Thursday, July 23, 2026

पीएचडी पूरी

आंकड़ों, इंटरव्यू, रिसर्च पेपरों में खुद को खपाते रहने के बाद आज लंबे समय बाद खुद के लिए कुछ लिख रहा हूं।
आज पीएचडी पूरी हो गई, वो पीएचडी जिसके लिए सालों कई बार छुट्टी लेकर बरेली आना जाना लगा रहा। थीसिस लिखते बहुत बार लगा कि अब तो आंखों में चश्मा लग ही जाएगा लेकिन मशीनों ने हमेशा आंखों को दुरुस्त बता दिया।
डॉक्टर कहलाने की खुशी इस माहौल में कहीं खो सी गई है, धूप बरसात में स्विगी जोमेटो में दस बारह हजार की नौकरी करते भाईयों को देखना कम दुखदाई था जो युवा साथियों को पुलिस से पिटते हुए देख लिया।
चौथे स्तंभ के कारीगरों को भी जलील होते देखना निराश करने वाला रहा। लैपडॉग मीडिया में काम करने वाले पत्रकारों के साथ खुद के दम पर टिके पत्रकारों के लिए भी यह दौर बुरा ही है। जिगरे वाले पत्रकार साथी भाई राहुल कोटियाल के पैरों में पड़े निशान ताउम्र आंखों में छाए रहेंगे।

ये बादल देर सवेर छंट ही जाएंगे लेकिन इसके बाद क्या! हम यह गारंटी ले सकते हैं कि ऐसा कोई आंदोलन नहीं होगा?
विपक्ष जब सत्ता में आएगा तो वह निष्पक्ष सत्ता चला पाएगा।
हमने देखा कि देश की पुलिस और मीडिया का इन आंदोलनों को भड़काने और शांत करने में अहम किरदार है लेकिन सबसे निराशाजनक यही है कि ये दोनों संस्थाएं सालों से कमजोर रही है।
पुलिस सुधार की बात सालों से उठते आई है और प्रेस फ्रीडम की रैंकिंग से हम परिचित ही हैं।
जब हम वैश्विक स्तर पर प्रेस फ्रीडम इंडेक्स को देखते हैं, तो नार्वे जैसे देश लगातार शीर्ष पर नजर आते हैं। नार्वे में प्रेस फ्रीडम के आगे रहने का सबसे बड़ा कारण वहां का संवैधानिक और संस्थागत ढांचा है। नार्वे के संविधान का अनुच्छेद 100 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना की पारदर्शिता की स्पष्ट गारंटी देता है। वहां 'फ्रीडम ऑफ इंफॉर्मेशन एक्ट' के तहत सरकारी कामकाज, फाइलों और फैसलों की जानकारी हासिल करना बेहद आसान और पारदर्शी है। इसके अलावा, वहां मीडिया के मालिकाना हक में किसी एक कॉरपोरेट घराने या राजनीतिक दल का एकाधिकार नहीं है; सरकार स्वतंत्र और क्षेत्रीय मीडिया को वित्तीय मदद (Grants) तो देती है, लेकिन उनके संपादकीय कामकाज में रत्ती भर भी दखल नहीं देती। वहां पत्रकारों पर राजनीतिक दबाव या पुलिसिया कार्रवाई का डर न के बराबर है।
वही व्यवस्था भारत में लागू करने के लिए सबसे पहले सूचना के अधिकार (RTI) को दोबारा उसकी पूरी ताकत और स्वतंत्रता के साथ बहाल करना होगा। मीडिया ओनरशिप के लिए सख्त नियम बनाने होंगे ताकि किसी एक उद्योगपति का पूरी मीडिया पर कब्जा न हो सके। विज्ञापन बांटने की प्रक्रिया को राजनीतिक निष्ठा के बजाय एक पारदर्शी और स्वतंत्र बोर्ड के अधीन करना पड़ेगा, और ऑन-ग्राउंड काम करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक कड़ा 'पत्रकार सुरक्षा कानून' बनाना बेहद जरूरी है।
जहां तक पुलिस सुधारों का सवाल है, भारत में आजादी के बाद से अब तक कई अहम कमेटियां और आयोग बने हैं, लेकिन उनकी सिफारिशें अक्सर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण फाइलों में ही दबी रह गईं। 1977-81 में बना राष्ट्रीय पुलिस आयोग (National Police Commission) स्वतंत्रता के बाद का पहला बड़ा प्रयास था, जिसने पुलिस को राजनीतिक आकाओं के दबाव से मुक्त करने की पुरजोर वकालत की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर 1998 में रिबेरो कमेटी और 2000 में पद्मनाभैया कमेटी बनी, जिन्होंने पुलिस की भर्ती, ट्रेनिंग और जांच (Investigation) को कानून-व्यवस्था (Law & Order) से अलग करने के महत्वपूर्ण सुझाव दिए। आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के लिए 2003 में मलिमथ कमेटी का गठन हुआ। फिर 2006 में पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य सुरक्षा आयोग के गठन, डीजीपी के न्यूनतम कार्यकाल और पुलिस की स्वतंत्रता को लेकर सात बड़े निर्देश दिए, जिन्हें आज भी सही मायनों में जमीन पर उतारा जाना बाकी है।
यदि हम विश्व की सर्वश्रेष्ठ पुलिस व्यवस्थाओं, जैसे फिनलैंड या जापान की तरफ देखें, तो वहां पुलिस को केवल अधिकार नहीं, बल्कि बेहतरीन सुविधाएं और पेशेवर माहौल मिलता है। फिनलैंड में पुलिस अधिकारी बनने के लिए 3 से 3.5 साल की बाकायदा यूनिवर्सिटी डिग्री अनिवार्य है, जहां केवल कानून ही नहीं बल्कि मानवाधिकार और मनोविज्ञान भी पढ़ाया जाता है। वहां पुलिसकर्मियों के लिए 8 घंटे की शिफ्ट तय होती है और उनके मानसिक तनाव को दूर करने के लिए नियमित काउंसलर्स की सुविधा मिलती है। जापान में 'कोबान' (स्थानीय पुलिस बूथ) की व्यवस्था है, जहां पुलिस अधिकारी जनता के बीच रहकर उनका भरोसा जीतते हैं। वहां जवानों को आधुनिक तकनीक, बॉडी कैम, उच्च स्तरीय प्रशिक्षण और सम्मानजनक वेतन-सुविधाएं हासिल हैं, जिससे पुलिस का रवैया दमनकारी होने के बजाय सेवा-उन्मुख बनता है।

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