Tuesday, January 26, 2021

इस गणतंत्र क्यों हारा लोकतंत्र?



किसानों के राजभवन कूच वाले दिन ही लगा था कि सब कुछ ठीक नही जा रहा। पुलिस स्पष्ट आदेश न होने की वज़ह से आंदोलनकारियों की भीड़ से बच रही थी।
 हमेशा कुछ आंदोलन में ऐसे लोग होते हैं जो जनतंत्र को भीड़तंत्र बना देते हैं। उन्हें यह पता नही होता कि वह भीड़ में क्यों हैं और कर क्या रहे हैं। 
वह सिर्फ अपने आंदोलन को बदनाम ही करते हैं। पुलिस के साथ-साथ, बैरकेडिंग व रास्ता रोकने के लिए लगाए गए वाहनों को अपने रास्ते से हटाना इस भीड़ का उद्देश्य बन गया था, ट्रैक्टर सब पर भारी होते चले गए। 
26 जनवरी को भी यही हुआ, दिल्ली फ़िर बदनाम हुई। पिछले कुछ महीनों से शांतिपूर्वक चल रहा आंदोलन हिंसक हो गया । गिरते-पड़ते पुलिसकर्मी सरकार के द्वारा इस आंदोलन की गम्भीरता को समझने में नाकाम होने के परिचायक थे। 
इन कानूनों को लेकर किसानों की सरकार के साथ ग्यारह दौर की वार्ता हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर नए कृषि कानूनों को एक से डेढ़ साल तक स्थगित करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी और तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग पर अडिग हैं।

स्वतंत्रता के बाद से वह कौन से कारण हैं जहां सरकार और जनता ऐसे आमने- सामने आते रहे हैं। उसके बाद भीड़ रोकने आई पुलिस और जनता के बीच भी बहुत सी जनहानि होती रही है। सरकारी सम्पत्ति का नुकसान अलग।

संवैधानिक अधिकारों का पालन करवाने में विफलता

भारतीय संविधान ने अपनी जनता को बहुत से अधिकार दिए हैं।
 यह धर्म, जाति, रंग ,भाषा, समुदाय, लिंग, आयु के मध्य भेद रहित तो कहा जाता है पर वास्तव में क्या हम इन अधिकारों को प्राप्त कर पाए हैं? 
वर्ष 2020 की शुरुआत में दिल्ली दंगो ने दिखा दिया था कि अब भी हम भारतीय धर्म के आधार पर बंटे हुए हैं और बहुत सी राजनीतिक पार्टियां अब भी मंदिर मस्जिदों के नाम से अपनी कच्ची रोटी पका रही हैं।
दलितों के साथ अत्याचार की खबरों से अख़बार भरे रहते हैं।
विज्ञापनों में सौंदर्य उत्पादों का गोरे रंग को बढ़ावा देना क्या भारतीय संविधान का खुला अपमान नही है!!
भाषा को लेकर बार-बार केंद्र और राज्य सरकारों के बीच की तनातनी सर्वविदित है।
महिलाओं को अब भी समाज में पूरे अधिकार नही दिए गए हैं। महिलाओं के प्रति अपराध इनसे जुड़े कानूनों में बार-बार किए गए सुधारों के बाद भी कम नही हुए हैं।
वृद्धों की सुरक्षा एवं सुविधा के लिए हम अलग से कोई विशेष कार्य नही कर पाए हैं।
किसी वीआईपी के लिए घण्टों सड़क बंद रख आम आदमी को खड़ा रखना क्या सभी नागरिकों को समान बनाता है।

15 दिसंबर 2019 की शाम सिटिज़नशिप अमेंडमेंट एक्ट (CAA) विरोध के बीच दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के अंदर पुलिस ने लाइब्रेरी में बैठे छात्रों पर लाठीचार्ज किया गया था, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल रहा था। यह दृश्य ब्रिटिश शासन की बर्बरता को याद दिला रहा था।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 बोलने की आज़ादी देता है, जो नागरिकों को इस अधिकार की इजाज़त देता है कि बिना हथियार के शांतिपूर्ण ढंग से जमा हो सकते हैं”, इसमें संगठन बनाने, बैठक करने और प्रदर्शन के लिए सड़कों पर आने का अधिकार शामिल है। हालांकि जमा होने का संवैधानिक अधिकार कुछ क़ानूनों द्वारा नियम कायदों में बंधा हुआ है, मसलन भारतीय दंड विधान संहिता, आपराधिक प्रक्रिया विधान और 1861 का पुलिस क़ानून। ये क़ानून सरकार को जमा होने के अधिकार के मद्देनज़र “न्यायसम्मत पाबंदियां” लगाने की शक्ति देते हैं, अगर लोगों का ऐसा कोई जमावड़ा आम शांति और व्यवस्था में ख़लल पैदा कर सकता है या इससे राष्ट्रीय प्रभुसत्ता के लिए ख़तरा पैदा हो जाए। इसके द्वारा , संविधान अनुच्छेद 19 (1) (बी) में दिए गए बोलने के अधिकार और अनुच्छेद 19 (3) परिभाषित की गई सामाजिक व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश करता है।

नागरिकों को जमा होने के अधिकार के लिए सहूलियत देते हुए भीड़ को नियंत्रित और व्यवस्थित करना भी पुलिस का फर्ज़ है। हालांकि, ऐसा भी वक़्त आता है जब विरोध प्रदर्शन या तो आपस में या पुलिस के साथ हिंसक हो जाते हैं। 

देश के मुख्य स्तम्भ का निरंतर कमज़ोर होना

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा सतम्भ कहा गया है जिसकी जिम्मेदारी संविधान और लोकतंत्र की ढाल बनकर उसकी सुरक्षा करना है। पर मैं इसे देश का मुख्य स्तम्भ मानता हूं क्योंकि लोकतंत्र आने से शताब्दी पूर्व ही पत्रकारिता ने देश में स्वतंत्रता लाने और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में अहम भूमिका निभाई। 

दूरदर्शन ने भी अपना कर्तव्य बखूबी निभाया। केबल टीवी और फिर मोबाइल टीवी आने के बाद से पिछले कुछ वर्षों में रवीश कुमार द्वारा प्रचलित गोदी मीडिया या लैपडॉग मीडिया ( जिसमें मीडिया अभिजात वर्ग का ही पक्ष लेती है ) ने लोकतंत्र और संविधान को कमज़ोर करने का कार्य किया है।

यह सब इसलिए किया गया क्योंकि बड़े मीडिया घराने खुद को मजबूत करते रहना चाहते हैं और भारतीय मीडिया पर हमेशा अपना राज़ होते देखना चाहते हैं। आप वही देखेंगे और पढ़ेंगे जो वो चाहते हैं।

किसान बिल लाने के समय से ही इसका विरोध शुरू हो गया था। मुख्यधारा का मीडिया यह तो दिखा रहा था कि विरोध कितना व्यापक है पर किसान बिल है क्या, उससे होने वाले फायदे नुकसान को समझाने वह नाकामयाब रहा। आंदोलन को एक सेलिब्रिटी आंदोलन का दर्जा दे दिया गया। 
सोशल मीडिया ने यहां अपनी अस्पष्ट खबरों का रूप दिखाया और युवाओं से लेकर बुज़ुर्ग इस आंदोलन को एक क्रांति के रूप में समझ इसमें शामिल होते चले गए। किसान खेतों की जगह सड़क में आ गए।

लोकतंत्र की मुख्य स्तम्भ पत्रकारिता की मर्यादा को बार-बार लांघा गया है। वर्ष 2016 में देश के उच्च दर्ज़े वाले पत्रकार ने 'टुकड़े टुकड़े गैंग' शब्द रचा था तब से अब तक यह देश तोड़ने वाले तत्वों का मुख्य शगूफा बन गया है।

पिछले कुछ वर्षों में टीवी चैनलों ने पत्रकारिता को आम आदमी की बीच बदनाम ही किया है। 
अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी और टाइम्स नाउ को हाईकोर्ट की लताड़ पड़ी थी और इनके लिए कहा गया कि यह खुद ही पुलिस, वकील, जज बन गए और फैसला भी सुना दिया।

समाचार चैनलों पर सिर्फ ख़बर सुनाई जानी चाहिए, फैसले लेने का अधिकार जनता के पास होना चाहिए। पत्रकारिता का स्तर सुधारने के लिए निष्पक्ष तरीके से तुरंत बड़े कदम उठाने की आवश्यकता है।

एक चुनी हुई सरकार का रवैया

केंद्र सरकार का रवैया भी पिछले कुछ समय से लोकतांत्रिक नही दिखा है। 
बीती सर्दी 'नागरिकता संशोधन कानून' के विरोध स्थल के रूप में शाहीन बाग ने बहुत नाम बटोरा। एक लोकतांत्रिक देश होने के बाद भी इस विरोध पर ज्यादा चर्चा नही की गई और सिर्फ आंदोलन को दबाने का कार्य किया गया। वो तो भला हो कोरोना का जो इस बहाने आंदोलनकारियों को हटाया गया।
विपक्ष अपनी भीतरी राजनीति में ही व्यस्त है तो आवाज़ उठाता कैसे!!

कोरोना काल में बिना योजना के लिए गए लॉकडाउन के फैसले से घबराया भारत सड़क पर रेंग रहा था, अर्थव्यवस्था चरमरा गई तो दूसरी ओर हरसिमरत कौर के मोदी मंत्रिमंडल से इस्तीफ़े के बाद भी सरकार किसान बिल वापस न लेने की जिद पर अड़ी रही। पूरी सर्दी किसानों ने खुले में बिता दी, गुबार तो फूटना ही था। लोकतंत्र में जिद की जगह कहाँ हैै?

आंदोलन अब भी ख़त्म नही हुआ है। जनतंत्र और भीड़तंत्र हम दोनों की ताक़त देख चुके हैं। देश का भला जिसमें है वही कार्य किए जाने चाहिए।

हिमांशु जोशी, टनकपुर, उत्तराखंड।

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