Sunday, November 16, 2025

०— मुंगली जी प्राक्कथन

शीर्षक- शून्य से क्षितिज तक एक यात्रा

             गिरिजा शंकर मुंगली

 कॉफी टेबल बुक
फॉण्ट: 14
लाइन स्पेसिंग: 1.3

प्राक्कथन

कभी कभी किसी यात्रा की शुरुआत हम बिना जाने कर देते हैं। तब हम शून्य पर होते हैं और हमें पता नहीं होता कि हमारी मंजिल क्या है पर सच यह है कि हमारी मंजिल बहुत पहले से हमारी प्रतीक्षा में खड़ी होती है। मेरे लिए यह पुस्तक भी ऐसा ही एक रास्ता थी।

पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में, जब मेरी कलम अभ्यास में थी और मन दुनिया को देखने के लिए उत्सुक था, तभी मेरे पत्रकारिता गुरु राजीव लोचन साह जी ने एक दिन कहा “तुम्हें मुंगली जी पर किताब लिखनी चाहिए। यह काम तुम्हें ही करना है।”

आलेखों के बाद किताब पर किसी दिन तो आना ही था लेकिन इतनी जल्दी नहीं सोचा था। पर एक गुरु ने भरोसा किया तो उसे निभाना तो था ही। 

उस समय मैं यह नहीं जानता था कि यह काम कैसे होगा और कब पूरा होगा। पर एक बात स्पष्ट थी कि यह कार्य मेरे हिस्से का है। कुछ काम हम चुनते हैं पर कुछ काम स्वयं हमें चुन लेते हैं। 

गिरिजा शंकर मुंगली, जिन्हें अब पुस्तक में लगभग हर जगह मुंगली जी लिखकर संबोधित किया जाएगा, उनसे पहली मुलाकात से अब तक इन चार पांच वर्षों में मेरे जीवन में भी उनके चरित्र का सकारात्मक असर हुआ है। उनका व्यवहार, उनकी सीख अब मेरे जीवन का हिस्सा हैं।

“किसी को सुनना सीखो। सुनना सबसे बड़ा ज्ञान है और सबसे बड़ा सम्मान भी।” अपने बारे में बताते हुए मेरे बीच में बोलने पर ये शब्द उन्होंने कई बार बोले।

पत्रकारिता या यूं कहें कि लेखन में बोलना आसान है पर सुनना कठिन है। यह कठिन कला मैंने उनसे सीखी। इसे सीखने बाद ही NDTV के लिए सौ से ऊपर आलेखों का सफर मेरे लिए आसान होता चला गया।

उन्होंने एक और वाक्य कहा था जो मेरे भीतर स्थिर हो गया “ऊँचा उड़ो पर जमीन मत छोड़ो। पंख खुले रहें तो आकाश मिलता है और पैर ज़मीन पर हों तो दिशा नहीं खोती।”

पत्रकारिता में उड़ान भी है और भ्रम भी। सफलता भी है और खो जाने का खतरा भी। 

साल बीतते गए, रिपोर्टिंग और रातों में लेखन चलता रहा। उमेश डोभाल पत्रकारिता पुरस्कार मिला लेकिन “मुंगली जी की किताब लिख रहा हूँ” वाक्य मन में बार–बार आता रहा। यह वाक्य वादा भी था और कभी कभी बोझ भी। क्योंकि लिखने में समय लगता है और पूरा करने में जीवन का धैर्य। इसी बीच मुंगली जी का एक वाक्य मुझे बार बार दिशा देता रहा “समय लगे तो लगे। काम पूरा करो फिर तुम्हारे हर अगले कदम की शुरुआत में मैं साथ हूं।”

किताब में समय लगने के बावजूद मैंने कभी उन्हें खुद पर गुस्सा होते नहीं देखा।

मुंगली जी के जीवन ने मुझे यह सिखाया कि ऊँचाई केवल पहाड़ों की नहीं होती। मनुष्य भी ऊँचा हो सकता है। उनकी विनम्रता, साहस, अनुशासन, दूसरों के लिए जीने का लक्ष्य और शिक्षा के प्रति समर्पण मेरे लिए मार्गदर्शक बने। उनके जीवन को लिखना मेरे लिए भी एक चुनौती न होकर लक्ष्य बन गया।

यह पुस्तक आवश्यक थी क्योंकि कुछ जीवन ऐसे होते हैं जिन्हें केवल याद रखना पर्याप्त नहीं होता। उन्हें लिखना भी आवश्यक होता है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ समझ सकें कि ईमानदारी, अनुशासन, राष्ट्रभावना और मानवता जैसे मूल्य कितने महत्त्वपूर्ण हैं। खुद निडर होकर अपने बच्चों को भी वैसा बनाना, एक अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद अपने जीवन की मंजिल समझ आते ही निडर होकर फ़ौज के अपने सफल करियर को छोड़कर दूसरी राह पकड़ने की यह कहानी लोगों तक पहुंचनी ही चाहिए।

यह पुस्तक साहित्यकार की शैली में नहीं लिखी गई। यह एक पत्रकार की पुस्तक है इसलिए भाषा सरल है। भाव सीधा है और घटनाएँ उसी रूप में रखी हैं जैसे सुनीं और समझीं। यह पुस्तक सुनने की कला के नाम है।

यह उड़ने के साहस की एक कहानी है, यह सत्य के साथ खड़े रहने का एक किस्सा है।

लेखन अकेला के बस का काम नहीं है यह साधना की तरह है। इस साधना में मेरा परिवार, मेरे मित्र और मेरे गुरु मेरे साथ खड़े रहे। उनका विश्वास ही मेरा आधार बना।

मैंने हमेशा से सिर्फ यही चाहा है कि मेरी कलम हमेशा समाज की भलाई के लिए चले।

आज जब यह पुस्तक आपके हाथ में है तो मुझे लगता है कि एक वाक्य जो वर्षों तक अधूरा था अब पूर्ण हो चुका है। अब मैं यह नहीं कहता कि किताब लिख रहा हूँ। अब मैं कह सकता हूँ कि हां, मैंने मुंगली जी पर किताब लिखी है। मैं एक किताब का लेखक भी हूं और अभी काफी आएंगी।

यह पुस्तक मेरे सीखने की यात्रा का प्रमाण है। मेरे वादे का उत्तर है। मेरे गुरु राजीव लोचन साह जी के विश्वास का सम्मान है।

ईश्वर करे यह पुस्तक आपकी आँखों तक ही नहीं आपके मन तक पहुँचे। आपको उस जगह पहुंचाए जहाँ ऊँचाई हो और विनम्रता भी, साथ में सत्य के साथ संवेदना भी हो क्योंकि यही मुंगली जी की विरासत है और यही मैंने उनसे सीखा है।

मुंगली जी के शब्दों में सरनेम बदल जाने की कहानी

मुंगली जी की कहानी लिखने से पहले आपको गिरिजा शंकर मुनगली से गिरिजा शंकर मुंगली हो जाने की कहानी भी बताता चलूं। 

मुंगली जी कहते हैं कि स्कूल से कॉलेज पहुंचने तक उनका सरनेम ‘मुनगली’ ही लिखा जाता था लेकिन जब वह सेना में आए तो लोग इसे ‘मुंगली’ लिखने लगे। नेमप्लेट में भी यही लिखा जाता था, तब से उनका सरनेम मुनगली से मुंगली हो गया। जारी रहेगा.....

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