परेड समाप्त होने के बाद भी मुंगली जी वहीं बैठे रहे। भीड़ लौट रही थी और उनका मन शांत हो गया था।
जैसे हर किसी के जीवन में एक पल ऐसा आता है जब उसे अपने जीवन का उद्देश्य ज्ञात हो जाता है वैसे ही मुंगली जी को भी अपने जीवन का उद्देश्य मिल गया था। वे समझ गए कि उनका स्थान कहीं और नहीं, उसी अनुशासन और उसी जिम्मेदारी की दुनिया में है जिसे वे अभी अपनी आंखों से देख आए हैं।
उन्होंने तय किया कि वे नौकरी में टिके रहने के बजाय सेना की राह पर चलेंगे, चाहे मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हो। इसके कुछ दिन बाद ही 8 या 9 फरवरी को न्यूज पेपर में इंडियन मिलिट्री एकेडमी का इश्तहार आया था। यह इश्तहार टेक्निकल एंट्री के लिए था, मुंगली जी ने इसके लिए आवेदन कर दिया।
मुंगली जी कहते हैं कि मैं सुबह शाम योग करता था, दौड़ने जाता था तो शरीर पूरी तरह फिट था। उनकी दिल्ली रहते हुए लाइब्रेरी जाने की आदत भी पड़ गई थी। जैसे कि उस जमाने में हर नैनीताल वाले की इच्छा सिविल सर्विस में जाने की होती थी तो इसके लिए वह भी ब्रिटिश काउंसलर लाइब्रेरी, अमेरिकन लाइब्रेरी में अपना खूब सारा वक्त बिताते थे। दुनिया में क्या चल रहा है, देश में क्या क्या घटित हो रहा है, उनको लगभग सभी जानकारी रहती ही थी और भाषा पर भी उनका अच्छा नियंत्रण था।
मिलिट्री में जाने की जो आवश्यक योग्यताएँ होती हैं, शायद मैं उसके लिए ठीक था। इसलिए मैंने आवेदन कर दिया और वापस अपनी सामान्य जिंदगी में लग गया। मेरे मन में ऐसा कुछ नहीं था कि बचपन से सेना में जाना है। कई लोग तो आठवीं नवीं कक्षा से ही दृढ़ निश्चय कर लेते हैं, लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं था।
दिल्ली की वही व्यस्त जिंदगी चलती रही। एक दिन अचानक खबर आई कि मेरा नाम, चयन के लिए सूची में आ गया है। एसएसबी बंगलौर के लिए कॉल आया और उस समय मुझे लगा कि मैं तो बिल्कुल फिट नहीं हूँ, कैसे चयन हो सकता है।
मेरे पास पासपोर्ट था, तो सोचा ठीक है। अगर चयन नहीं भी हुआ तो दक्षिण भारत का बाद श्रीलंका घूम लूंगा। जीवन में पहली बार दक्षिण का सौंदर्य देखने का मौका मिलेगा। मद्रास से कोलंबो तक एक जहाज जाता था, जिसकी टिकट सौ रुपए थी।
यह मेरा वैकल्पिक कार्यक्रम था लेकिन भगवान की योजना कुछ और ही थी। उसी योजना के अनुसार आठ से दस दिन चली प्रक्रिया क बाद मैं दस से पंद्रह लोगों के अपने बैच में अकेला चयनित हुआ। एसएसबी क्वालिफाई कर लिया।
वहां से लौटकर फिर मैं अपनी पुरानी जिंदगी में लौट आया। वही समय की कमी, वही भागदौड़, वही सब कुछ। मुझे पता नहीं था कि मैं मेरिट में आऊंगा या नहीं। सच कहूं तो मैं मेरिट लिस्ट की इतनी प्रतीक्षा भी नहीं कर रहा था।
आगे का घटनाक्रम बताते हुए मुंगली जी ने बताया कि एक दिन नैनिताल से मेरे परिवार की तरफ से संदेश आया। मेरी माता जी ने मुझे फोन किया और फोन पर मेरा भाई भी था, उन्होंने बताया कि तुम्हारा कॉल लेटर आ गया है और जून में तुम्हें आईएमए ज्वाइन करना है। उन्होंने ये भी बताया कि कुछ दिन पहले पुलिस वेरिफिकेशन भी हो गया है और तुम्हारे कपड़ों की माप भी मांगी गई है।
मुंगली जी ने कहा कि मेरे परिवार में कोई मिलिट्री में नहीं था तो मुझे कुछ नहीं पता था कि सेना में क्या होता है। ये बस एक इच्छा का पूरा होना था, वह जो मुझे 26 जनवरी की परेड देखकर शुरू हुई थी। मैं सिपाही या किसी भी रूप में सेना में जाना चाहता था। दिल्ली से मैं सीधे देहरादून आईएमए पहुंचा। दिल्ली में ही मैंने हेयर कट कर लिए थे पर वहां पहुंचने पर मुझसे फिर बाल कटवाने के लिए कहा गया।
मैंने सोचा मैंने कल ही बाल कटवाए, ये लोग क्या चाहते हैं। लेकिन जाना तो था ही, फिर मैं एक ग्रुप के साथ बार्बर के पास गया तो वहां ‘अच्छेलाल’ ने मेरे बाल में मशीन चला दी और बिल्कुल छोटे बाल कर दिए। इस तरह मेरी आर्मी की लाइफ शुरू हुई।
वहां इंसान को बैठने का भी वक्त नहीं मिलता। मुझे एक किटबैग में जूते, डांगरी कई चीजें मिली। फिर नाप दी हुई ड्रेस भी मिली। आईएमए का पहला दिन मेरे लिए बहुत लंबा हो रहा था।
थोड़ी देर बाद एक आदमी से मैंने पूछा कि मुझे कहां जाना है तो उसने मुझे हैंड्स डाउन बोला।
मैंने सोचा ये हैंड्स डाउन क्या होता है पर पता नहीं क्या सोचकर उसने मुझे जाओ कह दिया।
कमरे में सामान रखा ही था कि सीएचएम द्वारा सबको बुलाने के लिए आवाज लगाई गई। मैंने सोचा ये सीएचएम क्या होता होगा, जिसने हमें बुलाया है। खैर, हम सीएचएम के सामने खड़े हुए तो उसने सीधे हैंड्स डाउन करवा दिया, इस तरह यह सब चलता रहा। बाद में हमें साइकिल मिली, साथ बैठकर खाना सिखाया गया। हम सिर्फ दो तीन घंटे ही सो पाते थे।
मुंगली जी ने सेना में अपने प्रशिक्षण के यादगार दिनों के बारे में बात करते हुए आगे बताया कि उन दिनों वहां एक ड्रिल इंस्ट्रक्टर सुबेदार प्रताप सिंह भी थे, जो शायद राजस्थान के थे। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने लड़कों को सच्चा सैनिक बनना सिखाया, मैं उन्हें हमेशा इसी रूप में याद करता हूँ। उनका काम था आदमी को आदमी बनाना ‘To make a man out of a man’ वाली बात सच में उन पर ही लागू होती थी।
प्रताप सिंह साहब बहुत ही लंबे थे, लगभग छह फीट लंबे और उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था। उन्होंने हमें अनुशासन और आत्मबल सिखाया। मैं उन्हें हमेशा सम्मान से याद करता हूँ।
वह चाहते थे कि नए कैडेट्स के बूट की आवाज मसूरी तक पहुंचे, तब मुझे लगता था कि मैं ये कहां फंस गया। लेकिन धीरे धीरे मुझे इसमें आनंद आने लगा। मेरे वहां दो दोस्त बन गए, अमरजीत और संदीप कौल। हमारे ग्रुप को हम ट्रायो कहते थे। अमरजीत जनरल रिटायर हुआ, वह मेरा बहुत ख्याल रखता था।
मुंगली जी कहते हैं कि मैं नैनीताल झील में तैरता था तो मुझे तैराकी की आदत थी ही इसलिए वहां भी तैराकी में पहला आता था। उन्होंने बताया कि मैंने हॉर्स राइडिंग करना भी वहीं से सीखा। मैं आज पूरी दुनिया घूम गया हूं पर कह सकता हूं कि आईएमए ट्रेनिंग की सिखलाई दुनिया में कहीं नहीं है। इंसान वहां सम्मान लेना और देना सीखा जाता है। ट्रेनिंग के दौरान अफसरों को खाना, उठना, बैठना सिखाया जाता है। वहां शरीर को इस तरह ट्रेन कर दिया जाता है कि देश पहले हो, अपना वेलफेयर लास्ट में हो।
कर्नल एसपीएस रावत से मैं वहां बड़ा प्रभावित था, जब भी परेशान होता था, उनके घर चले जाता था। उन्होंने मुझे हमेशा सही दिशा दिखाई। छह फिट लंबे रावत जी का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक था। उनसे मैं अभी भी बातचीत करते रहता हूं।
आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं तो मुझे लगता है मेरी जिंदगी के वो सबसे बेहतरीन पल थे। वह आज भी मेरे साथ हैं, उठना बैठना वहीं की सीख है।
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