*त्यूणी : सीमांत इलाका और धार्मिक पहचान*
देहरादून जिले के सीमांत इलाके त्यूणी में बाजार भले छोटा हो, लेकिन आसपास के 22 से 30 गांवों की ज़रूरतें इसी पर टिकी हैं. हिमाचल की चार से पांच पंचायतों और उत्तराखंड की करीब 26 पंचायतों का आवागमन यहां होता है, इनमें महेंद्रथ, भूटानू, आराकोट गांव शामिल हैं. यहां आने वाले लोग आम पर्यटक नहीं बल्कि मुख्य रूप से महासू देवता के दर्शन के लिए आते हैं, इसलिए व्यापार स्थानीय मांग पर आधारित है.
स्थानीय मान्यता के मुताबिक महासू देवता चार भाई थे और सेडकुलिया महाराज उनके वजीर थे. लोककथाएं और धार्मिक विश्वास आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में प्रमुख हैं.
त्यूणी में नेपाली मूल की आबादी बड़ी है. रैगी ग्रामसभा के रहने वाले किशन प्रसाद पिछले आठ साल से यहां दुकान चला रहे हैं, वह बताते हैं कि उनके पूर्वज 1922 में यहां आए थे और कई पीढ़ियां यहीं बसीं, फिर भी कुछ लोग उन्हें आज भी बाहरी मानते हैं. वह कहते हैं कि कुछ गांवों के मंदिरों में दलित समुदाय का प्रवेश अब भी प्रतिबंधित है, हालांकि नई पीढ़ी इस परंपरा को बदलने की सोच रखती है.
*शिक्षा मौजूद लेकिन उच्च पढ़ाई के लिए देहरादून ही विकल्प*
त्यूणी में सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूल हैं. एक डिग्री कॉलेज भी है, लेकिन बेहतर विकल्पों और संसाधनों की कमी के कारण उच्च शिक्षा के लिए छात्र अब भी देहरादून जाना चुनते हैं. स्थानीय बोली और भाषा अब भी परिवारों में जिंदा है और उसके साथ ही पारंपरिक जीवनशैली भी बनी हुई है.
स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो प्राथमिक उपचार और छोटे ऑपरेशन यहां हो जाते हैं, लेकिन गंभीर बीमारियों में मरीजों को रोड़ू, देहरादून या शिमला भेजना पड़ता है.
*बदलता बाजार और डिजिटल भुगतान की बढ़ती भूमिका*
त्यूणी का बाजार पहले लकड़ी की दुकानों के लिए जाना जाता था. साल 2005 में अग्निकांड में कई दुकानें जलने के बाद बाजार का स्वरूप बदला और अब पक्की दुकानों की संख्या बढ़ गई है.
दो साल से कपड़ों का कारोबार करने वाले मनोज शर्मा कहते हैं कि क्षेत्र में ऑनलाइन शॉपिंग का असर अभी सीमित है, लेकिन यूपीआई भुगतान तेजी से बढ़ा है. त्यूणी का बाजार मछली, सेब और टमाटर के लिए लोकप्रिय है. पास से बहने वाली टौंस और पब्बर नदी की मछली यहां की पहचान मानी जाती है.
*महिलाएं, रोजगार और बदलता सामाजिक ढांचा*
किशन प्रसाद की बेटी भी दुकान में ही थीं, उन्होंने बताया कि त्यूणी में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है. लड़कियां टेलरिंग और हस्तशिल्प सीख रही हैं और एक दुकान में पांच से छह महिलाएं नियमित सिलाई का काम कर रही हैं. उन्होंने आगे बताया कि अब महिलाएं पीरियड्स के दौरान सैनिटरी पैड का इस्तेमाल कर रही हैं. बड़ी उम्र की महिलाएं अभी भी मोबाइल एप और यूपीआई भुगतान का इस्तेमाल कम करती हैं.
यहां कई पारंपरिक मान्यताएं अभी भी कायम हैं. प्रसव के बाद महिलाओं को 22 दिन तक अलग रखने की प्रथा कई घरों में जारी है, लेकिन नई पीढ़ी इसे लेकर सवाल करने लगी है.
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