कूदते-फांदते, डरते-छुपते, हाथ मे लाठी लिए जान बचाते।
ये लाल किले में कौन है, ये ख़ाकी है।
डंडा ले हिन्द सल्तनत की राजधानी में घुस,
जामिया में डंडे चलाते कौन है, ये ख़ाकी है।
रात सवेर, दिन दोपहर,
बारिश में भीगती, कम्पकम्पाती कौन है, ये ख़ाकी है।
रात कभी बहनों का भाई बन तो कभी किसी ग़रीब का आसरा बन, मसीहा बनते कौन है, ये ख़ाकी है।
कभी किसी विकास दूबे तो कभी क़साब की गोली सीने में खा अपनी मातृभूमि का क़र्ज़ चुकाते कौन है, ये ख़ाकी है।
वो बना किसी के स्टेट्स का सिंबल तो किसी का चौकीदार, ये सब्ज़ी और राशन ढोते कौन है, ये ख़ाकी है।
वो रहने के लिए 6×4 फुट की जगह, पीले पड़े संडास और गंदे पानी से जुड़ी बीमारियां ढोते कौन है, ये ख़ाकी है।
वो नौ महीनें की ट्रेंनिग से देश में व्यवस्था बनाने की उम्मीदों का भार लिए, राजनीति और व्यवसायियों के पंचों से पस्त कौन है, ये ख़ाकी है।
अरसे से पुलिस सुधार की राह ताकती, वो जरूरत सबकी और नापसंद हर एक की कौन है, ये ख़ाकी है।
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