मुंशी प्रेमचंद की पूस की रात में ठिठुरता पर फिर भी रात भर पहरा देता मैं ख़ाकी ओढ़ा इंसान हूं।
तेज़ आंधी, तूफ़ान, बरसात और बाढ़ में भी तुम्हारा हाथ थामे मैं ख़ाकी ओढ़ा इंसान हूं।
तपती, चमड़ा जलाने वाली धूप में सड़क पर अनगिनत रेंगते वाहनों को ज्यामितीय चलाने वाला मैं ख़ाकी ओढ़ा इंसान हूं।
मेरी न ईद है, न होली दीवाली पर तुम अपने घर सुरक्षित खुशियों के रंग उड़ाओ उसकी सिर्फ एक वज़ह मैं ख़ाकी ओढ़ा इंसान हूं।
अपनों को खोने का दर्द है तुम्हारे सीने में, इसमें कसूर मेरा कुछ नही है पर तुम्हारे ग़ुबार को सहता मैं ख़ाकी ओढ़ा इंसान हूं।
मेरा तो मंदिर भी और मेरा मस्जिद भी है, धर्म की इन लकीरों को मिटाता मैं ख़ाकी ओढ़ा इंसान हूं।
अपनों को अकेला घर छोड़ इस महामारी में तुम्हारा घर बचाने अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर लादे और मास्क पहनाने सड़कों पर खड़ा मैं ख़ाकी ओढ़ा इंसान हूं।
नफ़रत न पालो अपना ही हूं तुम्हारा,
राह में अकेली चलती बहनों की हिम्मत तो घर में अकेली रोती मां का सहारा हूं। कोई साथ न दे तो अंत में तुम्हें चार कंधे देने वाला मैं ख़ाकी ओढ़ा इंसान हूं।
हिमांशु।

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