बेहतरीन माहौल में पढ़ने की वजह से मुंगली जी के भीतर ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा स्वभाविक रूप से बढ़ती चले गई। वे हर विषय को गहराई से समझना चाहते थे और ज्ञान को केवल याद रखने की वस्तु नहीं मानते थे। उनके लिए पढ़ाई करना एक शानदार अनुभव था। वे इस बात को समझने का प्रयास करते थे कि किसी विचार का मूल कहां है, प्रश्न का उत्तर किस सोच से निकला है और किसी सिद्धांत के पीछे प्रकृति का कौन सा नियम कार्य करता है। उनकी नजर में पढ़ाई वह दरवाजा थी जो जीवन के अनेक रहस्यों को खोल सकती थी।
नैनीताल का प्राकृतिक परिवेश उनके व्यक्तित्व के निर्माण में उतना ही महत्त्वपूर्ण था। पहाड़ों की कठिन राहें उन्हें धैर्य सिखाती थीं, ढलानों पर चलते समय सजगता बढ़ती थी और मौसम के अचानक बदलते स्वभाव से वे अनुकूलन का पाठ सीखते थे। पहाड़ों में बिताया गया हर दिन उन्हें यह अनुभव कराता था कि अनुशासन और निरंतरता जीवन की सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं।
घर का वातावरण भी उनके व्यक्तित्व को दिशा देने वाला था।
पिता की पुस्तक-प्रियता ने उन्हें और प्रेरित किया। वे बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे और शिक्षा को जीवन की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति मानते थे। उनके अनुसार पढ़ाई का अर्थ केवल ज्ञान जुटाना नहीं बल्कि उस ज्ञान से स्वयं को बेहतर बनाना रहता था। मुंगली जी ने इस विचार को अपने जीवन का आधार बना लिया। घर का यह वातावरण केवल मुंगली जी के लिए ही नहीं, उनके भाइयों के लिए भी प्रेरणादायक था। घर में सीखने की संस्कृति इतनी मजबूत थी कि हर सदस्य दूसरे को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता था।
जैसे-जैसे मुंगली जी ने उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ाए, उनका दृष्टिकोण और व्यापक होता गया। वे समाज, प्रकृति और मानव व्यवहार को गहराई से समझने लगे। वे अनुभवों के माध्यम से सीखने में विश्वास रखते थे। गाँवों में जाकर लोगों से मिलना, प्रकृति के सानिध्य में समय बिताना और जीवन के विभिन्न पहलुओं पर चिंतन करना उनके दैनिक अनुभवों का हिस्सा बन गया। वे मानते थे कि शिक्षा तभी सार्थक है जब उसे व्यवहार में उतारा जाए।
उच्च शिक्षा ने उनके भीतर परिपक्वता लाई और उन्होंने यह समझा कि जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं को सक्षम बनाना नहीं, बल्कि उस क्षमता का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करना है। मुंगली जी कहते हैं कॉलेज के दिनों उनका प्रिय विषय इतिहास और अर्थशास्त्र था। उन्होंने कॉलेज के दिनों में एनसीसी भी ज्वॉइन की थी, डीएसबी नैनीताल की लाइब्रेरी में पढ़ाई लिखाई का माहौल भी शानदार था।
उन्होंने कहा कि डीएसबी कॉलेज के प्रोफेसर अपने विषय के जानकार तो थे ही वह कपड़े भी बड़े सलीके से पहना करते थे।
AML के अनुभव
मुंगली जी कहते हैं कि AML कंपनी ने काठगोदाम में पोस्ट कर के मुझे जीवन में पहली बार अनुशासित ढंग से काम करने का मौका दिया। पहली बार मैंने अपने हस्ताक्षर को एक पहचान बनते देखा, ऑफिस में अपनी कुर्सी पर बैठना, समय पर पहुंचना और जिम्मेदारी महसूस करना मेरे लिए यह सब नए अनुभव थे। मेरी पहली तनख्वाह 175 रुपए थी और यह मुझे आज भी अमूल्य राशि लगती है। जैसी हमारी घर की स्थिति थी उस हिसाब से मेरे लिए यह खजाना प्राप्त करने जैसा था। उन्होंने आगे बताया कि काठगोदाम में मेरा कार्यकाल बहुत कम रहा और मेरा ट्रांसफर दिल्ली हो गया और यहीं से मेरी अद्भुत यात्रा का प्रारंभ हुआ।
नैनीताल की शांत हवा से दिल्ली की भागमभाग तक: जीवन का एक नया अध्याय
नैनीताल की हर सुबह झील का सम्मोहित कर देने वाला दृश्य हमारे सामने होता है। गर्मियों में दुनिया से दूर नैनीताल की अपनी अलग ही दुनिया है, सर्दियों में बर्फ से ढका नैनीताल स्वर्ग सा अहसास देता है। देश दुनिया से घूमने आने वाले लोगों के बीच अपनी संस्कृति, सभ्यता को समेटे नैनीताल के लगभग परीकथा जैसे माहौल से निकलकर जब मुंगली जी दिल्ली पहुँचे, तो यह नया संसार उनके लिए बिल्कुल अलग था।
नैनीताल और दिल्ली के बीच की इस भौगोलिक दूरी में जीवन जीने का अनुभव बिल्कुल अलग था। अब मुंगली जी के लिए वहां न पहले जैसे लोग थे और न ही वह नैनीताल की शांत वादियों के बीच थे। यह एक पूरी नई दुनिया का अनुभव था, एक ऐसा संक्रमण जिसने उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया।
दिल्ली उत्तर भारत में यमुना नदी के पश्चिमी तट और अरावली पर्वतमाला की उत्तरी श्रृंखला के निकट स्थित एक प्राचीन और निरंतर विकसित होता महानगर है। इसकी भौगोलिक स्थिति ने इसे हमेशा से उत्तर और दक्षिण, पहाड़ और मैदान, व्यापार और संस्कृति के बीच सेतु बनाया। समय के साथ यह नगर अनेक साम्राज्यों का केंद्र बनता गया। कभी तोमर और चौहान वंशों के किले इसके विस्तार को आकार देते थे, फिर दिल्ली सल्तनत ने इसे प्रशासन और शिक्षा का केंद्र बनाया। मुगल शासन के दौर में यह कला, स्थापत्य और संस्कृति का विश्वविख्यात केंद्र बनकर उभरा। अंग्रेजी शासन ने नई दिल्ली की परिकल्पना की और इसे आधुनिक प्रशासनिक राजधानी के रूप में स्थापित किया। स्वतंत्रता के बाद यह शहर धीरे धीरे एक विशाल महानगर में परिवर्तित हुआ, जहाँ इतिहास की परतें आधुनिक जीवन की गति में सहज रूप से घुली हुई हैं। दिल्ली आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी सदियों पहले थी, एक ऐसा नगर जिसने समय की हर चुनौती को स्वीकार किया और हर युग में स्वयं को नए रूप में गढ़ लिया।
पहाड़ों में मुंगली जी का समय एक शांत नदी की तरह धीरे-धीरे बहता था, जहाँ हर पल को महसूस किया जा सकता था, वहीं दिल्ली में समय बहुत तेज गति से भागता था।
तब दिल्ली आज जैसा नहीं था, दिल्ली की दुनिया आज के मेट्रो वाले दिल्ली से कहीं बड़ी थी।
दिल्ली की सड़कें संघर्ष की जीवंत पाठशालाएँ थीं। जहाँ हर कदम एक नई चुनौती पेश करता था और हर मोड़ जीवन के एक नए और अनदेखे पहलू को उजागर करता था।
मुंगली जी ने बताया कि दिल्ली में वह दो वर्ष रहे और उस दौरान उनका कार्य कनॉट प्लेस में इंडियन ऑयल से परमीशन लेकर फर्नेस ऑयल खरीदना फिर उसे नापकर टैंकर में सील करवाकर काठगोदाम भेजना होता था। यह काम बहुत जिम्मेदारी वाला था पर उसमें मुंगली जी को खूब आनंद आता था।
कंपनी के टैंकर भेजने के साथ मुंगली जी उनकी छत में ही सोते हुए सफर कर लिया करते थे। गजरौला में मैं ड्राइवरों के साथ खाना खाता फिर छत में चले जाता था, एक किस्सा याद करते हुए मुंगली ने बताया कि एक बार मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास अरोड़ा अंकल से मिलने के लिए यूंही अकारण ट्रक से उतर गया और आगे जाकर ट्रक का एक्सीडेंट हो गया, ड्राइवर कंडक्टर दोनों की ही मृत्यु हो गई।
रवि भार्गव : हवाई यात्रा और दिल्ली
मुंगली जी कहते हैं कि अब तक उन्होंने 74 देशों की यात्रा कर ली है, अलास्का से दक्षिण अमेरिका के दक्षिण छोर तक, गैलापागोस द्वीप में शार्क के साथ तैरना भी शानदार अनुभव रहा। यूरोप में आर्कटिक सर्कल तक पहुंचना और अमेजन जंगल जाना दो विपरीत अनुभव थे।
उन्होंने कहा इन हवाई यात्राओं की शुरूआत AML के लिए दिल्ली में नौकरी करते हुए हुई। रवि भार्गव कंपनी में जनरल मैनेजर बने, उन्होंने मुझे कॉर्डिनेटर बना दिया और इसके साथ हीं मेरी जिम्मेदारी भी बढ़ गई। दिल्ली से बाहर भी जाना पड़ता था और उन्होंने पंजाबी बाग में किराए पर एक अच्छा कमरा भी ले लिया। रवि भार्गव उन्हें किसी कार्य से अपने साथ मुंबई ले गए। 24 साल की उम्र में मुंगली जी यह पहला हवाई सफर था, उन्होंने अपने जीवन में पहली बार समुद्र देखा।
मुंगली जी ने बताया कि श्री भार्गव से उन्हें जीवन में बहुत कुछ सीखने को मिला, उन्हें पहली बार पांच सितारा होटल में खाने का अवसर भी उसी यात्रा में प्राप्त हुआ। दिल्ली से वह कई अन्य राज्यों में भी गए और दिल्ली में ही उन्होंने स्कूटर चलाना भी सीखा।
मुंगली जी कहते हैं कि दिल्ली के अन्नत सीखने के अवसरों ने उन्हें अनुभवी बनाया। मलका गंज दिल्ली के रहने वाले अरोड़ा अंकल और उनके परिवार के वह बहुत ऋणी हैं। उस परिवार से उन्हें काफी कुछ सीखने को मिला।
दिल्ली में कार्य करने के दौरान मुंगली जी के घर की आर्थिक स्थिति एकदम से खराब हो गई। इसका कारण यह था कि उनके पिता का जंगल का कारोबार अचानक से बंद हो गया, उनके बड़े भाई निर्मल मुंगली उस समय एमबीबीएस कर रहे थे तो घर की जिम्मेदारी उन्होंने स्वयं ले ली। वह एक एक पैसा बचाते थे और उन्होंने खुद खाना बनाना भी सीखा। अपनी मां से खाना बनाना सीखने के बाद उन्होंने नूतन स्टोव और कुछ बर्तन लिए।
इससे उन्हें बहुत लाभ हुआ, उन्हें ताजा खाना मिलने लगा, पैसे की बचत हुई और होटल आने जाने का समय भी बचा। मुंगली ने बताया कि उनके बाल सखा रमेश मेहता की मौसी और उनका परिवार मेरा बहुत ख्याल रखते थे। दिल्ली में मेरा हर दिन आनंद में ही बीता।
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