*14 नवंबर : नेहरू के विचार और आज भी वैसी ही ‘हिंदुस्तान की समस्याएं’*
*सार्वजनिक जीवन की बुनियाद आजाद अखबारों पर होनी चाहिए*
प्रेस की आजादी पर लिखे 'अखबारों की आजादी' में जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं कि मैं अखबारों की आजादी का बहुत ज्यादा कायल हूं. मेरे ख्याल से अखबारों को अपनी राय जाहिर करने और नीति की आलोचना करने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए.
नेहरू छोटे अखबारों के लिए पत्रकार संगठनो के लिए लिखते हैं "उनमें सरकार अक्सर दखल देती है, क्योंकि उनकी प्रसिद्धि उतनी नहीं है. फिर भी हमारे छोटे छोटे और कमजोर से कमजोर अखबारों को सरकारी दबाव का शिकार होने देना खतरे की बात है, क्योंकि ज्यों ज्यों दबाव पड़ता है, त्यों त्यों दबाव डालने की आदत बढ़ती जाती है और उससे धीरे-धीरे जनता का मन सरकार द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किए जाने का आदी हो जाता है.
इसलिए पत्रकारों की एसोसिएशन तथा सब अखबारों के लिए यह जरूरी है कि कम मशहूर अखबारों तक के मामलों को यों ही न जाने दें. अगर वे प्रेस की आजादी बनाए रखने के ख्वाहिश मन्द हैं तो उन्हें सजग रह कर इस आजादी की रक्षा करनी चाहिए और हर प्रकार के अतिक्रमण को, फिर वह कहीं से भी हो, रोकना चाहिए."
*प्रेस की आजादी यह नही है कि सिर्फ वही छपे जो हम पसन्द करें*
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं, "एक अत्याचारी भी इस तरह की आजादी को मंजूर करता है. प्रेस की आजादी इसमें है कि हम उन चीजों को भी छपने दें, जिन्हें हम पसंद नहीं करते."
उन्होंने लिखा कि हमारी अपनी भी जो आलोचनाएं हुई हैं, उन्हें भी हम बर्दाश्त कर रहे हैं और जनता को अपने विचारों को जाहिर कर लेने दें जो हमारे पक्ष के लिए नुकसानदेह ही क्यों ना हो, क्योंकि बड़े लाभ या अंतिम ध्येय की कीमत पर क्षणिक लाभ पाने की कोशिश करना हमेशा एक खतरे की बात है.
*नेहरू का शांतिपूर्ण समाधान मॉडल*
'भारत और पाकिस्तान की समस्याएं' में जवाहरलाल नेहरु ने लिखा, "आज या भविष्य में अगर कोई झगड़ा हो तो उसके लिए युद्ध करना दोनों देश निन्दनीय समझते हैं. इसके अलावा यह भी निश्चय हुआ था कि इन दोनों देशों के बीच ऐसे झगड़ों का निपटारा माने हुए शांतिपूर्ण ढंग से किया जाए."
उन्होंने इस आलेख में आगे यह भी लिखा है कि हमने एक आम घोषणा का प्रस्ताव तो किया ही था, इसके अलावा हमने दो बड़े विवादात्मक प्रश्नों को सुलझाने के लिए विशेष प्रस्ताव किया था अर्थात निकासी जायजाद और पानी के सम्बन्ध में. हमने कहा था कि एक ट्रिब्यूनल बनाया जाए जिसमें दो जज भारत के और दो पाकिस्तान के हों और ये ऊंची श्रेणी के जज हों.
नेहरु लिखते हैं, "हमने यह प्रस्ताव किया था कि यह ट्रिब्यूनल दूसरे मौजूदा या भविष्य के झगड़ों पर विचार कर सकता है जिनके बारे में समझा जाए कि समझौता हो सकता है. जाहिर है कि राजनैतिक किस्म के ऐसे झगड़े जो अदालती क्षेत्र से बाहर के हैं इस ट्रिब्यूनल के सामने पेश नही हो सकते हैं."
उन्होंने लिखा कि इस बात की आशा है कि उच्च श्रेणी के न्यायाधीशों के सामने जो प्रश्न रखे जाएंगे उन पर से बिलकुल निष्पक्ष भाव से विचार करेंगे और ज्यादातर सहमत होंगे. अगर इनमें एकमत नही होता तो दोनों सरकारें स्वयं मिलजुल कर कोई समझौता कर लें या कोई दूसरा तरीका इन झगड़ों को तय करने का निकालें.
*ऐसा करके वे पाकिस्तान की नीति को ही मदद पहुंचा रहे हैं*
भारत पाकिस्तान पर अपने विचार रखते पूर्व प्रधानमंत्री ने 'भारत की वैदशिक नीति' आलेख में लिखा है कि काश्मीर की समस्या दोनों देशों के बीच बुनियादी अंदरूनी झगड़ों से उपजी है. हिंदुस्तान धर्म निरपेक्ष राज्य का समर्थक है और अपने अंगभूत हिस्सों के स्वतंत्र रहने का पक्षपाती है. लेकिन पाकिस्तान साम्प्रदायिक राज्य है और अपने उद्देश्यों और विचारधारा के कारण अपने दृष्टिकोण में आक्रामक है.
नेहरू की कड़ी टिप्पणी है, "हिंदुस्तान में कुछ ऐसे लोग हैं जो मूर्खता और विवेकहीनता के कारण उसी साम्प्रदायिक नीति को बरत रहे हैं जो पाकिस्तान में बरती जा रही है. ऐसा करके वे पाकिस्तान की नीति को ही मदद पहुंचा रहे हैं और भारतीय राज्य की बुनियादी मान्यता को कमजोर कर रहे हैं."
हिमांशु जोशी
No comments:
Post a Comment