पानी छपका मुंह पर ढूंढा निवाला कुछ न मिला तो पानी ही पी लिया।
कंधों में झोला हाथों में बोतल ले जाते देख उन्हें ,उसे ढूंढे अपना पुराना टाट मिला तो उठा लिया।
आज मौसम भी अच्छा है पता है उसे क्योंकि नाले में बहता पानी ज्यादा गर्म नही था न बहाव उसका ज़्यादा था, लोहा- बोतल जितना मिला उठा लिया।
चमन्नी अब चलती नही, पीला सा सिक्का दिन तक कमाया उसने तो उन्हीं कुचेले कपड़ों में सड़क किनारे बैठ हॉफ प्लेट चावल खा लिया।
चमचमाने लगी हैं ऊंची इमारतें और अब तो सड़क के ऊपर भी एक छत है। देख एक कोना उसी में उसने एक पुराना सा कम्बल बिछा लिया।
शोर है सड़कों का, हवा में कहीं कहीं भांग का नशा भी है, कोई बेसुध उसकी सुबह की कमाई कांच की बोतल लिए लेटा है। इन सब के बीच आंखों में कुछ उजले सपने लिए उसने नींद से हाथ मिला लिया।
आज वही सुबह है वही बच्चे कन्धों में झोला हाथों में बोतल लिए जा रहे हैं पर सड़क पर भीड़ है एक गाड़ी भी दीवार से भिड़ी पड़ी है। मैले कुचले साथ में लाल रंग टपकाते कुछ सपने गाड़ी में लादे जा रहे हैं। उसने अपने छोटे से जीवन में ही बहुत कुछ देख लिया।
हिमांशु जोशी। उत्तराखंड।
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