बदलते हिमालय की कहानी : माणा के लोगों के अनुभव और वैज्ञानिक पड़ताल
बद्रीनाथ धाम और भारत के प्रथम गांव माणा के ऊपर खड़ी पहाड़ी ढलानों पर बड़ी संख्या में ऐसे ग्लेशियर मौजूद हैं, जिन्हें वैज्ञानिक हैंगिंग ग्लेशियर कहते हैं. npj Natural Hazards में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक अलकनंदा बेसिन में ऐसे 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है. अध्ययन के अनुसार ऊपरी अलकनंदा बेसिन, जिसमें बद्रीनाथ और माणा का क्षेत्र शामिल है, हैंगिंग ग्लेशियरों की संख्या और अस्थिर बर्फ के आयतन के लिहाज से सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में है. इसी वजह से शोधकर्ताओं ने बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र को संभावित हिमस्खलन जोखिम के विस्तृत आकलन के लिए चुना.
इन्हीं पहाड़ों के बीच दशकों से रह रहे माणा गांव के दो बार ग्राम प्रधान रहे पीताम्बर सिंह मोलपा के मुताबिक हिमालय में यह बदलाव केवल वैज्ञानिक अध्ययनों तक सीमित नहीं है. उनके अनुसार मौसम, ग्लेशियरों और प्राकृतिक जलस्रोतों में आए बदलाव स्थानीय लोग वर्षों से महसूस कर रहे हैं.
दशकों में बदलता पहाड़
पीताम्बर सिंह मोलपा के मुताबिक पहले मई और जून तक भी आसपास के ऊंचे इलाकों में काफी बर्फ रहती थी. उनके अनुसार पांडुकेश्वर से आगे विष्णुप्रयाग घाटी में प्रवेश करते ही कई स्थानों पर ग्लेशियर दिखाई देते थे. हनुमान चट्टी पार करते ही बर्फानी हवा महसूस होने लगती थी, लेकिन अब पहले जैसी स्थिति नहीं रही.
उनके मुताबिक सबसे बड़ा बदलाव ग्लेशियरों में दिखाई देता है. उन्होंने सतोपंथ ग्लेशियर को लगातार पीछे खिसकते देखा है. उनके अनुसार वसुधारा के सामने मौजूद ग्लेशियर भी पहले की तुलना में पीछे चला गया है. उनका कहना है कि 1970 और 1980 के दशक के बाद कई छोटे ग्लेशियर खत्म हो गए या काफी पीछे चले गए.
पीताम्बर सिंह मोलपा के मुताबिक मौसम का स्वरूप भी पहले जैसा नहीं रहा. उनके अनुसार अब कई बार प्री-मानसून में तेज बारिश होती है. मानसून के दौरान कभी अपेक्षाकृत कम बारिश होती है और पोस्ट-मानसून में फिर तेज वर्षा देखने को मिलती है. उनके मुताबिक पहले बारिश का यह पैटर्न नहीं था.
उनका कहना है कि प्रकृति में भी कई बदलाव दिखाई दे रहे हैं. उनके अनुसार पहले प्रकृति के साथ इतनी छेड़छाड़ नहीं होती थी. अब पहाड़ों की कटाई बढ़ी है. बरसात के दौरान कई जगह चट्टानों से पानी निकलता दिखाई देता है, जो पहले कम देखने को मिलता था.
पीताम्बर सिंह मोलपा के मुताबिक प्राकृतिक जलस्रोतों में भी बदलाव महसूस हुआ है. उनके अनुसार कुछ प्राकृतिक स्रोत समय के साथ सूख गए, हालांकि बरसात के दौरान उनमें फिर पानी आने लगता है. उनका कहना है कि पहले नालों में पानी अधिक रहता था. वह कुबेर नाला, धंतोली नाला, द्रोणा नाला और अन्य स्थानीय जलस्रोतों का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि समय के साथ इनमें भी परिवर्तन महसूस हुआ है.
उनके मुताबिक हिमालय में आए ये बदलाव किसी एक वर्ष या एक मौसम की बात नहीं हैं, बल्कि कई दशकों के दौरान धीरे-धीरे दिखाई देने लगे हैं.
जब स्थानीय अनुभवों के साथ पढ़ा गया अध्ययन
पीताम्बर सिंह मोलपा ने जिन बदलावों का उल्लेख किया, अध्ययन में भी ग्लेशियरों, बदलती जलवायु और संभावित जोखिम से जुड़े निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए हैं.
अध्ययन के मुताबिक पिछले दो दशकों में हिमालय में तापमान वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ा है. इसके कारण कई ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार कई स्थानों पर मुख्य ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ सहायक ग्लेशियर अलग हो गए हैं, जिससे खड़ी ढलानों पर हैंगिंग ग्लेशियर बने हैं. अध्ययन के मुताबिक ऐसे हैंगिंग ग्लेशियर संभावित हिमस्खलन जोखिम के आकलन में महत्वपूर्ण हैं.
बारिश के पैटर्न में बदलाव को लेकर भी अध्ययन बदलती जलवायु और वर्षा में परिवर्तन को महत्वपूर्ण कारकों में शामिल करता है. शोधकर्ताओं के मुताबिक तापमान में वृद्धि, बदलती वर्षा और अन्य भू-आकृतिक प्रक्रियाएं हैंगिंग ग्लेशियरों की स्थिरता को प्रभावित कर रही हैं.
प्राकृतिक जलस्रोतों में बदलाव का उल्लेख अध्ययन सीधे तौर पर नहीं करता. हालांकि शोधकर्ताओं के मुताबिक यदि किसी हैंगिंग ग्लेशियर का हिस्सा टूटता है तो उसके साथ चट्टान और मलबा भी नीचे आ सकता है. ऐसी स्थिति में नदी का प्रवाह अस्थायी रूप से अवरुद्ध हो सकता है और बाद में उसके टूटने पर बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है.
अध्ययन के मुताबिक संभावित जोखिम केवल ग्लेशियरों की स्थिति पर निर्भर नहीं करता. शोधकर्ताओं ने उनके नीचे मौजूद आबादी, सड़कों और दूसरे बुनियादी ढांचे को भी जोखिम के आकलन का हिस्सा बनाया है.
बद्रीनाथ-माणा पर क्यों केंद्रित रहा अध्ययन?
अध्ययन के मुताबिक बद्रीनाथ और माणा के आसपास मौजूद 25 हैंगिंग ग्लेशियरों को आधार बनाकर संभावित हिमस्खलन का मॉडल तैयार किया गया. इसका उद्देश्य किसी भविष्य की घटना की भविष्यवाणी करना नहीं, बल्कि सबसे खराब संभावित स्थिति का आकलन करना था.
शोधकर्ताओं के मुताबिक यदि किसी हैंगिंग ग्लेशियर का पूरा अस्थिर हिस्सा टूट जाए तो उसका प्रभाव बद्रीनाथ, माणा, हनुमान चट्टी और घांघरिया जैसे क्षेत्रों तक पहुंच सकता है. अध्ययन के अनुसार मॉडल में बद्रीनाथ क्षेत्र में अधिकतम प्रवाह ऊंचाई 51 मीटर, बद्रीनाथ-माणा सड़क पर 48 मीटर और हनुमान चट्टी के आसपास 40 मीटर तक दर्ज की गई है.
अध्ययन के मुताबिक संभावित जोखिम का आकलन केवल ग्लेशियरों तक सीमित नहीं रखा गया. शोधकर्ताओं ने उनके नीचे मौजूद आबादी, सड़कों और दूसरे बुनियादी ढांचे के एक्सपोज़र का भी विश्लेषण किया.
अध्ययन के अनुसार वर्ष 2000 में संभावित रूप से प्रभावित निर्मित क्षेत्र लगभग 8 हजार वर्ग मीटर था, जो वर्ष 2030 तक बढ़कर करीब 1.52 लाख वर्ग मीटर होने का अनुमान है. इसी अवधि में संभावित रूप से प्रभावित आबादी लगभग 380 से बढ़कर 8,540 तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है. अध्ययन के मुताबिक बद्रीनाथ और माणा के बीच का क्षेत्र सबसे अधिक एक्सपोज़र वाले हिस्सों में शामिल है.
पुरानी घटनाओं से क्या सीख मिली?
अध्ययन में वर्ष 2021 की चमोली रॉक-आइस एवलांच का उल्लेख एक उदाहरण के रूप में किया गया है, जिसमें बर्फ, चट्टान और मलबे से जुड़ी श्रृंखलाबद्ध प्रक्रियाएं देखने को मिली थीं.
अध्ययन में वर्ष 1970 और 1978 की उन घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है, जब हिमस्खलन के कारण अलकनंदा नदी का प्रवाह अस्थायी रूप से अवरुद्ध हुआ था. शोधकर्ताओं के मुताबिक ऐसे उदाहरण बताते हैं कि हैंगिंग ग्लेशियरों से जुड़ी घटनाओं में बर्फ, चट्टान, मलबा और नदी तंत्र एक साथ प्रभावित हो सकते हैं.
वैज्ञानिक क्या सुझाव दे रहे हैं?
अध्ययन के मुताबिक हिमालय के सभी हैंगिंग ग्लेशियरों की लगातार निगरानी करना व्यावहारिक नहीं है. इसलिए शोधकर्ताओं ने अधिक जोखिम वाले ग्लेशियरों की पहचान कर उन पर प्राथमिकता के आधार पर निगरानी की आवश्यकता बताई है.
शोधकर्ताओं के अनुसार उपग्रह चित्रों, मैदानी सर्वेक्षण, रडार आधारित निगरानी और समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियों की मदद से संभावित जोखिम को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है. अध्ययन में कहा गया है कि आल्प्स क्षेत्र में इस तरह की निगरानी व्यवस्था पहले से उपयोग में है और हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों में भी इससे जोखिम प्रबंधन को मजबूत किया जा सकता है.
अध्ययन का निष्कर्ष
npj Natural Hazards में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक अलकनंदा बेसिन, विशेष रूप से बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र में मौजूद हैंगिंग ग्लेशियर संभावित हिमस्खलन जोखिम के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं. शोधकर्ताओं ने संवेदनशील ग्लेशियरों की पहचान, उनकी नियमित निगरानी, संभावित प्रभाव वाले क्षेत्रों के आकलन और जोखिम आधारित योजना बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है.
वहीं, माणा के दो बार ग्राम प्रधान रहे पीताम्बर सिंह मोलपा के मुताबिक पिछले कई दशकों में ग्लेशियरों, मौसम और प्राकृतिक जलस्रोतों में लगातार बदलाव दिखाई दिए हैं. स्थानीय अनुभव और अध्ययन, दोनों बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों को दर्ज करते हैं, हालांकि दोनों का दृष्टिकोण अलग-अलग है.
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