*अंजु वेद की ‘अधूरी नहीं हूं’: स्त्री-विमर्श का सच्चा आईना*
*प्रो. रमा ने इसे स्त्री मुक्ति का नया पाठ कहा है*
यूट्यूब के ‘कहानी माला’ चैनल से जुड़ी डॉ. अंजु वेद का कहानी संग्रह ‘अधूरी नहीं हूं’ संजय प्रकाशन से इस वर्ष प्रकाशित होकर आया है. कवर पेज आकर्षक है और उसे देखकर लगता है कि यह पुस्तक पाठकों को महिलाओं से जुड़े गंभीर और संवेदनशील मुद्दों से रूबरू कराती है. किताब की शुरुआत में हंसराज कॉलेज, दिल्ली की प्राचार्या प्रो. रमा ने इसे स्त्री मुक्ति का नया पाठ कहा है और अपनी टिप्पणी में उन हिस्सों को रेखांकित किया है जो इस संग्रह की वैचारिक दिशा तय करते हैं. लेखिका ने ‘संकलन के विषय में’ यह स्पष्ट लिखा है कि उनकी कहानियाँ कृत्रिम नहीं हैं और सीधे जीवन से ली गई हैं. इससे पाठक के मन में संग्रह की सहज विश्वसनीयता स्थापित होती है.
*कहानियों की दुनिया और उनका स्वर*
किताब की पहली कहानी ‘कुनिया’ में लेखिका स्वयं कहानी के भीतर मौजूद दिखती हैं. “अचानक मेरी दृष्टि पहली पंक्ति में खड़ी पहली बालिका पर पड़ी.” जैसे वाक्य कथा को व्यक्तिगत अनुभव और आत्मीयता से जोड़ते हैं. कुनिया के मासूम हावभाव को 'कुनिया की आंखें सजल हो उठीं, उसका गोल-गोल चेहरा खुशी से लाल हो गया.' जैसे वाक्यों से जीवंत कर दिया गया है. 'लड़की जात थी, कौन हाथ पीले करता उसके', पंक्ति हमारे सामाजिक मनोविज्ञान का कटु सच सामने रखती हैं. यही वह तीखापन है, जिसने प्रो. रमा को इस संग्रह की प्रशंसा करने पर मजबूर किया.
*ग्रामीण पृष्ठभूमि और संस्कारों की पुनरावृत्ति*
किताब की ज्यादातर कहानियाँ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित हैं और एक समान सांस्कृतिक धरातल साझा करती हैं. इनमें संस्कार, परंपरा, सामाजिक रूढ़ियाँ और स्त्री के लिए तय की गई भूमिकाएँ बार-बार उभरती हैं.
कई कहानियों में लेखिका संस्कारों के इर्द-गिर्द रहकर जीवन जीने की सीख भी देती हैं. नए और पुराने के द्वंद्व में यह भी दिखता है कि परंपरा को अक्सर सही और आधुनिक जीवनशैली को गलत ठहराने की प्रवृत्ति कई कथाओं में एकतरफा रूप में उभरती है.
इस दृष्टि से यह संग्रह विषय और भाव दोनों में एक-दूसरे से जुड़ी कहानियों का समूह है. नई कथ्य-तलाश या विविधता की अपेक्षा रखने वाले पाठकों को यहाँ कुछ समानता अधिक महसूस हो सकती है. परंतु ग्रामीण समाज में स्त्री की वास्तविक स्थिति को समझने वालों के लिए यह एक आवश्यक पाठ है.
*स्त्री संघर्ष, आकांक्षा और आत्मनिर्भरता*
शीर्षक कहानी ‘अधूरी नहीं हूं’ में यशवन्ती सामाजिक बेड़ियों को तोड़ते हुए आगे बढ़ती है. यह कहानी एक सीधा संदेश देती है कि बेटियाँ अपनी क्षमता के दम पर सब कुछ कर सकती हैं और उनका सशक्तिकरण परिवार के सहयोग से और तेज होता है. ‘कल्पना’ कहानी में विभिन्न वर्गों की महिलाएँ अपने-अपने संघर्ष, जिम्मेदारियाँ और छिपी आकांक्षाएँ लेकर सामने आती हैं. कमला, जो पिता की मृत्यु के बाद “घर का मर्द” बन गई और पराग की मां, जिसे “बेचारी” कहना स्वीकार नहीं, इन दोनों के माध्यम से स्त्री जीवन की विविधताएँ संवेदनशीलता से उभरती हैं. ‘क्या अपराध था’ कहानी में ग्रामीण समाज की बहुओं की स्थिति और उन पर ढहते सामाजिक अत्याचार नजदीक से दिखाई देते हैं.
*डिजिटल युग और परंपरा के द्वंद्व वाली कहानियाँ*
किताब की कई कहानियाँ ओल्ड स्कूल शैली की हैं और आधुनिक डिजिटल जीवन से मेल नहीं खातीं. ‘मैं मॉडर्न हूं’ कहानी शहर और गांव के बीच बने पुल को दिखाती है, पर कथा का बदलाव उतना स्वाभाविक नहीं लगता. सपना के चरित्र परिवर्तन का कारण स्पष्ट नहीं है और लेखिका का आधुनिक व्यवहार पर टिप्पणी करना पूर्वाग्रहपूर्ण प्रतीत होता है.
*लिंगभेद और पारिवारिक संवेदनशीलता*
‘लुभावन’ कहानी बच्चों की परवरिश में लिंग आधारित भेदभाव को तीखे और सटीक ढंग से उजागर करती है. “मैं ही क्यों? तेजस को भेजो.” और “तेजस को ये चीजें बिना काम के ही मिल जाती थीं.” इन पंक्तियों से यह साफ पता चलता है कि कई परिवारों में लड़कियों और लड़कों के बीच संसाधनों और स्नेह का वितरण आज भी समान नहीं है.
कहानी का यह अतिरिक्त विवरण इसे और गहराई देता है: “हमें चॉकलेट, बिस्कुट और बच्चों की पसंदीदा चीजें लुभावन के रूप में देती थी. हां, यह अलग बात है कि तेजस को ये चीजें बिना काम के ही मिल जाती थीं.” यह हिस्सा भेदभाव को और उभारता है.
बेटी द्वारा अस्पताल का बिल चुकाना इस कहानी का भावनात्मक शिखर है. “सिया, आज तूने अपनी परवरिश का...” यह पंक्ति पाठक को भीतर तक छू जाती है.
*थर्ड जेंडर का चित्रण और अकेली महिला*
‘तेरी पहचान’ कहानी में ‘सुंदरी’ का चरित्र अत्यंत संवेदना से लिखा गया है. इसमें थर्ड जेंडर समुदाय के संघर्ष, प्रेम, समर्पण और आत्मसम्मान को सम्मानजनक स्थान मिला है. “आप लोगों की इस तपस्या को सफल बनाने में मुझसे जो हो सकेगा, मैं प्राण देकर भी करूंगी.” यह वाक्य कहानी के साथ किताब को विशेष ऊंचाई देता है.
‘कौन-सी बेटी’ कहानी में उन सामाजिक व्यवहारों को उजागर किया गया है, जिनमें अकेली औरतों को पारिवारिक व सामाजिक आयोजनों से बाहर रखा जाता है. “ऐसे अवसर में इनको नहीं बुलाते.” यह पंक्ति अकेली स्त्रियों के प्रति समाज की असंवेदनशीलता को स्पष्ट करती है.
*वर्णनात्मक शैली और लक्षित पाठक-वर्ग*
अंजु वेद की अधिकांश कहानियाँ वर्णनात्मक (descriptive) हैं और संवाद बहुत कम हैं. लेखिका दृश्य, भावना और परिवेश को धीरे-धीरे खोलती हैं और पाठक को कहानी के भीतर ले जाती हैं. यह लेखन-शैली उन पाठकों को विशेष आकर्षित करेगी जो स्त्री-विमर्श पढ़ते हैं और ग्रामीण पृष्ठभूमि की कहानियों में रुचि रखते हैं. किताब परंपरा और आधुनिकता के संघर्ष को समझने की चाह रखने वालों को भी पसन्द आएगी. यह संग्रह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो महिला मुद्दों पर लिखी संवेदनशील कहानियाँ खोजते हैं.
‘अधूरी नहीं हूं’ एक ऐसा संग्रह है जो ग्रामीण जीवन, स्त्री संघर्ष और संस्कार-केंद्रित परंपराओं को बार-बार, कई कोणों से सामने लाता है. कई कहानियों में विषयों की पुनरावृत्ति है, पर वही पुनरावृत्ति इस बात का प्रमाण भी है कि हमारे समाज में स्त्री के जीवन की लाचारियाँ, उम्मीदें और सीमाएँ लगातार एक जैसी ही बनी रहती हैं.
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