अमरनाथ का हिमलिंग समय से पहले क्यों पिघला? इतिहास और भूविज्ञान से समझिए
इस बार अमरनाथ यात्रा शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद वहां बना बर्फ का शिवलिंग लगभग पूरी तरह पिघल गया. इससे श्रद्धालुओं के बीच चिंता और जिज्ञासा दोनों बढ़ गईं. क्या यह सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है या बदलती जलवायु का संकेत? इस सवाल को समझने के लिए अमरनाथ के इतिहास, गुफा के भूविज्ञान और वैज्ञानिकों की राय पर नजर डालना जरूरी है.
हजारों वर्षों से आस्था का केंद्र
अंग्रेजी, संस्कृत और हिंदी में स्नातकोत्तर तथा बी.एड. की डिग्री प्राप्त प्रो. एम.एल. कौल का The Amarnath Pilgrimage: History and Facts शीर्षक लेख Kashmiri Pandit Network की वेबसाइट पर प्रकाशित है. लेख के अनुसार प्राकृतिक रूप से बनने वाला बर्फ का अमरनाथ हिमलिंग हजारों वर्षों से श्रद्धा का पूजनीय स्थल रहा है. यह हिमलिंग चंद्रमा के बढ़ने और घटने के साथ आकार में बढ़ता और घटता है. श्रावण पूर्णिमा की रात यह अपने पूर्ण आकार को प्राप्त करता है. लिखित अभिलेखों में इस हिमलिंग को 'अमरेश', 'अमरेश्वर', 'रसलिंगम', 'सिद्धि लिंगम', 'बुद्धि लिंगम', 'शुद्धि लिंगम', 'पुरातन बुद्धि लिंगम' और 'पुंसवन लिंगम' जैसे नामों से संबोधित किया गया है. 'अमरनाथ' नाम का प्रचलन 'अमरनाथ महात्म्य' से माना जाता है, जिसे इस पवित्र तीर्थ पर एक प्रामाणिक ग्रंथ बताया गया है.
अमरनाथ गुफा के भूविज्ञान की कहानी
समुद्र तल से 12,729 फीट की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा ऊपरी सिंध घाटी की एक सहायक हिमानी घाटी में स्थित है. 1970 में प्रकाशित British Karst Research Expedition to the Himalaya की रिपोर्ट के अनुसार अमरनाथ गुफा एक मोटी और लगभग क्षैतिज चूना पत्थर की परत में बनी है. रिपोर्ट बताती है कि गुफा मुख्य रूप से फ्रॉस्ट एक्शन से बनी है. गुफा का प्रवेश द्वार लगभग 100 फीट चौड़ा और 50 फीट ऊंचा है, जबकि इसकी लंबाई लगभग 50 फीट है.
रिपोर्ट के अनुसार, गुफा के भीतर एक छोटे कक्ष में बर्फ के दो स्टैलेग्माइट बने थे. सितंबर 1970 की शुरुआत में किए गए सर्वेक्षण के दौरान एक स्टैलेग्माइट लगभग पूरी तरह पिघल चुका था, जबकि दूसरा लगभग एक फुट ऊंचा और छह इंच व्यास का रह गया था. रिपोर्ट के अनुसार, यही बर्फ का स्तंभ हिंदू श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है.
जलवायु परिवर्तन का कितना असर?
बरेली कॉलेज, बरेली के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. जसपाल सिंह का कहना है कि अमरनाथ गुफा में बर्फ के शिवलिंग का समय से पहले पिघलना ग्लोबल वार्मिंग, कम हिमपात, बढ़ते तापमान और स्थानीय प्रदूषण, खासकर वाहनों से निकलने वाले ब्लैक कार्बन, जैसे कई कारकों का संयुक्त प्रभाव हो सकता है. हालांकि, किसी एक वर्ष की घटना के आधार पर केवल प्रदूषण को इसका कारण नहीं माना जा सकता. इसके लिए मौसम, तापमान और हिमपात के दीर्घकालिक वैज्ञानिक आंकड़ों का विश्लेषण जरूरी है.
डॉ. जसपाल सिंह के अनुसार, पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण, कार्बन उत्सर्जन में कमी और धारणीय (सस्टेनेबल) पर्यटन को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है. उनका कहना है कि अमरनाथ जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि प्राकृतिक हिम संरचनाओं और वहां के पारिस्थितिक संतुलन को सुरक्षित रखा जा सके.
लगभग डेढ़ दशक पहले ही जताई गई थी चिंता
लगभग डेढ़ दशक पहले National Geographic में प्रकाशित Massive Hindu Pilgrimage Melting Sacred Glacier शीर्षक रिपोर्ट में अमरनाथ यात्रा के बढ़ते दबाव और उसके हिमालयी पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव पर चिंता व्यक्त की गई थी. रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर के वैज्ञानिक प्रो. शकील रोमशू ने कहा था कि हिमनद शून्य से नीचे के तापमान वाला क्षेत्र होता है, लेकिन हजारों लोग, चाहे वे यात्री हों या कोई और, 37 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले शरीर के साथ वहां मौजूद रहते हैं. हेलीकॉप्टर उड़ते हैं तो उनसे भी काफी ऊष्मा उत्पन्न होती है और तापमान बढ़ता है. इसलिए इससे क्षेत्र में बर्फ और हिमनदों के पिघलने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है.
रिपोर्ट के अनुसार, प्रो. रोमशू का कहना था कि पश्चिमी हिमालय के हिमनदों पर जलवायु परिवर्तन का व्यापक प्रभाव पड़ रहा है और अमरनाथ यात्रा उससे जुड़ी चुनौतियों का केवल एक हिस्सा है. उन्होंने सरकार से इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की वहन क्षमता के अनुरूप तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या सीमित करने की आवश्यकता बताई.
इसी रिपोर्ट में काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के तत्कालीन महानिदेशक डेविड मोल्डेन ने कहा था कि सरकारों को ऐसी नीतियां और नियम बनाने चाहिए, जिनसे इन संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्रों में आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की संख्या की निगरानी हो सके तथा पर्यावरण संरक्षण के साथ सतत पर्यटन को बढ़ावा मिले.
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