तैयार रहो सुनामी तो एक दिन आनी है।
डांडी वाले मज़दूर भारत के पैरों पर पड़े हैं पत्थरों के निशान,
तैयार रहो सुनामी तो एक दिन आनी है।
तड़पते-बिलखते, रोते अपनी मां के पल्लू से लिपटे हैं वो बेबस नन्हें हाथ,
तैयार रहो सुनामी तो एक दिन आनी है।
इस हिन्द में बिक रहा है अपने ही घर का रोटी दाल, पर तुम दुनिया को झूठी शान दिखाओ,
तैयार रहो सुनामी तो एक दिन आनी है।
सिस्टम से लड़ता आम और सांसों के लिए तड़पती जान,
तैयार रहो सुनामी तो एक दिन आनी है।
भीड़ जुटाने पर तुम्हें मिलता तंत्र और भीड़ बचाने वालों पर थोपा जा रहा है राजद्रोह का मंत्र,
तैयार रो सुनामी तो एक दिन आनी है।
हिमांशु।
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