इस साल 14 जनवरी को जब देश में नई फसल लगाने का सत्र शुरू हुआ, तब देश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा की तरफ से यह ट्वीट किया गया था. इसमें भाजपा ने वनों की सुरक्षा पर किए गए अपने कार्यों का बखान कुछ इस तरह किया.
दिल्ली-देहरादून के बीच का सफ़र ढाई घंटे करने के लिए दिल्ली-सहारनपुर-दून 6-लेन इकॉनोमिक कॉरिडोर बनना है.
इसी एक्सप्रेस-वे के लिए चल रहे काम में राजाजी नेशनल पार्क से लगे हुए देहरादून के आशारोड़ी से उत्तर प्रदेश के गणेशपुर तक 19 किलोमीटर के सफ़र को 15 मिनट कम करने के लिए सैंकड़ों साल पुराने वृक्षों का कटान जारी है.
इस कटान के खिलाफ प्रदर्शन की अगुवाई करने वाली संस्था 'सिटीजन फॉर ग्रीन दून' के हिमांशु अरोड़ा कहते हैं कि गणेशपुर से आशारोड़ी के बीच सड़क पहले से ही बहुत चौड़ी है. मात्र एक लोहे का पुल है जो इस रास्ते को संकरा करता है, लोहे के पुल को चौड़ा करना ही ट्रैफिक के लिहाज से बेहतर हो सकता था.
वह कहते हैं सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन ट्राइब्यूनल की तरफ से नियुक्त एक्सपर्ट पैनल के भी पुनर्गठन का निर्देश दिया है, जिसका काम पर्यावरण को हुए नुकसान के साथ ही वृक्षारोपण कराना भी होगा. लेकिन इसका जमीनी स्तर पर कोई प्रभाव नही दिखता.
आशारोड़ी से तीन किलोमीटर दूर पड़ने वाली टनल तक पहुंचने में अभी पांच मिनट लगते हैं और यहां भी मात्र दो-तीन मिनट बचाने के लिए ही लगभग 2500 पेड़ काट दिए जाएंगे. हिमांशु आगे बताते हैं कि यह जगह हाथियों का गलियारा है और सैकड़ों प्रजाति के वन्य जीव, पक्षी और तितलियों की कई प्रजातियां यहां रहती हैं. पेड़ कटने के बाद उनका क्या होगा!
'कम नुकसान पहुंचाओ', इसका उदाहरण है सामने
पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचाने की शर्त में इन सड़कों को स्वीकृति मिल जाती है. वन काटने के बाद किए गए वृक्षारोपण का नतीजा हम पीएम मोदी के 'मन की बात' में भी उठ चुके रिस्पना के उदाहरण से ले सकते हैं।
हिमांशु अरोड़ा बताते हैं रिस्पना के करीब बीस किमी लंबे बहाव क्षेत्र में मृत रिस्पना नदी को पुनर्जीवित करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की अगुवाई में साल 2018 में नदी के दोनों ओर वृक्षारोपण हुआ और करीब दो लाख वृक्ष लगाने का दावा भी किया गया. पर अब वहां एक भी पेड़ नही दिखता.
देश के अग्रणी पर्यावरणविद रवि चोपड़ा, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट, 'सिटीजन फॉर ग्रीन दून' संस्था और कुछ युवाओं सहित उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले कुछ लोग इन पेड़ों को काटे जाने का विरोध कर रहे हैं. लेकिन 'चिपको' की इस धरती में यह विरोध इन पेड़ों को बचाने के लिए काफी नही जान पड़ रहा है.

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