Sunday, June 13, 2021

टीकाकरण के लिए अनिवार्य ऑनलाइन पंजीकरण की व्यवहारिकता पर तफ़्तीश करती एक रिपोर्ट.

भारत में 11 जून तक पूरी तरह से मात्र 3.4 प्रतिशत जनों का टीकाकरण हुआ है।
 कुछ बड़े देशों, कुछ छोटे और पिछले साल कोरोना के शीर्ष पर रहते सर्वोच्च संक्रमित देश इटली के टीकाकरण आंकड़ों पर नज़र फिराएं तो अमरीका में यह आंकड़ा 43.1 प्रतिशत, ब्राज़ील में 11.1 प्रतिशत, पाकिस्तान में 1.2 प्रतिशत और इटली में 22.6 प्रतिशत है।

सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना टीकाकरण पर पंजीकरण की अनिवार्य आवश्यकता पर गंभीर चिंता व्यक्त की, क्योंकि भारत की आबादी के एक बड़े वर्ग के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुंच नहीं है।

देश में "डिजिटल डिवाइड" पर प्रकाश डालते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा,"आप डिजिटल इंडिया, डिजिटल इंडिया कहते रहते हैं, लेकिन आप जमीनी हकीकत से अवगत नहीं हैं।"

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने पूछा "आप निश्चित रूप से रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं, लेकिन आप डिजिटल डिवाइड का जवाब कैसे देंगे? आप उन प्रवासी मजदूरों के सवाल का जवाब कैसे देते हैं, जिन्हें एक राज्य से दूसरे राज्य जाना है? झारखंड के एक गरीब कार्यकर्ता को एक आम केंद्र में जाना पड़ता है "

हिंदी लाइव लॉ डॉट इन के अनुसार सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि किसी व्यक्ति को दी जाने वाली खुराक की संख्या, टीके के प्रकार और व्यक्ति की पात्रता मानदंड पर नज़र रखने के लिए राष्ट्रीय पोर्टल में पंजीकरण कराना आवश्यक है। केंद्र ने यह भी कहा है कि बिना डिजिटल पहुंच वाले लोग टीके के पंजीकरण के लिए गांव के कॉमन सेंटर, दोस्तों, परिवार या गैर सरकारी संगठनों की मदद ले सकते हैं।

टीकाकरण पर ज़मीनी हकीकत

दिल्ली में सरकार द्वारा कहे इस वक्तव्य की जांच के लिए हमने वहां से सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तराखंड में जमीनी स्तर पर कुछ सच्चाई परखी, जिससे हमें इतने हो-हल्ले  के बीच चल रहे इस टीकाकरण के बारे में कुछ ज़मीनी हकीकत जानने के लिए मिले।

देहरादून के चकराता ब्लॉक स्थित गांव मशक के मातवर सिंह कहते हैं कि अभी तक गांव से छह सात किलोमीटर दूर कोटी कनासर में टीकाकरण कैम्प लग रहा था जहां खुद पंजीकरण न करा सकने वालों के लिए पंजीकरण की व्यवस्था थी ,वहां दिन में 100-150 लोगों का ही टीकाकरण सम्भव हो पा रहा था जबकि 300-350 लोग टीकाकरण के लिए आ रहे थे। अब आशा कार्यकर्ताओं की ओर से बताया जा रहा है कि हर ग्राम सभा में प्रतिदिन 100 लोगों का टीकाकरण होगा, जिसमें टीकाकरण केंद्र में ही पंजीकरण की सुविधा होगी।

काम न मिलने की वज़ह से खीरी, उत्तर प्रदेश के छोटूराम अपने दो साथियों के साथ हरिद्वार से वापस घर लौटते दिखते हैं। टीके और उसके लिए अनिवार्य पंजीकरण के बारे में सवाल करने पर वह अपना फोन दिखाते हुए कहते हैं कि वह सब टीका लगाना तो चाहते हैं पर उनके लिए इसकी ऑनलाईन प्रक्रिया समझनी मुश्किल है।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रोशनाबाद अभी कोरोना परीक्षण से आगे ही नही बढ़ पाया है वहां कम्पनियों से आए श्रमिक कड़ी धूप में कोरोना परीक्षण के लिए पंक्तिबद्ध दिखे।

सामुदायिक केंद्र रोशनाबाद जाने पर पता लगा कि टीकाकरण कैम्प राजकीय प्राथमिक विद्यालय रोशनाबाद में लगा है, वहां पहुंचने पर उत्तर प्रदेश बुलंदशहर के राजेंद्र प्रसाद अपने साथी दलवीर सिंह के साथ विद्यालय के मुख्यद्वार पर ही मिल गए, वह दोनों टीका लगाने आए थे। अपनी प्राइवेट कंपनी के ज़ोर देने पर दोनों टीकाकरण के लिए आए तो थे पर दोनों के मन में टीकाकरण को लेकर शंका भरे सवाल थे।


दोनों ने अपना टीका पंजीकरण कैम्प में ही उपलब्ध लैपटॉप पर करवाया था।

आसपास पूछने पर पता चला कि बहुत कम लोग टीकाकरण के लिए सामने आ रहे हैं ।


भवाली, उत्तराखंड में टीकाकरण की स्थिति जानने के लिए संजीव भगत से सम्पर्क किया गया तो वह बताते हैं कि पंजीकरण की प्रक्रिया इतनी मुश्किल है कि शिक्षित व्यक्ति को भी परेशानी हो रही है, टीके के स्लॉट बुक करने में खासी समस्या सामने आ रही है। जिनके पास मोबाइल है वह तो ठीक जिनके पास नही है वह कुछ दाम चुका कर किसी न किसी से विनती कर टीके का पंजीकरण करवा रहे हैं, कोरोना काल में किसी के संपर्क में आ पंजीकरण के लिए गिड़गिड़ाना कितना सुरक्षित है!!

टीके की उपलब्धता

मेरी सरकार वेबसाइट पर हरिद्वार में अपने पिनकोड पर 18+ के लिए भुगतान हो या मुफ़्त विकल्प दोनों पर कोवेक्सिन टीका उपलब्ध नही था।


वहीं कोविशील्ड टीका मुफ़्त में तो उपलब्ध नही था पर भुगतान पर इसके 1428 टीके उपलब्ध थे।


जनता को मुफ्त टीके दिए जाने का दावा ठोकने वाली सरकार के ऐसे अदृश्य मुफ़्त टीके जनता के लिए कितने उपयोगी हैं यह तो सरकार ही जानें जबकि अपने देश में टीकों की होने वाली जरूरत का गलत अनुमान लगा विदेशों में टीके भेजने और अपने हक के टीके विदेश भेजने पर सवाल उठाने के बाद कठघरे में खड़े करने वाली बात तो यहां की ही नही गई है!

बिना पंजीकरण भी टीकाकरण शुरू करने की मांग

विपक्ष के अघोषित मुखिया की ओर से एक ट्वीट आया है, जीवन जीने का अधिकार सभी का है,यह बात टीकाकरण के इंटरनेट पर अनिवार्य पंजीकरण को लेकर आई है।

बात सही भी है और बहुत पहले सोची जानी थी। हमारे देश का डिजिटल ज्ञान कितना है यह हमें पिछले कुछ सालों की उन महत्वपूर्ण घटनाओं से पता चलता है जिन्हें कभी महत्व नही दिया गया।

डिजिटल भारत की असफलता 

रेलवे ने टिकटघर पर भीड़ कम करने के लिए 'यूटीएस'
एप लांच किया था बावजूद इसके मुंबई लोकल ट्रेन के स्टेशन में टिकटघर के सामने भीड़ जस की तस रही, देश के अग्रणी बैंक 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया' ने योनो
एप लांच कर यह उम्मीद लगाई थी कि ग्राहक बैंक का आधा काम घर से ही निपटाएंगे पर स्थिति फिर वही पुरानी।
कोरोना की वज़ह से चली ऑनलाइन शिक्षा में स्कूल से मिल रहे गृहकार्य पर माता-पिता और उनके बच्चे इधर-उधर से पूछ-पूछ कर काम कर कैसे अपनी लाज बचा रहे हैं यह तो वही जानें।
यहां पर पिछले साल सरकार द्वारा कोरोना से जंग में परमाणु हथियार के समान पेश किए गए 'आरोग्य सेतु' एप की असफलता का जिक्र करना भी ग़लत नही होगा जो अब सिर्फ़ एयरपोर्ट के अंदर जाने का पास और टीकाकरण का प्रमाणपत्र मात्र रह गया है।

चलिए एक बार भारत में स्मार्टफोन रखने वालों के आंकड़ों पर भी गौर कर लें, न्युज़ू की 'ग्लोबल मोबाइल मार्केट' रिपोर्ट के अनुसार भारत की सिर्फ़ 31.8 प्रतिशत आबादी के पास स्मार्टफोन है और लैपटॉप व डेस्कटॉप के आंकड़े तो सोचिए ही मत।

टीकाकरण बिना पंजीकरण के भी सम्भव

डिजिटल भारत की ज़िद और वहम से बाहर निकल अगर सरकार अपनी जनता की सुरक्षा को लेकर वास्तव में गम्भीर है तो अभी भी टीकाकरण के अनिवार्य पंजीकरण को समाप्त किया जा सकता है।  हेपेटाइटिस बी, पोलियो जैसी बीमारियों को इंटरनेट युग से पहले वृहद स्तर पर टीकाकरण अभियान चला समाप्त किया जा चुका है।

हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।

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