Saturday, March 7, 2026

महिला दिवस पर एक अलग कहानी : वह ‘महिला’ जो असल में महिला नहीं है

*महिला दिवस पर एक अलग कहानी : वह ‘महिला’ जो असल में महिला नहीं है*

महिला दिवस पर आमतौर पर हम उन महिलाओं की कहानियां सुनते हैं जिन्होंने समाज में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं. लेकिन इस बार हम एक ऐसे विषय की बात कर रहे हैं जिस पर शायद बहुत कम चर्चा हुई है. उत्तराखंड के पारंपरिक छोलिया नृत्य में एक पुरुष कलाकार महिला का किरदार निभाता है और उसी अनुभव के साथ कई सवाल सामने आते हैं.

*छोलिया नृत्य की परंपरा*

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का प्रसिद्ध छोलिया नृत्य अपनी वीरता और परंपरा के लिए जाना जाता है. यह नृत्य आमतौर पर शादियों और उत्सवों में किया जाता है और तलवार तथा ढाल के साथ होने वाला यह प्रदर्शन कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान माना जाता है. बारात के साथ चलने वाली छोलिया की टोली अपनी तेज लय और पारंपरिक वेशभूषा के कारण अलग पहचान रखती है. पहले के समय में गांवों में महिलाएं सार्वजनिक मंचों पर नृत्य नहीं करती थीं. ऐसे में कई लोक प्रस्तुतियों में पुरुष ही महिला का वेश धारण करके स्त्री का किरदार निभाते थे. घाघरा, ओढ़नी और पारंपरिक आभूषण पहनकर वे मंच पर उतरते हैं और दर्शकों के सामने एक महिला की तरह अभिनय और नृत्य करते हैं. आज भी कई जगहों पर यह परंपरा जारी है और ऐसे कलाकार केवल नृत्य ही नहीं करते हैं, वह ऐसे चरित्र को भी जीवित रखते हैं जो परंपरा, समाज और स्त्री की छवि तीनों को जोड़ता है.

*पहचान छिपाने की मजबूरी और कलाकारों की बात*

इसी परंपरा से जुड़े एक युवा कलाकार से हमने बात की, जो छोलिया नृत्य में महिला का किरदार निभाते हैं. महिला दिवस के मौके पर उनसे बातचीत की. छोलिया में नृतक बने लड़के ने अपनी पहचान बताने से इनकार करते हुए कहा कि अभी हमारे समाज में यह स्वीकृत नहीं है, पहचान खुलने से लोग बात बनाएंगे. उनका कहना था कि मंच पर यह कला का हिस्सा है लेकिन वास्तविक जीवन में लोग इसे उसी नजर से नहीं देखते. उन्हीं के साथ वाद्य यंत्र बजाने वाले मुकेश हमसे बात करने के लिए तैयार हो गए. मुकेश बनबसा से हैं और अट्ठारह साल से इस काम से जुड़े हुए हैं. मुकेश कहते हैं कि सत्रह साल बाद यह पहला सीजन है जब वह नृतक नहीं बने हैं. उन्होंने अब तक चार हजार से शादियों में काम कर लिया है और इतने लंबे समय में इस परंपरा के साथ जुड़े रहकर उन्होंने इसके कई पहलुओं को करीब से देखा है.

*कमाई और काम का स्वरूप*

मुकेश ने आगे बात करते हुए कहा कि इस काम में अच्छा पैसा है लेकिन शादी के सीजन के बाद कोई और काम भी देखना पड़ता है. उनके अनुसार छोलिया नृत्य ज्यादातर शादियों से जुड़ा होता है, इसलिए यह पूरी तरह मौसमी काम है. जब शादी का सीजन खत्म हो जाता है तो कलाकारों को दूसरी आजीविका भी तलाशनी पड़ती है. मुकेश बताते हैं कि साल भर में वह छोलिया के जरिए चार पांच लाख रुपए तक आराम से कमा लेते हैं, लेकिन इसके लिए लगातार कार्यक्रमों में हिस्सा लेना पड़ता है और कई बार एक ही दिन में अलग अलग जगहों पर प्रदर्शन करना पड़ता है.

*वाद्य यंत्र और प्रस्तुति*

मुकेश ने बताया कि छोलिया नृत्य के दौरान नगरा, झाली, तुरी, दमाऊ और मशकबीन जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं. इन वाद्य यंत्रों की तेज ध्वनि और लय ही इस नृत्य की पहचान है. नृतक तलवार और ढाल के साथ कदम मिलाते हैं और वाद्य यंत्रों की लय के साथ पूरी प्रस्तुति आगे बढ़ती है. बारात के साथ चलती यह टोली कई बार सड़क पर ही प्रदर्शन करती है और आसपास के लोग भी इसे देखने के लिए रुक जाते हैं.

*महिला बनने का अनुभव*

महिला बनने के अपने अनुभव पर वह कहते हैं कि इस काम के बाद ही उन्होंने जाना कि वास्तव में महिला होना कितना कठिन है. उन्होंने कहा टेलीविजन पर महिला का किरदार निभाने वाले पुरुषों की इज्जत होती है लेकिन वास्तविक समाज में ऐसे लोगों को अब भी अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता. उन्होंने ये भी कहा कि सब लोग एक जैसे नहीं होते, कला की इज्जत करने वाले लोग भी हैं और उन्हीं की वजह से यह नृत्य अब तक बचा हुआ है.

*अनुभव के साथ महिला भागीदारी पर राय*

मुकेश कहते हैं कि नृत्य करते बहुत से पुरुष अश्लील हरकतें करते हैं, कुछ लोग गलत बात भी करते हैं. शरीर को छूना, नकोचना आम बात है, उन्होंने कहा कि एक पुरुष होकर उन्हें ये सब बुरा लगता है तो महिलाओं के लिए ये सब सहना कितना मुश्किल होता होगा. जो महिला रोज अपने काम के लिए सड़क पर निकल रही है उसके लिए एक महिला होना कितना मुश्किल है उन्होंने इसी काम के बाद समझा है.

क्या इस काम में महिलाओं को शामिल होना चाहिए, इस सवाल के साथ मुकेश और महिला बने लड़के ने बिल्कुल मना करते हुए कहा कि जब हमारे लिए यह सब करना इतना मुश्किल है तो वास्तव में अगर कोई महिला नृतक का काम करेगी तो उसके लिए तो यह बिल्कुल सही नहीं होगा.

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