Saturday, July 18, 2026

सफलता की ये राह सिखाती है, नौकरी की राह छोड़ो और उद्यम से नाता जोड़ो

*सफलता का संदेश साफ, नौकरी के साथ उद्यम का भी रखिए ख्वाब*

सरकारी नौकरी आज भी लाखों युवाओं का सबसे बड़ा सपना है. वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, कोचिंग, आवेदन और इंतजार में युवाओं की उम्र का बड़ा हिस्सा बीत जाता है. उत्तराखंड के भवाली में संजीव भगत की सफलता युवाओं को एक और राह दिखाते हुए सिखाती है कि उद्यम से भी जीवन में सफल हुआ जा सकता है. संघर्ष, धैर्य और लगातार सीखते रहने से देर ही सही पर सफलता जरूर मिलती है.

*17 साल की उम्र में देखा सपना और फिर संघर्ष से सींचा कारोबार*

15 जून 1969 को भवाली के पास फरसौली गांव में जन्मे संजीव भगत एक साधारण परिवार से आते हैं. उनके पिता नंद किशोर भगत वन विभाग में क्लर्क थे, माता गृहिणी थीं और दादा की भवाली में छोटी दुकान थी. आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि कई बार स्कूल आने-जाने के पैसे तक नहीं होते थे. पिता की सोच अपने समय से आगे थी. उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ कर पत्रकारिता की और वानिकी पर आधारित एक पत्रिका बनरखा निकाली, फिर उत्तराखण्ड भारती और नैनीताल समाचार से जुड़े. इसी माहौल में संजीव ने ग्यारहवीं कक्षा में रहते हुए उत्तर प्रदेश खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड को उद्योग लगाने के लिए पत्र लिख दिया. अधिकारी जब उद्योग का मॉडल देखने पहुंचे तो सामने एक किशोर को देखकर हैरान रह गए. बैंक से ऋण लेने के लिए उन्होंने कई चक्कर लगाए और शिकायतें कीं फिर भी ऋण नहीं मिला. आखिर पिता ने अपनी बचत से उन्हें पचास हजार रुपये दिए और 1989 में संजीव ने फूड प्रोसेसिंग की एक इमारत खड़ी की. उन्होंने निजी छात्र के रूप में अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और साथ में उत्तर उजाला, दैनिक जागरण में पत्रकारिता भी करते रहे. वर्ष 1993 में उनका 2.63 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ और फूड प्रोसेसिंग इकाई की औपचारिक शुरुआत हुई.

*नुकसान के साल बीते, पहाड़ का स्वाद पहचान बन गया*

संजीव भगत बताते हैं कि कारोबार शुरू करना आसान नहीं था, साल 1994 में बाजार में भेजा गया अधिकांश माल बिकने के बाद भी भुगतान में फंस गया. 1995 में फिर परिवार की बचत उनके लिए सहारा बनी. 1996 और 1997 तक नुकसान झेलते हुए भी उन्होंने काम बंद नहीं किया. उनकी बड़ी बहन, जिन्होंने इग्नू से फूड प्रोसेसिंग का प्रशिक्षण लिया था, शुरुआती दौर में लगातार साथ रहीं. 1998 में फरसौली में नैनीताल फूड प्रोडक्ट्स का "फ्रूटेज" नाम से पहला शोरूम खुला और यहीं से उनके कारोबार ने रफ्तार पकड़ी. 

आज फ्रूटेज के उत्पाद उत्तराखंड की पहचान बन चुके हैं. बुरांश, माल्टा और पहाड़ के दूसरे फलों से बने उत्पादों ने स्थानीय बाजार में अपनी जगह बनाई है. संजीव कहते हैं कि उनकी इकाई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देती है. गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के विद्यार्थियों को हर वर्ष औद्योगिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है. आज स्थानीय उत्पादों की मांग, ई कॉमर्स, पर्यटन और डिजिटल बाजार तेजी से बढ़ रहे हैं, तब यह काम और भी महत्वपूर्ण हो गया है.

*व्यापार का सबसे बड़ा पाठ ये कि "बाजार सिखाता है"*

संजीव भगत ने अपने उत्पाद अहमदाबाद, राजकोट, सूरत, बड़ौदा, दिल्ली और लखनऊ तक पहुंचाने की कोशिश की. वे कहते हैं कि अनुभव ने उन्हें सिखाया कि हर उत्पाद का अपना भौगोलिक बाजार होता है. बुरांश हिमालय के लोगों के लिए परिचित है, मैदानों में इसकी पहचान सीमित है. परिवहन, भंडारण और स्वाद की भिन्नता भी कारोबार की दिशा तय करती है.

संजीव का मानना है कि उद्योग लगाने के लिए योजना, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, पूंजी, विपणन और धैर्य सभी जरूरी हैं. बैंक के चक्कर लगाने पड़ते हैं, मशीनें खरीदनी होती हैं, जमीन और ढांचा तैयार करना पड़ता है, तब कहीं जाकर उद्योग खड़ा होता है. आज भी उनका सबसे बड़ा संदेश यही है कि समाज को अपने बच्चों को नौकरी के साथ उद्यमिता के लिए भी तैयार करना होगा. हर परिवार अगर अपने बच्चों को जोखिम उठाना, बाजार समझना और अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाए तो रोजगार की तस्वीर बदल सकती है. उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में पलायन आज भी चुनौती है और इस स्थिति में स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्योग गांवों से पलायन रोकने का उपाय बन सकते हैं.

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