*मोरी में गुज्जर समुदाय के कुछ परिवार, पशुपालन मुख्य आय और एक सामाजिक नियम है कमाल*
उत्तरकाशी जिले के मोरी ब्लॉक में रास्ते से गुजरते हुए सांद्रा गांव में गुज्जर समुदाय के तीन से चार परिवार रहते हैं. इस डिजिटल दौर में अब गुज्जर भी समाज की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं. उनके कुछ सामाजिक नियम महिलाओं के लिए लाभकारी भी हैं.
*रहन-सहन, आय और शिक्षा*
सांद्रा गांव में सड़क के किनारे तीन - चार गुज्जर परिवार पट्टे पर मिली जमीन में लकड़ी और टिन से बनी झोपड़ियों में रहते हैं, उनके घरों के पास ही पंद्रह से बीस गाय और भैंस बंधी देखी. घर की महिलाओं में से एक जुबैदा बताती हैं कि दूध बेचकर परिवार की आय होती है और दूध नजदीक ही मोरी के बाजार में बिक जाता है. वहीं खड़े कुतुबद्दीन कहते हैं कि अब महीने में आठ से दस हजार रुपए की कमाई वाले दूध के कारोबार पर निर्भर रहना मुश्किल हो रहा है इसलिए वह गाड़ी चलाने का काम भी कर रहे हैं. बाकी कुछ परिवार अब भी सिर्फ पशुपालन पर निर्भर हैं.
पहली पीढ़ी खासकर महिलाएं स्कूल नहीं गईं लेकिन अब बच्चे पढ़ रहे हैं, प्राथमिक स्कूल पास में ही है. जुबैदा ने बताया कि नजदीक गांवों में रहने वाले समुदाय के कुछ लड़के कॉलेज भी पढ़ रहे हैं. आधार और राशन कार्ड सबके बने हैं और वे मोरी पते पर दर्ज हैं.
*स्वास्थ्य सेवाओं की समस्या लेकिन सामाजिक नियम कमाल के*
जुबैदा ने बताया कि उनके समुदाय में स्वास्थ्य सुविधा सीमित है और ज्यादातर प्रसव घरों में होते हैं. माहवारी को लेकर पारंपरिक मान्यताएं अब भी कायम हैं पर यह महिलाओं के लिए फायदे की ही हैं. समुदाय की महिलाओं को माहवारी के दौरान कहीं चार दिन तो कहीं दस-पंद्रह दिन तक सामान्य कामों से दूर रखा जाता है और इस समय खाना भी पुरुष बनाते हैं. परिवार इस अवधि को महिलाओं के आराम करने का समय और जरूरी परंपरा मानते हैं. प्रसव के बाद तो महिलाओं की यह छुट्टी तीस से चालीस दिन लंबी हो जाती है.
कुछ गुज्जर महिलाएं अब सैनिटरी पैड इस्तेमाल करती हैं लेकिन कई अभी भी कपड़ा उपयोग करती हैं. जुबैदा का कहना है कि आंगनवाड़ी से उन्हें न पैड मिलता है और न बच्चों का पोषण राशन. शिकायत करने के बावजूद कोई बदलाव नहीं हुआ है. परिवारों के पास टीवी और फ्रिज नहीं है पर मोबाइल अब लगभग सभी के पास है और युवा व्हाट्सऐप चला लेते हैं. शौचालय पक्का है लेकिन पानी की सुविधा अभी ठीक नहीं है.
*पंचायत सहभागिता और योजनाओं तक पहुंच*
कुतुबद्दीन कहते हैं कि ग्रामसभा की बैठकों में समुदाय की उपस्थिति कम है और इन्हें बैठकों की जानकारी भी नहीं मिलती. पंचायत रजिस्टर में नाम दर्ज होने के बावजूद योजनाओं का लाभ उनके लिए सीमित ही है और सरकारी सुविधाएं कागज तक सीमित हैं.
इसके बावजूद समुदाय को बदलाव महसूस हो रहा है. बच्चों की शिक्षा, मोबाइल तकनीक और सरकारी पहचान पत्रों ने इनके जीवन में नई दिशा दी है. कुतुबद्दीन का मानना है कि अगर योजनाएं जमीन तक पहुंचीं तो आने वाली पीढ़ी का जीवन मौजूदा स्थिति से कहीं बेहतर हो सकता है.
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