उत्तराखंड का गांव लोहारी इन दिनों देशभर में बड़ी चर्चा में है, एक संस्कृति को डूबते देखे जाने से हर कोई दुखी है.
टिहरी की तरह ही लोहारी को भी विकास के नाम पर डुबा दिया गया है, लोहारी की डूब का विरोध उस तरह से चर्चा नही पा सका जैसा टिहरी के समय हुआ था लेकिन क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समाचारों में यह विषय छाया रहा.
शुरू से ही विवादों में रही है यह परियोजना
लखवाड़ व्यासी जल विद्युत परियोजना के बारे में जानकारी जुटाई जाए तो पता चलता है इसकी आधारशिला वर्ष 1960 के आसपास रखी गई, व्यासी जलविद्युत परियोजना का पहला सर्वे 1967 में हुआ.
जिसके बाद ही लोहारी गांव बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में आ गया.
इस परियोजना को सबसे पहले जेपी कंपनी द्वारा बनाया गया, लेकिन साल 1990 में आर्थिक कारणों की वजह से डैम अधर में लटक गया. साल 2012 में जब उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार आई उसके बाद इस डैम को उत्तराखंड जल विद्युत निगम को दे दिया गया और लखवाड़ परियोजना से व्यासी को अलग कर दिया गया.
डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार केंद्र द्वारा लखवाड़-व्यासी परियोजना को दी गई मंजूरी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन थी.
बांध संघर्ष समिति लोहारी के अध्यक्ष नरेश चौहान कहते हैं कि इस परियोजना में हमें साल 1972 के दौरान पहली बार मुआवजा मिला, तब सरकार ने हमारे गांव वालों से यह एग्रीमेंट किया था कि जमीन के बदले जमीन दी जाएगी लेकिन बाद में अपने वादे से मुकरते हुए सरकार पैसा देने लगी और जब गांव वालों ने यह पैसा नही लिया तो सरकार द्वारा उस पैसे को ट्रेज़री में रखवा दिया गया.
बाद में कुछ लोगों ने वह पैसा ले लिया और कुछ का पैसा अब भी ट्रेज़री में ही जमा है.
सरकार को जब भी जरूरत पड़ी तब उसने हमारी जमीन का अधिग्रहण किया. हमारी जमीन का अंतिम बार अधिग्रहण साल 1989 में किया गया था, लेकिन परियोजना शुरू होने के लगभग पचास साल बाद भी आज तक सरकार हमारा विस्थापन नही करा सकी.
एक तुगलकी फरमान और गांव खाली.
व्यासी परियोजना का काम अब लगभग-लगभग पूरा हो चुका है और इस पर जल्दी ही बिजली उत्पादन भी शुरू कर दिया जाएगा.
यमुना नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद यह परियोजना 120 मेगावाट तक बिजली उत्पादित करेगी और इसी वजह से अप्रैल 2022 में प्रशासन ने लोहारी गांव के निवासियों को गांव खाली करने का नोटिस थमा दिया.
सरकार ने भूमि पर कब्ज़ा लेने से पहले यह नोटिस जारी किया और किसी के आपत्ति होने पर 30 अप्रैल तक अपनी बात रखने का समय भी दिया.
लेकिन लोकतंत्र और कानून को ठेंगा दिखाते हुए 'कलेक्टर/प्रशासक/समुचित सरकार, देहरादून' की तरफ जारी इस नोटिस में दिए गए समय से काफी पहले ही 10-11 अप्रैल को ही गांव पूरी तरह से डूबा दिया गया.
लोहारी गांव के निवासियों को एक तरफ तो तीस दिनों तक अपनी आपत्ति जताने की समय सीमा दी गई थी
पर दूसरी तरफ इन तीस दिनों के शुरुआती दिनों में ही गांव वालों को 48 घण्टे के अंदर घर छोड़ने का आदेश जारी कर दिया गया.
इस आदेश को जारी करने वाले शायद इस बात से अनजान थे कि वर्षों से एक घर में रहने वाला कोई परिवार अपना घर मात्र 48 घण्टे में ही अपना घर-बार कैसे समेट लेगा.
नरेश चौहान कहते हैं कि हमें इस बात का तो पता था कि जब परियोजना पूरी होगी तब हमें यहां से जाना होगा लेकिन सरकार ने हमारे रहने की कोई व्यवस्था किए बिना ही हमें बेघर कर दिया.
गांव में पानी भरने के तीन दिन बाद तक हम क्रेशर के ढेर में खुले आसमान के नीचे रहने पर मजबूर थे, जब वह भी डूब गया तो हमने पास के एक स्कूल में आसरा लिया है. हम कुल मिलाकर 20-22 परिवार हैं जो इस स्कूल के चार कमरों और बरामदों में रुके हुए हैं, बाकी कुछ परिवारों ने स्कूल से लगे एक मकान में अपना सर छुपाने के लिए जगह मांगी है.
हिंदुस्तान की एक ख़बर के अनुसार प्रशासन की तरफ से हुए यह कहा गया है कि गांव वालों के स्थाई रूप से पुनर्वास के लिए कोटी मार्ग में यूजेवीएनएल की जमीन को चिन्हित किया गया है.
इस पर नरेश चौहान कहते हैं कि वहां पर एक परिवार को सिर्फ 25 वर्ग मीटर जगह ही दी जा रही है , जो एक परिवार के रहने और खाने मात्र के लिए ही है. ऐसे में हम अपने रोजगार खेती और पशुपालन को कैसे करेंगे और ऊपर से यह जगह हमारे गांव से 40 किलोमीटर दूर भी है तो उसके बाद हम यहां पर अपनी बची हुई जमीन पर खेती करने कैसे आएंगे.
गांव वाले अब इस बात के लिए आंदोलन कर रहे हैं कि प्रशासन उन्हें लोहारी से 500 मीटर दूर की जगह दे पर प्रशासन का यह कहना है कि उस जगह हाईटेंशन लाइन प्रस्तावित है और वहां की भूगर्भीय रिपोर्ट भी नेगेटिव है. गांव वाले इस रिपोर्ट पर भी सवाल उठाते हैं.
ऐसी परियोजना भविष्य के लिए बेहद खतरनाक
पर्यावरणविद रवि चोपड़ा इस परियोजना को पर्यावरण के लिए बेहद ही खतरनाक बताते हैं. उनका कहना है कि लोहारी गांव को डुबाने वाली लखवाड़-व्यासी परियोजना के इलाके में डूब क्षेत्र का पचास प्रतिशत हिस्सा जंगल का इलाका है, जो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं.
अपर यमुना कैचमेंट में चल रहे ऐसे प्रोजेक्टों से भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका मूल्यांकन कभी नही हुआ है. पहले से ही खतरे में यमुना के ग्लेशियर के लिए यह बड़ी समस्या है.
लखवाड़ के अगल-बगल में जो पहाड़ हैं उनकी ढाल स्थिर नही है और वहां पर अक्सर भूस्खलन होते रहते हैं. वहां रहने वाले लोग इस बात से भी चिंतित हैं कि क्या वो झील के ऊपर जाकर सुरक्षित रह पाएंगे. टिहरी में हम यह देख रहे हैं कि वहां झील के चारों तरफ भयानक भूस्खलन हो रहा है.
भविष्य में और कितने लोहारी, और कितनी संस्कृति समाप्त
ऐसी परियोजनाओं को विकास परियोजना कहा जाता है. पर अंत में सवाल यह है कि उत्तराखंड को अभी और कितने लोहारी देखने होंगे, विकास के नाम पर अभी ऐसे कितने गांव और संस्कृतियों का विनाश होगा.
हिमांशु जोशी

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