*धर्मेन्द्र और फिल्म ‘आतंक’ : 30 साल बाद फिर चर्चा में जेसु*
धर्मेंद्र आज चर्चा में हैं तो लोगों ने उनकी पुरानी फिल्मों को भी याद करना शुरू किया है. इसी क्रम में साल 1995-96 की फिल्म आतंक और उसका किरदार जेसु फिर चर्चा में आ गया. समुद्र की लहरों के बीच संघर्ष करता एक मछुआरा, जो हार नहीं मानता.
*धर्मेंद्र की सिवाय किसी भी किरदार को ज्यादा जगह नही यानी 'ही मैन शो'*
फिल्म की कहानी मछुआरों के गांव और उनके संघर्ष पर आधारित है. तकनीकी सीमाओं के बावजूद फिल्म में भावनात्मक ईमानदारी दिखती है.
धर्मेन्द्र के साथ फिल्म में विनोद मेहरा, गिरीश कर्नाड, अमजद खान और रवि किशन जैसे बड़े नाम थे लेकिन उनका किरदार सीमित था, हेमा मालिनी को भी स्क्रीन में बहुत कम जगह मिली. फिल्म की कहानी कई जगह भटकती है पर फिल्म अपने इमोशनल कोर पर टिकी दिखती है.
*धर्मेन्द्र बतौर जेसु एक साधारण मछुआरा, असाधारण जज्बा*
जेसु एक साधारण मछुआरा है जो दबंग अल्फांजो के शोषण के खिलाफ खड़ा होता है. अनाथ होने की वजह से वह एक बच्चे से कहता है, 'मैं जानता हूं मां के प्यार के बगैर बच्चा कैसे जीता है'.
भाई और बहु को समुद्र में खो देने के बाद उसका संकल्प, 'मां कसम चाहे मेरी जान चली जाए मैं शार्क को मार के रहूंगा', धर्मेन्द्र की ‘हीमैन’ छवि को मजबूत करता है. लाल साड़ी पहनी हेमा मालिनी को कंधे पर उठाने वाला दृश्य भी उसी छवि का विस्तार है.
*दृश्य जो चर्चा में रहे. एक्शन, साहस और उस दौर की सिनेमाई भाषा*
क्लाइमेक्स में धर्मेन्द्र समुद्र में उतरकर शार्क से भिड़ते हैं और टकराव में अमजद खान को लेने आया हेलीकॉप्टर, शार्क से टकराकर क्रैश हो जाता है. आज के दर्शकों को यह ओवरड्रामेटिक लग सकता है, लेकिन उस समय इसे रोमांचक माना गया.
बिना आधुनिक तकनीक के ऐसे दृश्य निभाना उस दौर के सितारों के साहस की मिसाल माना जाता था.
*धर्मेन्द्र-हेमा की स्क्रीन उपस्थिति*
जैसा हमने पहले बताया कि हेमा मालिनी का किरदार सीमित है, पर उनकी और धर्मेन्द्र की सहज केमिस्ट्री दिखती है. वास्तविक जिंदगी की साझेदारी परदे पर भी दिखती है. फिल्म प्रेमकथा से ज्यादा मछुआरों के संघर्ष और सामाजिक चेतना का संदर्भ बनकर उभरती है.
*विरासत, आज क्लासिक नहीं, पर यादों में दर्ज*
तीन दशक बाद आतंक को कोई क्लासिक नहीं कहेगा. पर यह धर्मेन्द्र की मेहनत और उस दौर की फिल्म निर्माण शैली को दिखाती है.
फिल्म देखकर पुराने जमाने के सितारों की लोकप्रियता की यादें ताजा हो गईं. यह फिल्म हमें बताती है कि सिनेमाई तकनीक सीमित हो सकती है, पर ईमानदार कोशिशें दर्शकों तक पहुंचती हैं..
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