अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान, बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र में बढ़ते खतरे की चेतावनी
उत्तराखंड के मध्य हिमालय में स्थित अलकनंदा बेसिन में जलवायु परिवर्तन के साथ ग्लेशियरों की बदलती स्थिति अब नए तरह के जोखिम पैदा कर रही है. वर्ष 2026 में npj Natural Hazards में प्रकाशित शोधपत्र "Basin-scale Inventory and Exposure Assessment of Hanging Glaciers, Central Himalaya" में पहली बार पूरे अलकनंदा बेसिन के हैंगिंग ग्लेशियरों (खड़ी ढलानों पर स्थित ग्लेशियर) का विस्तृत आकलन किया गया है. नंदू कृष्णन, आशीम सत्तार और हरेंद्र सिंह नेगी सहित शोधकर्ताओं की टीम का कहना है कि तेजी से बढ़ती गर्मी, जलवायु परिवर्तन और हिमालय में बढ़ते मानवीय दबाव के बीच इन ग्लेशियरों से जुड़े जोखिमों को अब गंभीरता से समझने और उनकी नियमित निगरानी की आवश्यकता है.
अलकनंदा बेसिन का पहला व्यापक आकलन
शोधकर्ताओं ने अलकनंदा बेसिन में कुल 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की है. इनका कुल क्षेत्रफल 71.7 वर्ग किलोमीटर है, जबकि इनमें मौजूद बर्फ का अनुमानित आयतन 2.39 घन किलोमीटर है. अध्ययन के अनुसार इनमें से लगभग 0.74 घन किलोमीटर बर्फ अस्थिर "हैंगिंग मास" के रूप में मौजूद है, जिसके टूटकर नीचे गिरने की आशंका रहती है. शोधपत्र बताता है कि ये ग्लेशियर औसतन 33 डिग्री से अधिक ढलान वाले पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित हैं और अधिकांश दक्षिण-पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए हैं. अध्ययन में यह भी पाया गया कि ऊपरी अलकनंदा क्षेत्र में कुल हैंगिंग बर्फ का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है.
क्यों बढ़ रही है चिंता?
शोधपत्र के अनुसार पिछले दो दशकों में हिमालय का तापमान वैश्विक औसत से अधिक तेजी से बढ़ा है. इसके कारण ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं और पहले स्थिर रहे कई पर्वतीय ग्लेशियर अब अस्थिर होते हुए हैंगिंग ग्लेशियरों का रूप ले रहे हैं. अध्ययन बताता है कि ऐसे ग्लेशियर समय-समय पर बर्फ और हिमखंडों के टूटने की घटनाओं के माध्यम से अपना संतुलन बनाए रखते हैं. अनियमित वर्षा, पर्वतीय ढलानों का क्षरण और हिमालय की सक्रिय भूकंपीय प्रकृति भी इस अस्थिरता को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं.
शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि हिमालय में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, सड़क निर्माण, तीर्थ पर्यटन और जलविद्युत परियोजनाओं के कारण अब पहले की तुलना में कहीं अधिक आबादी और आधारभूत ढांचा इन संभावित खतरों के दायरे में आ गया है.
बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र पर विशेष फोकस
अध्ययन में r.avaflow मॉडल के माध्यम से संभावित हिमस्खलन (Avalanche) का सिमुलेशन किया गया. इसके अनुसार यदि हैंगिंग ग्लेशियरों से बड़े पैमाने पर बर्फ टूटती है तो उसका प्रभाव नीचे स्थित बस्तियों और आधारभूत ढांचे तक पहुंच सकता है. शोधपत्र के अनुसार बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र में ऐसे संभावित हिमस्खलन के दौरान प्रवाह की ऊंचाई 50 मीटर से अधिक हो सकती है.
अध्ययन यह भी बताता है कि अलकनंदा बेसिन में बद्रीनाथ, केदारनाथ, हेमकुंड साहिब जैसे प्रमुख तीर्थस्थल, जोशीमठ, चमोली, तपोवन और माणा जैसी बस्तियां, ट्रेकिंग मार्ग तथा विष्णुप्रयाग, तपोवन-विष्णुगाड और पीपलकोटी जैसी जलविद्युत परियोजनाएं ग्लेशियरों के निकट स्थित हैं. इसलिए भविष्य में किसी बड़े हिमस्खलन की स्थिति में इन क्षेत्रों की संवेदनशीलता बढ़ सकती है.
2030 तक कई गुना बढ़ सकता है जोखिम
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में जोखिम वाले क्षेत्रों में बढ़ते निर्माण और आबादी का भी आकलन किया है. उनके अनुसार वर्ष 2000 में जहां जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्मित क्षेत्र लगभग 8 हजार वर्ग मीटर था, वहीं 2030 तक इसके बढ़कर लगभग 1.52 लाख वर्ग मीटर तक पहुंचने का अनुमान है. इसी अवधि में जोखिम वाले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी लगभग 380 से बढ़कर 8,500 तक पहुंच सकती है.
अध्ययन में कहा गया है कि अलकनंदा बेसिन के लगभग 80 प्रतिशत ग्लेशियर छोटे हैं और खड़ी पर्वतीय ढलानों पर स्थित हैं. इसलिए जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के साथ इनकी अस्थिरता और बढ़ सकती है. शोधकर्ताओं का मानना है कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में केवल आपदा आने के बाद राहत और बचाव पर निर्भर रहने के बजाय जोखिम आधारित योजना, नियमित निगरानी और वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर विकास योजनाएं तैयार करना समय की आवश्यकता है.
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