Monday, May 10, 2021

तख़्त और ताबूत।

तख़्त तख़्त करते करते ताबूत को अपनी शान समझ बैठे हैं,
ये 'औसरों ' के तलाश वाले आज़ादे हिंद को बदनाम कर बैठे हैं।

वहीं कुछ बन्दे खुदा के भेजे फरिश्ते भी हैं, जो पूरी कायनात का दम जुटा इंसानियत बचाने में हैं।
मैंने देखा है उन्हें वो अपना सब कुछ लुटा कोरोना से इस जंग में खुद दीवार बन बैठे हैं।

कपड़ों में कितने ही चिन्हों और खुद का नाम छपा वो चौराहों पर भीड़ जुटाया करते थे,
आज उसी कपड़े में खुद का मुंह छिपा एक कोने में दुबक बैठे हैं।

गंगा घाट पर आज लाशों का अंबार है, न कौम है न जात है बस इंसानियत का कत्ल है,
वो तो इन लाशों की गिनती से भी नोटों का ढेर लगा बैठे हैं।

 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्'
गीता का पाठ छोड़ आज वो खुद को ही बलवान समझ बैठे हैं 

तख़्त तख़्त करते करते ताबूत को अपनी शान समझ बैठे हैं,
ये 'औसरों ' के तलाश वाले आज़ादे हिंद को बदनाम कर बैठे हैं।



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