Sunday, November 16, 2025

नौ – मुंगली जी

शिक्षा मिशन का आरंभ: छह बच्चों से हजारों तक की यात्रा

सेना से रिटायरमेंट के बाद जब अधिकांश लोग आरामदायक जीवन की तलाश करते हैं तब मुंगली जी ने शिक्षा का मार्ग चुना। सियांग नदी वाली घटना से मिले अनुभवों और चिंतन ने उन्हें इस दिशा में प्रेरित किया। शिक्षा के क्षेत्र को करियर के लिए चुनना कभी आसान नहीं होता है। इसमें लगातार मेहनत और धैर्य की जरूरत होती है। परिणाम बहुत धीरे दिखाई देते हैं लेकिन स्थायी होते हैं। मुंगली जी इसकी शक्ति को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने व्यक्तिगत सुख का त्याग कर ज्ञान फैलाने का संकल्प लिया। 

छह बच्चों से हुई शुरूआत 

उनके शिक्षा मिशन की शुरुआत बहुत ही साधारण थी। एक किराए के छोटे कमरे में कुछ पुरानी कुर्सियों और केवल छह बच्चों के साथ उन्होंने अपना विद्यालय शुरु किया। बच्चों के लिए लाई गई किताबें पुरानी तो थी पर मुंगली जी का उत्साह और समर्पण ऐसा था कि यह छोटा स्थान भी किसी बड़े संस्थान से कम नहीं लगता था। मुंगली जी को विश्वास था विश्वास था कि शिक्षा का मूल, आलीशान भवनों में न होकर शिक्षक के हृदय में होता है। एक समर्पित शिक्षक से छह बच्चे भी अनगिनत संभावनाओं का द्वार खोल सकते हैं। मुंगली जी इन बच्चों को भविष्य के वृक्षों के बीज की तरह देखते थे और खुद को उनका पोषक मानते थे।

पहले दिन बच्चों को देखकर मुंगली जी का मन स्नेह से भर उठा और उनके प्रति जिम्मेदारी की भावना जाग उठी। उन्होंने बच्चों से कहा कि आप लोगों के लिए यह पढ़ाई साधारण न होकर जीवन बदलने वाली असाधारण यात्रा है। शिक्षा चरित्र बनाती है और मन को शुद्ध करती है, यह आंतरिक शक्ति और विवेक देती है। बच्चे उनकी बातों से प्रभावित हुए और यहीं से स्कूल में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच मजबूत रिश्ते की नींव बनी।

समय के साथ पुणे में स्कूल की चर्चा होने लगी और इस माउथ पब्लिसिटी से वहां बच्चों की संख्या भी बढ़ने लगी। माता-पिता अपने बच्चों के अंदर सकारात्मक बदलाव देखकर खुश होते थे। लोग मुंगली जी के निस्वार्थ समर्पण से प्रभावित हुए, वे समझने लगे कि सच्ची शिक्षा किताबों से ज्यादा शिक्षक के व्यवहार से आती है। मुंगली जी अब लोगों के बीच एक आदर्श बन चुके थे और उनका आकर्षण ही था जो अधिक परिवारों को स्कूल के साथ जोड़ता गया। यह एक ऐसा केंद्र बन गया जहां मानवीय विकास हो रहा था।

मुंगली जी ने बच्चों के चरित्र निर्माण के लिए कुछ नियम बनाए, यह नियम बच्चों के आंतरिक विकास पर केंद्रित थे। समय की पाबंदी को वे सम्मान और नियंत्रण का जरिया मानते थे। मुंगली जी कहते हैं विद्यार्थी जीवन में समय का सदुपयोग ही सफलता की कुंजी है। हर बच्चे की प्रतिभा को पहचानना और निखारना उनका लक्ष्य था। वे किसी भी प्रकार की तुलना को बच्चों के लिए गलत मानते थे और उनका यह मकसद रहता था कि हर बच्चा अपनी पूर्णता की ओर आगे बढ़े। इन मूल्यों से बच्चे आदर्श विद्यार्थी बनने लगे और उनका मन पढ़ाई में भी लगने लगा।

अकादमिक के साथ छात्रों के व्यक्तित्व निर्माण पर भी मुंगली जी का जोर बराबर रहता है। खेल से बच्चे धैर्य, टीम वर्क और निष्पक्षता सीखते हैं और खेल उन्हें शारीरिक और मानसिक संतुलन भी देता है। संस्कारों से सम्मान और करुणा का भाव विकसित होता है। स्कूल में बड़ों के लिए आदर और सेवा की भावना सिखाई जाती है। यह संतुलन विद्यालय को एक आदर्श विद्यालय बनाता है, जिसमें ज्ञान, संस्कार और अनुशासन एक साथ बुने जाते हैं।

कुछ वर्षों में मुंगली जी का यह छोटा विद्यालय एक सम्मानित संस्था बन गया। इसमें पीछे कोई चमत्कार न होकर उनके परिवार की लगातार मेहनत थी। मुंगली जी सुबह सबसे पहले स्कूल आते और कक्षाओं का निरीक्षण करते थे, इसके बाद वह शिक्षकों से छात्रों की प्रगति पर चर्चा भी करते थे।

मुंगली जी के लिए बच्चे को केवल विद्यार्थी नहीं बल्कि भविष्य के निर्माता भी हैं। उनके विद्यालय में छात्रों के बीच अमीरी गरीबी को लेकर कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। संस्था बढ़ने पर भी मुंगली जी का बच्चों के साथ व्यक्तिगत जुड़ाव रहा। उनका मानना है शिक्षक का हृदय बच्चों से जुड़ा रहना चाहिए, इसी से बच्चों को सफलता प्राप्त होगी। मुंगली जी के लिए सफलता जीवन समझना और सही निर्णय लेना है। 

लोगों की नज़र में गिरिजा और स्कूल

सुभाष नामदेव माजिरा: गाँव और स्कूल

सुभाष नामदेव माजिरा बताते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में उनके भुकुम गांव का माहौल अत्यंत सीमित अवसरों और गहरे अविश्वास से भरा था। परिवारों में यह धारणा घर कर गई थी कि उनके बच्चे जीवनभर गांव से बाहर निकलकर कुछ बड़ा हासिल नहीं कर सकते।
बच्चे अक्सर पाँचवीं या सातवीं कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते पढ़ाई छोड़ देते थे और इसका कारण यह था कि बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा के बाद आगे बढ़ने के अवसर बहुत कम थे।

गांव में संस्कृति स्कूल के खुलने के बाद हालात बदलने लगे। विद्यालय के माध्यम से गांव के तीस बच्चों को नौकरी मिली। इससे गांव के परिवारों में शिक्षा को लेकर सकारात्मक सोच विकसित हुई। जिस गाँव में कभी बारहवीं या स्नातक की पढ़ाई की बात करना भी एक दिवास्वप्न सा लगता था, वहाँ अब यह एक यथार्थ बन चुका है।

मुंगली जी की सबसे बड़ी खूबी पर बात करते हुए सुभाष कहते हैं कि मुंगली जी किसी भी बच्चे के माता-पिता को छोटा या हीन महसूस नही कराते हैं। वह सरल बात करते हैं और उनमें किसी भी प्रकार का कोई दिखावा नहीं है।
 मुंगली जी के आचरण से लोगों में यह विश्वास पैदा होने लगा कि यह विद्यालय केवल ईंट-पत्थर की इमारत न होकर एक परिवार है, जिसमें गांव के हर बच्चे और परिवार का स्वागत है।

सुभाष ने बताया कि मुंगली जी गांव में लोगों की समस्या पर सबसे पहले खड़े होते हैं। छात्र की फीस भरने की समस्या हो, किसी परिवार पर आया कोई अप्रत्याशित संकट हो या किसी बच्चे के भविष्य को लेकर कोई गहन असमंजस हो, मुंगली जी बिना किसी अनावश्यक प्रचार के, चुपचाप समाधान ढूंढ लेते है। उनका शांत और प्रभावी हस्तक्षेप हमेशा समस्या को हल करता है।

सुभाष का एक वाक्य मुंगली जी के प्रति गाँव के लोगों के भाव को अत्यंत स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है, वे जहाँ भी रहे, पर गाँव उनकी सोच में हमेशा शामिल रहा। उनका गाँव से हार्दिक जुड़ाव है इसलिए गाँव की कोई भी समस्या उन्हें दूर की बात नहीं लगती है। वे गाँव के रास्तों, पानी की उपलब्धता और बच्चों की शिक्षा की चिंता ऐसे करते हैं, मानो यह सब उनके अपने घर की ही ज़िम्मेदारी हो।

सुभाष बताते हैं कि मुंगली जी किसी भी उपलब्धि का श्रेय कभी अपने ऊपर नहीं लेते हैं। गाँव के लोग कहते हैं कि अगर मुंगली जी ने किसी गरीब परिवार की कोई गुप्त मदद भी की होती है तो वे उसका उल्लेख तक नहीं करते हैं। सुभाष जब भी मुंगली जी से इसकी वजह पूछते हैं तो उनका कहना होता है कि सेवा बताई नहीं जाती, सेवा एक स्वभाव है।


अजीत इंगावले: विद्यालय की नींव और निर्णय

अजीत इंगावले उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिन्होंने 'संस्कृति विद्यालय' की स्थापना के प्रारंभिक और चुनौतीपूर्ण दौर को बहुत करीब से देखा। वह बताते हैं कि स्कूल की शुरुआत का समय आसान नहीं था, स्कूल तब केवल एक विचार था और उस विचार को साकार करने के लिए धैर्य के साथ एक साफ नीयत और मजबूत दिशा-निर्देशक नेतृत्व की भी आवश्यकता थी। 

अजीत बताते हैं कि यही वह समय था जब मुंगली जी की वास्तविक क्षमता के रूप में उनकी नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शिता पूरी तरह से लोगों के सामने आई।

स्कूल के लिए जमीन का चयन और उसकी जाँच, आवश्यक दस्तावेज़ों को पूरा करना, सरकारी अनुमतियाँ प्राप्त करना, विस्तृत योजनाएँ बनाना और इन सबके साथ लोगों का विश्वास जीतना,  ये सारे कार्य मुंगली जी ने बेहद कुशलता के साथ किए। अजीत याद करते हैं कि हर कदम पर कोई न कोई अप्रत्याशित रुकावट आ ही जाती थी पर मुंगली जी इन रुकावटों को कभी बाधा नहीं बनने देते थे।

अजीत कहते हैं कि मैंने मुंगली जी को कभी घबराते नहीं देखा। चाहे समस्या कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वे पहले पूरी स्थिति को अत्यंत शांति से समझते हैं और फिर एक स्पष्ट योजना के साथ आगे बढ़ते हैं।
 किसी भी बैठक में, यदि भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती थी या निर्णय लेना कठिन लगता, तो सभी की निगाहें स्वाभाविक रूप से मुंगली जी की ओर टिक जाती थीं। वे किसी भी बात पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देते थे, मुंगली जी सबसे पहले सबकी बात धैर्यपूर्वक सुनते थे और फिर एक ऐसा समाधान प्रस्तुत करते थे जिसमें सभी को रास्ता दिखाई देता था।।

अजीत आगे बताते हैं कि मुंगली जी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे किसी भी कार्य को जल्दबाजी में नहीं करते हैं। उनका हर कदम सोचा-समझा होता है । 

अजीत ने बताया कि विद्यालय की वित्तीय व्यवस्था, योग्य स्टाफ की खोज और विद्यालय के पूरे ढांचे का निर्माण, मुंगली जी की नजरों के बीच ही हुआ है। 

प्रोफेसर एस. सी. जोशी 

मुंगली जी की जीवनी तैयार करने के इस महत्वपूर्ण क्रम में मेरी बातचीत प्रोफेसर डॉ. एस. सी. जोशी से भी हुई।वह नेशनल डिफेंस एकेडमी, पुणे में प्राचार्य रहने के साथ उत्तरांचल विश्वविद्यालय, देहरादून के कुलपति भी रह चुके हैं।
डॉ. जोशी ने बताया कि उन्हें आज भी वह दृश्य अच्छी तरह याद है जब मुंगली जी पहली बार उनके कार्यालय पहुंचे थे। उनकी आँखों में आत्मविश्वास और चेहरे पर  विनम्र मुस्कान थी। उन्होंने कहा कि मुंगली जी उत्कृष्ट सैन्य नेतृत्व, बेजोड़ प्रशासनिक दक्षता और एक आधुनिक, प्रगतिशील दृष्टिकोण रखते थे। उन्होंने एन.डी.ए. में अपने कार्यकाल के दौरान कार्यप्रणाली को सुव्यवस्थित तो किया ही, साथ में परिसर के सौंदर्यीकरण और संरचनात्मक विकास में भी सार्थक योगदान दिया। उनके कार्यों की एनडीए में आज भी मिसाल दी जाती है। 

डॉ. जोशी के अनुसार, उन्होंने रियल एस्टेट और स्कूल शिक्षा जैसे क्षेत्रों में जिस ईमानदारी, श्रम और दूरदर्शिता से काम किया, वही उनके व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान है।

डॉ. जोशी ने यह भी बताया कि कुमाऊँ जैसे अपने प्रिय पर्वतीय प्रदेश से दूर, पुणे में रहते हुए भी मुंगली जी के दिल में अपने प्रदेश के लिए हमेशा जगह बनी रही। उन्होंने सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में निरंतर सक्रिय भागीदारी रखी और पुणे में कुमाऊँ समुदाय के बीच एक जोड़ने वाले, सशक्त सेतु की तरह कार्य किया। 

डॉ. जोशी ने इस बात पर भी जोर दिया कि मेरे द्वारा लिखी जा रही इस जीवनी का सबसे बड़ा आधार यही होना चाहिए कि मुंगली जी का जीवन केवल उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह चरित्र की गहराई, मानवीय मूल्यों और अटूट सिद्धांतों की एक जीती-जागती मिसाल है।

सूर्यकांत काकड़े का बयान: मानवीय स्पर्श और अदम्य सेवा वाले मुंगली जी

सूर्यकांत काकड़े पुणे के एक अत्यंत प्रतिष्ठित बिल्डर हैं और सेना से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण निर्माण और तकनीकी परियोजनाओं में उन्होंने वर्षों तक कार्य किया है। इन्हीं कार्यों के दौरान उन्हें मुंगली जी को बहुत करीब से देखने, समझने और उनके साथ काम करने का अवसर मिला।

सूर्यकांत कहते हैं कि वह मुंगली जी को एन.डी.ए. के दिनों से ही जानते हैं, उन दिनों वह कर्नल थे। तब से लेकर आज तक, वे मुंगली जी को उसी अनुशासन, ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ जीवन निभाते हुए देखते आए हैं।

काकड़े कहते हैं कि मुंगली जी शुरुआत से ही भीड़ में अलग दिखते थे। उनकी कार्यशैली, सोच और दृष्टिकोण हमेशा ही एक अलग स्तर का रहा। वे अपनी सारी ऊर्जा को पूरी ईमानदारी से वहीं लगाते थे, जहाँ उनकी वास्तविक आवश्यकता होती थी। 

सूर्यकांत काकड़े का मुंगली जी के साथ सबसे गहरा, सबसे मार्मिक और सबसे महत्वपूर्ण अनुभव 422 परिवारों के पुनर्वास से जुड़ा है। वे बताते हैं कि यह कार्य अत्यंत कठिन, अत्यंत संवेदनशील और अविश्वसनीय रूप से जटिल था। इतने बड़े पैमाने पर इतने सारे परिवारों को एक साथ पुनर्स्थापित करना, जमीन, घर, स्कूली व्यवस्था, पीने के पानी की सुविधा, सड़कों का निर्माण और समग्र सामाजिक ढांचे को तैयार करना, कोई साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी। पर मुंगली जी ने इसे केवल एक सरकारी या प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में नहीं लिया। उन्होंने हर परिवार से जुड़े व्यक्तिगत दर्द को समझा। 

स्कूल के बारे में बात करते हुए सूर्यकांत काकड़े कहते हैं कि मुंगली जी ने अपने स्कूल के माध्यम से जिस प्रयोगात्मक शिक्षा का बीड़ा उठाया है, वह अत्यंत सराहनीय है। उन्हें यह देखकर प्रसन्नता होती है कि मुंगली जी के बच्चे भी अपने पिता की तरह ही व्यवहार कुशल और जिम्मेदार हैं।

चंपावत में विकास का सपना और मुंगली जी का प्रभाव

चंपावत में हाल के वर्षों में जिस तरह का एक नया विकास दृष्टिकोण उभर रहा है, उसे कई स्थानीय उद्यमियों और समाजसेवियों ने आगे बढ़ाया है। उनमें नरेंद्र सिंह लडवाल भी शामिल हैं, नरेंद्र सिंह लडवाल बताते हैं कि चंपावत को खेल और पर्यटन के एक नए केंद्र के रूप में विकसित करने का उनका सपना लंबे समय से आकार ले रहा है। आधुनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स बनाने की उनकी योजना भी उसी दिशा का हिस्सा है। इसमें बैडमिंटन, बास्केटबॉल, वॉलीबॉल और फुटबॉल के लिए विशेष सुविधाएँ तैयार की जा रही हैं। कई वर्षों तक यहाँ ऑल इंडिया स्तर का फुटबॉल टूर्नामेंट आयोजित होता रहा, जिसे महामारी के कारण दो वर्ष रोकना पड़ा। अब फिर से इसे बड़े स्वरूप में शुरू करने की तैयारी है ताकि युवा खिलाड़ियों को अवसर मिले और चंपावत की नई पहचान बने।

यह क्षेत्र अपनी ऑर्गेनिक जीवनशैली, पहाड़ी भोजन, पहुँचारी फल, काफल, स्थानीय अनाज, स्वच्छ हवा और ट्रैकिंग से भरपूर प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। नरेंद्र सिंह लडवाल का मानना है कि इस क्षमता को समझने और इसके लिए सही वातावरण बनाने में मुंगली जी की दृष्टि और प्रोत्साहन महत्वपूर्ण रहे। उनका कहना है कि यदि प्रशासन, स्थानीय समुदाय और उद्यमी मिलकर काम करें तो चंपावत आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य, पर्यटन, खेल और प्राकृतिक अनुभवों का केंद्र बन सकता है।

नरेंद्र सिंह लडवाल अपने जीवन अनुभव का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि उनका व्यावसायिक सफर बहुराष्ट्रीय कंपनियों से शुरू हुआ और धीरे-धीरे ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स, शिक्षा, होटल और ऑर्गेनिक उत्पादों तक फैलता गया। वे कहते हैं कि किसी क्षेत्र की उन्नति तभी संभव है जब सफल लोग अपने मूल स्थान के प्रति संवेदनशील रहें। यही विचार उन्हें मुंगली जी के बेहद नज़दीक लाता है।

मुंगली जी से पहली मुलाकात उनके लिए एक विशेष अनुभव रही। उन्होंने मुंगली जी के बारे में कई बार सुना था। मिलने पर उनकी सादगी, लोगों के प्रति सहज स्नेह और कार्य के प्रति दृढ़ निष्ठा ने उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया। नरेंद्र सिंह लडवाल बताते हैं कि मुंगली जी अपनी जड़ों से जुड़े व्यक्ति हैं और अपने क्षेत्र की प्रगति को व्यक्तिगत कर्तव्य मानते हैं।

उनका मानना है कि मुंगली जी ने अनेक पहाड़ी युवाओं को यह विश्वास दिया कि वे चाहे जहाँ भी हों, अपने क्षेत्र के लिए कुछ कर सकते हैं।

स्कूल के छात्रों की नज़र से

स्कूल को समझने के लिए मैंने वहाँ पढ़ने वाले कुछ छात्रों के आलेख स्कूल की मैगजीन ‘अभिव्यक्ति’ से लिए हैं।

अंखिता डोड्डीहल ने अपने अनुभव इस तरह साझा किए हैं –

जब वह अपने स्कूल के दिनों को याद करती है तो सबसे पहले यही सोचती है कि उसके लिए संस्कृति स्कूल का क्या अर्थ है। उसका कहना है कि स्कूल ने उसे जैसा बनाया आज वह वैसी ही है। उसे संस्कृति स्कूल में अपना पहला दिन आज भी याद है। कुछ साल पहले जब वह पहली बार स्कूल पहुँची थी तो उसका मन खुश नहीं था और वह अपने पुराने स्कूल को छोड़ने को तैयार नहीं थी।

लेकिन जैसे ही वह संस्कृति स्कूल में दाखिल हुई और वहां के बच्चों, शिक्षकों और प्रिंसिपल से मिली, उसे महसूस हुआ कि यह अनुभव अच्छा होने वाला है। उसे पूरे वातावरण से सकारात्मकता मिली।

वह संस्कृति स्कूल को एक ऐसी जगह मानती है जो हर साल अलग-अलग स्वभाव और पृष्ठभूमि वाले बच्चों को अपने भीतर लेती है और समय के साथ उन्हें ऐसे व्यक्तित्वों में बदल देती है, जिनमें आत्मविश्वास, अलग पहचान और आगे बढ़ने की इच्छा होती है।
उसके अनुसार, इस स्कूल में गुज़रा हर दिन उसके लिए खास रहा और इन अनुभवों को शब्दों में पूरी तरह बताया नहीं जा सकता।

वह कहती हैं कि स्कूल की गतिविधियाँ और अवसर उसे हमेशा उत्साहित रखते थे। हर गतिविधि में हिस्सा लेने से उसे कुछ नया सीखने का मौका मिलता था। पढ़ाई के साथ सीखने की प्रक्रिया दिलचस्प और उपयोगी थी। उसे लगता था कि स्कूल का हर कोना बच्चों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है।

वह और उसके दोस्त स्कूल के समय को हैप्पी ऑवर्स कहते थे क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ पढ़ाई नहीं था बल्कि उससे कहीं अधिक था।

वह मनिषा मैडम की फिज़िक्स की क्लास कभी नहीं भूलेगी। उन्हें वह सिर्फ एक अच्छी अध्यापिका नहीं बल्कि दूसरी माँ जैसी लगती थीं। मनिषा मैडम पढ़ाने के साथ बच्चों को बेहतर इंसान बनने में भी मदद करती थीं।

अंग्रेज़ी की रोमेलिया मैडम उसे तनाव से राहत देती थीं। वह मैडम को एक ऐसी दोस्त बताती है जिनसे वह किसी भी वक्त बिना झिझक के सलाह ले सकती थी।

केमिस्ट्री की प्रैक्टिकल क्लास अनघा मैडम के साथ हमेशा सीखने वाली और आनंददायक होती थी। वहीं गणित की नेहा मैडम रोज़ नए सवाल देती थीं, जो चुनौतीपूर्ण तो होते थे लेकिन उनका विश्वास और प्रोत्साहन बच्चों को आगे बढ़ाते थे।

वह कहती है कि सोनाली मैडम, महेश सर, सिंधु मैडम और पाटोले सर के साथ खेल-कूद, फोटोग्राफी और अन्य गतिविधियाँ उसके लिए तनाव कम करने का तरीका थीं।

अंत में वह बताती है कि उसके सभी शिक्षक और दोस्त उसके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं और अब रोज़ उन्हें न देख पाने का दुख होता है। उसके अनुसार, इस स्कूल का हिस्सा बनना एक महत्वपूर्ण अनुभव था और यहाँ बिताई गई यादें उसके साथ हमेशा रहेंगी।

प्रेरक व्यक्तित्व से मिलाता संस्कृति 

इसी तरह एक और पूर्व छात्रा उर्जा जॉबनपुत्रा, अभिव्यक्ति में लिखती हैं कि स्कूल जीवन कई छोटे छोटे पलों से बनता है। सुबह जल्दी उठकर सही मोजे मिलाने से लेकर इतिहास की कक्षा में झपकी लेते हुए पकड़े न जाने तक यही सब चीजें मिलकर स्कूल की यादें बनाती हैं। 

हमारा हायर सेकेंडरी का समय संस्कृति स्कूल में दो जून 2014 को शुरू हुआ था। स्कूल का माहौल और प्रिंसिपल देवयानी मुंगली मैडम का स्नेह हमें दो वर्षों तक मिला, यह साल हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और यादगार रहे।

शुरुआत में हमारी कक्षा में केवल दस विद्यार्थी थे। शुरुआत में कोई भी ज्यादा बातें नहीं करता था। धीरे धीरे हम सब एक दूसरे से जुड़ते गए और शिक्षकों से भी नजदीकी बढ़ती गई।

असेंबली में मनिषा नेहेते मैडम हमारी कक्षा अध्यापिका थीं। वे पढ़ाई के साथ अनुशासन भी सिखाती थीं और बच्चों के लिए हमेशा उपलब्ध रहती थीं।

हम सब के बीच का रिश्ता हर दिन मजबूत होता गया। हम सभी एक जैसे यूनिफॉर्म पहनते थे और लड़कियों के लिए रिबन या दो चोटी लगाने का नियम था, जिससे साफ सुथरा और अनुशासित रूप दिखता था। शिक्षक हम सब पर ध्यान देते थे।

हमारा पसंदीदा समय ग्राउंड पर खेलना था। हम बास्केटबॉल और फुटबॉल खेलते थे और कभी भी ग्राउंड जाने का मौका नहीं छोड़ते थे।

शुरुआत में पढ़ाई कठिन लगी लेकिन हर दिन चीजें बेहतर होती गईं। हमारे शिक्षक हर विषय को इस तरह समझाते थे कि धीरे धीरे सब स्पष्ट होता गया। हमारी परीक्षाएं हमारे लिए सीढ़ियों की तरह थीं और हर सफलता के साथ हम एक पायदान ऊपर चढ़ते गए।

हम अपने से छोटे बच्चों के लिए उदाहरण माने जाते थे। आज भी मुझे यह सोचकर आश्चर्य होता है कि क्या वे सच में हमसे प्रेरित होते थे।

एक वर्ष के भीतर ही मुझे हेड गर्ल की जिम्मेदारी दी गई। यह मेरे लिए गर्व और जिम्मेदारी का समय था। इस दौरान मैंने उतार चढ़ाव दोनों देखे लेकिन अनुभव बहुत महत्वपूर्ण रहा। हमें कई प्रेरक व्यक्तित्वों से मिलने का अवसर मिला जिनमें डॉक्टर किरण बेदी, मिस निम्रत कौर और एम्मा डॉसन शामिल थीं। हमें यह अनुभव संस्कृति स्कूल ही दे सकता था।

हमारी फिजिकल एजुकेशन की कक्षाएं खुले मैदान में होती थीं जहाँ हम पक्षियों की आवाजें और हवा में हिलते पेड़ों के बीच पढ़ते थे। नयी ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थी हमारे साथी बन गए और हम सब एक ही बैच की तरह हो गए।

हमने बहुत से प्रोजेक्ट मिलकर किए। हम साथ में लंच शेयर करते थे और मजाक करते थे और इसी तरह दिन बीतता था। वर्ष के अंत में जब हम सब अलग होने वाले थे तब हम सब दुखी थे।

हमने बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में लंबे घंटे लगाए। हमने पूरा प्रयास किया कि जो काम हमने किया वह सबसे अच्छा हो।

हम ब्रेक के बाद कई बार वॉशरूम जाने के बहाने निकलते थे जबकि हमें ऐसा करने से रोका जाता था। हम बारहवीं कक्षा का पहला बैच थे, जिसे स्कूल ने बहुत स्नेह और भरोसे से तैयार किया था। अंतिम तीन महीने परीक्षा की तैयारी, अतिरिक्त कक्षाओं और समय सारणी से भरे हुए थे।

हमारे शिक्षकों ने हमेशा हमारी क्षमताओं को समझा और हमें आगे बढ़ाया। हमने हर विषय का पूरा अनुभव लिया। फिजिक्स के शुरुआती अध्यायों से लेकर केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल्स तक और अध्यापकों की डांट, हमने सब कुछ देखा।

हम रूटीन के इतने आदी हो गए थे कि हम कभी कभी केवल स्कूल आने के लिए ही आ जाते थे क्योंकि हमें स्कूल का माहौल अच्छा लगता था। हम सभी विद्यार्थी उस संस्कृति स्कूल के आभारी हैं जिसने हमें जीवन के दो सबसे अच्छे वर्ष दिए। यह स्कूल हमारे लिए दूसरा घर रहा।

दो वर्षों की यादों में हँसी, पागलपन और आँसू सब शामिल हैं। हमने हर कठिन समय को अपने शिक्षकों की सहायता से पार किया।

कुछ क्षण ऐसे भी आए जिनकी अहमियत उस समय समझ में नहीं आई लेकिन बाद में वे याद बन गए। परिवर्तन हमेशा आता है और हाल ही में जो परिवर्तन हमारे जीवन में आया है, वो ये है कि अब संस्कृति स्कूल हमारे पीछे रह गया है।

हम संस्कृति  परिवार का हिस्सा होने पर गर्व करते हैं और उसे हमेशा याद करते हैं।

संस्कृति स्कूल ने हमें समझा

अभिध्या रामदासी का आलेख भी अभिव्यक्ति में शामिल किया गया है।

 वह कहती हैं संस्कृति स्कूल ही है जिसने मुझे सिर्फ शिक्षा ही नहीं बल्कि उससे भी बहुत अधिक दिया।

मैंने अपने जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण और बदलाव लाने वाले वर्ष इस स्कूल में बिताए। मैंने दसवीं के बाद यहाँ प्रवेश लिया। वही समय होता है जब पढ़ाई, वातावरण, दबाव, मित्र, मार्गदर्शक, शिक्षक और लगभग हर चीज में बड़ा बदलाव आता है। स्कूल में अपने पहले दिन मेरे मन में बहुत चिंता थी लेकिन जैसे ही मैंने संस्कृति में कदम रखा मुझे भरोसा हो गया कि चिंता की कोई बात नहीं है।

हम बारहवीं कक्षा के पहले बैच थे और हमने यहाँ अपने समय का हर एक पल भरपूर जिया और स्कूल ने हमें हर काम में पूरा सहयोग दिया।

हमें सबसे अच्छे शिक्षकों से पढ़ने का अवसर मिला। वे सुनिश्चित करते थे कि हम विषय को समझें और आत्मविश्वास महसूस करें। उन्होंने पूरी मेहनत से हमें हर विषय के साथ सहज बनाया।

 शुरुआत से ही हमारी कक्षा की शिक्षक मनिषा मैडम, अनघा मैडम, रोमेलिया मैडम, नेहा मैडम, खेल शिक्षक सोनाली मैडम और महेश सर हमारे सबसे करीबी दोस्त बन गए। हम अपने लंच का समय उनके साथ बिताते थे और सबकुछ अपने शिक्षकों के साथ बाँटते थे।

 हमारी कक्षा की सभी लड़कियों ने एक दूसरे के साथ अद्भुत दोस्ती बनाई। हम कभी झगड़ते थे, कभी हँसते थे, एक दूसरे के बाल खींचते थे, एक दूसरे के बारे में सबकुछ जानने लगे और पढ़ाई भी साथ की। धीरे धीरे हम एक दूसरे के सबसे अच्छे दोस्त बन गए। मैंने ये दो वर्ष जितना आरामदायक और दोस्ताना माहौल में बिताए वह पहले कभी नहीं हुआ। हमने पढ़ाई के साथ साथ अपनी कक्षा के बच्चों और स्टाफ रूम के शिक्षकों के साथ खूब मस्ती की।

संस्कृति स्कूल ने हमें वह अवसर दिया जिससे हम अपने अंदर की क्षमताओं को सबसे अच्छी तरह विकसित कर सकें। स्कूल ने हम पर पहली नज़र से ही विश्वास किया और हम नए बच्चे बहुत जल्दी इस माहौल में ढल गए। हमें नेतृत्व के अवसर दिए गए और हमारी क्षमताओं पर कभी शक नहीं किया गया। हमें महेश सर का लगातार समर्थन मिलता रहा।

हम सोनाली मैडम के साथ वह खेल खेलते थे, जो हमें पसंद था और उसे आगे बढ़ाते थे। हमें हर इंटर स्कूल प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर मिला, चाहे वह खेल से जुड़ी हो या पढ़ाई से या हमारे शौक से।
मुझे इंटर स्कूल वाद विवाद प्रतियोगिता में संस्कृति स्कूल का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला और मुझे गर्व है कि रोमेलिया मैडम की मदद से मुझे सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुरस्कार मिला।

हमने इंद्रधनुष और कैलिडोस्कोप जैसी इंटर स्कूल सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ आयोजित कीं और विज्ञान मेला भी स्कूल में आयोजित किया। हमने अपनी वार्षिक सभा की तैयारी खुद की और पहाड़ियों पर बढ़ते हुए बारिश की हल्की आवाजों के बीच अपनी कक्षाओं को सजाया। जब हमने कहा कि हम बारिश में खेलना चाहते हैं तो किसी ने रोक नहीं लगाई और हमें अपनी पसंद के खेल चुनने की आज़ादी दी गई।

संस्कृति स्कूल ने हमें समझा और हमें वही बनाने की कोशिश की जो हम थे। वहाँ बच्चों के लिए सालाना यात्राएँ और वार्षिक स्वैच्छिक यात्राएँ होती थीं। हमारे पास सालाना पिकनिक और अन्य गतिविधियाँ भी थीं।

इन सबके बीच हमारे शिक्षकों ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि हमारी पढ़ाई से कोई समझौता न हो। हमें अतिरिक्त व्याख्यान दिए जाते थे। यदि हम में से किसी एक को भी कठिनाई होती थी तो शिक्षकों को समय पर जानकारी दी जाती थी। वे हमेशा साथ खड़े रहते थे। हमारे हर टेस्ट और परीक्षा से पहले वे हमारे साथ होते थे। देवयानी मैडम तो बोर्ड परीक्षा से पहले हमें शुभकामनाएँ देने भी आईं। हमारे प्रोजेक्ट और असाइनमेंट समय पर पूरे हों, इसके लिए भी शिक्षकों ने पूरा सहयोग दिया। उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि हम सही हाथों में हैं।

मैं अपने हृदय की गहराइयों से देवयानी मैडम और नेहा मैडम का आभार व्यक्त करना चाहती हूँ। वे हमारी मजबूती थीं और उन्होंने ही संस्कृति को मेरे लिए दूसरा घर बनाया।

ऐसे अध्यापक कभी नहीं मिले।

अंत में मेरी परितोष बेडेकर का संस्कृति स्कूल को लेकर लिखा व्यक्तिगत अनुभव अभिव्यक्ति से लिया गया है। उन्होंने लिखा है कि संस्कृति स्कूल में बिताए गए दो वर्ष मेरी यादों में हमेशा बसे रहेंगे। इस स्कूल से जुड़ा हर अनुभव मेरे लिए खास रहा। पहली बार मैं मई 2014 में स्कूल देखने गया था। कैंपस की लोकेशन और आसपास का माहौल देखकर मन तुरंत लग गया। शिक्षक और स्टाफ बहुत विनम्र थे। जब देवयानी मैम ने मुझे और मेरी बहन को अपने ऑफिस बुलाकर हालचाल पूछा, तो उस अपनत्व ने मन को छू लिया। लंबे समय बाद नेहा मैम से मिलना भी बेहद सुखद लगा।

मैंने तीन जून को 11वीं कक्षा शुरू की। पहले दिन की सारी घबराहट स्कूल में कदम रखते ही दूर हो गई। बस ड्राइवर नीलेश काका और मनीषा ताई ने मुस्कुराकर स्वागत किया। यह वही स्कूल था जहाँ हर चीज़ समय पर होती थी, हर शिक्षक अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित था और इसी अनुशासन ने मुझे बेहद प्रभावित किया।

संस्कृति से मुझे दो सबसे बड़ी चीज़ें मिलीं, वह थे शिक्षा और दोस्त। मेरी क्लास टीचर मनीषा मैम से बेहतर अध्यापक मुझे कभी नहीं मिला। उनकी लगन, मेहनत और हम विद्यार्थियों के लिए उनका समय देना, सब कुछ यादगार है। हम किसी भी समस्या के साथ उनके पास जाते और वे उसे पूरी निष्ठा से समझकर हल करने में मदद करतीं। मैं हमेशा यह कोशिश करूंगा कि किसी दिन मैं भी उनकी तरह बनने की कोशिश करूँ। मेरे सभी विषय अध्यापक अपने-अपने विषय में पारंगत थे और वे हमेशा किताब से आगे जाकर हमें समझाते थे। साफ़-सुथरी लिखावट, समय पर सबमिशन, अनुशासन, इन छोटी-छोटी आदतों ने मेरे भीतर बहुत सुधार किया। यही शिक्षण शैली मुझे कॉलेज में सबसे ज़्यादा याद आएगी।

दिन के अंत में मुझे सबसे अपने दोस्तों के साथ वक्त बिताना सबसे अच्छा लगता था।

ओंकार और अश्विन के साथ फुटबॉल की बातें, मानस के साथ मज़ाक करना, पार्थ के साथ खेलना, उर्जा से बेकार से बेकार सवाल पूछना, अभिधन्या और अंकिता को चिढ़ाना और याशी–साक्षी को हमेशा पढ़ते हुए देखना। यही स्कूल की सबसे प्यारी यादें बन गईं।

भाभा हाउस का प्रीफेक्ट बनना मेरे लिए बड़ी चुनौती था क्योंकि शुरुआत में मैं उसके सभी सदस्यों को जानता भी नहीं था। लेकिन हमारी हाउस टीचर सुदेशना मैम और बाकी प्रीफेक्ट, इशान और ध्रुव ने मेरा काम आसान कर दिया। देखते ही देखते मेरे कई दोस्त उसी हाउस से बन गए। मार्चपास्ट के दौरान हाउस को लीड करना और स्पोर्ट्स डे पर जिम्मेदारी संभालना मेरे लिए गर्व का क्षण था। इन अनुभवों ने मुझे आत्मविश्वासी बनाया।

खेल की बात करूँ तो अंतर-विद्यालय प्रतियोगिता में स्कूल का प्रतिनिधित्व करना अद्भुत अनुभव था। कोल्हापुर में फुटबॉल टीम के साथ बिताए पाँच दिन तो जैसे जीवन की सबसे यादगार यात्रा थी। अलग-अलग अतिथि वक्ताओं को सुनना और उनसे सीखना भी एक बड़ा अनुभव था। स्कूल के सारे कार्यक्रम अत्यंत समृद्ध और प्रभावी थे।

यहाँ बिताया गया समय मेरे जीवन की सबसे कीमती कमाई है। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो एक भी अप्रिय स्मृति नहीं मिलती। इन दो वर्षों ने मुझे बेहतर इंसान बनाया है। संस्कृति स्कूल ने मुझे न केवल शिक्षा दी बल्कि मेरे व्यक्तित्व को भी आकार दिया।

No comments:

Post a Comment

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...