Sunday, November 16, 2025

चार– सैन्य जीवन - साहस, प्रकृति और नेतृत्व की दास्तान

सैन्य जीवन - साहस, प्रकृति और नेतृत्व की दास्तान 

आगे चलकर मुंगली जी को सेना में पर्यावरण और पहाड़ी क्षेत्रों से जुड़े विशेष कार्य और पोस्टिंग मिलीं। पहाड़ उनकी सेवा के प्रारंभिक वर्षों में भौगोलिक चुनौती तो थे ही, इसके साथ ही पहाड़ उनके लिए एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति भी रहे। पहाड़ों का अनिश्चित मौसम और दुर्गमता उन्हें हर दिन एक नई सीख देती थी।

ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनाती ने उन्हें सिखाया कि फौजी का जीवन केवल आदेशों और अभ्यास से नहीं चलता, बल्कि अनुकूलन और धैर्य भी उसके लिए आवश्यक होता है। 
लंबी चढ़ाइयों, सीमित संसाधनों और अनिश्चित भूगोल के बीच साथी जवानों का मनोबल देखकर उन्हें यह गहरा बोध हुआ कि सेना की सबसे बड़ी शक्ति उनका हथियार नहीं, बल्कि उनकी निष्ठा है। पहाड़ों में उन्हें यह भी समझ आया कि करुणा और कठोरता एक साथ कैसे जीवित रह सकती हैं, उन्होंने सीखा कि कठिन भूगोल में ही सबसे गहरी मानवीय संवेदनाएँ जन्म लेती हैं।

इन्हीं दिनों में मुंगली जी ने पर्यावरण संरक्षण को सैन्य कार्य का स्वाभाविक विस्तार मानना शुरू किया। उन्होंने महसूस किया कि पर्वतीय पारिस्थितिकी अत्यंत संवेदनशील है, इसलिए सैनिकों को केवल सुरक्षा का नहीं बल्कि संरक्षण का भी दायित्व निभाना चाहिए। उनके मस्तिष्क में ये बातें किसी दबाव से नहीं, बल्कि अपने अनुभव से प्राप्त समझ और संवेदना से उपजी थीं, मुंगली जी के साथी भी उनके हर निर्णय को स्वेच्छा से अपनाते गए।

इन अनुभवों ने मुंगली जी को यह समझने में मदद दी कि नेतृत्व सिर्फ आदेश देने का नाम नहीं है। नेतृत्व सबसे आगे चलता है, सबसे पहले कठिनाई का सामना करता है और सबसे अंत में आराम करता है।

ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति जवानों के लिए प्रेरणा बनती थी। मुंगली जी देखते थे कि उनका अधिकारी उन्हीं के साथ बर्फ में चलता है, ठंड सहता है और जोखिम उठाता है।

कोटा में अपनी पोस्टिंग के दौरान, उन्होंने एक अत्यंत महत्वाकांक्षी और विशाल स्तर पर वृक्षारोपण अभियान का नेतृत्व किया। यह अभियान केवल आदेश की खानापूर्ति करने तक सीमित नही रहा, इसमें मुंगली जी की व्यक्तिगत प्रतिबद्धता, प्रकृति प्रेम और दूरदर्शी सोच का दिखाई दी। पौधे ही हमारे बेहतर भविष्य का रास्ता हैं, इस सोच के साथ अभियान के अन्तर्गत हजारों पौधे लगाए गए। 

मुंगली जी मानते थे कि पेड़ केवल छाया या फल नहीं देते, वे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करते हैं, हवा को शुद्ध करते हैं, मिट्टी का कटाव रोकते हैं, वन्यजीवों को आश्रय देते हैं, मनुष्य को शांति और सुकून देते हैं और सबसे महत्वपूर्ण यह कि वे समाज और आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य प्रदान करते हैं।

इकोलॉजी सेल: सेना और पर्यावरण का सह-अस्तित्व

सेना में पर्यावरण संरक्षण के प्रति मुंगली जी की सक्रिय भूमिका की वजह से उनके प्रयासों को धीरे धीरे विशेष पहचान मिलने लगी। इकोलॉजी सेल में रहते हुए उनके कार्यों सराहा गया और सबसे खास बात यह रही कि उन्हें आर्मी चीफ की कमेंडेशन (प्रशंसा) मिली।

मुंगली जी पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अपना नाम बना रहे थे कि इस बीच उन्होंने डॉक्यूमेंट्री बनाने का एक  रचनात्मक काम भी किया।
इस बौद्धिक और कलात्मक कार्य में उन्होंने स्वयं को पूरी तरह झोंक दिया।

उनकी बनाई हुई डॉक्यूमेंट्री "Off The Desert" आज भी सेना के प्रशिक्षण, बहुआयामी स्वरूप और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक सुंदर, प्रेरणादायक और अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज मानी जाती है।

मुंगली जी ने इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से सैन्य अधिकारी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन तो किया ही, साथ में उन्होंने अपने विचारों, व्यापक दृष्टि और अपने दर्शन को कलात्मक रूप में व्यक्त किया। मुंगली जी ने यह दिखाया कि फौजी जीवन केवल युद्ध, संघर्ष और सीमाओं की रक्षा तक ही सीमित नहीं है। इसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रकृति की समस्याओं का विश्लेषण और समाज के प्रति जिम्मेदारी का निर्वहन भी शामिल है। 

Off The Desert ऐसे कुछ सैनिकों की कहानी थी जो रेगिस्तानों के कठिन जीवन में रहते हुए भी समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं।
वे बंजर भूमि को हरा-भरा बनाने का सपना देखते हैं और उसे साकार करते हैं। यह डॉक्यूमेंट्री प्रकृति के प्रति सेना के समर्पण का एक अद्भुत उदाहरण थी।

सैन्य सेवा के विभिन्न चरणों में मुंगली जी ने अपने से नीचे रैंक वालों के साथ करीब रहकर काम किया, सभी के जीवन का हिस्सा बनते हुए वह उनके सुख-दुख में सहभागी हुए। मुंगली जी ने सिपाहियों के साथ प्रशिक्षण लिया और उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को भी समझा।
सिपाहियों को वह बेहतर नागरिक बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। मुंगली जी के अनुसार यदि सिपाही का अपने अधिकारी, संस्था और अपने उद्देश्य पर अडिग विश्वास हो तो वह किसी भी बड़ी चुनौती का सामना कर सकता है और उसमें जीत हासिल कर सकता है।

स्वाभाविक नेतृत्व: आगे बढ़कर, कर्तव्य निभाकर, मिसाल बनकर नेतृत्व

मुंगली जी का नेतृत्व थोपा हुआ न होकर स्वाभाविक था। यह उनके आचरण से संभव हुआ, वे कठिन समय में स्वयं आगे आकर जोखिम उठाते थे और पहल करते हुए उदाहरण प्रस्तुत करते थे।

इसके विपरीत अपेक्षाकृत आसान समय में वे दूसरों को, विशेषकर अपने सिपाहियों को आगे बढ़ने और अनुभव प्राप्त करने का भरपूर अवसर देते थे।

मुंगली जी कहते हैं कि सच्चा नेतृत्व वही होता है जब पहले अपना कर्तव्य निभाया लिया जाए और उसके बाद ही सुविधा ली जाए।
जो लीडर स्वयं त्याग करता है और अपने सैनिकों, कर्मचारियों या कार्यकर्ताओं से पहले कष्ट झेलता है, वही अपने अनुयायियों से सर्वश्रेष्ठ की अपेक्षा रख सकता है और वही उनका हृदय जीत सकता है। यह सिद्धांत उनके हर निर्णय में निरंतर झलकता था और इस वजह से ही फौज में मुंगली जी के साथ काम करने वाले सभी सैनिक उन्हें अपना मानते हुए सम्मान करते थे।

पुरुषार्थ का परिपक्व होना: फौज के वे अनमोल, जीवन-व्यापी सबक

इसी सैन्य जीवन में मुंगली जी का पुरूषार्थ अधिक परिपक्व हुआ और निखर कर सामने आया। उन्होंने फौज में अपने साथियों और अनुभव से दो ऐसे अनमोल सबक सीखे, जो उनके जीवन का आधार स्तंभ बन गए। इन्हीं की वजह से उनके भविष्य को भी दिशा मिली। पहला सबक यह था कि जीवन में चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किल या कठिन समय हो वह कभी स्थायी नहीं होता।हर मुश्किल वक्त, हर अंधकारमय रात, गुजर जाती है, और उसके बाद एक नया सवेरा आता है। 

दूसरा सबक यह था कि मनुष्य की हार केवल उसके मन में होती है। यदि मन में जीत का अदम्य संकल्प हो और यह विश्वास हो कि आप विजयी होंगे, तो हर मुश्किल परिस्थिति में रास्ता निकल ही आता है और विजय निश्चित होती है।

ये दो सिद्धांत मुंगली जी के लिए जीवन में हार न मानते हुए विजयी होने के मूल मंत्र थे और इन्हें उन्होंने अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था।

सैन्य जीवन ही था भव्य नींव का पत्थर

सैनिक जीवन के इन वर्षों में मिले गहन अनुभवों ने उन्हें वह दृष्टि प्रदान की, जिसने आगे चलकर उनके जीवन में लिए गए हर निर्णय और कार्य को सही दिशा दी। 

मुंगली जी के लिए सैन्य जीवन सिर्फ एक नौकरी या एक पेशा मात्र नहीं था। उनके लिए यह एक गहन साधना और आत्म-उत्थान की प्रक्रिया थी।
सैन्य जीवन ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया।
इसी के जरिए आगे चलकर वह शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में हजारों बच्चों के जीवन को बदलने वाले बने।

मुंगली जी के शब्दों में सैन्य जीवन उनके लिए वह भव्य नींव का पत्थर था, जिस पर उनके आज का निर्माण हुआ।

दूसरों के लिए जीने वाले मुंगली जी

स्वनिवृत लेफ्टिनेंट जनरल राजेन्द्र निम्भोरकर ने मुंगली जी के बारे में बात करते हुए कहा कि कर्नल मुंगली से मेरा परिचय जून 1978 में तब हुआ जब वह हमारे साथ इंडियन मिलिट्री अकेडमी में शामिल हुए। वह बहुत ही शांत स्वभाव के लेकिन दृढ़ निश्चयी जेंटलमैन कैडेट थे। हम लोग एनडीए से आए थे इसलिए तीन साल के प्रशिक्षण के कारण शारीरिक रूप से अधिक मजबूत थे। सिविल से आने वाले कैडेटों की तुलना में हमारे लिए यह प्रशिक्षण थोड़ा आसान था। कर्नल मुंगली के लिए यह सब बिल्कुल नया था। सैन्य प्रशिक्षण अत्यंत कठिन होता है लेकिन उन्होंने अपने दृढ़ निश्चय से खुद को शारीरिक रूप से मजबूत बना लिया और टर्म के अंत तक हम सबके बराबर आ गए।

धीरे-धीरे हमें पता चला कि उनकी सबसे अच्छी विशेषता मित्रों के प्रति निष्ठवान रहने की थी और वह दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे।

मुझे एक घटना याद आती है। यह हमारी अंतिम से पहले वाली टर्म की बात है जब हमने एक प्रतिस्पर्धी सहनशक्ति मार्च में भाग लिया था। इसे गोल्डन रिंग कहा जाता था। इसमें हमें लगभग बीस किलो वजनी लड़ाकू सामान और राइफल लेकर मार्च करना होता था। यह सामान छोड़ने की अनुमति नहीं होती थी।

यह अभ्यास नदी किनारों नालों जंगलों से गुजरते हुए भदराज मंदिर की ओर चढ़ाई करते हुए फिर क्लाउड्स एंड सांवरी देवी और टॉम नदी से होते हुए लगभग ग्यारह किलोमीटर का अत्यंत कठिन मार्च था। दिन के अंत तक हम भदराज की ढलानों पर चढ़ रहे थे और अत्यधिक थकान के कारण केवल इच्छा शक्ति के सहारे चल रहे थे।

उस समय दशहरे के दिन थे और रातें देहरादून के क्षेत्र में बहुत ठंडी होती थीं। चलते समय हम पसीने से भीग जाते थे और जैसे ही रुकते थे पसीना सूखते ही ठंड असहनीय लगने लगती थी। इस अनुभव को शब्दों में बताना मुश्किल है इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। अंत में हम भदराज पहुँचे तो स्टाफ को अपनी रिपोर्ट दी, इसके बाद हमने कुछ मिनट आराम किया अपने वेपन लोड चेक किए और फिर रात में आगे क्लाउड्स एंड की तरफ बढ़ने लगे। यह यात्रा रात में बहुत ही कठिन होती है।

रास्ते में एक स्थान पर हमने देखा कि हमारी टीम के एक साथी के पास राइफल नहीं थी। वह शायद भदराज में रह गई थी या चलते समय कहीं गिर गई थी। राइफल का खो जाना मतलब था कि हमारा पलटन प्रतियोगिता हार जाएगा और वह कैडेट अपनी टीम को नुकसान पहुंचा देता।

अब उस राइफल को खोजने के लिए पीछे लौटना बहुत ही कठिन और थकाऊ काम था। हमारे शरीर थकान से टूट चुके थे और कोई भी वापस नहीं जाना चाहता था। यहां तक कि जिसने राइफल खोई थी, वह भी वापस नहीं जाना चाहता था।

अचानक मैंने देखा कि मुंगली मेरी तरफ आ रहे थे। उन्होंने मुझसे कहा कि चलो राइफल खोजकर लाते हैं। उनके इस सुझाव से मैं हैरान रह गया और उनकी अपने साथियों की मदद करने की भावना ने मुझे बहुत प्रभावित किया।

मेरा शरीर वापस जाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था लेकिन मन ने मुझे अनुमति दी और मैं चल पड़ा। हम दोनों वापस भदराज पहुँचे खोज की और अंत में राइफल मिल गई। जब हम लौटे तो हम दोनों बिल्कुल थककर चूर हो चुके थे। शारीरिक थकान के अलावा हमें कई जोंकों ने काट लिया था और काफी खून बहा था।

एक और घटना उनके चरित्र की महानता को दिखाती है। यह हमारी अंतिम टर्म के कैंप ‘चंडी’ के दौरान की बात है। इस कैंप का प्रशिक्षण बहुत ही कठोर होता है और प्रशिक्षक नियमों का बहुत सख्ती से पालन करवाते हैं।

मई का महीना था और धूप बहुत तीखी थी। हमें लगभग चार घंटे चलना था। रास्ते में एक नाला आता था जिसका नाम कालूवाला नाला था और इसके आगे हमारा गंतव्य शिवालिक पहाड़ियों के पास था। मार्च का महीना लगभग शुरू ही हुआ था।

कुछ कैडेटों ने पानी के नियमों का पालन नहीं किया और नियमों के खिलाफ अपनी बोतलों का पानी पी लिया। प्रशिक्षक बहुत नाराज हुए और दंड के रूप में हर कैडेट को लगभग दस किलो का एक पत्थर उठाकर चलने को कहा। यह बोझ पहले से मौजूद बीस किलो के सामान के ऊपर था। इस वजह से हम सभी को यह दंड बहुत कठिन लगा और सभी बड़बड़ाने लगे।

एक कैडेट जो दस्तखत की नकल करने में माहिर था उसने कहा कि हम अपने पत्थर रास्ते में कहीं छोड़ दें और गंतव्य स्थल के पास किसी नाले से पत्थर उठाकर उन पर प्रशिक्षक के हस्ताक्षर की नकली कॉपी कर देंगे। सभी ने उसकी बात मान ली पर मुंगली ने ऐसा नहीं किया। वह पत्थर उठाए आगे बढ़ते रहे।

गर्मी बहुत तेज थी, पानी नहीं था और हम सभी को हीट स्ट्रोक का डर हो रहा था। लगभग एक किलोमीटर चलने के बाद मैंने सोचा कि अगर मुंगली यह सब सह सकता है तो मैं क्यों नहीं। मैंने प्रेरणा ली पत्थर उठाया और अंत तक पहुँच गया। जब हम पहुँचे तो हम दोनों लगभग बेहोश जैसे थे। बाकी कैडेट ठीक थे और उन्हें उनकी ताकत के लिए प्रशंसा भी मिली जबकि हम नियमों का पालन कर रहे थे।

उस दिन मुझे मुंगली से बहुत बड़ा सबक मिला। परिस्थिति कैसी भी हो सही रास्ता हमेशा कठिन होता है लेकिन गलत रास्ता आसान होने के बावजूद सही नहीं होता। जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए। यह सीख मुझे मेरे आगे के करियर में मुश्किल समय में बहुत काम आई।

इसके बाद मुंगली सेना की एडवेंचर गतिविधियों में बहुत आगे बढ़े और उच्च स्तर तक पहुंचे। मुझे उनमें एक आदर्श अधिकारी और एक सच्चा मित्र मिला। अगर मुझसे पूछा जाए कि युद्ध में मैं किस साथी को अपने साथ ले जाना चाहूंगा तो मेरा उत्तर हमेशा मुंगली होगा। क्योंकि मैं जानता हूं कि वह अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरे की जान बचाने के लिए तैयार रहेगा।

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