Saturday, February 6, 2021

कम आंकी गई प्लाज़्मा थेरेपी पर एक रिपोर्ट।

24 दिसंबर 2020 में पहली बार प्लाज़्मा दान करने के ठीक एक महीने बाद आई एक कॉल की वज़ह से मेरा ध्यान फिर से कोरोना के ताज़ा आंकड़ों की ओर चला गया। जिस महामारी से संक्रमित मरीज़ों को लेकर जमकर हो-हल्ला चल रहा था वह अब शांत है। कभी इस महामारी को फैलाने की जिम्मेदारी जमातियों पर लादी गई तो कभी बॉलीवुड की गायिका कनिका कपूर पर।

अब तक भारत में कोरोना मरीज़ों की संख्या 1.8 करोड़ पार कर गई है जिसमें से 1.5 करोड़ मरीज़ इस महामारी से ठीक हो चुके हैं तो 1.5 लाख लोगों की कोरोना से मृत्यु हो चुकी है, एक्टिव कोरोना मरीज़ों की संख्या भी लगभग 1.5 लाख ही है। 
इन्हीं 1.5 लाख एक्टिव मरीज़ों में से एक हैं गम्भीर रूप से कोरोना संक्रमित देहरादून निवासी प्रेमचंद पंवार, जिनके परिवार द्वारा प्लाज़्मा डोनर की तलाश के लिए विभिन्न माध्यमों पर किए गए प्रयास के बाद मुझसे उनके लिए प्लाज़्मा दान करने की गुज़ारिश के लिए सम्पर्क किया गया।

दूसरी बार प्लाज़्मा दान करने के लिए एक बार तो मेरे मन में ना कहने का विचार आया पर प्लाज़्मा डोनरों की जिस तरह कमी है और यह किसी का जीवन बचा सकता है विचार कर मैं इसके लिए मना नही कर पाया। प्लाज़्मा डोनर ढूंढने के लिए सामने आ रही परेशानियों और इससे सम्बंधित अन्य चुनौतियों को समझने से पहले हमें प्लाज़्मा थेरेपी को समझना जरूरी है।

प्लाज़्मा थेरेपी 

कोरोना वायरस जैसे रोगजनक सूक्ष्मजीव जब हमारे शरीर को संक्रमित करते हैं, तो हमारा रोग प्रतिरोधी तंत्र एंटीबॉडी का उत्पादन करता है। शरीर के भीतर जैसे ही कोई बाहरी बैक्टीरिया या वायरस प्रवेश करता है, तो ये एंटीबॉडी उसे पहचानकर शरीर को संक्रमण से निजात दिलाने में मदद करते हैं। प्लाज़्मा थेरेपी में भी बीमारी से उबर चुके व्यक्ति के एंटीबॉडी तत्वों को लेकर दूसरे रोगियों के शरीर में डाल दिया जाता है। इस तरह, बीमार व्यक्ति का प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत हो जाता है और वायरस का सामना कर सकता है।

सफ़ल साबित होती प्लाज़्मा थेरेपी

 भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (भारत में जैव-चिकित्सा अनुसंधा हेतु निर्माण, समन्वय और प्रोत्साहन के लिए शीर्ष संस्था है। इस परिषद को भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त होती है।) ने भले ही कोरोना मरीज़ पर प्लाज़्मा थेरेपी को कारगर नही माना है पर अभी यह शुरुआती चरण में है और इस पर अधिक शोध की आवश्यकता है। किसी भी प्रयोग या नए कार्य की सफलता या असफलता उसके परिणाम पर निर्भर करती है।
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत किच्छा निवासी अलीम खान द्वारा लोक सूचना अधिकारी , राजकीय मेडिकल कॉलेज से यह जानकारी मांगी गई थी कि दिनांक 13/11/2020 तक सुशीला तिवारी में कितने मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी गई तथा उन मरीज़ो में से कितनों की प्लाज़्मा थेरेपी के बाद मृत्यु हुई और कितने मरीज़ो को बचाया जा सका । इसकी सूचना यह प्राप्त हुई थी कि दिनांक 13/11/2020 तक कुल 172 रोगियों को प्लाज़्मा थेरेपी प्रदान की थी जिसमें से 142 रोगी जीवित रहे और 30 रोगियों की मृत्यु हुई।
यहां प्लाज़्मा थेरेपी की सफ़लता दर देख हम कह सकते हैं कि प्लाज़्मा थेरेपी लोगों की जान बचाने में कामयाब हुई है।

मानवता पर टिकी प्लाज़्मा थेरेपी

प्लाज़्मा दान करने की प्रक्रिया के लिए डोनर की मेडिकल हिस्ट्री देखी जाती है। यह देखा जाता है कि वह किसी गम्भीर समस्या से पीड़ित न हो। डोनर की मेडिकल हिस्ट्री में कोई भी समस्या पाई जाती है तो उन्हें प्लाज्मा डोनेट करने के लिए मना कर दिया जाता है। चेक लिस्ट में फिट पाने के बाद डोनर की पल्स देखी जाती है, ब्लड प्रेशर चेक किया जाता है, पूरा एग्जामिन किया जाता है। इस तरह के जब सभी बेसिक टेस्ट सही पाए जाते हैं तो फिर डोनर से प्लाज़्मा लिया जाता है और इस प्रक्रिया में करीब 30 मिनट लगते हैं। एक बार प्लाज़्मा डोनेट करने के 15 दिन बाद फिर से प्लाज्मा डोनेट कर सकते हैं।

भारत मे रक्तदान करने वालों की संख्या पहले ही कम है अब प्लाज़्मा दान करने के लिए भी लोग आगे नही आ रहे हैं। लोगों के आगे आए बिना प्लाज़्मा बैंक भी किसी काम के नही होंगे। 

हल्द्वानी में कोरोना मरीज़ों के लिए प्लाज़्मा की व्यवस्था करने वाले वंदे मातरम ग्रुप द्वारा जुटाए गए साढ़े छह सौ में से चार सौ रक्तदाताओं में एंटीबॉडी खत्म हो चुकी थी और वह प्लाज़्मा थिरेपी के लिए चाहते हुए भी मदद करने में असमर्थ थे। 

नॉटिंघम विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के शोधकर्ताओं ने ऑस्ट्रेलियाई रेड क्रॉस लाइफब्लड और क्वींसलैंड ऑस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालय के साथ मिलकर यूनाइटेड किंगडम में प्लाज्मा दान के लिए प्रेरणा और बाधाओं की जांच करने के लिए शोध किया। अध्ययन में यूनाइटेड किंगडम के 419 निवासियों को शामिल किया गया था जो कोविड -19 से संक्रमित थे और  प्लाज़्मा दान करने के पात्र थे।
ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन में प्रकाशित निष्कर्षों से पता चला है कि ज्यादातर लोग दान देना इसलिए पसंद करेंगे क्योंकि वह कोरोना से ठीक होने के बाद मानवता के प्रति अपना आभार प्रकट करना चाहते हैं। 
प्लाज़्मा दान करने के दौरान ख़राब सुई प्रयोग होने का विचार उनके इस दान के लिए तैयार होने में सबसे बड़ी बाधा थी।

प्लाज़्मा की व्यवस्था करने के लिए जुझते मरीज़ों के परिवार

कोरोना मरीज़ के परिवारों को प्लाज़्मा की व्यवस्था स्वयं करनी पड़ रही है। वह कोरोना से ठीक हो चुके लोगों की लिस्ट लिए अपने कोरोना संक्रमित परिजन के ब्लड ग्रुप वाले लोगों से सम्पर्क साध प्लाज़्मा दान करने की अपील कर रहे हैं । कुछ समाजसेवी लोगों ने सोशल मीडिया की मदद से ऐसे परिवारों की मदद करने की जिम्मेदारी उठाई है। फ़ेसबुक, वाट्सएप पर प्लाज़्मा डोनर से प्लाज़्मा दान करने की अपील करने हेतु ग्रुप बनाए गए हैं। उत्तराखंड की बात करें तो इसमें फेसबुक और वाट्सएप ग्रुप के रूप में 'उत्तराखंड रक्त मित्र देहरादून'  और 'वंदे मातरम ग्रुप हल्द्वानी' शामिल हैं। उत्तराखंड में युवा अलीम खान द्वारा बनाई गई https://covid19.uk.gov.in जैसी वेबसाइट भी इसमें मददगार हैं।

परिवारों के साथ ऐसे समय में भी धोखाधड़ी करने वालों की कमी नही है। जिस मरीज़ को मैंने प्लाज़्मा दान किया उसके परिवार वालों द्वारा मुझे बताया गया कि उनके पास ऐसे व्यक्ति का फ़ोन भी आया जो उनके लिए प्लाज़्मा का प्रबंध करने की गारंटी ले रहा था। इस काम के लिए उसके द्वारा पहले तीस हज़ार रुपए की व्यवस्था करने की बात कही गई।

परिवार द्वारा सोशल मीडिया पर की गई अपील पढ़ मोबाइल नम्बर - 8506945879 से उनके पास यह फ़ोन आया कि वह प्लाज़्मा दान के लिए हरिद्वार से देहरादून आने के लिए तैयार है। उसके बाद रास्ते में फंसने की बात कह उसने ऑनलाइन पेमेंट एप के माध्यम से मरीज़ के परिवार से एक हज़ार रुपए लेने के बाद अपना फोन ऑफ कर दिया गया। ( यह नम्बर अब भी चलती हालत में है )

सरकारी अस्पतालों में डोनर मिलने पर उनसे प्लाज़्मा निकाल मरीज़ को चढ़ाना सस्ता तो है पर प्राइवेट अस्पताल इस कार्य के हजारों वसूल रहे हैं।

सरकार द्वारा वर्ष 2021-22 के बजट में स्वास्थ्य सेवाओं पर 2.24 लाख करोड़ खर्च करने का एलान किया गया है। अब उनका कैसे सही प्रयोग किया जाए कि उसका लाभ जरूरतमंदों को मिले यह हमारे तंत्र पर निर्भर करता है क्योंकि एक महामारी की वज़ह से वर्ष 2020 में हमने अपनी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा हिलते देख ही लिया है।

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