Sunday, July 5, 2026

नम्बर में ही नहीं, महिला सशक्तिकरण में भी अव्वल है भारत का प्रथम गांव माणा

नम्बर में ही नहीं, महिला सशक्तिकरण में भी अव्वल है भारत का प्रथम गांव माणा

भारत का प्रथम गांव माणा अपनी भौगोलिक पहचान और बद्रीनाथ धाम से जुड़ी आस्था के लिए जाना जाता है, लेकिन इस गांव की एक और पहचान है, जो शायद उतनी चर्चा में नहीं आती. यहां महिलाओं का हुनर और मेहनत गांव की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है. ऊन से ऊनी कपड़े तैयार करने से लेकर उन्हें बाजार तक पहुंचाने, दुकान चलाने, खेती और पशुपालन तक, गांव की महिलाएं हर स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.

बुग्याल से शुरू होती है आत्मनिर्भरता की कहानी

गांव में तीन बार प्रधान रहे पीतांबर सिंह मोलपा बताते हैं कि माणा गांव वालों के बारह बुग्याल हैं, जिन्हें वे चरवाहों को किराए पर देते हैं. चरवाहे उनमें भेड़ चराते हैं और बाद में माणा वाले उनसे ऊन भी खरीदते हैं.

मोलपा बताते हैं कि गांव की कुंवारी लड़कियों के हाथों का बना कम्बल बद्रीनाथ धाम में भगवान को चढ़ाया जाता है और मंदिर की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसी परंपरा के साथ गांव की महिलाएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऊनी कपड़े बुनने का हुनर सीखती और आगे बढ़ाती रही हैं. माणा की पहचान आज भी उसके पारंपरिक ऊनी हस्तशिल्प से जुड़ी हुई है.

बचपन से सीख, सीजन में लाखों की कमाई

26 वर्षीय नीलम बताती हैं कि गांव में लगभग दो हजार लोगों की आबादी है, जिसमें लगभग आधी महिलाएं हैं. वह कहती हैं कि देश का पहला गांव माणा शायद ऐसा पहला गांव भी होगा, जहां किसी परिवार की अर्थव्यवस्था में आधे से ज्यादा योगदान महिलाओं का होता है.

नीलम के अनुसार, गांव की लड़कियां बचपन से ही ऊनी कपड़े बुनना सीख लेती हैं. बद्रीनाथ धाम के यात्रा सीजन के दौरान महिलाएं अपने हाथों से बुने स्वेटर, टोपी, कम्बल, मोजे और दूसरे ऊनी कपड़े दुकानों में बेचती हैं. गांव की बाजार में भी अधिकतर दुकानों पर महिलाएं ही बैठी हुई दिखाई देती हैं.

समूहों से बढ़ा महिलाओं का आत्मविश्वास

पीताम्बर सिंह कहते हैं कि ऊनी कपड़ों की बिक्री से गांव की महिलाएं यात्रा सीजन में लाखों रुपये तक की कमाई कर लेती हैं. इसके साथ ही वे खेती और पशुपालन में भी बराबर की भागीदारी निभाती हैं.

उन्होंने आगे कहा कि गांव की महिलाओं ने मिलकर काम करने के लिए कई समूह भी बनाए हैं. इन समूहों के जरिए वे ऊनी उत्पाद तैयार करने, उन्हें बेचने और एक-दूसरे का सहयोग करने का काम करती हैं.

मार्च 2026 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टीडिसिप्लिनरी एजुकेशनल रिसर्च (IJMER) में प्रकाशित डॉ. कृष्णा रॉय के शोध पत्र में माणा को जनभागीदारी आधारित विकास के एक उदाहरण के रूप में बताया गया है. अध्ययन के अनुसार, गांव में स्वयं सहायता समूहों, कौशल विकास कार्यक्रमों और सरकारी योजनाओं के जरिए पारंपरिक भोटिया ऊनी शिल्प को नए बाजारों से जोड़ने की कोशिश की गई है. शोध के मुताबिक, माणा में विकास का मॉडल समुदाय की भागीदारी और अधिकार आधारित दृष्टिकोण पर आधारित है. अध्ययन में स्वयं सहायता समूहों, आजीविका कार्यक्रमों और पारंपरिक ऊनी शिल्प को बढ़ावा देने के प्रयासों को इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है.

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