Sunday, November 16, 2025

तीन — सेना के लिए संकल्प, चयन और एक नई दिशा का उदय

सेना के लिए संकल्प, चयन और एक नई दिशा का उदय 

दिल्ली में नौकरी कर रहे मुंगली जी रोजमर्रा की भागदौड़ के बीच 26 जनवरी 1978 के गणतंत्र दिवस की परेड देखने बिना किसी पूर्व योजना के राजपथ पहुंच गए।

मुंगली जी की नौकरी बहुत अच्छी थी, प्लेन से दिल्ली मुंबई आना जाना होता था। वह अपनी कंपनी के प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर थे, कमरा मिला हुआ था और स्वतंत्र लाइफ जी रहे थे। 

दिल्ली की उस सर्द सुबह में, जब पूरा शहर हल्की धुंध की परतों में छुपा हुआ था, मुंगली जी पहली बार गणतंत्र दिवस की परेड को राजपथ पर अपने सामने घटित होते देख रहे थे। यह दृश्य उनके भीतर एक अजीब सा रोमांच पैदा कर रहा था। तेज हवा के बीच लहराता तिरंगा, राजपथ के आसपास देशभक्ति से जुड़ी पेंटिंग और दर्शक दीर्घाओं से उठते देशभक्ति नारे उन्हें रोमांचित कर रहे थे। भारतीय सेना के जवानों की वर्दी का आकर्षण उन्हें अपनी तरफ लगातार खींच रहा था।

जैसे ही राष्ट्रपति के आगमन की उद्घोषणा हुई, पूरा राजपथ शांत हो गया। राजपथ में उपस्थित लोग एक साथ खड़े हुए और राष्ट्रगान की ध्वनि जब गूंजने लगी तो मुंगली जी के भीतर मानो कोई पुराना संस्कार अचानक जीवंत हो उठा। उन्हें अपने नैनीताल के घर का वह तिरंगा याद आ गया, जिसे बचपन में वे हर साल छत पर लगाते थे।

राष्ट्रगान समाप्त होते ही परेड का पहला दस्ते आगे बढ़ा। थलसेना की टुकड़ियों की दृढ़ और सघन कदमताल देखकर मुंगली जी अपने भीतर एक अनोखा आत्मविश्वास महसूस कर रहे थे। जूतों की ताल और बैरल की धूप में चमकती हुई रेखा से उन्हें सेना का अनुशासन समझ आ रहा था। नौसेना और वायुसेना की टुकड़ियाँ जब उनके सामने से गुजरीं, तो उनकी आंखें सफेद और नीले रंग की चमक को देखकर दंग रह गई। उन्हें महसूस हुआ कि देश की शक्ति केवल हथियारों में ही नहीं है, यह उस वर्दी में भी है जो हर जवान पर खूब जमती है और जवान के आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ा देती है।

राज्यों की झांकियाँ जब धीरे-धीरे राजपथ पर बढ़ने लगीं, तो मुंगली जी का मन विशेष रूप से उत्तराखंड की झांकी पर ठिठक गया। देवदार की हरियाली, लोकनृत्य की छवियाँ उन्हें नैनीताल की यादों में लेकर चली गई।

झांकियों के बाद जब भारी सैन्य उपकरणों का प्रदर्शन शुरू हुआ, तो मुंगली जी का मन तकनीक और रणनीति के उस संयोजन पर ठहर गया जिसे वे हमेशा उत्सुकता से समझना चाहते थे। टैंक, मिसाइल जब राजपथ से गुजर रहे थे तो इन शांत ढांचों में उन्हें एक ऐसी शक्ति दिखाई दी जो केवल दिखावे की नहीं, बल्कि धैर्य और तैयारी की निशानी थी।

वायुसेना के फ्लाई पास्ट ने तो जैसे मुंगली जी के भीतर की पूरी संवेदना को हिला दिया। लड़ाकू विमान तेज गर्जन के साथ जब आसमान को चीरते हुए ऊपर से गुजरे, तो वह अनायास खड़े हो गए। आकाश में उभरती तिरंगी आकृतियाँ ने उन्हें भारतीय सेना की शक्ति का बखूबी अहसास करवा दिया था।

बीएसएफ की ऊँट टुकड़ी और बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम ने परेड में वह सहजता और सौहार्द जोड़ा जिसे मुंगली जी हमेशा भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। उनका विश्वास था कि भारत की असली पहचान उसकी विविधता है और राजपथ पर उस दिन विविधता किसी उत्सव की तरह खिल उठी थी।

वीरता पुरस्कार विजेताओं का आगमन हुआ तो एक युवा अधिकारी व्हीलचेयर पर ले जाया जा रहा था। उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव झलक रहे थे, मुंगली जी पहली बार इतने निकट से किसी ऐसे व्यक्ति को देख रहे थे जिसने अपने जीवन को राष्ट्र के लिए दांव पर लगाया हो। उनके मन में एक ही सवाल उठा कि क्या जीवन का असली उद्देश्य केवल नौकरी करना और गुजारा चलाना है या उससे आगे भी कोई रास्ता है।

परेड समाप्त होने के बाद भी मुंगली जी वहीं बैठे रहे। भीड़ लौट रही थी और उनका मन शांत हो गया था।

जैसे हर किसी के जीवन में एक पल ऐसा आता है जब उसे अपने जीवन का उद्देश्य ज्ञात हो जाता है वैसे ही मुंगली जी को भी अपने जीवन का उद्देश्य मिल गया था। वे समझ गए कि उनका स्थान कहीं और नहीं, उसी अनुशासन और उसी जिम्मेदारी की दुनिया में है जिसे वे अभी अपनी आंखों से देख आए हैं।

उन्होंने तय किया कि वे नौकरी में टिके रहने के बजाय सेना की राह पर चलेंगे, चाहे मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हो। इसके कुछ दिन बाद ही 8 या 9 फरवरी को न्यूज पेपर में इंडियन मिलिट्री एकेडमी का इश्तहार आया था। यह इश्तहार टेक्निकल एंट्री के लिए था, मुंगली जी ने इसके लिए आवेदन कर दिया।

मुंगली जी कहते हैं कि मैं सुबह शाम योग करता था, दौड़ने जाता था तो शरीर पूरी तरह फिट था। उनकी दिल्ली रहते हुए लाइब्रेरी जाने की आदत भी पड़ गई थी। जैसे कि उस जमाने में हर नैनीताल वाले की इच्छा सिविल सर्विस में जाने की होती थी तो इसके लिए वह भी ब्रिटिश काउंसलर लाइब्रेरी, अमेरिकन लाइब्रेरी में अपना खूब सारा वक्त बिताते थे। दुनिया में क्या चल रहा है, देश में क्या क्या घटित हो रहा है, उनको लगभग सभी जानकारी रहती ही थी और भाषा पर भी उनका अच्छा नियंत्रण था।

मिलिट्री में जाने की जो आवश्यक योग्यताएँ होती हैं, शायद मैं उसके लिए ठीक था। इसलिए मैंने आवेदन कर दिया और वापस अपनी सामान्य जिंदगी में लग गया। मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं था कि बचपन से सेना में जाना है। कई लोग तो आठवीं नवीं कक्षा से ही दृढ़ निश्चय कर लेते हैं, लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं था।

दिल्ली की वही व्यस्त जिंदगी चलती रही। एक दिन अचानक खबर आई कि मेरा नाम, चयन के लिए सूची में आ गया है। एसएसबी बंगलौर के लिए कॉल आया और उस समय मुझे लगा कि मैं तो बिल्कुल फिट नहीं हूँ, कैसे चयन हो सकता है।

 मेरे पास पासपोर्ट था, तो सोचा ठीक है। अगर चयन नहीं भी हुआ तो दक्षिण भारत का बाद श्रीलंका घूम लूंगा। जीवन में पहली बार दक्षिण का सौंदर्य देखने का मौका मिलेगा। मद्रास से कोलंबो तक एक जहाज जाता था, जिसकी टिकट सौ रुपए थी।

यह मेरा वैकल्पिक कार्यक्रम था लेकिन भगवान की योजना कुछ और ही थी। उसी योजना के अनुसार आठ से दस दिन चली प्रक्रिया क बाद मैं दस से पंद्रह लोगों के अपने बैच में अकेला चयनित हुआ। एसएसबी क्वालिफाई कर लिया।

वहां से लौटकर फिर मैं अपनी पुरानी जिंदगी में लौट आया। वही समय की कमी, वही भागदौड़, वही सब कुछ। मुझे पता नहीं था कि मैं मेरिट में आऊंगा या नहीं। सच कहूं तो मैं मेरिट लिस्ट की इतनी प्रतीक्षा भी नहीं कर रहा था।

आगे का घटनाक्रम बताते हुए मुंगली जी ने बताया कि एक दिन नैनिताल से मेरे परिवार की तरफ से संदेश आया। मेरी माता जी ने मुझे फोन किया और फोन पर मेरा भाई भी था, उन्होंने बताया कि तुम्हारा कॉल लेटर आ गया है और जून में तुम्हें आईएमए ज्वाइन करना है। उन्होंने ये भी बताया कि कुछ दिन पहले पुलिस वेरिफिकेशन भी हो गया है और तुम्हारे कपड़ों की माप भी मांगी गई है। 

मुंगली जी ने कहा कि मेरे परिवार में कोई मिलिट्री में नहीं था तो मुझे कुछ नहीं पता था कि सेना में क्या होता है। ये बस एक इच्छा का पूरा होना था, वह जो मुझे 26 जनवरी की परेड देखकर शुरू हुई थी। मैं सिपाही या किसी भी रूप में सेना में जाना चाहता था। दिल्ली से मैं सीधे देहरादून आईएमए पहुंचा। दिल्ली में ही मैंने हेयर कट कर लिए थे पर वहां पहुंचने पर मुझसे फिर बाल कटवाने के लिए कहा गया।

मैंने सोचा मैंने कल ही बाल कटवाए, ये लोग क्या चाहते हैं। लेकिन जाना तो था ही, फिर मैं एक ग्रुप के साथ बार्बर के पास गया तो वहां ‘अच्छेलाल’ ने मेरे बाल में मशीन चला दी और बिल्कुल छोटे बाल कर दिए। इस तरह मेरी आर्मी की लाइफ शुरू हुई।

वहां इंसान को बैठने का भी वक्त नहीं मिलता। मुझे एक किटबैग में जूते, डांगरी कई चीजें मिली। फिर नाप दी हुई ड्रेस भी मिली। आईएमए का पहला दिन मेरे लिए बहुत लंबा हो रहा था।

थोड़ी देर बाद एक आदमी से मैंने पूछा कि मुझे कहां जाना है तो उसने मुझे हैंड्स डाउन बोला।

मैंने सोचा ये हैंड्स डाउन क्या होता है पर पता नहीं क्या सोचकर उसने मुझे जाओ कह दिया।

कमरे में सामान रखा ही था कि सीएचएम द्वारा सबको बुलाने के लिए आवाज लगाई गई। मैंने सोचा ये सीएचएम क्या होता होगा, जिसने हमें बुलाया है। खैर, हम सीएचएम के सामने खड़े हुए तो उसने सीधे हैंड्स डाउन करवा दिया, इस तरह यह सब चलता रहा। बाद में हमें साइकिल मिली, साथ बैठकर खाना सिखाया गया। हम सिर्फ दो तीन घंटे ही सो पाते थे। 

मुंगली जी ने सेना में अपने प्रशिक्षण के यादगार दिनों के बारे में बात करते हुए आगे बताया कि उन दिनों वहां एक ड्रिल इंस्ट्रक्टर सुबेदार प्रताप सिंह भी थे, जो शायद राजस्थान के थे। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने लड़कों को सच्चा सैनिक बनना सिखाया, मैं उन्हें हमेशा इसी रूप में याद करता हूँ। उनका काम था आदमी को आदमी बनाना ‘To make a man out of a man’ वाली बात सच में उन पर ही लागू होती थी।

प्रताप सिंह साहब बहुत ही लंबे थे, लगभग छह फीट लंबे और उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था। उन्होंने हमें अनुशासन और आत्मबल सिखाया। मैं उन्हें हमेशा सम्मान से याद करता हूँ।

वह चाहते थे कि नए कैडेट्स के बूट की आवाज मसूरी तक पहुंचे, तब मुझे लगता था कि मैं ये कहां फंस गया। लेकिन धीरे धीरे मुझे इसमें आनंद आने लगा। मेरे वहां दो दोस्त बन गए, अमरजीत और संदीप कौल। हमारे ग्रुप को हम ट्रायो कहते थे। अमरजीत जनरल रिटायर हुआ,  वह मेरा बहुत ख्याल रखता था।

मुंगली जी कहते हैं कि मैं नैनीताल झील में तैरता था तो मुझे तैराकी की आदत थी ही इसलिए वहां भी तैराकी में पहला आता था। उन्होंने बताया कि मैंने हॉर्स राइडिंग करना भी वहीं से सीखा। मैं आज पूरी दुनिया घूम गया हूं पर कह सकता हूं कि आईएमए ट्रेनिंग की सिखलाई दुनिया में कहीं नहीं है। इंसान वहां सम्मान लेना और देना सीखा जाता है। ट्रेनिंग के दौरान अफसरों को खाना, उठना, बैठना सिखाया जाता है। वहां शरीर को इस तरह ट्रेन कर दिया जाता है कि देश पहले हो, अपना वेलफेयर लास्ट में हो।

कर्नल एसपीएस रावत से मैं वहां बड़ा प्रभावित था, जब भी परेशान होता था, उनके घर चले जाता था। उन्होंने मुझे हमेशा सही दिशा दिखाई। छह फिट लंबे रावत जी का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक था। उनसे मैं अभी भी बातचीत करते रहता हूं।

आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं तो मुझे लगता है मेरी जिंदगी के वो सबसे बेहतरीन पल थे। वह आज भी मेरे साथ हैं, उठना बैठना वहीं की सीख है।

सिक्किम की भूमि: प्रशिक्षण का प्रथम पड़ाव और स्वयं की वास्तविक पहचान

सेना में प्रवेश के उपरांत मुंगली जी का पहला व्यावहारिक पड़ाव सिक्किम की दुर्गम, ऊँची और अत्यंत कठिन भूमि थी। यह स्थान अपनी ऊँचाई, बर्फीले ठंडे मौसम और अत्यंत कठोर प्रशिक्षण के लिए जाना जाता था।
यह वह कसौटी थी जहाँ उनके संकल्पों को परखा जाना था। लेकिन मुंगली जी के लिए, यह सब कुछ कठिन नहीं रहा।
सिक्किम में उन्होंने वास्तव में स्वयं को पहचाना। उन्होंने अपनी शारीरिक और मानसिक सीमाओं को केवल परखा ही नहीं, बल्कि उन्हें पार भी किया और पाया कि वे अपनी कल्पना से कहीं अधिक मजबूत और सहनशील थे। 

अपने जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव में मुंगली जी भारत के अनेक कठिन और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पहुँचे, सेना में उन्होंने अनेक जिम्मेदारियाँ संभालीं और अनेक मुश्किलों का सामना किया, इनमें से कुछ का विस्तृत वर्णन आगे आएगा।

यह अध्याय उनके जीवन में उस महत्वपूर्ण, स्वर्णिम द्वार की तरह है, जिसे पार करने के बाद उनका संपूर्ण जीवन, एक नए और महान उद्देश्य की ओर मुड़ गया।

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