Sunday, November 16, 2025

एक — शून्य से क्षितिज तक एक यात्रा

चम्पावत से शुरू होती नीम करौली बाबा का विशेष आशीर्वाद पाए मुंगली परिवार की कहानी

मुंगली जी के बारे में जानने से पहले उनके परिवार और उसके इतिहास के बारे में जानना जरूरी है। ये कहानी उत्तराखंड के चंपावत शहर से शुरू होती है।

चंपावत उत्तराखंड के पूर्वी कुमाऊँ क्षेत्र का एक प्राचीन शहर है, यह लगभग 1670 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और राज्य के पूर्वी छोर पर नेपाल से लगा हुआ है। इतिहास पर नजर डालें तो चम्पावत चंद राजाओं की राजधानी रहा और दसवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच वहां अनेक मंदिरों, स्तंभों और शिलालेखों का निर्माण हुआ। इनमें से कई अभी सुरक्षित हैं और कुछ को बदहाल स्थिति में छोड़ दिया गया है।

बालेश्वर मंदिर, नागनाथ मंदिर, एक हथिया का नौला, कोतवाली चबूतरा और बाणासुर किला जैसी धरोहरें इस धरती की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता का साक्षात प्रमाण हैं। चंपावत में फैले हुए चाय बागान, हिमालय की स्वच्छ हवा, घने देवदार के पेड़ इस छोटे से शहर को एक अद्भुत संसार बना देते हैं।

स्थानीय लोककथाओं के अनुसार इस नगर का मूल नाम चम्पावती था, जो राजा अर्जुन देव की पुत्री चम्पावती के नाम पर रखा गया था। सदियों से यह क्षेत्र नाग, किन्नर और कुमाऊँ की लोकपौराणिक परंपराओं का केंद्र माना जाता है, जिसके कारण इसकी संस्कृति विविध रंगों से भरी हुई है। चंपावत का सामाजिक जीवन अपनी सादगी, आस्था और प्राकृतिक संतुलन के लिए जाना जाता है। आज चंपावत में जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है और यह पर्यटन, शिक्षा तथा स्थानीय संस्कृति के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है।

मुंगली जी कहते हैं कि उन्होंने अपने घर के बुजुर्गों से यही सुना है कि जब चंद शासकों का गौरवशाली शासनकाल चंपावत से अल्मोड़ा की ओर स्थानांतरित हुआ, तब उनके साथ वह परिवार भी चले जो राजदरबार की सेवा में अग्रिम पंक्ति में थे, उनमें हमारे मुंगली वंश के पुरखे भी शामिल थे।

अल्मोड़ा में बसने के बाद भी, परिवार ने अपनी उन जड़ों से रिश्ता नहीं तोड़ा और उनका चम्पावत से संपर्क बना रहा।
चंपावत के प्राचीन मंदिरों में जाना, वहाँ परंपरागत त्योहारों में पूरे उत्साह से शामिल होना और चम्पावत की सांस्कृतिक परंपराओं को अपनी नई जीवनशैली में जीवित रखना, यह मुंगली परिवार के लिए किसी धर्म-कार्य से कम नहीं था या यूं कहें कि ये उनके लिए खुद को न भूलने जैसा भी था।

परिवार में नई पीढ़ी को उनका चंपावत से जुड़ा इतिहास सुनाया जाता था, समय के पहिये घूमते रहे और दुनिया बदलती रही। आधुनिकता की लहरें, व्यापार और अवसरों की तलाश, मुंगली परिवार को पहाड़ों की शांत फिज़ाओं से निकालकर मैदानी क्षेत्रों की ओर ले गई। अंततः, उन्होंने हल्द्वानी को अपना नया घर चुना। यह निर्णय आसान नहीं रहा होगा। उस हवा को छोड़ना जो सदियों से उनकी साँसों में बसी थी, इसके साथ आड़े-तिरछे, ऊंचे-नीचे रास्तों वाले सुंदर पहाड़ों को छोड़ना, जिन पर उनके दादा-परदादा चले थे और उनकी प्रारंभिक सभ्यता विकसित हुई थी।

लेकिन जीवन का नियम यही है कि यह कभी नहीं रुकता, निरंतर आगे बढ़ता है और मनुष्य को भी उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलना पड़ता है।

मैदान के शहर में अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए अनेक नए अवसर थे, इसमें व्यापार और वाणिज्य की नई संभावनाएँ शामिल थीं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि हल्द्वानी में बच्चों की बेहतर शिक्षा के अवसर होने के साथ- साथ उनके बेहतर भविष्य के लिए साधन उपलब्ध थे। मुंगली परिवार को हल्द्वानी आने के बाद एक नई दिशा मिली।

हल्द्वानी, पहाड़ों का प्रवेश द्वार

हल्द्वानी शहर कुमाऊं का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, यह अल्मोड़ा, द्वाराहाट, रानीखेत जैसे सुंदर और ऐतिहासिक स्थानों का प्रवेश द्वार है। हल्द्वानी से पहाड़ों का रोमांच शुरू हो जाता है और यहां से हमें मैदानी इलाकों का विस्तार भी दिखता है। यह शहर हमेशा से पहाड़ और मैदान के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु रहा है, एक ऐसा मिलन बिंदु जहाँ दो अलग अलग संस्कृतियां मिलती हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं।

काठगोदाम स्टेशन की चहल-पहल से लेकर नैनीताल की ओर जाने वाली सड़कों का ट्रैफिक, हमें मैदान और पहाड़ दोनों का अहसास करवाते रहते हैं।
 यह पूरा इलाका ही उस आवाजाही, रफ्तार और व्यावसायिक ऊर्जा को अपने भीतर समेटे हुए है, जिसने हल्द्वानी को आज एक प्रमुख व्यापारिक, शैक्षिक और रोजमर्रा के जीवन का केंद्र बनाया है।

पहाड़ों से नीचे की ओर चलने वाली ठंडी हवा, शहर के पूर्वी छोर पर फैले गौलापार के खुले, हरे-भरे खेत, हल्द्वानी की पहचान के अविभाज्य अंग हैं। अब नई, चौड़ी सड़कों ने काफी हद तक गौलापार की पहचान को बदल दिया है लेकिन अब भी उस जगह हरे भरे खेत हमें दिखाई देते ही हैं।
 
हल्द्वानी का पूरा चरित्र केवल उसके बाजारों की भीड़-भाड़ या उसकी व्यस्त सड़कों की भागदौड़ से नहीं बनता, बल्कि उन असंख्य लोगों से बनता है जो यहाँ रहते हुए अपने जीवन के हर क्षेत्र में मेहनत और लगन के साथ इस शहर को जीवंत रखते हैं।
इतना सब करने के बाद भी हल्द्वानी के लोगों ने अपनी पहाड़ की संस्कृति अब भी नहीं छोड़ी है।
यहां हर तरह के लोग हैं, वे किसान जो अपनी ज़मीन से जुड़े हैं, हल्द्वानी में व्यापारी हैं जो अपनी मेहनत से बाज़ार को चलाते हैं, यहां के मज़दूर शहर की हर बुनियाद को मजबूत करते हैं, भविष्य का निर्माण करने वाले शिक्षक हैं और लोगों का जीवन बचाने वाले डॉक्टर हैं। हर कोई अपने-अपने तरीके से, इस शहर को चला रहा है, अपने हिस्से का योगदान दे रहा है। यही विविधता, मेलजोल और सामूहिक प्रयास हल्द्वानी की पहचान का मूल आधार है।

बीते हुए वर्षों में, हल्द्वानी ने तीव्र गति से कई बदलाव होते देखे हैं। खूब सारे प्राइवेट स्कूल, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस अस्पताल, आधुनिकता का चेहरा कहलाए जाने वाले मॉल, चौड़ी सड़क, व्यवस्थित रेल और बस स्टेशन ने इसे एक आधुनिक विकसित शहर का चेहरा दिया है।

लेकिन इस बड़े पैमाने पर हुए विकास के बीच भी, पुराने मोहल्लों ने अपनी सादगी, पहचान और मौलिक चरित्र को जस का तस बनाए रखा है। हल्द्वानी की भूमि हमेशा से उन लोगों की कर्मभूमि रही है, जिन्होंने अपने परिश्रम से नए रास्ते बनाते हुए नई ऊँचाइयों को छुआ है। मुंगली परिवार ने भी हल्द्वानी पहुंचने पर बीस बीघे से अधिक उपजाऊ ज़मीन ली, जिसका विस्तृत विवरण साल 1885 में आधिकारिक दस्तावेज़ों में दर्ज हुआ था।

सन् 1885 में मिला जमीन का वह दस्तावेज अंग्रेज़ी और उर्दू अक्षरों में लिखा हुआ है। साथ ही दस्तावेज में सरकारी मोहरें और दस्तखत स्पष्ट रूप से अंकित हैं। यह आज भी मुंगली परिवार के पास एक अनमोल धरोहर के रूप में सुरक्षित है।
उस समय इतनी बड़ी ज़मीन की रजिस्ट्री करवाना और उसे कानूनी तौर पर अपने नाम करवाना आसान काम नहीं होता था। कचहरी के कई सारे चक्कर लगाने और अलग अलग कागजात तैयार करने के बाद यह रजिस्ट्री तैयार हुई। इसके लिए परिवार को अच्छी खासी धनराशि भी खर्च करनी पड़ी थी।

लेकिन परिवार ने यह सब किया, क्योंकि वे जानते थे कि यह प्रक्रिया कोई मामूली सा लेनदेन ना होकर परिवार के बेहतर भविष्य के लिए एक बेहतर निवेश है और हल्द्वानी में पक्के कागज वाली इतनी जमीन होना भविष्य में बड़ी बात होने वाली है।

रामपुर रोड की ओर फैली हुई इस विशाल भूमि को समय के साथ, स्थानीय लोगों ने 'मुंगली गार्डन' कहना शुरू कर दिया। इस नाम के साथ ही परिवार की प्रतिष्ठा और उनका सामाजिक स्तर और भी ऊँचा हो गया। आज उस जगह के आसपास उत्तर उजाला अखबार का ऑफिस और गुरुद्वारा है।

'मुंगली गार्डन' के भीतर का जीवन केवल खेती-बाड़ी तक सीमित नहीं था। यह अपने आप में एक आत्मनिर्भर संसार था। खेतों के बीच बने साधारण, फिर भी सुविधाजनक कक्ष, गौशाला, मज़दूरों के रहने के छोटे-छोटे घर और बीच में एक छोटा सा पवित्र मंदिर, यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते थे जहाँ श्रम और भक्ति दोनों का बराबर महत्व था।

गौशाला में गायों की देखभाल को मुंगली परिवार बहुत महत्व देता था। गायों को केवल आर्थिक साधन न मानकर परिवार का अभिन्न अंग माना जाता था। उनकी साफ़-सफ़ाई का विशेष ध्यान रखा जाता था, उन्हें समय पर पौष्टिक चारा और पानी दिया जाता था और बीमार पड़ने पर उनका तुरंत इलाज कराया जाता था। जब कोई गाय बछड़ा देती थी, तो पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ जाती थी। दूध परिवार के उपभोग के लिए भी होता था और बाज़ार में बेचकर आय का एक अतिरिक्त स्रोत भी बनता था। 

डेयरी उत्पादों से परिवार की अच्छी खासी आय हो जाती थी और उस समय यह परिवार की आत्मनिर्भरता का उदाहरण था।

मज़दूरों के घर भी 'मुंगली गार्डन' के भीतर ही बने थे, वे अपने परिवारों सहित वहीं रहते थे।
उनके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य की देखभाल और त्योहारों पर उनके लिए कपड़ों और उपहार की व्यवस्था का जिम्मा मुंगली परिवार ने स्वयं अपने ऊपर लिया था। यह केवल मालिक और नौकर का रिश्ता नहीं था, यह एक पारिवारिक रिश्ता था। मज़दूर मुंगली परिवार को अपना मानते थे और परिवार उन्हें अपने सदस्यों की तरह। यह वह सामाजिक और सामूहिकता की भावना थी जो आज के आधुनिक, एकल परिवारों के युग में दुर्लभ हो गई है।

परिवार का मुख्य व्यापार उस समय के उत्तराखंड के वन और फॉरेस्ट कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा था। यह वह दौर था जब जंगल रोज़गार का एक प्रमुख स्रोत थे, लेकिन साथ ही वे जोखिमों से भी भरे थे। घने, दुर्गम जंगलों में जंगली जानवरों के खतरों के बावजूद जाकर पेड़ों को काटना, फिर लकड़ी को पहाड़ी रास्तों से नीचे लाना और उसे बाज़ार तक पहुँचाना, हर कदम पर खतरा था।

लेकिन इस काम में अच्छी आमदनी की संभावना भी थी। मुंगली परिवार इस व्यापार में अत्यंत कुशल था। उनके पास दशकों का अनुभव था, प्रशिक्षित मज़दूरों की एक निष्ठावान टीम थी और बाज़ार में मजबूत संपर्क थे। इन सबने मिलकर उन्हें इस क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित और सफल स्थान दिलाया था।

हालांकि 1970 के दशक में वन-अनुबंध का काम सरकार के बढ़ते नियंत्रण, नियमों के कड़े होने और ठेकों की कमी के कारण बंद हो गया, लेकिन तब तक परिवार ने अपनी एक स्थायी पहचान, सम्मान और समाज में एक मजबूत स्थिति बना ली थी।

आनंद बल्लभ उप्रेती की किताब 'हल्द्वानी : स्मृतियों के झरोखे से' में मुंगली परिवार के बारे में लिखा है "हल्द्वानी नगर के पुराने परिवारों में से मुंगली परिवार का नाम भी लिया जाता है। हल्द्वानी का मुंगली गार्डन इसी परिवार के नाम से विख्यात है। इतना ही नहीं, हल्द्वानी बसने की शुरुआत में भवानी गंज और नैनीताल में भवानी लॉज इसी परिवार के मुखिया के नाम से बना जो आज भी मौजूद है।
2 अक्टूबर 1888 को नीलाम में रामपुर रोड स्थित जमीन उनके दादा पंडित भवानीदत्त जी ने क्रय की, जिसे मुनगली गार्डन कहा जाता है। 

तब पहाड़ के बड़े कारोबारियों में दान सिंह मालदार का नाम था, उसी प्रकार भाबर में पंडित भवानीदत्त मुंगली का नाम भी।"

संयुक्त परिवार और आस्था: संस्कार, परंपरा और भक्ति का त्रिवेणी संगम 

संयुक्त परिवार उस समय की सामाजिक संरचना का आधार था और मुंगली परिवार इसका एक उत्कृष्ट, जीवंत उदाहरण था। संयुक्त परिवार का अर्थ केवल यह नहीं था कि सभी सदस्य एक ही छत के नीचे रहते थे, इसका अर्थ होता था कि हर सदस्य, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, पुरुष हो या महिला, एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदार रहता था। बड़ों के निर्णय को मानना, छोटों की देखभाल करना, खुशियों में साथ मिलकर हँसना और दुखों में एक-दूसरे का सहारा बनना, यह सब एक व्यवस्था थी।
इसी में परिवार की असली ताकत और स्थिरता की वजह छिपी थी।

घर में, 'इजा' ( माँ) और 'चाची' (छोटी माँ) जैसे संबोधन केवल आदरसूचक शब्द नहीं थे, बल्कि वे उस सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक परंपरा की पहचान थे, जिसमें बड़ों का सम्मान पीढ़ियों तक चलता रहा। छोटे बच्चों को बचपन से ही सिखाया जाता था कि बड़ों के साथ कैसा व्यवहार करना है। छोटे बड़ों के सामने ऊँची आवाज़ में बात नहीं करते थे, उनके बैठे हुए आगे नहीं बैठते थे और उनकी बात बीच में नहीं काटते थे।

मुंगली परिवार का सबसे महत्वपूर्ण आधार उसकी गहरी धार्मिक आस्था थी। परिवार के लिए धर्म केवल रिवाजों का पालन करना, पूजा-पाठ या मंदिरों के चक्कर लगाना भर नहीं था। उनके लिए यह जीवन जीने का एक तरीका था। हर काम की शुरुआत ईश्वर के नाम से होती थी, भोजन से पहले प्रार्थना की जाती थी और शाम को आरती होती था। इन सबमें कोई दिखावा या औपचारिकता नहीं थी। यह उनके जीवन का एक स्वाभाविक और सहज हिस्सा था।

'मुंगली गार्डन' में खेतों के बीच बनी एक साधारण सी कुटिया आध्यात्मिक केंद्र का रूप ले चुकी थी। यह भव्य मंदिर न होकर भी उस क्षेत्र से गुजरने वाले साधु-संतों और यात्रियों के लिए एक विश्राम स्थल था।
 जो भी संत या यात्री वहाँ पहुँचते थे, परिवार उनकी पूरे दिल से सेवा करता था। उन्हें भोजन दिया जाता था और उनके रहने की व्यवस्था की जाती थी, इसके बाद उनके प्रवचन सुने जाते थे। बदले में, ये संत और यात्री परिवार को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते थे, उन्हें आशीर्वाद देते थे और जीवन के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डालते थे। यह कोई आर्थिक लेन-देन न होकर श्रद्धा, विश्वास और सेवा की एक परंपरा थी, जो सदियों से भारतीय समाज का अभिन्न अंग रही है।

इन सभी आध्यात्मिक अनुभवों के बीच, एक दिन ऐसी घटना हुई जिसने परिवार के धर्म के प्रति विश्वास को एक नई ऊँचाई पर पहुँचाया और मुंगली जी के जीवन की दिशा को भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया। नीम करौली बाबा एक दिन 'मुंगली गार्डन' पहुंचे, आज उनका नाम पूरे विश्व भर में जाना जाता है।
तब भी लोग उनके दर्शन के लिए मीलों चलकर आते थे और ऐसे महान संत का परिवार के घर आना, उनके साथ समय बिताना मुंगली परिवार के लिए केवल एक घटना न होकर बाबा का चमत्कारिक रूप से प्राप्त प्रत्यक्ष आशीर्वाद था। 

बाबा जब भी मुंगली गार्डन पहुंचते थे तो वह औपचारिक न रहकर साधारण ढंग से ही परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर बातें करते थे और कभी-कभी उन्हें कोई प्रेरक कहानी सुनाते थे, कभी-कभी वे बस चुपचाप भी बैठे रहते थे। परिवार के सदस्य उन क्षणों को अत्यंत संजो कर रखते थे। 

बाबा के आगमन और उनके साथ बिताए गए समय ने मुंगली परिवार की भक्ति परंपरा को और भी मज़बूत किया। ऐसा लगने लगा कि परिवार पर बाबा की विशेष कृपा है और उनका घर धन्य है। लोग कहने लगे कि मुंगली परिवार साधारण नहीं है, उन पर दैवीय आशीर्वाद है। यह बात परिवार के लिए गर्व का विषय थी, वे जानते थे कि यह सब ईश्वर की कृपा है और उन्हें इस कृपा को बनाए रखने के लिए अच्छे कर्म करते रहना है और सेवा भाव से जीना है।

'हल्द्वानी : स्मृतियों के झरोखे से' में गिरिजा शंकर मुंगली जी के बड़े भाई डॉक्टर निर्मल चंद्र मुंगली जी के हवाले से लिखा है "अपने बचपन को याद करते हुए डॉक्टर मुंगली बताते हैं सन् 1952 में जब वह दो तीन साल के थे, घर से बाहर घूमते हुए खो गए। ढूंढ खोज के बाद उनके परिजनों को पता चला कि मैं रामलीला मैदान के पीछे शिवदत्त जोशी के घर में हूं। श्री शिवदत्त जी डीएम के ओएस थे और हल्द्वानी में उनके आवास पर निमकरौली महाराज के प्रवचन चलते थे। डॉक्टर मुंगली के पिता भवानीदत्त जी भी महाराज के परम भक्तों में थे। अपने पुत्र को ढूंढते हुए ज्यों ही भवानीदत्त जी शिवदत्त जोशी के आवास पहुंचे उन्होंने देखा उनका बालक महाराज जी के पास बैठा है। इस बीच नीमकरौली बाबा ने उन्हें देखते ही कहा है - 'तू बनाएगा'। पिताजी ने भी हां कह दिया। महाराज भवानीदत्त जी को इंजीनियर कहकर पुकारते थे। महाराज से हां तो कह दिया लेकिन क्या बनाएगा यह भवानीदत्त जी को कुछ नहीं पता था। उन्हें बाद में पता चला कि मनोरा क्षेत्र में मन्दिर (नैनीताल स्थित वर्तमान की हनुमानगड़ी मन्दिर) बनाने के लिये बाबा ने कहा है। इस घटना के बाद हनुमानगड़ी में मन्दिर का कार्य शुरू हुआ। उस समय हनुमानगड़ी का यह इलाका लावारिश लाशों को दबाने का मरघट था। मनोरा क्षेत्रवासियों का भुमिया मन्दिर यहाँ जरूर था। बाबा के आदेश पर भवानीदत्त मुनगली हल्द्वानी के खिचड़ी मोहल्ले से मिस्त्री को अपने साथ हनुमानगड़ी ले गये। उस समय लियाकत और रियासत नामक दो भाई मशहूर कारीगर मिस्त्री थे। बीमार होने के बावजूद रियासत ने हनुमानगड़ी का काम किया। मन्दिर का पहला निर्माण बिना फीते की नपाई के हुआ। मन्दिर के गुम्बद को बनाने के लिये कण्डों (उपलों) का ढेर लगाया गया और ऊपर से ढोला बँधा। मक्खन नामक कारीगर ने हनुमान की मूर्ति बनाई।"

जन्म का रहस्य: दैवीय संकेत, भविष्यवाणियाँ और एक गहरा आध्यात्मिक संबंध

जब गिरिजा शंकर मुंगली जी का जन्म हुआ, तब नीम करौली बाबा भी 'मुंगली गार्डन' पहुंच गए थे। यह कैसे संभव हुआ, वे कहाँ थे और उन्हें किस दैवीय संकेत से पता चला कि इस घर में एक विशेष बच्चे का जन्म हुआ है, यह सब आज भी रहस्य है।

लेकिन परिवार का अटूट विश्वास है कि बाबा को किसी अलौकिक शक्ति के माध्यम से इस बात का ज्ञान हुआ था और इसीलिए वे आए। उन्होंने नवजात शिशु को देखा, उसके माथे को स्नेह से छुआ, उसे आशीर्वाद दिया और फिर उसका नामकरण किया।

बाबा ने बच्चे का नाम ’शंकर’ रखा। शंकर, भगवान शिव का वह नाम है जो विनाश, सृजन, तपस्या और त्याग का प्रतीक है। यह नाम शक्ति और शांति दोनों को अपने भीतर समेटे हुए है। शंकर नाम देकर, बाबा ने उस बच्चे के जीवन की दिशा को सूक्ष्म रूप से इंगित कर दिया था।

बाबा के अगले शब्द भविष्यवाणियों से भरे थे और समय के साथ अक्षरशः सत्य साबित होने वाली थे। उन्होंने कहा था कि यह काम करेगा, विजय पाएगा और अंत में शांति को प्राथमिकता देगा।
इसके बाद, बाबा ने ये भी कहा कि मेरी बेटी का नाम गिरजा है और यह गिरजा शंकर होगा।

'गिरजा', देवी पार्वती का नाम है और वह भगवान शिव की पत्नी हैं। 'गिरजा शंकर' नाम शिव और पार्वती का संयुक्त रूप बन गया।

परिवार ने इन शब्दों को ध्यान से सुना, उन्हें अपने हृदय में उतार लिया, लेकिन इनका पूरा अर्थ उस समय वे समझ नहीं पाए। लेकिन मुंगली परिवार के लोग जानते थे कि बाबा जो कहते हैं, उसमें कोई गहरा अर्थ ज़रूर छिपा होता है और वह समय आने पर अवश्य स्पष्ट होगा।

लेकिन बाबा तो एक संन्यासी थे, उनका कोई परिवार, कोई बेटी कैसे हो सकती है? यह प्रश्न परिवार के मन में कौंधा, लेकिन वे कुछ बोल नहीं पाए। उन्होंने इन शब्दों को भी याद रखा, लेकिन इनका अर्थ वे नहीं समझ सके।

बाबा के जाने के बाद, परिवार इस घटना पर विचार करता रहा। उनके शब्द, उनके नामकरण, सब कुछ एक पहेली की तरह था। लेकिन उस बच्चे के भीतर धीरे-धीरे एक अहसास पनपने लगा। यह अहसास कि उसका जीवन केवल उसका अपना नहीं है, बल्कि यह किसी उद्देश्य से जुड़ा है, यह एक जिम्मेदारी है और उसे उस उद्देश्य को पूरा करना है। 

सालों बाद, जीवन में कुछ ऐसे मोड़ आए जब नीम करौली बाबा की बोली गई बातों से गिरिजा शंकर मुंगली जी का साक्षात्कार हुआ।

वह उस व्यक्ति से मिले जो वास्तव में नीम करौली बाबा की बेटी, गिरजा का बेटा था। वह मुलाकात ऐसी थे मानो समय रुक गया हो, मुंगली जी को बाबा के वे शब्द याद आए जो उनके जन्म के समय कहे गए थे और तब उन्हें सब कुछ स्पष्ट हो गया।


माँ की पाठशाला: वाणी, विवेक और अनंत ब्रह्मांड की शिक्षा

मुंगली जी के जीवन की पहली गुरु, उनकी मां कमला मुंगली थीं। मुंगली जी की माँ साधारण दिखती थीं, लेकिन भीतर से वे असाधारण थीं। उनकी वाणी में संयम और हर शब्द में विचार था, साथ ही उनके व्यवहार में गहरी परिपक्वता थी। वे जानती थीं कि कब क्या बोलना है, कब चुप रहना है, कब सख्त होना है और कब कोमल रहना है। 

मुंगली जी से उनकी मां कहती थीं कि अपनी वाणी संभालो। जो बोलो, सोच-समझकर बोलो क्योंकि हर शब्द का अपना प्रभाव होता है। एक निकला हुआ शब्द तीर की तरह होता है, एक बार निकल गया तो वापस नहीं आ सकता और वह चोट भी कर सकता है। 

साथ ही वह ये भी समझाती थीं कि भाषा तुम्हारी पहचान बन जाती है। आप जैसा बोलते हैं, लोग आपको वैसा ही पहचानते हैं। यदि आपकी भाषा मधुर, शालीन और सम्मानजनक है, तो लोग आपको पसंद करते हैं और आपका आदर करते हैं।

वहीं आपकी भाषा कर्कश, अशालीन या अपमानजनक है, तो लोग आपसे दूर हो जाते हैं और आपको तुच्छ समझते हैं। इसलिए भाषा को अपनी पहचान का एक सकारात्मक पहलू बनाना अत्यंत आवश्यक है।

मुंगली जी की मां का एक और महत्वपूर्ण उपदेश यह था कि दूसरों की कमी देखने से पहले स्वयं को देखो।

मुंगली जी कहते हैं कि उनकी सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा थी कि मन सीमित मत रखो, क्योंकि मनुष्य का पूरा ब्रह्मांड उसकी सोच में छिपा होता है। मुंगली जी के लिए यह वाक्य केवल एक उपदेश नहीं था, उनके लिए यह एक संपूर्ण जीवन दर्शन था।
इसका अर्थ यह था कि हमें अपनी सोच छोटी रखते हुए नही जीना चाहिए। खुद को केवल अपने परिवार, समाज, धर्म या अपने देश तक सीमित मत करो। पूरी दुनिया को अपना मानो, पूरी मानवता को अपना मानो। यदि इंसान की सोच विशाल है, तो उसका संसार भी विशाल है। यह शिक्षा व्यक्ति को असीम संभावनाओं की ओर ले जाती है और उसे संकीर्णताओं से मुक्त करती है।

नैनीताल में प्रकृति की पाठशाला और झील का संगीत

मुंगली जी के लिए नैनीताल सिर्फ एक पहाड़ी टूरिस्ट स्पॉट नहीं था, नैनीताल उनके बचपन की पहली और सबसे महत्वपूर्ण पाठशाला था। सुबह की कोमल धूप, झील पर हल्की धुंध की चादर के बीच तैरती नावें, देवदार के घने जंगलों से आती खुशबू, दूर से सुनाई देती नैना देवी मंदिर की घंटियाँ, लकड़ी के पारंपरिक घरों की खूबसूरती और शाम ढलते ही झील पर नजर आता पूरा मॉल रोड, यह सब मिलकर उनके भीतर वह ऊर्जा भरते थे, जो आगे चलकर मुंगली जी के व्यक्तित्व का स्थायी आधार बनी।

नैनीताल का मौसम मुंगली जी के लिए स्वयं ही एक शिक्षक था। वहाँ की अद्भुत प्रकृति ने घर के सभी बच्चों को अनुशासन सिखाया।
चाइना पीक, टिफिन टॉप जैसी पहाड़ियों पर चढ़ाई ने उन्हें सहनशक्ति और दृढ़ता दी। झील ने उन्हें पानी सा स्वभाव सिखाया, मुंगली जी कहते हैं झील का पानी कभी शांत रहता है, कभी उफनता है पर एक बात उसमें हमेशा समान रहती है कि पानी हर परिस्थिति में बहता रहता है।
झील के किनारे बैठकर घंटों सोचना, प्रकृति के साथ बातचीत करना मुंगली जी के बचपन का एक प्रिय शगल था।

 उनका घर एक छोटे से विद्यालय जैसा था। वहाँ हर कमरे में, हर व्यक्ति से उन्हें एक सीख मिलती थी। माँ की सहज समझदारी, दादा जयकिशन जी की शालीनता, पिता हरीकिशन जी का संयमित व्यवहार, साथ में ताऊजी की गंभीरता, इन चारों से बच्चों को घर में हमेशा कुछ नया सीखने को मिलता रहता था।

नैनीताल में उस समय के समाज में एक विशेष शिष्टता थी। लोग एक-दूसरे का सम्मान करते थे और इसी माहौल ने मुंगली जी के भीतर गहरी सामाजिक समझ पैदा होने लगी। उन्होंने समझा कि विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोग एक साथ मिलकर कैसे रह सकते हैं, कैसे विविधता में एकता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत होता है।

उनके बचपन का सबसे प्रिय स्थान मॉल रोड के लगभग मध्य में स्थित 'लाइब्रेरी' थी। यह उनके लिए किसी मंदिर से कम नहीं थी। वहाँ किताबें थीं, अनगिनत विचार थे, विविध संस्कृतियों की यात्राएँ थीं और लाइब्रेरी के जरिए संपूर्ण विश्व उनके सामने खुला था। 

किसी भी पर्वतीय बालक के लिए किताबों का महत्व मैदानी क्षेत्र के बालकों से अधिक होता है क्योंकि उन तक संसाधनों की पहुंच आसान नहीं होती। लेकिन यह मुंगली जी की खुशकिस्मती थी कि उन्हें ’नैनीताल’ मिला। जहां पढ़ने लिखने की संस्कृति अन्य इलाकों से अधिक थी। छह साल की उम्र में ही मुंगली जी के लिए पढ़ना केवल एक अकादमिक गतिविधि नहीं था बल्कि उन्होंने पढ़ते हुए जीवन को समझने की एक प्रक्रिया शुरू कर ली थी।

मुंगली जी कहते हैं कि यदि कोई बच्चा प्रकृति के इतने करीब, इतने शांत वातावरण में पढ़ता है, तो उसके विचारों में गहराई अपने आप उतर जाती है। यही गहराई, यही अंतर्दृष्टि बाद में उनके जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में झलकती रही है।

दादा जयकिशन जी का उनके जीवन पर गहरा, स्थायी प्रभाव था। दादा अत्यंत सरल और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। वे कहते थे कि मनुष्य को अपने भीतर सच्चाई रखनी चाहिए, क्योंकि बाहरी परिस्थितियाँ कितनी भी बदल जाएं, आंतरिक सत्य ही उसका स्थायी साथी होता है। मुंगली जी ने यह बात अपने बचपन में ही समझ ली थी।

पिता हरीकिशन जी अपने पिता की शांति और संयम को खुद के स्वभाव में समेटे हुए थे, साथ ही उनमें व्यावहारिक सोच और न्याय के प्रति गहरी निष्ठा भी थी। वे अपने काम को पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ करते थे। उन्होंने मुंगली जी को यह समझाया कि जीवन में मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। वे स्वयं श्रम करके परिवार के लिए साधन जुटाते थे और अपने बच्चों को भी यह सिखाते थे कि परिश्रम के बिना सफलता का कोई मार्ग नहीं है।

पिताजी का न्यायप्रिय स्वभाव लोगों के बीच विशेष रूप से पहचाना जाता था। वे कभी पक्षपात नहीं करते थे। परिवार में, पड़ोस में या फिर व्यापार के किसी प्रसंग में, यदि उन्हें कोई गलत बात दिखाई देती तो वे तुरंत अपनी आपत्ति प्रकट करते थे। उनका विश्वास था कि न्याय हर व्यक्ति का अधिकार है और उसे बनाए रखना हर किसी की जिम्मेदारी है। उन्होंने मुंगली जी को यह शिक्षा दी कि अन्याय के सामने चुप रहना स्वयं अन्याय का भागीदार बनने जैसा है। यही विचार आगे चलकर मुंगली जी के व्यक्तित्व की नींव बना और उन्होंने सामाजिक न्याय, समानता और सत्य को अपने जीवन के केंद्रीय सिद्धांत के रूप में अपनाया।


इस प्रकार मुंगली जी का बचपन अनुशासन, प्रकृति और अध्यात्म का एक अद्भुत संगम था। उन्होंने पहाड़ों से धैर्य और सहनशक्ति ली, झीलों से गहराई और स्थिरता सीखी, जंगलों से शांति का महत्व समझा, मंदिरों से विश्वास और भक्ति पाई, माँ से वाणी और विवेक का सच्चा अर्थ समझा और दादा जी से जीवन की सच्ची शिष्टता और सच्चाई सीखी।

यह सब मिलकर उस व्यक्तित्व की मजबूत नींव बने, जिसने आगे चलकर सेना में राष्ट्र सेवा का मार्ग अपनाया, फिर समाज के बीच रहकर आम लोगों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया और अंततः शिक्षा के विशाल क्षेत्र में ज्ञान का प्रसार किया।

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