पश्चिमी हिमालय के ऊंचाई वाले जंगल वहां की मिट्टी में नमी बनाए रखते हैं और जल स्रोतों को सहारा भी देते हैं. इन जंगलों की सबसे खास बात यह है कि ये बड़ी मात्रा में कार्बन संचित करते हैं, जिससे हिमालय की जैव विविधता संतुलित रहती है. एक रिसर्च में चौंकाने वाली बात सामने आई है कि अब इन जंगलों में ऊंचाई बढ़ने के साथ मिट्टी के गुण और वनस्पति की संरचना लगातार बदल रही है.
Scientific Reports में 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित शोधपत्र Elevation-driven influences on soil nutrient dynamics and vegetation structure in temperate subalpine forests of the Western Himalaya में Renu Rawal, Khashti Dasila, Lalit M. Tewari ने दिखाया है कि ऊंचाई बढ़ने पर मिट्टी की नमी, जल धारण क्षमता और कुछ पोषक तत्व बढ़ते हैं, जबकि पेड़ों की संख्या और प्रजातीय विविधता घटती जाती है. अध्ययन के अनुसार हिमालयी जंगलों में मिट्टी और वनस्पति के बीच होने वाले इन बदलावों को समझे बिना भविष्य की संरक्षण योजनाएं प्रभावी नहीं हो सकतीं.
*कहां हुआ अध्ययन और कैसे किया गया?*
यह अध्ययन उत्तराखंड के केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य के चोपता-तुंगनाथ क्षेत्र में 2100 से 3300 मीटर की ऊंचाई वाले समशीतोष्ण और उप-अल्पाइन वनों में किया गया. इस क्षेत्र को इसलिए चुना गया क्योंकि यहां निचले घने जंगलों से लेकर ट्रीलाइन (Treeline) के पास स्थित उप-अल्पाइन वन तक पूरे प्राकृतिक परिवर्तन को करीब से देखा जा सकता है.
शोधकर्ताओं ने पूरे क्षेत्र को 100-100 मीटर की ऊंचाई वाले हिस्सों में बांटा. प्रत्येक ऊंचाई पर तीन अध्ययन प्लॉट बनाए गए और कुल 105 प्लॉटों का सर्वेक्षण किया गया. इन प्लॉटों में पेड़ों, झाड़ियों और छोटे पौधों का अलग-अलग स्तर पर अध्ययन किया गया. उनकी संख्या, प्रजातीय समृद्धि, घनत्व और विविधता का आकलन किया गया.
प्रत्येक प्लॉट से पांच अलग-अलग स्थानों से मिट्टी के नमूने भी लिए गए. इन नमूनों की जांच दो गहराइयों, 0-15 सेंटीमीटर और 15-30 सेंटीमीटर पर की गई. मिट्टी में नमी, pH, घनत्व, रंध्रता (Porosity), जल धारण क्षमता, रेत, गाद और चिकनी मिट्टी का अनुपात जैसे कई मानकों का विश्लेषण किया गया. अध्ययन की व्यापकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वनस्पति के आकलन के लिए हजारों छोटे-छोटे अध्ययन खंडों (Quadrats) का उपयोग किया गया.
*ऊंचाई बढ़ने के साथ मिट्टी में क्या बदलाव मिले?*
अध्ययन में पाया गया कि ऊंचाई बढ़ने के साथ मिट्टी की नमी, रंध्रता, जल धारण क्षमता, रेत की मात्रा, उपलब्ध फास्फोरस और कुल नाइट्रोजन में सामान्य रूप से वृद्धि हुई.
इसके विपरीत मिट्टी का घनत्व, गाद, कार्बनिक कार्बन, कार्बनिक पदार्थ और कार्बन-नाइट्रोजन अनुपात में कमी दर्ज की गई. शोधकर्ताओं के अनुसार अधिक ऊंचाई पर कम तापमान और कम वाष्पोत्सर्जन के कारण मिट्टी अधिक समय तक नम रहती है, जिससे उसकी जल धारण क्षमता भी बढ़ जाती है. इससे मिट्टी अधिक भुरभुरी और कम सघन हो जाती है.
मिट्टी की ऊपरी और निचली परतों में भी स्पष्ट अंतर सामने आया. निचली परत में नमी, pH और चिकनी मिट्टी की मात्रा अधिक मिली, जबकि ऊपरी परत में कार्बनिक कार्बन, कार्बनिक पदार्थ, उपलब्ध नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और जल धारण क्षमता अधिक पाई गई. शोधकर्ताओं के अनुसार सतह पर पत्तियों और अन्य जैविक अवशेषों के लगातार जमा होने से ऊपरी परत अधिक पोषक बन जाती है.
*जंगल की वनस्पति भी बदल रही है*
अध्ययन में पाया गया कि ऊंचाई बढ़ने के साथ पेड़ों का घनत्व और प्रजातीय समृद्धि लगातार घटती गई. सबसे अधिक पेड़ मध्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिले और अधिक ऊंचाई पर उनकी संख्या कम होती गई.
इसके विपरीत जमीन पर उगने वाले छोटे पौधों और घास जैसी वनस्पतियों की विविधता ऊंचाई बढ़ने के साथ बढ़ती दिखाई दी. झाड़ियों की विविधता में कोई स्पष्ट पैटर्न नहीं मिला.
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि अलग-अलग ऊंचाई पर पौध समुदायों की संरचना बदलती जाती है, जिससे पूरे वन का स्वरूप भी बदल जाता है.
अध्ययन के अनुसार ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान में कमी, मिट्टी की नमी में वृद्धि, पोषक तत्वों का वितरण और पौधों तथा मिट्टी के बीच होने वाली पारिस्थितिक प्रक्रियाएं इन बदलावों के प्रमुख कारण हैं.
शोधकर्ताओं का मानना है कि अधिक ऊंचाई पर कम तापमान के कारण वाष्पोत्सर्जन घट जाता है, जिससे मिट्टी में पानी अधिक समय तक बना रहता है. वहीं पेड़ों की जैव मात्रा कम होने से पत्तियों का गिरना भी कम हो जाता है, जिसके कारण कार्बनिक कार्बन और कार्बनिक पदार्थ की मात्रा घटती है. वहां उपलब्ध नाइट्रोजन और फास्फोरस में वृद्धि यह संकेत देती है कि अधिक ऊंचाई पर पोषक तत्वों का नुकसान अपेक्षाकृत कम हो रहा है.
*कौन से कारक सबसे अधिक प्रभाव डालते हैं?*
शोधकर्ताओं ने Canonical Correspondence Analysis (CCA) के माध्यम से मिट्टी और वनस्पति के संबंधों का भी विश्लेषण किया. इसमें पाया गया कि ऊंचाई, मिट्टी की नमी, मिट्टी का घनत्व और गाद की मात्रा पौध प्रजातियों की संरचना और उनके वितरण को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारक हैं.
इसके अलावा मिट्टी के अन्य भौतिक और रासायनिक गुण भी अलग-अलग प्रकार की वनस्पतियों को प्रभावित करते हैं.
*अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?*
अध्ययन का निष्कर्ष है कि पश्चिमी हिमालय के उच्च पर्वतीय वनों में मिट्टी और वनस्पति के बीच गहरा पारिस्थितिक संबंध मौजूद है. ऊंचाई में बदलाव केवल पेड़ों की संख्या को प्रभावित नहीं करता, यह मिट्टी के पोषक तत्वों, उसकी जल धारण क्षमता, प्रजातीय संरचना और पूरे वन तंत्र की कार्यप्रणाली को भी बदल देता है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि हिमालय जलवायु परिवर्तन के प्रति दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है. ऐसे में मिट्टी और वनस्पति में हो रहे इन परिवर्तनों की दीर्घकालिक निगरानी जरूरी है. इससे भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने, जैव विविधता के संरक्षण की योजनाएं बनाने और हिमालयी वनों के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए ठोस आधार तैयार करने में मदद मिल सकती है.
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