Sunday, November 16, 2025

सात – अरुणाचल

सियांग की वह घटना जिसने मुंगली जी का जीवन बदल दिया

जब मुंगली जी की उत्तर पूर्व में पोस्टिंग आई, तब उन्हें लगा था कि उनका सैन्य करियर एक स्थिर दिशा में बढ़ रहा है। उनके अंदर अपनी नौकरी को लेकर अनुभव और आत्मविश्वास दोनों थे।
लेकिन जैसे ही वे अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास पहुँचे, उन्हें एहसास हुआ कि यह जगह उन्हें बिल्कुल नए तरीके से परखेगी। पहाड़ी रास्ते, अचानक उठती घाटियाँ, अजीब सी शांति और तेज़ हवा के झोंके, उन्हें पहली ही नज़र में सब कुछ अलग और अजनबी सा लगा।

अरुणाचल की सड़क बेहद संकरी थी और कई जगह पर मिट्टी ढही हुई थी। वाहन को अत्यंत सावधानी से धीरे-धीरे चलाना पड़ता था, क्योंकि पहाड़ों के मोड़ों पर जरा सी चूक बड़ी दुर्घटना का सबब बन सकती थी।
 घने जंगलों और कभी नीले कभी सफेद बादलों से भरे आसमान के सिवाय वहां और कोई भी था। मुंगली जी खिड़की के बाहर देखते रहे और सोचते रहे कि प्रकृति कितनी विशाल है और मनुष्य कितना छोटा।

अरुणाचल प्रदेश भारत के उत्तर पूर्व में स्थित एक अत्यंत सुंदर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश है। हिमालय की पूर्वी पर्वतमाला पर बसे इस प्रदेश को भारत का उदयाचल कहा जाता है, क्योंकि देश में सबसे पहले सूर्य की किरणें यहीं पड़ती हैं। घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ों, गहरी घाटियों और अनगिनत जलधाराओं से भरा यह प्रदेश प्रकृति के सौंदर्य, सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक गहराई का अद्भुत मिश्रण है। अरुणाचल की जनजातियाँ आज भी अपनी परंपराओं में प्रकृति को सबसे बड़ा संरक्षक मानती हैं।

अरुणाचल प्रदेश प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विविधता से भरपूर है। यहाँ की हर जनजाति की अपनी विशिष्ट भाषा, परिधान, कला, उत्सव और जीवन-दर्शन है। मोनपा और शेरडुकपेन समुदाय बौद्ध परंपरा से गहराई से जुड़े हैं। अपतानी समुदाय अपनी अत्यंत कुशलतापूर्ण खेती पद्धति के लिए विश्व-प्रसिद्ध है।

निशि, गालो, तागिन और आदि समुदायों के त्योहार, लोक-नृत्य और वीर-गाथाएँ जनजातीय संस्कृति के जीवंत उदाहरण हैं। लकड़ी की नक्काशी, बाँसकारी, पारंपरिक हथियार, लोक-संगीत और सामुदायिक जीवन की परंपराएँ आज भी यहाँ की पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं।

अरुणाचल प्रदेश की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान को आकार देने में उसकी नदियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें सबसे प्रमुख सियांग नदी है। इसे अरुणाचल प्रदेश की जीवन-धारा कहा जाता है। यह नदी तिब्बत में 'यारलुंग त्सांगपो' के नाम से बहती है और भारत में प्रवेश करते ही सियांग कहलाती है। यह अरुणाचल प्रदेश की विशाल पर्वत-श्रृंखलाओं के बीच से बहते हुए अपार ऊर्जा और जल-सम्पदा लेकर आती है। सियांग न केवल एक भौगोलिक धारा है, बल्कि जनजातीय जीवन, भूमि, कृषि, परिवहन और सांस्कृतिक चेतना का आधार भी है। कई समुदाय इसे पवित्र मानते हैं और उनके उत्सव, लोककथाएँ और नृत्य इसके इर्द-गिर्द विकसित हुए हैं।

सियांग नदी अरुणाचल के जंगली और दुर्गम क्षेत्रों को जीवन देती है। यह नदी अनेक झरनों, उपनदियों और घाटियों को जोड़ते हुए आगे बढ़ती है। सियांग आगे चलकर असम में प्रवेश करते ही ब्रह्मपुत्र का रूप ले लेती है, जो समूचे पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी जीवन-रेखा है। इस नदी की उर्वरता, जल-शक्ति और पारिस्थितिकी आज तक लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है।

आधुनिक अरुणाचल प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और बुनियादी ढाँचे का तेजी से विस्तार हो रहा है। तवांग, ज़ीरो, मेचुका और पासीघाट आज पर्यटकों के प्रमुख आकर्षण बन चुके हैं। नामदाफा राष्ट्रीय उद्यान, मोलिंग अभयारण्य और पाखुई टाइगर रिज़र्व जैव-विविधता के खजाने हैं, इसमें अनगिनत दुर्लभ वनस्पतियाँ और जीव पाए जाते हैं। साथ ही यह राज्य भारत की उत्तर-पूर्वी सीमाओं की सुरक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अरुणाचल का प्रभाव: प्रकृति से संवाद

कैंप की पहली सुबह हवा का स्पर्श मुंगली जी को कुछ अलग सा लगा। आसपास पूर्ण शांति थी, केवल दूर कहीं पहाड़ी पर किसी पक्षी की चहचहाहट ही सुनाई देती थी, जो शीघ्र ही खामोशी में विलीन हो जाती थी। मुंगली जी ने उस सुबह कैंप के पास चहलकदमी की, घाटी का लंबा दृश्य और सूर्योदय की पहली किरणें, मानो यह सब उन्हें किसी अनजाने खतरे के प्रति सचेत कर रहा था।

कुछ ही दिनों में मुंगली जी आस-पास के गाँवों में जाने लगे। ये छोटे, पहाड़ी ढलानों पर बसे गाँव थे, जहाँ घर लकड़ी और पत्थर के थे। वहाँ के लोग शांत और विनम्र थे। वे बोलते कम थे पर उनकी मुस्कान में आत्मीयता थी। उन लोगों का जीवन भले ही कठिन था पर उनकी जीवनशैली में कोई दिक्कत नहीं थी। वे लोग सुबह जल्दी उठ जाते थे, फिर अपने खेतों और जानवरों की देखभाल करते और शाम को लौट आते।

मुंगली जी अक्सर उनके बीच रुककर बातें करते, उनके जीवन के संघर्षों, बर्फबारी से निपटने, खेतों में पानी लाने और बच्चों की शिक्षा के बारे में पूछते। इन बातों से उन्हें एहसास हुआ कि कठिन परिस्थितियाँ कैसे इंसान को मजबूत बनाती हैं। अरुणाचल के लोग आधुनिक सुविधाओं की कमी के बावजूद अपने जीवन में संतुष्ट थे।

पहाड़ों में मौसम अप्रत्याशित रूप से बदल जाता था। धूप अचानक गायब हो जाती, बादल छा जाते और तेज हवाएँ चलने लगतीं। सेना को ऐसे मौसम में बाहर निकलना पड़ता था, मुंगली जी और उनकी टीम अब इस इलाके के स्वभाव को समझने लगी थी। उनका काम अक्सर उन्हें दूर-दराज के इलाकों में ले जाता, जहाँ वाहन नहीं पहुँच पाते थे। ऐसे में कठिन चढ़ाई के बावजूद, रास्तों की सुंदरता थकान को कम कर देती थी।

धीरे-धीरे अरुणाचल का यह वातावरण मुंगली जी के मन में बसने लगा। यह प्रदेश उन्हें हर दिन धैर्य, संतोष और विनम्रता जैसी नई सीख दे रहा था। गाँवों के लोग इन्हीं मूल्यों के साथ जीते थे और यही मूल्य मुंगली जी के अंदर भी उतरने लगे। एक दिन एक वृद्ध व्यक्ति लकड़ी का छोटा बोझ लेकर पहाड़ी से उतर रहा था, उसने मुंगली जी को देखते हुए कहा कि पहाड़ों पर रहने वाला व्यक्ति अपने बोझ को खुद उठाना सीख जाता है। उसकी यह सरल बात मुंगली जी के मन में उतर गई।

सियांग नदी का वह उफान

एक दिन उन्हें अपने कमांडिंग अधिकारी से सूचना मिली कि उनकी यूनिट को सियांग नदी में एक महत्वपूर्ण अभियान करना है। सियांग अपने तेज प्रवाह और गहराई के लिए जानी जाने वाली नदी है, यह मुंगली जी के लिए एक गंभीर चुनौती थी। अभियान के लिए किया जाने वाला अभ्यास वास्तविक स्थिति जैसा था और इसमें हर सदस्य को पूरी तैयारी के साथ जाना था। मुंगली जी ने उपकरणों की जांच की और साथियों को संयम व एकजुटता का महत्व समझाया।

अभ्यास वाले दिन आसमान साफ था और हल्की हवा चल रही थी। टीम नदी के किनारे पहुँची, सियांग दूर से ही तेज आवाज के साथ बहती सुनाई दे रही थी, टीम को इस आवाज को सुनते ऐसा लग रहा था मानो नदी उनकी किसी भी गलती को माफ नही करेगी।
राफ्ट पानी में उतरी और बहाव के साथ आगे बढ़ी। शुरुआती कुछ मिनट आसान थे, किनारों पर घने पेड़ थे और पहाड़ों पर सुबह की धूप बिखरी हुई थी।

जैसे ही राफ्ट मोड़ के पास पहुँची, पानी का रंग बदला हुआ सा लगा और बहाव बढ़ने के साथ नीचे छिपी हुई चट्टानों ने राफ्ट के लिए खतरा बढ़ा दिया था। टीम ने संतुलन बनाए रखने का पूरा प्रयास किया पर नदी का स्वभाव बदल चुका था।

एक तेज लहर ने राफ्ट को ऊपर उठाकर पीछे धकेल दिया और अगले ही पल राफ्ट पलट गई।

मुंगली जी और उनके साथी तेज बहाव में गिर पड़े। पानी अत्यंत ठंडा और बहाव बहुत तेज था, कई क्षणों तक दिशा समझ नहीं आई।

टीम के सदस्य ऊपर आने की कोशिश करते रहे पर धारा उन्हें नीचे खींचती रही। पानी का दबाव इतना था कि आँखें खोलना भी कठिन था। मुंगली जी ने अपना सारा अनुभव लगाते हुए मन को स्थिर रखा, वे जानते थे कि सीधे संघर्ष से कुछ हासिल नहीं होता। उन्होंने खुद को थोड़ा बहाव के साथ चलने दिया ताकि सांस पर नियंत्रण पा सकें। कुछ देर बाद जब उन्हें ऊपर आने का अवसर मिला, उन्होंने पूरी ताकत से हाथ चलाया और सतह पर आए। पर तुरंत ही फिर नीचे खिंच गए, यह संघर्ष कई बार दोहराया गया। हर बार थोड़ी देर के लिए हवा मिलती और फिर पानी उन्हें घेर लेता। लेकिन ऐसी कठिन परिस्थितियों को कई बार झेल चुके मुंगली जी के भीतर हार मानने का भाव नहीं था। उनके मन में एक ही विचार आया कि मुझे सतह तक आना ही है।

बहाव धीरे-धीरे बदलने लगा। मुंगली जी ने इसका लाभ उठाया और ऊपर आकर जोर से सांस ली। अब वे थोड़ी देर तक सतह पर रह सके। उन्होंने दूर राफ्ट को देखा और उसकी ओर तैरना शुरू किया। साथियों ने उन्हें देख लिया था। एक सैनिक ने रस्सी फेंकी, मुंगली जी ने उसे पकड़ा और पूरी शक्ति लगाकर खुद को संभाला। टीम ने मिलकर उन्हें खींचा और आखिरकार वे किनारे पहुँच गए।

जमीन पर बैठे तो उनका शरीर कांप रहा था पर मन शांत था। यह केवल पानी में गिरने और बाहर निकलने का अनुभव नहीं था। यह जीवन का वह क्षण था जिसने उन्हें उनकी असली क्षमता और कमजोरी दोनों से रूबरू कराया था।

परिवर्तन की शुरुआत

सुरक्षित जमीन पर पहुँचने के बाद मुंगली जी कुछ देर शांत बैठे रहे। उनके कपड़ों से पानी टपक रहा था, शरीर ठंड से कांप रहा था लेकिन मन धीरे-धीरे स्थिर हो रहा था। नदी अब भी उतनी ही तेज बह रही थी, उसकी आवाज दूर तक सुनाई दे रही थी। वे उस आवाज को ध्यान से सुनते रहे, मानो नदी अब भी उनसे कुछ कह रही हो। इस आवाज में एक गहराई थी जो अंदर तक उतर जाती थी।

साथी जवान उनके पास आए और पूछा कि क्या वे ठीक हैं।
मुंगली जी ने हल्की मुस्कान देकर कहा कि वे ठीक हैं। कैंप की ओर लौटते हुए हर कोई उस घटना पर बात कर रहा था, कोई नदी के तेज बहाव की बात कर रहा था तो कोई मुंगली जी के संयम पर।
मुंगली जी सब सुन तो रहे थे पर उनका ध्यान अपने भीतर की ओर था। वे सोच रहे थे कि इस घटना ने उन्हें जीवन के बारे में एक नई समझ दी है।

कैंप पहुँचने पर गर्म चाय के साथ उनके शरीर को थोड़ा आराम मिला। थोड़ी देर बाद वे बाहर टहलने निकले। शाम हो रही थी, पहाड़ों की चोटियों पर हल्का लाल रंग बिखर रहा था, नीला आसमान अब नारंगी हो रहा था। यह दृश्य बहुत शांत था। मुंगली जी कुछ देर इसे देखते रहे, उन्हें समझ आया कि प्रकृति कभी एक जैसी नहीं होती। वह हर पल बदलती है, कभी शांत तो कभी उग्र हो जाती है।

अगली सुबह उनका मन पूरी तरह साफ था, वे नदी के किनारे फिर गए। इस बार नदी उतनी उग्र नहीं थी, पानी का रंग साफ था, सूरज की रोशनी में पानी छोटे-छोटे चमकदार कण के रूप में चमक रहा था। मुंगली जी नदी को बहुत देर देखते रहे। उन्हें लगा कि इस नदी ने उन्हें एक गहरी सीख दी थी, जो किसी किताब से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव से मिलती है।

उन्होंने सोचा कि जब वे पानी में थे, तब डर था लेकिन उस डर ने उन्हें कमजोर नहीं किया। उन्होंने वही सीखा जो वे हमेशा फौजी जीवन में सुनते आए थे, मन मजबूत हो तो शरीर आपका साथ देता है।
यह विचार अब उनके भीतर गहराई से बस गया था। उन्हें लगा कि यह घटना केवल एक दुर्घटना न होकर उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

उस शाम उन्होंने अपने कमांडिंग अधिकारी से मुलाकात की। अधिकारी ने पूछा कि कल की घटना ने उन्हें कैसा महसूस कराया। मुंगली जी ने कहा कि यह अनुभव कठिन था, पर इसने उन्हें स्वयं को समझने में बहुत सहायता दी। अधिकारी ने उनकी बात ध्यान से सुनी और कहा कि फौजी का जीवन इसी तरह के अनुभवों से बनता है। हर अनुभव उसे नया बनाता है।

मुंगली जी ने महसूस किया कि यह बात बिल्कुल सही थी। सेना में सिपाही से लेकर अधिकारी तक के जवान केवल प्रशिक्षण और मिशनों से तैयार नहीं होते, वह संपूर्ण उन क्षणों से बनते हैं जब जीवन अचानक बदल जाता है, जब कोई व्यक्ति अपनी सीमा देखता है और फिर आगे बढ़ने की शक्ति पाता है।

सेवा और शिक्षा की ओर झुकाव

अगले कुछ दिनों में नदी का अनुभव मुंगली जी के मन में बार-बार उभरता रहा। वे सोचते थे कि यदि उन्होंने मन को कमजोर होने दिया होता, तो शायद वे सतह तक नहीं आ पाते। उन्होंने समझा कि जीवन में कठिन परिस्थितियाँ आती हैं और उन परिस्थितियों में मन की दिशा ही तय करती है कि आगे क्या होगा। यदि मन सही दिशा में रहे, तो शरीर भी सही दिशा में चलता है। वे कई बार नदी के किनारे बैठकर पूरे अनुभव को याद करते। उन्हें महसूस होता था कि यह घटना केवल एक चुनौती नहीं, बल्कि एक संदेश थी कि जीवन में सब कुछ नियंत्रण में नहीं होता।
परिस्थितियों को स्वीकार करना पड़ता है और सही समय पर कदम उठाना पड़ता है।

धीरे-धीरे यह अनुभव उनके भीतर बस गया। वे अधिक संयमित हो गए, किसी बात पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देते थे, हर बात को समझते और फिर निर्णय लेते थे। उनके साथी सैनिक भी यह परिवर्तन देख रहे थे, वे कहते थे कि मुंगली जी अब अधिक शांत और स्थिर हो गए हैं।

इन दिनों में वे गाँवों में पहले से अधिक समय बिताने लगे। उन्हें लगा कि यहाँ के लोग परिस्थितियों को सरलता से स्वीकार कर आगे बढ़ने में पारंगत हैं। यह बात उन्हें बहुत प्रभावित करती थी।
धीरे-धीरे उनके भीतर सेवा का भाव भी बढ़ने लगा। वे सोचते थे कि यदि प्रकृति ने उन्हें इतना कुछ सिखाया है, तो उन्हें भी अपने अनुभवों का उपयोग दूसरों के लिए करना चाहिए। वे गाँवों के बच्चों को देखते और सोचते कि यदि इन्हें अच्छी शिक्षा मिले तो वे अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं। यही विचार अब उनके मन में लगातार बना रहता था।

एक दिन मुंगली जी एक पहाड़ी के ऊपर बैठे थे। उन्हें महसूस हुआ कि अरुणाचल की यह यात्रा केवल उनके लिए एक सैन्य पोस्टिंग नहीं है। प्रकृति, जीवन और स्वयं को समझने की एक शिक्षा है। 
उन्होंने सोचा कि जिस तरह नदी रुकती नहीं, वैसे ही जीवन भी नहीं रुकता, व्यक्ति को हर परिस्थिति में आगे बढ़ते रहना चाहिए और उन्हें भी अब अगले लक्ष्य की तरफ देखना होगा।

मुंगली जी को लगा कि वे अब केवल अपने सैन्य दायित्व तक सीमित नहीं रह सकते। उन्हें अपने अनुभवों को समाज के लिए भी उपयोग करना चाहिए। वे लोगों की मदद करना चाहते थे, बच्चों को पढ़ाना चाहते थे और जो उन्होंने प्रकृति से सीखा है, वह दूसरों को भी सिखाना चाहते थे। यह विचार उसी अनुभव की देन था जो उन्हें सियांग नदी ने दिया था और यही उनके पूरे जीवन का आधार बनने वाला था।

अरुणाचल से विदाई: बदला हुआ दृष्टिकोण और जीवन का नया उद्देश्य

एक सुबह जब मुंगली जी कैंप से बाहर निकले और नदी के किनारे जा पहुंचे।
उस दिन वे नदी के किनारे बहुत देर तक बैठे रहे, अपनी नोटबुक में कुछ लिखने लगे। पहले ऐसे क्षणों में वे शायद कुछ नहीं लिखते थे पर अब उनके मन में विचार लगातार आ रहे थे। उन्होंने लिखा कि नदी ने उन्हें क्या सिखाया, पहाड़ों ने क्या बताया, गाँव के लोगों ने क्या समझाया।

जब वे कैंप लौटे, तो साथियों ने बताया कि अगले सप्ताह आसपास के गाँवों की स्थिति पर जानकारी के लिए उन्हें एक छोटी यात्रा के लिए जाना है। मुंगली जी को यह बात सुनकर बेहद खुशी हुई क्योंकि वे उन गाँवों को और करीब से समझना चाहते थे।

यात्रा वाले दिन सभी सैनिक सुबह जल्दी तैयार हुए। रास्ता लंबा था और कई जगह रास्ते की हालत ठीक नहीं थी। कहीं पर सड़क टूटी हुई थी तो कहीं मिट्टी फिसलन से भरी मिली। 
फिर भी पहाड़ों की सुंदरता ने यात्रा को सहज बना दिया था। 

पहले गाँव पहुंचे तो मुंगली जी ने देखा कि वहां के घर लकड़ी और पत्थर से बने थे, छतें तिरछी थीं ताकि बारिश का पानी गिर सके। लोग अपने खेतों में काम पर लगे हुए थे।
गाँव के बच्चों ने सेना के जवानों को उत्सुकता से देखने लगे, मुंगली जी ने बच्चों से उनके स्कूल के बारे में पूछा।

उन्होंने बताया कि स्कूल कई किलोमीटर दूर है, बारिश में वहां पहुँचना बहुत मुश्किल होता है फिर भी वह स्कूल जाना नहीं छोड़ते। यह सुनकर मुंगली जी को लगा कि इच्छाशक्ति किसी भी कठिनाई को छोटा बना देती है।

वे आगे एक बुजुर्ग व्यक्ति से मिले, जिसने अपने जीवन से जुड़ी बातें उनसे साझा कीं। उसने कहा कि साहब हर चढ़ाई आसान नहीं होती पर जो चलता रहता है, वह एक दिन ऊँचाई पर जरूर पहुँचता है। मुंगली जी को लगा कि यह बात जीवन पर भी लागू होती है।

अगले गाँव तक पहुँचने के लिए सैनिकों को काफी दूरी पैदल तय करनी पड़ी। रास्ता ऊपर की ओर था और मिट्टी पर पैर फिसल रहे थे। दूसरे गाँव में पहुँचकर उन्होंने देखा कि लोग खेती के साथ-साथ बांस की चीजें भी बनाते थे। उनके हाथों की चाल तेज थी, वे बहुत ध्यान से काम कर रहे थे। मुंगली जी समझ गए कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता, यह मेहनत ही व्यक्ति को सक्षम बनाती है।

इस गाँव में एक छोटी पर बेहद साफ नदी थी, उसका पानी इतना साफ था कि अंदर पत्थर, मछलियां भी साफ दिख रही थीं। 
इस पूरी यात्रा ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया। उन्होंने देखा कि कठिन परिस्थितियों में भी लोग खुश रहते हैं, अपने हालात को स्वीकार करते हैं और मेहनत से जीवन को आगे बढ़ाते हैं।

सियांग के अनुभव और इन गाँवों में बिताए समय से उन्हें एक ही सीख मिल रही थी और वह थी कि मनुष्य को हर परिस्थिति में आगे बढ़ते रहना चाहिए।

वापस लौटते समय, उन्हें वह क्षण याद आ रहा था जब वे नदी के भीतर थे।

जब मुंगली जी अपने कैंप वापस लौटे तो शाम हो चुकी थी। उन्होंने महसूस किया कि आज का दिन उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, आज के दिन उन्हें अपने भविष्य की दिशा दिख रही थी। उन्हें लगा कि इस सम्पूर्ण अनुभव ने उनके मन को और पक्का कर दिया था। वे अब केवल आदेशों के अनुसार नहीं चलना चाहते थे, बल्कि कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे दूसरों का जीवन बेहतर हो। उनका मन शिक्षा और सेवा की ओर स्वाभाविक रूप से खिंच रहा था।

रात को सोते समय उन्होंने सोचा कि सियांग नदी ने जो परिवर्तन शुरू किया था, वह अब पूरी तरह आकार ले चुका है। यह परिवर्तन उन्हें एक नई राह की ओर ले जा रहा है। कुछ दिनों बाद उन्हें नया आदेश मिला कि जल्द ही उन्हें एक अन्य स्थान पर भेजा जाएगा। आदेश सुनते ही मन में हल्का सा खिंचाव महसूस हुआ। अरुणाचल की घाटियाँ अब उन्हें अपनी लगने लगी थीं। 

जब वे अरुणाचल छोड़ने लगे, तो रास्ते के हर मोड़ पर उन्हें लगा कि वे कुछ मूल्यवान छोड़ रहे हैं। यह कोई वस्तु न होकर, उनकी नई समझ और दृष्टि थी।

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