मेजर गिरिजा शंकर मुंगली एक शोधकर्ता के तौर पर
मेजर गिरिजा शंकर मुंगली का जीवन एक ऐसी यात्रा है जो सेना की अनुशासनबद्ध दुनिया से शुरू होकर, हिमालय की ऊँचाइयों की ओर बढ़ी और अंततः ज्ञान की गहन खोज में सिमटती चली गई है।
वे भारतीय में एक सेना अधिकारी ही नहीं रहे, बल्कि हिमालय के इतिहास, विशेषकर पर्वतारोहण के क्षेत्र में एक समर्पित शोधकर्ता भी हैं। वर्ष 1998 में कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल से इतिहास में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त करना, उनके लिए अपनी जीवन यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। सेना मुख्यालय, नई दिल्ली में क्वार्टर मास्टर जनरल्स शाखा के पारिस्थितिकी प्रकोष्ठ से जुड़ा उनका कार्य, केवल एक पेशेवर जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि हिमालय के प्रति उनके गहरे लगाव और सम्मान का प्रमाण रहा।
उनका शोध प्रबंध, "HISTORY OF MOUNTAINEERING IN THE HIMALAYA: With Special Reference to the Army Mountaineering Expeditions and the Role of the Indian Army in Promoting Adventure Activities and Environmental Care in the Himalaya," उनके जीवन के दो मुख्य स्तंभों को जोड़ता है। वह दो स्तंभ हैं- हिमालय की भव्यता और भारतीय सेना का योगदान। यह शोध कार्य मुंगली जी के जीवन का दर्पण भी है, जो हिमालय से शुरू होकर सेना तक पहुंचा था।
यह शोध कार्य सिर्फ एक अकादमिक कार्य नहीं है बल्कि उन ऊँचाइयों और उन लोगों के प्रति एक श्रद्धा सुमन है, जिन्होंने इन चोटियों को फतह किया और पर्यावरण संरक्षण की नींव रखी।
मेजर मुंगली की यह जीवनी उनके शोध प्रबंध की जानकारी दिए बिना अधूरी रहेगी। वे अपने शोध कार्य की शुरूआत से ही हिमालय की उत्पत्ति, उसके भूगोल और भूविज्ञान में डूब जाते हैं।
अपने शोध के माध्यम से, मेजर मुंगली ने 18वीं शताब्दी के हिमालय में पर्वतारोहण के शुरुआती दिनों की कहानियों को फिर से जीवंत किया, स्थानीय लोगों के साहसिक कार्य, तीर्थयात्रियों की यात्राएँ, व्यापार के रास्ते और अनगिनत अग्रदूतों के वे भ्रमण जिन्होंने इन बर्फीली चोटियों को पहली बार छुआ, इन कहानियों में शामिल हैं।
उनका शोध 1885 से 1953 के बीच के उस युग पर प्रकाश डालता है, जब एवरेस्ट की विजय जैसी ऐतिहासिक घटनाएँ हुईं और सर्वेक्षकों, पर्वतारोहियों ने हिमालय के रहस्यों को खोलना शुरू किया।
मेजर मुंगली ने अपने शोध के जरिए विशेष रूप से 1953 से 1995 के बीच पर्वतारोहण में भारतीय सेना के योगदान पर गहराई से प्रकाश डालते हैं। वे विभिन्न अभियानों, सेना द्वारा स्थापित पर्वतारोहण संस्थानों और साहसिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में सेना की भूमिका का विस्तृत वर्णन करते हैं। हॉज, एच.एम.आई, एन.आई.एम और डब्लू.एच.आई.एम जैसे प्रमुख पर्वतारोहण संस्थानों की स्थापना और विकास में सेना की भूमिका को वे रेखांकित करते हैं।
मेजर मुंगली ने पर्वतारोहण के नियोजन, उससे जुड़े खतरों और अन्य साहसिक खेलों, जैसे राफ्टिंग, वायु खेल और बर्फ व हिमपात में होने वाले रोमांच का भी विश्लेषण किया। उन्होंने हिमालय के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक पहलुओं को भी छुआ। मुंगली जी ने यह समझने की कोशिश की कि कैसे पहाड़ों की ये ऊँचाईयाँ भारतीय जीवन शैली का अभिन्न अंग बनीं।
अपनी थीसिस के प्राक्कथन में, मेजर मुंगली स्वयं स्वीकार करते हैं कि हिमालय जैसे विशाल विषय को एक पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। वे कहते हैं कि उन्होंने एक विनम्र प्रयास किया है और स्वीकार करते हैं कि हो सकता है उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण प्रयासों या योगदानों को अनदेखा कर दिया हो। यह स्वीकारोक्ति उनके शोध की निष्पक्षता और उनकी मानवीयता को दर्शाती है।
मेजर मुंगली का आभार व्यक्त करने का तरीका उनके विशाल हृदय और कृतज्ञतापूर्ण स्वभाव का उदाहरण है। वे भारतीय सेना को इस अमूल्य अवसर के लिए धन्यवाद देते हैं, जिसने उन्हें अपना शोध कार्य आगे बढ़ाने में मदद की। सैन्य प्रशिक्षण निदेशालय, सेना पर्यावरण प्रकोष्ठ और सेना अभिलेखागार से प्राप्त महत्वपूर्ण जानकारी और डेटा के लिए वे विशेष रूप से आभारी हैं।
कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के इतिहास विभाग के शिक्षकों और शोध विद्वानों, इंडियन माउंटनेयरिंग फाउंडेशन (आई.एम.एफ.) और विभिन्न पर्वतारोहण संस्थानों, जैसे हॉज, एच.एम.आई, एन.आई.एम और डब्लू.एच.आई.एम के प्रति भी उनका आभार व्यक्त होता है। उन्होंने चिकित्सा अनुसंधान, पर्यावरण और जैव-विविधता के लिए एम्स, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, एफ.आर.आई और डब्लू.डब्ल्यू.एफ इंडिया जैसी संस्थाओं का भी उल्लेख किया है।
ऐसे कई लोग थे जो मेजर मुंगली के जीवन में प्रेरणा के निरंतर स्रोत बने रहे। स्वर्गीय जनरल बी.सी. जोशी (पूर्व सेना प्रमुख), लेफ्टिनेंट जनरल बलजीत सिंह (डब्लू.डब्ल्यू.एफ. के ट्रस्टी), लेफ्टिनेंट जनरल एम.एल. डार (पूर्व वाइस चीफ), मेजर जनरल सुरेंद्र शाह, मेजर जनरल एम.पी.एस. त्यागी और ब्रिगेडियर के.एन. भट्ट जैसे प्रतिष्ठित नाम उनकी सूची में शामिल हैं। वे ब्रिगेडियर जे.एस. ओबेरॉय, कर्नल एम.टी. राव, कर्नल आर.एस. ब्रार, कर्नल वी.के. भट्ट, लेफ्टिनेंट कर्नल पी.एस. राय और मेजर अशोक अब्बे जैसे कई अन्य लोगों को भी धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने उन्हें प्रोत्साहित और मार्गदर्शित किया।
पारिवारिक प्रेरणा पर भी थीसिस में चर्चा
मेजर मुंगली अपने जीवन में अपनी पत्नी देवयानी, पुत्रों अनुज और प्रणीत और अपने माता-पिता, स्वर्गीय श्री बी.सी. मुंगली और स्वर्गीय श्रीमती कमला मुंगली को भी अपनी प्रेरणा और सहायता का एक महत्वपूर्ण स्रोत मानते हैं। यह उनके पारिवारिक जीवन के उस मजबूत आधार को दर्शाता है जिसने उन्हें अपने शोध और सामाजिक कार्यों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
मेजर मुंगली अपने शोध मार्गदर्शक डॉ. शेखर पाठक के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। डॉ. पाठक ने न केवल उनके विचारों को व्यवस्थित करने में मदद की, बल्कि उनके ज्ञान ने इस शोध कार्य पर अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। यह गुरु-शिष्य के संबंध का एक सुंदर उदाहरण है, जहाँ ज्ञान और अनुभव का हस्तांतरण होता है।
मेजर गिरिजा शंकर मुंगली ऐसे व्यक्ति हैं जो ज्ञान पाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, अपने देश की सेवा में विश्वास करते हैं और हिमालय जैसी महान प्राकृतिक संरचनाओं के प्रति गहरा सम्मान रखते हैं। उनका शोध कार्य हिमालय में पर्वतारोहण के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज ही नहीं है, बल्कि भारतीय सेना और पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का भी एक प्रमाण है। 26 नवंबर 1998 को हस्ताक्षरित यह कार्य, मेजर मुंगली की उस गहरी निष्ठा और समर्पण को दर्शाता है, जिसने उनके जीवन को नई दिशा दी।
मेजर गिरिजा शंकर मुंगली का शोध हिमालय की सतह से परे जाकर, उसकी जटिलताओं और मानवीय महत्वाकांक्षाओं के अनूठे मिश्रण में गहराई से उतरता है।
वे बताते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक, इस विशाल और रहस्यमयी पर्वत श्रृंखला का एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक मानचित्र भी उपलब्ध नहीं था। उस समय, आगंतुक अक्सर मुश्किल और अनजान रास्तों पर ही चलने को मजबूर थे, क्योंकि एक विश्वसनीय और व्यापक मानचित्र की परम आवश्यकता और उसके महत्व को तब तक पूरी तरह से महसूस नहीं किया गया था। यह वही काल था जब रणनीतिक और व्यापारिक आवश्यकता ने ईस्ट इंडिया कंपनी को हिमालयी क्षेत्रों के सर्वेक्षण और गहन मानचित्रण के लिए प्रेरित किया, जिसने उन्नीसवीं शताब्दी की दूसरी तिमाही में इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया को गति प्रदान की।
भारतीय सर्वेक्षकों का अदम्य साहस और महत्वपूर्ण योगदान
मेजर मुंगली, भारतीय सर्वेक्षकों और खोजकर्ताओं के असाधारण योगदान पर विशेष जोर देते हैं। उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों ने हिमालय की व्यवस्थित और वैज्ञानिक व्याख्या की दिशा में महत्वपूर्ण और स्थायी भूमिका निभाई। वे विस्तार से बताते हैं कि कैसे नैन सिंह और किशेन सिंह जैसे सर्वेक्षकों ने उस समय उपलब्ध सरल और अविश्वसनीय उपकरणों का उपयोग करते हुए साल 1862 तक 20,000 फीट से ऊपर सैंतीस चोटियों और 21,000 फीट से ऊपर पांच चोटियों पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की थी। ये केवल साधारण यात्राएँ नहीं थीं, इनमें भारी सर्वेक्षण उपकरण ले जाए गए थे और यह महीनों तक चलने वाले अभियान थे। अता मोहम्मद, मिर्जा शुजा और किनथुप जैसे अन्य भारतीय सर्वेक्षकों का भी इस अन्वेषण में महत्वपूर्ण और अमूल्य योगदान रहा, जिन्होंने अनजाने रास्तों को खोजा और नक्शों को सटीकता प्रदान की।
देशी प्रतिभा का उदय, शेरपाओं का योगदान
यह स्वीकार करते हुए कि प्रारंभिक पर्वतारोही अक्सर यूरोपीय गाइडों पर निर्भर रहते थे, जिन्हें आल्प्स के पर्वतीय वातावरण में प्रशिक्षित किया गया था। मेजर मुंगली साल 1907 में पर्वतारोहियों द्वारा साक्षात्कार की गई एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना प्रकाश डालते हैं, जिसमें अभियानों में देशी लोगों को सहायक सदस्यों के रूप में शामिल करने का महत्व के बारे में बताया गया था। इस दूरदर्शी विचार ने पर्वतारोहण की दुनिया में एक क्रांति ला दी। इसके तुरंत बाद शेरपा हिमालयी अभियानों का एक अविभाज्य और अनिवार्य हिस्सा बन गए और उनके अद्वितीय योगदान के साथ असाधारण उपलब्धियों को अंततः विश्व स्तर पर व्यापक मान्यता मिली। मेजर मुंगली के लिए यह केवल मानव श्रम की उपलब्धता का मामला नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी स्थानीय प्रतिभा की पहचान थी, जिसने हिमालयी चोटियों पर विजय को संभव बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पर्वतारोहण का खेल और अंतिम लक्ष्य का उद्भव
जैसा कि मेजर मुंगली ने पहले उल्लेख किया था, उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक, हिमालय का रहस्य कुछ हद तक बना हुआ था लेकिन पर्वतारोहण की खेल भावना धीरे-धीरे विकसित हो रही थी और इसकी जड़ें जम रही थी। वे साल 1909 में अब्रुज्जी के ड्यूक के K2 अभियान का उल्लेख करते हैं, जिसने फोटो-ग्रामेट्रिक सर्वेक्षण की तकनीक में अग्रणी कार्य किया, यह वैज्ञानिक अन्वेषण का एक महत्वपूर्ण कदम था। बीसवीं शताब्दी की पहली तिमाही में, हावर्ड बरी ने माउंट एवरेस्ट पर पहले टोही अभियान का नेतृत्व किया, यह उस महान शिखर की ओर पहला व्यवस्थित प्रयास था। ब्रूस ने वर्ष 1929 में दूसरा अभियान किया।
कंचनजंगा का पहला टोही अभियान साल 1929 में बाउर के नेतृत्व में हुआ और 1931 में एरिक शिप्टन, फ्रैंक स्माइथ, लेवा और होल्ड्सवर्थ ने कामेट पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की, यह उस युग की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक थी।
जर्मनों का साल 1937 में नंगा पर्वत का वह प्रयास जिसमें दुर्भाग्य से सात जर्मनों और छह कुलियों को अपनी जान गंवानी पड़ी, हिमालय की अपार क्रूरता और उस पर विजय पाने की मानव की अदम्य इच्छाशक्ति दोनों को एक साथ दर्शाता है। यह घटना पर्वतारोहियों के लिए एक गंभीर चेतावनी और प्रेरणा दोनों थी। मेजर मुंगली के शब्दों में हिमालय पर्वतारोहियों का सपना बना रहा, एक ऐसा लक्ष्य जिसने अनगिनत लोगों को प्रेरित किया।
माउंट एवरेस्ट: वह निषिद्ध शिखर और वैश्विक आकर्षण
बीसवीं शताब्दी की शुरुआत तक, वैज्ञानिक समुदाय में यह स्थापित हो चुका था कि माउंट एवरेस्ट पृथ्वी पर सबसे ऊँचा बिंदु था। लेकिन इस महान पर्वत की चढ़ाई एक जटिल भू-राजनीतिक पहेली थी। यह पर्वत निषिद्ध क्षेत्र का हिस्सा था, एक तरफ तिब्बत और दूसरी तरफ नेपाल। इस क्षेत्र में विदेशियों का प्रवेश पूरी तरह से निषिद्ध था, जिसने इस शिखर पर चढ़ने के किसी भी प्रयास को उस समय के लिए असंभव बना दिया था। पहला महत्वपूर्ण प्रयास केवल 1921 में ब्रिटिश पर्वतारोहियों द्वारा किया गया और वह भी सफल नहीं रहा था। एवरेस्ट पर बार-बार किए गए प्रयास, भले ही तत्काल सफल न हो रहे हों, पहाड़ों में वैश्विक रुचि को अप्रत्याशित रूप से बढ़ाते रहे। माउंट एवरेस्ट, इस प्रकार, सभी पर्वतारोहियों का सबसे बड़ा सपना बन गया।
एक सतत अन्वेषण: हिमालय के प्रति एक गहरा प्रेम
मेजर गिरिजा शंकर मुंगली का शोध केवल हिमालय की सतह से परे जाकर, उसके इतिहास, भूगोल और मानवीय अन्वेषण की गहराई में उतरता है। उनका कार्य केवल तथ्यों का संकलन नहीं है, बल्कि उस भूमि के प्रति एक गहरा, अटूट प्रेम और असीम सम्मान है, जिसने अनगिनत कहानियों, संघर्षों, विजयों और मानवीय उपलब्धियों को अपनी गोद में समेट रखा है।
वे हमें उस ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा बनाते हैं जो सर्वेक्षकों, खोजकर्ताओं, स्थानीय लोगों और अंततः पर्वतारोहियों ने पूरी की। मुंगली जी कुशलतापूर्वक यह दर्शाते हैं कि कैसे हिमालय ने सदियों से दुनिया भर के लोगों को अपनी ओर सम्मोहित किया है, कैसे यह आज भी अन्वेषण, प्रेरणा और आत्म-खोज का स्त्रोत बना हुआ है।
मेजर गिरिजा शंकर मुंगली: हिमालय की ऊँचाइयों को छूना
मेजर गिरिजा शंकर मुंगली का यह शोध हमें पर्वतारोहण के स्वर्णिम युग में भी ले जाता है, जिसकी शुरुआत साल 1953 में हुई थी। यह वह वर्ष था जब सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे ने माउंट एवरेस्ट की प्रतिष्ठित चोटी को फतह किया और तब से इन अदम्य ऊँचाइयों को जीतने की अनंत खोज जारी रही है। मेजर मुंगली बताते हैं कि पर्वतारोहण, किसी भी अन्य गतिविधि की तरह ही समय के साथ विकसित हुआ है।
मेजर मुंगली अपनी थीसिस में इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि कैसे पर्वतारोहण की भाषा ‘सैन्य’ बन गई। पर्वतारोही पर्वत को वह शत्रु मानते थे जिसे जीतना था और इस प्रकार विजय और पराजय की बातें होने लगीं। यह दृष्टिकोण, उन्नीसवीं शताब्दी से विकसित हुआ और यह दर्शाता है कि कैसे मानव ने प्रकृति की इस महान शक्ति को चुनौती दी।
अग्रणी पर्वतारोही केवल दो बुनियादी उपकरणों, रस्सी और बर्फ-कुल्हाड़ी का उपयोग करते थे, वहीं आधुनिक पर्वतारोही अधिक भार वहन क्षमता वाले, हल्के और मजबूत उपकरणों का उपयोग करते हैं। सिंथेटिक फाइबर के आविष्कार ने कपड़ों और तंबुओं की गुणवत्ता में क्रांतिकारी बदलाव लाया है, जो गर्मी के खराब संवाहक और जलरोधी होने के साथ-साथ वजन में भी हल्के हैं।
तकनीक का उत्थान: नेविगेशन, संचार और चिकित्सा
मेजर मुंगली ने नेविगेशन, संचार और चिकित्सा सहायता क्षेत्र पर भी ध्यान केंद्रित किया, उन्होंने लिखा कि इनमें बड़े बदलाव हुए हैं।
वे बताते हैं कि आज सैटेलाइट संचार प्रणाली पर्वतारोहियों को कुछ ही सेकंड में अपना सटीक स्थान और अनुसरण की जाने वाली दिशा स्थापित करने में मदद करती है। यह एक महत्वपूर्ण विकास है, क्योंकि पर्वतारोहण के अग्रदूतों के पास बाहरी दुनिया के साथ संचार का कोई साधन नहीं था। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक और सैटेलाइट संचार तत्काल वैश्विक संपर्क प्रदान करता है। उच्च ऊंचाई की बीमारियों पर अच्छी तरह से शोध किया गया है और अधिकांश बीमारियों के लिए प्रभावी दवा उपलब्ध है। अनुकूलन का अभ्यास किया जाता है ताकि उच्च ऊंचाई पर मनुष्य की शारीरिक सहनशक्ति को बढ़ाया जा सके।
स्वतंत्रता के बाद का युग: सेना की बहुआयामी भूमिका
स्वतंत्रता के बाद के युग में मेजर मुंगली भारतीय सेना के अग्रणी खोजपूर्ण अभियानों पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हैं, इनके जरिए ही हिमालय में रोमांच की जबरदस्त संभावना उजागर हुई।
ये अभियान अब पूर्ण रूप से विकसित साहसिक गतिविधियों में परिपक्व हुए हैं। सेना ने पर्वतारोहण और अन्य साहसिक गतिविधियों को अनुशासन के दायरे को बढ़ावा देने के लिए आयोजित किया है, इनमें भूमि और जल खेलों का पूरा स्पेक्ट्रम शामिल है। साथ ही, सेना ने नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए सुझावों को नहीं भूलाया है, इसके लिए सेना द्वारा पूरी हिमालयी पर्वतमाला में विभिन्न पर्वत सफाई कार्यक्रम और पारिस्थितिकी पुनर्निर्माण गतिविधियां शामिल हैं। साल 1993 में नंदा देवी के लिए पारिस्थितिकी और पर्यावरण अभियान, एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसे नागरिक और वैज्ञानिक समुदाय की सक्रिय भागीदारी के साथ सेना द्वारा आयोजित किया गया था।
मेजर मुंगली जोर देते हैं कि सेना पर्वतारोहण में अग्रणी रही है और साहस की भावना को प्रोत्साहित करने की लंबी परंपरा ने इसे देश में साहसिक खेलों को बढ़ावा देने वाले विभिन्न संगठनों के लिए एक अग्रणी मॉडल बनाया है।
कैप्टन एम.एस. कोहली के शब्दों में, भारतीय पर्वतारोहण के विकास और वृद्धि में सशस्त्र बलों के अधिकारियों और जवानों द्वारा महत्वपूर्ण योगदान दिया गया है।
पर्वतारोहण से जुड़ा शायद ही कोई बड़ा अभियान हुआ हो, जिसमें सैन्य कर्मियों ने भाग न लिया हो, चार एवरेस्ट अभियानों में से तीन सेना के अधिकारियों द्वारा संचालित किए गए थे।
सेना में साहसिक गतिविधियों को सुव्यवस्थित करने के लिए, सेना मुख्यालय में सेना साहसिक फाउंडेशन की स्थापना की गई। फाउंडेशन ने साहसिक गतिविधियों की योजना बनाना, आयोजित करना और संचालित करना शुरू किया। बाद में सेना साहसिक सेल (एएसी) की स्थापना की गई, यह अब 'सेना साहसिक विंग' के रूप में जानी जाती है।
पर्यावरणीय चेतना भी सेना की जिम्मेदारी
सेना ने वैश्विक स्तर पर सामने आ रही विभिन्न पर्यावरणीय चुनौतियों के साथ भी कदम मिलाया है। सेना ने अपनी जिम्मेदारी निभाई है और राष्ट्रीय नीति के अनुरूप ईको सेल की स्थापना की है ताकि पर्यावरण संरक्षण गतिविधियों की योजना बनाई जा सके। पर्यावरण से जुड़ी सही जानकारी का प्रसार किया जा सके और नाजुक संतुलन को बनाए रखने की दिशा में काम किया जा सके।
प्रदूषण नियंत्रण और ईको पुनर्निर्माण को सड़क निर्माण में विस्फोटकों, लकड़ी के ईंधन के उपयोग को कम करके एवं ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देने के साथ ही व्यापक वनीकरण कार्य द्वारा लागू किया जा रहा है।
सीमा सड़क संगठन (बी.आर.ओ.) और हिम एवं हिमस्खलन अध्ययन स्थापना (एस.ए.एस.ई.)
मेजर मुंगली हिमालय को सुलभ बनाने में सीमा सड़क संगठन (बी.आर.ओ.) की महत्वपूर्ण भूमिका को भी स्वीकार करते हैं। बी.आर.ओ, हिमालय में संचार की महत्वपूर्ण लाइनें प्रदान करता है और उसने हिमालय के विकास के लिए भी अत्यधिक योगदान देने के साथ रोजगार प्रदान किया है। हिम एवं हिमस्खलन अध्ययन स्थापना (एस.ए.एस.ई.) जैसे अन्य रक्षा संगठन, दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित हैं और हिमालय में हिमस्खलन पर सुरक्षित अध्ययन करते हैं। यह हिमस्खलन की निगरानी करते हैं और दुर्घटनाओं से बचने के लिए नियमित जानकारी और सुरक्षा उपाय प्रदान करते हैं।
ऊंचाई पर चिकित्सा और मानव शरीर
पर्वतारोहण का विकास केवल रोमांच या अन्वेषण का परिणाम नहीं है, बल्कि उच्च ऊँचाई पर दुर्लभ हवा की परिस्थितियों में मानव शरीर विज्ञान को समझने की वैज्ञानिक जिज्ञासा से भी प्रेरित रहा है। सेना चिकित्सा कोर ने उच्च ऊँचाई चिकित्सा विज्ञान के विकास और शोध में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चूँकि सेना का एक बड़ा हिस्सा उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तैनात रहता है, इसलिए उच्च ऊँचाई के प्रभावों को समझना उसके लिए अनिवार्य बन जाता है।
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 3000 मीटर से अधिक ऊँचाई पर पहुँचने के बाद मानव शरीर में कई शारीरिक, जैवरासायनिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन दिखाई देते हैं। सेना के लिए ये चुनौतियाँ और भी महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि पर्वतारोहण में प्राकृतिक तथा मानव-निर्मित, दोनों प्रकार के जोखिम शामिल होते हैं। इसी कारण सेना चिकित्सा कोर के डॉक्टर, पर्वतारोही और शोधकर्ता नियमित रूप से पर्वतीय क्षेत्रों का दौरा करते हैं, ताकि मानव शरीर पर उच्च ऊँचाई के प्रभावों का गहन अध्ययन किया जा सके और सैनिकों के लिए सुरक्षित, वैज्ञानिक दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकें।
आपातकालीन बचाव और HIMEX
आपातकालीन निकासी और खोज अभियानों में पिछले वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। मोटर परिवहन और हेलीकॉप्टरों के बढ़ते उपयोग ने इन अभियानों की गति और दक्षता को कई गुना बढ़ा दिया है। इसके परिणामस्वरूप न केवल अनगिनत मानव जीवन बचाए जा रहे हैं, बल्कि पर्वतारोहियों का मनोबल भी अत्यधिक मजबूत हुआ है। इस क्षेत्र में भारतीय सेना की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
सेना ने महान हिमालयी अभियान (HIMEX) का आयोजन कर इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया। यह एक महत्वाकांक्षी, बहु-आयामी और बहु-अनुशासनात्मक साहसिक अभियान था, जिसने हिमालयी पर्वतमाला के विस्तृत खंड को सफलतापूर्वक कवर किया। HIMEX ने न केवल पर्वतारोहण अभियानों के नए मानक स्थापित किए, बल्कि हिमालय के वैज्ञानिक, भौगोलिक और सामरिक अध्ययन में भी अमूल्य योगदान दिया।
संस्थान और नैतिक कोड
सेना की सहायता से संचालित विभिन्न पर्वतारोहण संस्थान जैसे हिमालयी पर्वतारोहण संस्थान, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान और उच्च ऊंचाई वाला युद्ध स्कूल, खेल और साहसिक प्रशिक्षण के लिए पेशेवर मार्गदर्शन प्रदान करते हुए पर्वतारोहण के लोकप्रिता की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन संस्थानों के माध्यम से नई पीढ़ी में पर्वतारोहण के प्रति समझ, तकनीकी दक्षता और अनुशासन विकसित हो रहा है।
मेजर मुंगली यह स्पष्ट रूप से बताते हैं कि पर्वत केवल चुनौती नहीं, बल्कि सम्मान के योग्य प्राकृतिक धरोहर हैं। इसी सोच को ध्यान में रखते हुए पर्वतारोहियों के लिए क्या करें और क्या न करें की एक नैतिक संहिता तैयार की गई है, जिसका पालन हर पर्वतारोही के लिए आवश्यक है। यह संहिता पर्वतीय पर्यावरण, पर्वतों की गरिमा और स्वयं पर्वतारोहियों की सुरक्षा के संरक्षण के लिए अनिवार्य मानी जाती है।
हिमालयी जैव विविधता और सेना का समग्र दृष्टिकोण
मुंगली जी की थीसिस के अनुसार हिमालय की जैव विविधता अत्यंत अद्वितीय है और इसके कई क्षेत्र आज भी पूरी तरह अन्वेषित नहीं हो पाए हैं। भारतीय सेना ने हिमालय की पारिस्थितिकी और पर्यावरण के संरक्षण एवं विकास के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाया है। वनीकरण परियोजनाओं में सक्रिय भागीदारी, वन्यजीव संरक्षण में सहयोग और संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने का दायित्व सेना ने गंभीरता से निभाया है। इसके साथ ही, कचरे के सुरक्षित निपटान के लिए उपयुक्त और वैज्ञानिक तरीके विकसित किए गए हैं, जिससे प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण संभव हो पाया है।
विभिन्न साहसिक खेल और निरंतर निगरानी
हिमालय की विशाल पर्वतमाला और उसके अद्वितीय दृश्य केवल पर्वतारोहण या ट्रेकिंग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भूमि, वायु और जल के अनेक साहसिक खेल रोमांच-प्रेमियों के लिए बड़ा आकर्षण हैं। इन गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए सेना ने अनेक स्थानों पर नोडल केंद्र स्थापित किए हैं, जहाँ आवश्यक प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, सेना हिमालय की कठिन ऊँचाइयों में निरंतर निगरानी रखती है। यह चुनौतीपूर्ण वातावरण न केवल सेना की दक्षता को बढ़ाता है, बल्कि उसे अधिक सजग, साहसी और तत्पर बनाता है।
अंत में, हिमालय की स्थायी प्रेरणा
अंत में मेजर मुंगली हिमालयी क्षेत्र के लोगों की जीवंत संस्कृति, कला, शिल्प, धर्म की विविधता और मुख्य रूप से पशुपालन पर आधारित अर्थव्यवस्था की सराहना करते हैं।
वह कहते हैं यह अक्सर दुखद है कि लोग पर्वतारोहण के पीछे की मूल भावना को गलत समझते हैं। वे इसे प्रकृति के खिलाफ मनुष्य के संघर्ष के रूप में समझते हैं, लेकिन इसके विपरीत, यह प्रकृति के साथ एकता महसूस करने की इच्छा से उत्पन्न होता है। हालांकि इसमें चुनौती की भावना है, जीवन पर्वतों के आसपास है, शीर्ष पर नहीं।
जिन्हें हिमालय से मिलने का सौभाग्य प्राप्त है, उनके लिए यह हमेशा प्रेरणा, शक्ति और चुनौती का एक बारहमासी स्रोत बने रहेंगे।
मेजर मुंगली के लिए, हिमालय जीवंत हैं और यह जीवन कई कारकों का परिणाम है, पवित्रता, वनस्पति और जीव जंतु इसमें प्रमुख हैं। मनुष्य और हिमालय के बीच का बंधन पुराना है और जब तक मनुष्य में साहसिक कार्य की भावना जीवित रहेगी तब तक यह बना रहेगा।
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