यात्रा, बाजार और बुनियादी सुविधाओं से जूझता कस्बा
बड़कोट में अस्कोट आराकोट यात्रियों के स्वागत के लिए डाइट में प्रोग्राम रखा गया था। इसी दौरान वहां के बाजार में लोगों से बातचीत हुई।
बड़कोट में अस्पताल मौजूद है और हाल के समय में कुछ जांच सुविधाएं शुरू हुई हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाएं अब भी बेहद कमजोर हैं। गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को देहरादून रेफर किया जाता है और स्थानीय स्तर पर भरोसेमंद इलाज की सुविधा नहीं है।
बड़कोट के व्यापारी राजेश कुमार जैन बताते हैं कि हल्की बीमारी में भी यहां सही इलाज मिलना मुश्किल है। वह अपने अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि पिछले साल उन्हें बुखार हुआ था। यहां दवाइयां चलती रहीं, लेकिन बीमारी ठीक नहीं हुई। बाद में देहरादून जाकर जांच कराई गई तो पता चला कि टाइफाइड नहीं, बल्कि फेफड़ों में संक्रमण था। उनका कहना है कि गलत इलाज से स्थिति और गंभीर हो सकती थी।
राजेश के अनुसार गर्भवती महिलाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है। कई मामलों में महिलाओं को देहरादून रेफर किया जाता है और रास्ते में ही जटिलताएं हो जाती हैं। उनका कहना है कि स्वास्थ्य सुविधा की कमी यहां स्थायी संकट बन चुकी है।
पूरे तहसील का बाजार है बड़कोट
आगे बात करते हुए राजेश बताते हैं कि बड़कोट केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र का मुख्य बाजार है। बड़कोट तहसील के अंतर्गत आने वाले सौ से अधिक गांवों के लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए यहीं आते हैं। यमुनोत्री क्षेत्र तक के गांवों की निर्भरता बड़कोट बाजार पर है।
उनका कहना है कि छोटे गांवों में दुकानें जरूर खुली हैं, लेकिन असली खरीदारी आज भी बड़कोट से ही होती है। इसी वजह से बड़कोट का बाजार पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।
यात्रा सीजन और चौपट होता कारोबार
राजेश कुमार ने बताया कि बड़कोट का व्यापार मुख्य रूप से तीर्थ यात्रा पर निर्भर है। यात्रा सीजन में लाखों श्रद्धालु आते हैं और होटल, दुकानें, ढाबे सभी चलते हैं। लेकिन इस बार हालात पूरी तरह बदल गए।
उनके अनुसार यात्रा को जिस तरह नियंत्रित किया गया, उससे बड़कोट का कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ। जिन यात्रियों की बुकिंग बड़कोट में थी, वे दो तीन दिन बाद यहां पहुंचे या बीच रास्ते से लौट गए। होटल, दुकानें और लीज पर ली गई जमीनें घाटे में चली गईं।
राजेश कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा हाल पहले कभी नहीं देखा। उनका कहना है कि इस बार व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ और बाजार पूरी तरह बैठ गया।
जांच चौकियों से बना डर का माहौल
राजेश ने बताया कि हरिद्वार से लेकर यमुनोत्री तक यात्रियों को कई स्थानों पर रोका गया। पहचान पत्र और कागजों की बार बार जांच से यात्रियों में डर पैदा हुआ।
उनका कहना है कि कई यात्रियों ने यह सवाल करना शुरू कर दिया कि क्या यमुनोत्री जाने के लिए भी किसी तरह की अनुमति चाहिए। इस डर का सबसे ज्यादा नुकसान बड़कोट जैसे पड़ाव कस्बों को हुआ, जहां यात्री रुकते, खरीदारी करते और स्थानीय लोगों की आजीविका चलती थी।
पानी और सड़क, वर्षों पुरानी समस्याएं
बड़कोट में पानी की समस्या भी लंबे समय से बनी हुई है। राजाराम जगूड़ी के अनुसार पंपिंग योजना की मांग वर्षों पुरानी है। जमीन का मुआवजा बढ़ चुका है और पत्राचार भी हुआ है, लेकिन काम आज तक शुरू नहीं हो पाया।
यमुनोत्री जैसे विश्व प्रसिद्ध धाम की ओर जाने वाली सड़क की हालत को लेकर भी स्थानीय लोग नाराज हैं। उनका कहना है कि खराब सड़कें पहली बार आने वाले यात्रियों पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं और पूरे क्षेत्र की छवि प्रभावित होती है।
शिक्षा और स्वास्थ्य में पहाड़ और मैदान का फर्क
राजेश कहते हैं कि क्षेत्र में स्कूल और कॉलेज तो हैं, लेकिन व्यवस्थाएं कमजोर हैं। कहीं शिक्षक ज्यादा हैं और बच्चे कम, तो कहीं बच्चे ज्यादा और शिक्षक कम। पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है।
स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी यही स्थिति है। उनका कहना है कि मैदानी इलाकों की तुलना में पहाड़ में आज भी बुनियादी सुविधाएं न के बराबर हैं और यही असमानता लोगों की सबसे बड़ी पीड़ा है।
बड़कोट की स्थिति, पूरे उत्तराखंड का सवाल
राजेश का कहना है कि बड़कोट की स्थिति केवल एक कस्बे की कहानी नहीं है। यह गढ़वाल और पूरे उत्तराखंड के उन इलाकों की तस्वीर है, जहां यात्रा, बाजार, स्वास्थ्य और शिक्षा एक दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।
लोगों को उम्मीद थी कि उत्तराखंड बनने के बाद हालात सुधरेंगे, लेकिन आज कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या सच में उनकी जिंदगी आसान हुई है। बड़कोट बाजार में बैठा हर व्यक्ति यही कहता है कि समस्या केवल यात्रा की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की है।
मंजियाली गांव : पानी, बसावट और खेती के संघर्ष
पानी की कमी से शुरू हुई बसावट
उत्तरकाशी जिले के रवाईं क्षेत्र की मुंगरसन्ती पट्टी में स्थित मंजियाली गांव जिला मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूर है। बड़कोट से हम जब वहां पहुंचे तो गांव के प्रधान प्रकाश रावत मिले। वह बताते हैं कि वे मूल रूप से बिल्ला गांव के रहने वाले हैं, जहां पानी की भारी कमी थी। मौजूदा मंजियाली क्षेत्र में पहले गौशाला थी और लोग सर्दियों में यहां मवेशियों के साथ आते थे। धीरे-धीरे, लगभग एक पीढ़ी पहले, लोग यहीं स्थायी रूप से बस गए। गांव के पास यमुना और कमल नदी बराबर में बहती हैं, लेकिन इसके बावजूद गांव में आज तक कोई नौला नहीं है।
प्रशासन, आबादी और सामाजिक संरचना
मंजियाली गांव बड़कोट तहसील के अंतर्गत आता है, पोस्ट ऑफिस गांव से 2 किलोमीटर दूर है, एसबीआई नौगांव में है और बड़कोट तहसील 6 किलोमीटर दूर पड़ती है। गांव में जियो और एयरटेल नेटवर्क काम करता है। यहां 165 परिवार रहते हैं और कुल जनसंख्या लगभग तेरह सौ बताई जाती है। रावत, राणा, चौहान, कोहली, लाल, आर्य और कुमार समुदाय के लोग यहां रहते हैं। आबादी में लगभग 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग और शेष ओबीसी व अन्य वर्ग हैं। दलित परिवार मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं।
जंगल, जमीन और खेती की तस्वीर
गांव की वन पंचायत में आठ सदस्य हैं और रिज़र्व जंगल से लकड़ी मिलती है। बंजर भूमि ज्यादा है, फिर भी खेती होती है। यहां मटर, टमाटर, बीन्स, मंडुआ, गेहूं, झंगोरा, धान, आलू, प्याज, मक्का, चौलाई, राजमा, मसूर और तौर उगाए जाते हैं। गाय, भैंस, बकरी, खच्चर और घोड़े पाले जाते हैं और लगभग सभी परिवारों के पास अपनी जमीन है। इस क्षेत्र को रवाईं इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां लंबे समय तक हिमाचल के राजा शासन करते रहे।
सरकारी योजनाएं, शराब और महिला आंदोलन
गांव में 45 से 50 लोग सरकारी नौकरी में हैं। लोग ऑनलाइन बैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं और किसान सम्मान निधि, मनरेगा, उज्ज्वला और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। इसके साथ ही गांव में शराब का चलन भी ज्यादा बताया जाता है। इसके खिलाफ महिलाओं का आंदोलन लंबे समय से चलता आ रहा है। ग्रामीण बताते हैं कि साल 2004–05 में महिलाओं ने शराब के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया था, जिसकी याद आज भी गांव में बनी हुई है।
सूर्य मंदिर और खेती का मौजूदा संकट
मंजियाली गांव में सूर्य देव का एक मंदिर है, लेकिन इसका कोई लिखित इतिहास कहीं दर्ज नहीं है। ग्रामीण चाहते हैं कि इसका संरक्षण हो, ताकि पर्यटन के रूप में गांव को नया सहारा मिल सके। खेती की मौजूदा हालत रवींद्र कुमार की कहानी में दिखती है। उन्होंने बड़कोट के श्रीदेव सुमन कॉलेज से पढ़ाई की और एयरफोर्स में चयन भी हुआ था, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे नहीं जा सके। अब वे खेती करते हैं। इस साल बारिश की कमी से टमाटर की पैदावार में लगभग 40–50 प्रतिशत गिरावट आई है। आधुनिक मशीनें मौजूद हैं, लेकिन खेतों तक रास्ते न होने के कारण आज भी कई जगह बैलों से खेती करनी पड़ती है।
जंगल, पानी और लोग : डख्याट से ठडुंग तक पहाड़ की जमीनी कहानी
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में जंगल और पानी का रिश्ता सिर्फ पर्यावरण का नहीं, जीवन का सवाल है। उत्तरकाशी जिले के डख्याट गांव से लेकर बड़कोट क्षेत्र के ठडुंग तक लोगों के साथ हुई बातचीत यही बताती है कि जहां जंगल पर स्थानीय समुदाय का अधिकार और जिम्मेदारी है, वहां पानी, खेती और जीवन की निरंतरता बनी रहती है। इन गांवों में जंगल की रक्षा कानून से नहीं, समझ और जरूरत से होती है। डख्याट के बारे में नंदगांव में सिद्धांत बिष्ट से सुना था तो समय निकाल कर डख्याट पहुंच कर सिद्धांत के परिचित से मुलाकात की।
डख्याट : जंगल पर ग्रामीणों का अधिकार, पानी की सुरक्षा की बुनियाद
डख्याट गांव में खेती करने वाले खेमराज सिंह ज्याड़ा बताते हैं कि गांव के जंगल पर पूरा अधिकार ग्रामीणों का है। यहां ग्राम वन पंचायत व्यवस्था लागू है और वन पंचायत समिति का सरपंच पांच साल के लिए चुना जाता है। यह चुनाव प्रशासनिक अधिकारियों की देखरेख में होता है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है।
खेमराज बताते हैं कि पिछले एक दो साल की गर्मियों में जब बड़कोट और आसपास के इलाकों में पानी की भारी किल्लत रही, तब भी डख्याट के चार पानी के स्रोत सूखे नहीं। आसपास के गांवों के लोग भी यहां से पानी लेने आए। वह कहते हैं कि पिछली गर्मी में जहां पहाड़ के कई इलाकों में लोग रजाई छोड़ चुके थे, वहीं डख्याट में रात को रजाई ओढ़नी पड़ती है। इसका कारण घना और सुरक्षित जंगल है।
रात बारह बजे भी आग बुझाने निकलते हैं ग्रामीण
डख्याट में जंगल से लकड़ी काटना और चारा पत्ती लेना पूरी तरह प्रतिबंधित है। हर पांच साल में वन पंचायत समिति की निगरानी में सीमित काट छांट की जाती है। खेमराज कहते हैं कि अगर जंगल में रात के बारह बजे भी आग लगती है तो गांव के लोग उसे बुझाने निकल जाते हैं। उनके अनुसार जब जंगल सरकार के अधीन होता है तो लोग उसे अपना नहीं मानते, लेकिन जब जंगल गांव का होता है तो हर व्यक्ति उसकी रक्षा करता है।
डख्याट का अनुभव दिखाता है कि जंगल माइक्रोक्लाइमेट बनाता है। वह तापमान को नियंत्रित करता है, नमी बनाए रखता है और पानी के स्रोतों को जीवित रखता है।
ठडुंग : जंगल देता है पानी, गांव करता है सुरक्षा
बड़कोट क्षेत्र के ठडुंग गांव में भी जंगल और पानी का रिश्ता साफ दिखाई देता है। बड़कोट से आगे निकलने के बाद गांव में मिले जगमोहन सिंह राणा बताते हैं कि ठडुंग लाल धान की खेती के लिए जाना जाता है और इसकी वजह गांव में उपलब्ध पानी का स्रोत है। गांव के ठीक ऊपर बांझ यानी ओक के पेड़ों का घना जंगल है, जिसकी ग्रामीण पूरी तरह सुरक्षा करते हैं।
जगमोहन के अनुसार गांव में सात–आठ लोगों की एक स्थायी टीम बनाई गई है, जो जंगल में आग लगने की स्थिति में वन विभाग के साथ मिलकर आग बुझाने का काम करती है। यह कोई अस्थायी व्यवस्था नहीं है, बल्कि नियमित निगरानी की एक प्रणाली है और सरकार व समुदाय के सहयोग का उदाहरण भी है।
बांझ का जंगल और खेती का सीधा रिश्ता
जगमोहन बताते हैं कि बांझ के जंगल और पानी के बीच सीधा संबंध है। बांझ के पेड़ों की जड़ें गहरी होती हैं और उनकी घनी छतरी मिट्टी और नमी को बनाए रखती है। यही जंगल पानी को धीरे धीरे छोड़ता है, जिससे नीचे खेती संभव हो पाती है।
ठडुंग में उगाया जाने वाला लाल धान पहाड़ की पारंपरिक फसल है, जिसके लिए अच्छी सिंचाई जरूरी होती है। गांव की खेती पूरी तरह ऊपर के जंगल से आने वाले पानी पर निर्भर है। जंगल कमजोर होगा तो पानी और खेती दोनों पर असर पड़ेगा।
शिक्षा, बच्चे और भविष्य के सपने
ठडुंग गांव में प्राथमिक स्कूल है, जबकि आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को पास के हुडोली जाना पड़ता है। गांव की रहने वाली आरुषि आठवीं कक्षा में पढ़ती है और हुडोली के इंटर कॉलेज में पढ़ाई कर रही है। वह बताती है कि स्कूल में सभी विषयों के शिक्षक हैं और करीब 300 बच्चे पढ़ते हैं। आसपास के चार गांवों से बच्चे यहां पढ़ने आते हैं।
आरुषि का सपना है कि वह बड़ी होकर पुलिस अफसर बने। उसके पिता किसान हैं और परिवार खेती पर निर्भर है। जमीन से खाने भर का अनाज हो जाता है, लेकिन बाजार में बेचने लायक उत्पादन नहीं हो पाता। परिवार में पांच भाई बहन हैं और सभी पढ़ाई कर रहे हैं।
खेती, आजीविका और पलायन
जगमोहन ने बताया कि ठडुंग में धान, दालें, राजमा और सब्जियां उगाई जाती हैं। खेती से बहुत अधिक कमाई नहीं होती, लेकिन गुजारा निकल जाता है। कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ कभी कभार मिल जाता है, लेकिन गांव की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार खेती ही है।
गांव वालों के अनुसार ठडुंग की आबादी करीब 800 से 900 के बीच है और परिवारों की संख्या 150 से 200 के आसपास है। पढ़ाई के लिए बच्चे बाहर जाते हैं, लेकिन परिवार स्थायी रूप से गांव छोड़कर नहीं जाते। यही वजह है कि यहां बड़े पैमाने पर पलायन नहीं दिखता।
जंगल क्यों बचता है
डख्याट और ठडुंग दोनों गांवों की कहानी एक ही बात कहती है। जंगल की रक्षा केवल कानून से नहीं होती। जंगल इसलिए बचता है क्योंकि लोग जानते हैं कि जंगल उनके जीवन का आधार है। जंगल पानी देता है, ठंडक देता है, खेती को सहारा देता है और आजीविका से जुड़ा है।
यही वजह है कि जहां जंगल पर समुदाय का अधिकार और जिम्मेदारी होती है, वहां लोग आधी रात को भी आग बुझाने निकलते हैं और जंगल को बचाए रखते हैं।
महरगांव : जब बेटी के पीरियड्स पर जशोदा ने पूरे परिवार को खिलाया
परंपरा और बदलाव के बीच खड़ा एक पहाड़ी गांव
महरगांव की जशोदा ने अपनी बेटी के पहली बार पीरियड्स आने पर पूरे परिवार को भोजन कराया। गांव में जहां आज भी पीरियड्स के दौरान अलग रहने और रसोई से दूर रखने की परंपरा है, वहां जशोदा का यह कदम बदलाव की एक साफ़ तस्वीर पेश करता है। यही बदलाव, पानी, खेती, महिलाओं और सामाजिक संरचना के बीच महरगांव की असली कहानी कहता है।
जंगल से पानी, खेतों तक नालियां और सामूहिक जिम्मेदारी
महरगांव में पानी के प्राकृतिक स्रोत से खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए नालियां बनाई गई हैं। घरों तक पानी पहुंचाने के लिए स्रोत पर सीमेंट की टंकी बनाई गई है, जिससे पाइपलाइन के जरिए पानी सप्लाई होती है। गांव के ऊपर बांझ का जंगल है और यहीं से पानी का स्रोत आता है। गांव की युवती भारती पंवार बताती हैं कि जंगल में आग लगने पर गांव के दस–पंद्रह लोग झाड़ियों की मदद से आग बुझाने जाते हैं। इसे गांव वाले अपनी सामूहिक जिम्मेदारी मानते हैं।
आबादी, शिक्षा और नए मौके
महरगांव में करीब 90 परिवार रहते हैं और आबादी लगभग 800 है। गांव में करीब दस प्रतिशत लोग सरकारी नौकरी में हैं। भारती कहती हैं कि लड़कियां स्कूल जाती हैं और पढ़ाई में बराबरी देखी जाती है। पढ़ाई के लिए डिग्री कॉलेज पुरोला और बड़कोट अहम केंद्र हैं। गांव की एक लड़की और एक लड़का वायरलेस में चयनित हुए हैं।
यात्रियों का स्वागत करने वाले और साथ ही उनके हाथों अपनी किताबों का विमोचन करवाने वाले महावीर सिंह रवॉल्टा ने रवॉल्टी भाषा में लेखन के जरिए इस क्षेत्र में खास पहचान बनाई है और अपने उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में पहाड़ का दर्द उठाया है।
खेती, लाल चावल और बदलता श्रम-संस्कृति
गांव में आलू, मटर, मंडुआ, लाल चावल, गेहूं और सोयाबीन की खेती होती है। भारती पंवार ने बताया कि आलू और मटर हिमाचल के व्यापारी ले जाते हैं। लाल चावल के लिए यह इलाका मशहूर है, यह आसपास के इलाकों में 120 रुपये किलो तक बिकता है और बाहर जाकर 200 रुपये किलो से ज्यादा में बेचा जाता है। खेती में गोबर, चारे और पत्तियों से बनी खाद का ज्यादा इस्तेमाल होता है। नई बहुएं अब खेती का काम पहले से कम करती हैं और उन पर सास का पहले जैसा दबाव नहीं है। भारती के साथ बैठे उनके परिवार के सदस्य कहते हैं कि इस साल न बर्फ पड़ी और न पहले जैसी ठंड रही।
समूह, बैंकिंग और महिलाओं की भागीदारी
गांव में दस स्वयं सहायता समूह हैं। इन समूहों से महिलाओं को दो प्रतिशत ब्याज पर बैंक कर्ज मिलता है। महावीर सिंह रवॉल्टा के घर यात्रियों से मिलने आई गांव की महिलाओं ने बताया कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने सिलाई मशीन और आटा पीसने की मशीनें ली हैं। हर दस समूहों पर एक सक्रिय महिला होती है, जो फील्ड में जाकर लोगों को जोड़ती है। जनधन खातों से गांव को फायदा मिला है। महिलाओं के पास एंड्रॉयड फोन हैं और वे फेसबुक व व्हाट्सएप का इस्तेमाल करती हैं, हालांकि बैंकिंग और स्किल इंडिया जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की जानकारी अब भी सीमित है।
स्वास्थ्य, पीरियड्स और सामाजिक व्यवहार
स्वास्थ्य के लिए गांव पुरोला अस्पताल पर निर्भर है, जो करीब 9 किलोमीटर दूर है। भारती पंवार के हाथ में गुड़ाई के दौरान कट लगने पर उन्हें वहीं इलाज कराना पड़ा। देहरादून नजदीक होने की वजह से डिलीवरी के दौरान महिलाओं की मौत के मामले कम बताए जाते हैं। गांव में पीरियड्स के दौरान चार दिन अलग रहने की परंपरा है, हालांकि टॉयलेट वही इस्तेमाल होता है। कुछ परिवारों में 21 दिन तक अलग बिस्तर और रसोई से दूरी भी देखी जाती है। महिलाओं ने मेंस्ट्रुअल कप के बारे में नहीं सुना है, जबकि लड़कियों ने सोशल मीडिया और टीवी से इसकी जानकारी पाई है। हमें भारती ने जशोदा के बारे में बताया, जशोदा ने अपनी बेटी के पीरियड्स शुरू होने पर पूरे गांव को खाना खिलाया था। यह एक बहुत बड़ा सामाजिक बदलाव है।
जातीय संरचना, परंपराएं और देवी का मेला
महरगांव में तीन–चार अनुसूचित जाति के परिवार हैं, जिनके अपने मकान और जमीन हैं। स्कूलों में भेदभाव की बात सामने नहीं आती। गांव में राणा, रावत, पंवार, भट्ट, बहुगुणा, नौटियाल, ठाकुर और ब्राह्मण रहते हैं। पहले यहां रावत रहते थे, बाद में अन्य जातियां भी बसीं। छानियों में रहने वाले लोगों को पहले ‘मर’ कहा जाता था, जब सब यहीं बस गए तो गांव महरगांव कहलाया। यहां माता राजराजेश्वरी का मंदिर है, जिनके पुजारी उनियाल होते हैं। हर साल 5 सितंबर को देवी का मेला लगता है और देवी की डोली महरगांव, उदकोटी और बैंणा के हर घर में जाती है।
बुठोत्रा गांव : खेती, परंपरा और डेमोग्राफिक बदलाव के बीच पहाड़ का यथार्थ
मोरी क्षेत्र से आगे नदी के दूसरी ओर स्थित बुठोत्रा गांव पूरी घाटी में बंगाण क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है। गांव के लोग बताते हैं कि आसपास के गांवों में रीति रिवाज और सामाजिक जीवन लगभग एक जैसा है। बुठोत्रा की आबादी करीब डेढ़ सौ से दो सौ के बीच मानी जाती है और गांव के साथ जुड़ी कई थलियां भी हैं।
यहां थलियां गांव से अलग खेतों और जंगलों के पास बनी छोटी बस्तियों को कहा जाता है, जहां पहले लोग खेती और पशुपालन के लिए रहते थे। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बुठोत्रा की कुछ थलियां अब पूरी तरह खाली हो चुकी हैं। जिन जगहों पर कभी घर और खेत थे, वहां अब सूखे ढांचे और उजड़ी जमीन दिखती है। लोग धीरे धीरे नीचे की ओर या बाहर बसते चले गए। खूनीगाड़ से यह गांव सड़क के दाहिनी तरफ ऊपर दिखता है, मेरे जोर देने पर वरिष्ठ सहयात्री प्रीति थपलियाल और चंद्रा भंडारी वहां चलने को राजी हो गए।
खेती, लाल चावल और गुजारे की अर्थव्यवस्था
बुठोत्रा गांव में लाल चावल, धान, गेहूं और सेब की खेती होती है। खेती ही यहां आजीविका का मुख्य आधार है, लेकिन इससे केवल गुजारे भर की आमदनी हो पाती है। ग्रामीण बताते हैं कि साल भर का खर्च खेती से निकल पाना मुश्किल होता है। इसी वजह से कई परिवार मजदूरी, छोटे निजी काम या बाहर जाकर काम करने पर निर्भर हो गए हैं।
दिलीप कुमार की बातों में सामाजिक बदलाव
गांव में बातचीत के दौरान स्थानीय निवासी दिलीप कुमार बताते हैं कि पहले गांव में छुआछूत और सामाजिक भेदभाव ज्यादा था। समय के साथ इसमें काफी कमी आई है। युवाओं में यह लगभग खत्म हो चुका है, हालांकि बुजुर्ग पीढ़ी में इसके कुछ अवशेष अब भी दिखाई देते हैं।
दिलीप कुमार के अनुसार अब मंदिर, पूजा या देवी देवता के नाम पर खुले तौर पर भेदभाव नहीं होता। मान्यताएं आज भी हैं, लेकिन पहले जैसी सख्ती नहीं रही। गांव का सामाजिक जीवन अब भी सामूहिकता पर टिका है।
युवा, शिक्षा और बाहर जाने की मजबूरी
बुठोत्रा गांव में युवाओं की संख्या लगभग पैंतीस से चालीस के बीच बताई जाती है। इंटरमीडिएट के बाद लगभग सभी युवा पढ़ाई या काम के लिए बाहर चले जाते हैं। गांव में उच्च शिक्षा के साधन नहीं हैं, इसलिए बाहर जाना मजबूरी बन गया है।
कुछ युवा प्रतियोगी परीक्षाओं और पीए जैसी सेवाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन गांव से अब तक बड़े पदों पर चयन बहुत कम हुआ है। लड़कियां भी अब पढ़ाई कर रही हैं और परिवार उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
महिलाएं, परंपरा और स्वास्थ्य की चुनौती
गांव में महिलाओं को लेकर पारंपरिक मान्यताएं अब भी मौजूद हैं। दिलीप कुमार बताते हैं कि माहवारी और गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को कुछ समय के लिए पूजा पाठ से अलग रखा जाता है। हालांकि अब इसमें पहले जैसी कठोरता नहीं रही।
स्वास्थ्य सुविधाएं बुठोत्रा गांव की बड़ी चिंता हैं। गंभीर बीमारी या गर्भावस्था में जटिलता होने पर महिलाओं को बाहर के अस्पतालों में ले जाना पड़ता है। दूरी, समय और संसाधनों की कमी कई बार जोखिम बढ़ा देती है।
खेल, टूर्नामेंट और गांव की एकजुटता
बुठोत्रा गांव में एक पुराना खेल टूर्नामेंट भी आयोजित होता है, जिसमें आसपास के कई गांव शामिल होते हैं। यह आयोजन एक कमेटी द्वारा किया जाता है और इसमें करीब एक लाख रुपये तक का पुरस्कार रखा जाता है। हिमाचल से भी टीमें आती हैं और कबड्डी जैसे पारंपरिक खेल खेले जाते हैं।
खेल मैदान पूरी तरह समतल नहीं हैं, लेकिन फिर भी खेल गतिविधियां गांव के सामाजिक जीवन को जोड़ने का काम करती हैं।
डेमोग्राफिक चेंज और बाहरी बसावट की चिंता
बुठोत्रा गांव में अब एक नई चिंता उभर रही है, जिसे ग्रामीण डेमोग्राफिक चेंज के रूप में देखते हैं। गांव के लोग बताते हैं कि आसपास के इलाकों में धीरे धीरे बाहरी लोग बसने लगे हैं। शुरुआत में एक दो परिवार आते हैं, फिर उनके रिश्तेदार भी आने लगते हैं और धीरे धीरे छोटी बस्तियां फैलने लगती हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि कई जगहों पर सरकारी या वन भूमि पर अस्थायी डेरों के जरिए बसावट शुरू होती है। समय बीतने के साथ यही डेरें स्थायी घरों में बदल जाती हैं। प्रशासनिक ढील और अधिकारियों के तबादलों का फायदा उठाकर अतिक्रमण बढ़ता चला जाता है।
गांव के बुजुर्ग मानते हैं कि अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में यह बदलाव बुठोत्रा और आसपास के गांवों के सामाजिक संतुलन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
बदलता गांव, बची हुई पहचान
बुठोत्रा गांव की कहानी उस पहाड़ की कहानी है, जहां परंपरा और बदलाव साथ साथ चल रहे हैं। छुआछूत और सामाजिक भेदभाव कमजोर पड़े हैं, शिक्षा की चाह बढ़ी है, लेकिन रोजगार, स्वास्थ्य और डेमोग्राफिक बदलाव जैसी समस्याएं अब भी जस की तस हैं।
ग्रामीण मानते हैं कि बदलाव जरूरी है, लेकिन खेती, थलियां, संस्कृति और सामूहिक जीवन ही आज भी बुठोत्रा की असली पहचान है।
हनोल : महासू देवता की लोककथा, माली परंपरा और जौनसार-बावर की जीवित आस्था
कश्मीर से हनोल तक फैली महासू देवता की कथा, जिसे लोग आज भी जीते हैं
यात्रा में आगे बढ़ते हुए एक मुख्य पड़ाव हनोल मंदिर में हमारी मुलाकात मुकेश नेगी से हुई, वह मंदिर में ही रहते हैं और वहां से जुड़ी परंपराओं को जानते हैं। मुकेश नेगी बताते हैं कि हनोल मंदिर और महासू देवता का इतिहास उन्होंने भी अपने पुराने लोगों से सुना है और यही कथा पीढ़ियों से यहां सुनाई जाती रही है। लोकमान्यता के अनुसार महासू देवता चार हैं और वे कश्मीर से यहां आए थे। जौनसार-बावर क्षेत्र में महासू देवता को न्याय और संरक्षण के देवता के रूप में पूजा जाता है और हनोल उनका प्रमुख धाम माना जाता है। हनोल मंदिर पुरातत्व विभाग के अंतर्गत संरक्षित है।
किरमिर राक्षस, ब्राह्मण परिवार और महासू का आह्वान
मुकेश नेगी बताते हैं कि लोककथा के अनुसार पुराने समय में किरमिर नाम का एक राक्षस था, जो आज के महेंद्रथ की जगह स्थित गांव में आया था। उस गांव में हुना भाट नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसके सात बेटे थे। गांव वालों ने राक्षस से कहा कि वे उसे हर हफ्ते खाने के लिए देंगे और बदले में वह एक ही जगह रहेगा। इसी दौरान राक्षस ने ब्राह्मण के छह बेटों को खा लिया। यह इलाका पब्बर नदी के किनारे बताया जाता है। एक दिन जब ब्राह्मण की पत्नी नदी के किनारे मिट्टी के बर्तन में पानी भर रही थी, तो पानी की आवाज सुनकर राक्षस ने नदी से बाहर हाथ निकालकर उसे खाने की कोशिश की। उसी समय उसके मुंह से अनायास ही “हे महासू” निकला।
महासू देवता का प्रकट होना और चार महाराजों की कथा
लोकमान्यता के अनुसार महासू देवता 64 देवियों और 52 वीरों के साथ चलते हैं। इनमें सबसे बड़े शडकुलिया महाराज ने ब्राह्मण की पत्नी की रक्षा की और कहा कि यदि राक्षस से बचना है तो महासू देवता को कश्मीर से यहां लाना होगा। घर लौटकर ब्राह्मण की पत्नी ने यह बात अपने पति को बताई और हुना भाट कश्मीर गए। वहां उन्होंने पानी के माध्यम से महाराज को बुलाकर सारी बात बताई। महाराज ने कहा कि तुम जाओ, हम आ जाएंगे। इसके बाद महाराज ने ब्राह्मण के गले में माला डाली और लोककथा के अनुसार वह ब्राह्मण तुरंत सैकड़ों किलोमीटर दूर हनोल पहुंच गया।
सोने-चांदी का हल, घायल देवता और चालदा महाराज
मुकेश नेगी बताते हैं कि महाराज ने कहा था कि सोने और चांदी का हल बनाया जाए और उनके लिए पकवान बनाए जाएं, तभी वे बाहर निकलेंगे। पकवान बनते समय राक्षस वहां आ गया और डर के कारण ब्राह्मण ने एक दिन पहले ही हल लगा दिया। सबसे पहले महेंद्रथ में बाशिक महाराज निकले, जिनका कान कट गया। इसके बाद बोठा महासू निकले और हल उनके पैर और आंख में लग गया, जिससे वे वहीं बैठ गए। तीसरी लकीर में पवासी महाराज निकले, जिनकी कोख फट गई। सबसे छोटे चालदा महाराज हस्तलेखन विद्या और कला जानते थे। उन्हें पता था कि समय अनुकूल नहीं है, इसलिए वे हल के पीछे से निकले और उन्हें कोई चोट नहीं आई। बाहर आते ही चालदा महाराज ने राक्षस का वध किया। लोकमान्यता है कि राक्षस ‘खूनीगाढ़’ में मारा गया और उसका सिर ‘मुंडाड़’ में गिरा।
चलायमान देवता, हनोल में ठहराव और जिम्मेदारियां
राक्षस के वध के बाद चारों महाराज कश्मीर लौटना चाहते थे, लेकिन घायल और अपाहिज होने की वजह से तीन महाराज हनोल में ही रुक गए। चालदा महाराज को स्थान देने और सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया और हनोल क्षेत्र बोठा महासू को दिया गया। लोकमान्यता के अनुसार चालदा महाराज को चलायमान देवता माना जाता है। उनका प्रवास हर साल बदलता है। मुकेश कहते हैं कि चालदा महाराज बाहर जाकर कमा कर लाते हैं और फिर अपने भाइयों को खिलाते हैं। हनोल में वे बारह-तेरह साल बाद केवल एक रात के लिए आते हैं और उनके आने का कोई निश्चित समय नहीं होता। चालदा महाराज को अपने साथ ले जाने के लिए कई लोग यात्रा में साथ चलते हैं।
शाठी-पाशी, पांडव-कौरव और मंदिर की परंपरा
मुकेश नेगी बताते हैं कि यह क्षेत्र शाठी और पाशी, यानी पांडवों और कौरवों से जुड़ा माना जाता है। लोकमान्यता है कि हनोल मंदिर का निर्माण शाठी यानी पांडवों ने किया था। यहां भीम के कंचे आज भी बताए जाते हैं। मेले के दौरान शाठी और पाशी के वंशज आज भी यहां पहुंचते हैं।
माली परंपरा, पुजारी व्यवस्था और आज का हनोल
मुकेश नेगी बताते हैं कि हनोल और आसपास के इलाकों में जिन लोगों के भीतर देवता आते हैं, उन्हें स्थानीय भाषा में “माली” कहा जाता है। माली को देवता का माध्यम माना जाता है और धार्मिक अवसरों पर उनके माध्यम से देवता की इच्छा को समझा जाता है। वह भी एक माली हैं।
हनोल क्षेत्र में चार गांव हैं और हर गांव में लगभग पांच-छह सौ लोग रहते हैं। मंदिर के पुजारी इन्हीं चार गांवों से होते हैं और बाहर का कोई व्यक्ति पुजारी नहीं बनता। पुजारी ड्यूटी के दौरान किसी के हाथ का खाना नहीं खाते। चार गांवों से बारी-बारी से पूजा होती है और बाहर का भोजन वर्जित है। मंदिर परिसर में कुछ स्थान ऐसे हैं, जहां पुजारी के अलावा किसी और का जाना मना है।
खेती कम, पढ़ाई के बाद बाहर और प्रशासनिक व्यवस्था
मुकेश ने बताया कि हनोल में खेतीबाड़ी बहुत कम है और लोग पढ़ाई के बाद रोज़गार के लिए बाहर जाते हैं। मंदिर में किसी तरह के दान की मांग नहीं की जाती और श्रद्धालु अपनी मर्जी से दान करते हैं। हनोल मंदिर की एक समिति बनी हुई है, जो एसडीएम की देखरेख में रहती है। लोककथा, परंपरा और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच हनोल मंदिर आज भी जौनसार-बावर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बना हुआ है। इस क्षेत्र के विकास के लिए मास्टर प्लान भी बन रहा है।
उत्तराखंड के सुदूरवर्ती गांवों से हिंदी साहित्य के बड़े नाम आते रहे हैं। महावीर रवांल्टा भी उसी कड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं। लिखने की वजह से अपने दुखों के पहाड़ को भूलकर महावीर रवांल्टा ने रवांल्टी भाषा के लिए जो कार्य किए हैं, उनसे वह अपनी जन्मभूमि हिमालय का कद और भी बढ़ा रहे हैं।
अस्कोट आराकोट यात्रा में महावीर से मुलाकात
अस्कोट आराकोट यात्रा के दौरान स्वील गांव से निकलते वक्त एक लड़के ने हमारा उस रात का पड़ाव पूछा। हमने उसे महरगांव बताया। यह सुनते ही वह बोला कि रवांल्टी भाषा में लिखने वाले महावीर रवांल्टा वहीं रहते हैं। एक भाषा को बचाए रखने वाले शख्स से मिलने की बेसब्री वहीं से शुरू हो गई थी।
शाम होते ही महरगांव पहुंचने पर महावीर रवांल्टा ने सभी यात्रियों का अपने घर में स्वागत किया। घर के आंगन में मंच बनाकर बच्चों द्वारा एक नाटक दिखाने की योजना थी, लेकिन बारिश की वजह से कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। इसी बीच अस्कोट आराकोट यात्रियों के हाथों उनकी किताब ‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुमक’ का विमोचन हो गया।
यात्रा के अंतिम पड़ाव आराकोट में उनसे फिर मुलाकात हुई और रात में उनके साथ ठहरकर लंबी बातचीत का अवसर मिला।
बचपन से ही पढ़ने लिखने के शौकीन रहे महावीर
महावीर रवांल्टा का जन्म 10 मई 1966 को उत्तरकाशी जिले के सरनौल गांव में हुआ। उनके पिता टीका सिंह राजस्व विभाग में कानूनगो थे और माता रूपदेई देवी गृहिणी थीं। तीन भाइयों और दो बहनों में दूसरे नंबर के महावीर बचपन में ही महरगांव आ गए।
गांव के विद्यालय में शनिवार को होने वाले कार्यक्रमों में कविता पाठ होता था। यहीं से कविता पढ़ने का शौक जागा। नौवीं कक्षा में विद्यालय के पुस्तकालय से किताबें पढ़नी शुरू कीं। पराग, नंदन और धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं पढ़ते थे। साथी अपने जेब खर्च से खाने की चीजें लेते थे, जबकि महावीर उससे पत्रिकाएं खरीद लेते थे।
बाद में पिता के साथ उत्तरकाशी आए और गांधी वाचनालय जाने लगे। बारहवीं में विज्ञान वर्ग के छात्र थे, लेकिन रुचि प्रेमचंद, शिवानी और हिमांशु जोशी जैसे लेखकों में थी।
‘हिमालय और हम’ के लिए पहला पत्र
बीएससी में दाखिला लेने के बाद पहले ही साल असफल हो गए, क्योंकि लिखने में पूरी तरह डूब चुके थे। टिहरी से प्रकाशित साप्ताहिक ‘हिमालय और हम’ को पहला पत्र लिखा। इसके संपादक गोविंद प्रसाद गैरोला थे।
साल 1983 में देहरादून से प्रकाशित साप्ताहिक ‘उत्तरांचल’ के स्तंभ ‘साहित्य कला और संस्कृति’ में उनकी पहली कविता ‘बेरोजगार’ प्रकाशित हुई। इससे यह भरोसा जगा कि लिखोगे तो कहीं न कहीं छपोगे जरूर।
ज्ञानपीठ से कम नहीं थे वे बीस रुपये
उत्तरकाशी के माघ मेले में होने वाले कवि सम्मेलन में बड़े कवियों को सुनते हुए महावीर के मन में भी मंच पर कविता पढ़ने की इच्छा जागी। इत्तेफाक से कवि घनश्याम रतूड़ी ने उन्हें कविता पाठ का अवसर दिया।
कविता सुनाने पर उन्हें बीस रुपये का इनाम मिला। महावीर कहते हैं कि वह लिफाफा उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार के बराबर लगा। इसी ने उनका हौसला और मजबूत किया।
कहानीकार और नाटककार महावीर
महावीर ने महरगांव में नाट्य शिविर लगाए, जिनमें गांव के बच्चों ने भाग लिया। गांव की समस्याओं पर आधारित नाटक लिखे गए। पौराणिक, लोककथा और समसामयिक विषयों को मंच पर लाया गया।
रामलीला में महिलाओं के किरदार पुरुष निभाते थे, लेकिन महावीर ने गांव की लड़कियों को मंच पर लाने की शुरुआत की। चुनावी विवादों के चलते जब नाटक का विरोध हुआ तो उन्होंने अपने घर के आंगन में ही मंच तैयार कर लिया।
लेखक के तौर पर जमते महावीर
नौकरी के सिलसिले में मुरादाबाद और फिर अस्कोट जाना पड़ा। रंगमंच से दूरी बनी, तो लेखन और गहरा हो गया। साल 1992 में पहला उपन्यास ‘पगडंडियों के सहारे’ प्रकाशित हुआ। इसके बाद ‘एक और लड़ाई लड़’, ‘समय नहीं ठहरता’, ‘अपना अपना आकाश’ और ‘टुकड़ा टुकड़ा यथार्थ’ जैसी रचनाएं आईं।
दुख के पहाड़ को झेलकर खुद पहाड़ से ऊंचे बने
साल 2004 में महावीर की इकलौती बेटी का निधन हो गया। वह कहते हैं कि उस दुख ने तोड़ दिया था, लेकिन लेखन ने ही जीने की ताकत दी। इसी दौर में ‘त्रिशंकु’ और ‘सपनों के साथ चेहरे’ जैसी कृतियां सामने आईं।
सम्मानों को लेकर महावीर कहते हैं कि सही समय पर मिला सम्मान लेखकों के लिए संजीवनी जैसा होता है।
अपनी भाषा को पहचान दिलाते महावीर
रवांई क्षेत्र के लोग अपनी भाषा बोलने में झिझकते थे। हिंदी में पहचान बनने के बाद महावीर ने रवांल्टी भाषा के लिए काम शुरू किया। कविता, लोककथाएं, शब्दकोश और भाषा सर्वेक्षण में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
हाल ही में उनकी किताब ‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुमक’ प्रकाशित हुई है। चार उपन्यास, अनेक कहानी संग्रह, कविता संग्रह और हिंदी व रवांल्टी में रचनात्मक काम आज भी जारी है।
क्यों शुरू होना चाहिए बंद पड़ा महिला समाख्या कार्यक्रम
अस्कोट आराकोट यात्रा के दौरान सहयात्री प्रीति थपलियाल और चंद्रा भंडारी को महरगांव सहित कई गांवों में मैं महिलाओं से कुछ महत्वपूर्ण सवाल पूछते देख रहा था। घर के फैसलों में भागीदारी है या नहीं, अपनी बात रखने का अवसर मिलता है या नहीं, घरेलू हिंसा या अन्य समस्याओं पर बोलने की कोई जगह है या नहीं। यह सवाल किसी सर्वे का हिस्सा नहीं थे, बल्कि उस अनुभव से निकले थे, जिसे वे सालों पहले महिला समाख्या कार्यक्रम के दौरान जी चुकी थीं।
यात्रा के दौरान ही उनसे महिला समाख्या कार्यक्रम पर विस्तार से बातचीत हुई। प्रीति थपलियाल और चंद्रा भंडारी महिला समाख्या प्रोग्राम में डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम कॉर्डिनेटर रह चुकी हैं। उसी बातचीत में उन्होंने कई महिलाओं की कहानियां साझा कीं। इन्हीं कहानियों में एक नाम बार बार सामने आया। गंगा देवी। एक ऐसी महिला, जिसकी ज़िंदगी महिला समाख्या कार्यक्रम का जीवंत उदाहरण है।
क्या था महिला समाख्या कार्यक्रम
महिला समाख्या कार्यक्रम के बारे में बात करते हुए प्रीति थपलियाल बताती हैं कि उत्तराखंड में महिलाओं को लंबे समय तक घर की चारदीवारी से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी। यह स्थिति आज भी कई इलाकों में पूरी तरह नहीं बदली है।
साक्षरता के साथ साथ महिलाओं को जीवन कौशल, आत्मविश्वास और अपने हालात को समझने की क्षमता देने के लिए एक अलग तरह के कार्यक्रम की जरूरत महसूस की गई। इसी सोच के साथ केंद्र सरकार के मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के अंतर्गत शिक्षा विभाग ने साल 1988 में महिला समाख्या कार्यक्रम शुरू किया। यह कोई कागज़ी योजना नहीं थी, बल्कि महिलाओं के साथ रहकर काम करने वाला जमीनी कार्यक्रम था।
साल 1990 में अविभाजित उत्तर प्रदेश के टिहरी जिले को इस कार्यक्रम के लिए चुना गया। इसके बाद 1995 में पौड़ी और 1996 में नैनीताल जिले इसमें शामिल हुए। साल 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यह साफ हुआ कि पहाड़ों में सबसे ज्यादा मेहनत करने वाली महिलाओं की घर के फैसलों में कोई भूमिका नहीं है। इसी कारण साल 2004 में उत्तरकाशी, चंपावत और उधम सिंह नगर जिलों में भी महिला समाख्या कार्यक्रम शुरू किया गया।
गांव स्तर पर इसका ढांचा सहयोगिनी से शुरू होता था। एक सहयोगिनी दस गांवों की जिम्मेदारी संभालती थी। सौ गांवों पर दस कार्यकर्ता होते थे। यह पूरी संरचना महिलाओं के बीच से निकली महिलाओं द्वारा चलाई जाती थी।
महिला समाख्या से साक्षर महिलाएं आज आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता
प्रीति बताती हैं कि महिला समाख्या के तहत साक्षरता शिविर लगाए जाते थे। इसके लिए अलग से पाठ्यक्रम तैयार किया गया था। कई महिलाओं को ओपन स्कूल के जरिए परीक्षाएं दिलाई गईं। आज इन्हीं महिलाओं में से कई आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता के रूप में काम कर रही हैं।
उत्तराखंड में महिला समाख्या ने स्कूल छोड़ चुकी एक हजार से अधिक लड़कियों को दोबारा शिक्षा से जोड़ा। इसके साथ ही महिलाओं पर हो रहे यौन अपराधों को लेकर सर्वेक्षण भी किए गए, जिनसे पहली बार कई मुद्दे सार्वजनिक रूप से सामने आए।
संजीवनी केंद्र और अपनी अदालत
साल 2004 में महिला समाख्या ने जड़ी बूटी का ज्ञान रखने वाली महिलाओं की पहचान की। इनके सहयोग से ग्राम, क्लस्टर और विकासखंड स्तर पर संजीवनी केंद्र खोले गए। इससे पारंपरिक ज्ञान सुरक्षित हुआ और यह अंधविश्वास भी टूटा कि ज्ञान साझा करने से खत्म हो जाता है। पौड़ी का संजीवनी केंद्र जड़ी बूटी शोध संस्थान देहरादून द्वारा पुरस्कृत भी किया गया।
महिला समाख्या के तहत अपनी अदालत की शुरुआत भी हुई। यहां महिलाएं पारिवारिक और सामाजिक विवादों का समाधान खुद करती थीं। यह महिलाओं के आत्मविश्वास का बड़ा मंच था।
जब महिला समाख्या ने टैक्सी का किराया तय करवा दिया
प्रीति बताती हैं कि महिला समाख्या के सदस्य महिलाओं से जुड़े हर मुद्दे में उनके साथ खड़े रहते थे। साल 1997 में बेतालघाट में राशन कार्ड बनवाने के नाम पर महिलाओं से पैसे लिए जा रहे थे। टैक्सी चालक भी महिलाओं से मनमाना किराया वसूलते थे। महिला समाख्या ने महिलाओं को जागरूक किया कि राशन कार्ड बनवाने के कोई पैसे नहीं लगते और टैक्सी का किराया तय होना चाहिए। महिलाओं ने विरोध किया और व्यवस्था बदली।
साल 2016 में महिला समाख्या कार्यक्रम बंद करने का पत्र आया। विरोध हुआ, लेकिन कार्यक्रम बंद हो गया। इसके बाद लगभग 350 लोग बेरोजगार हुए। इससे ज्यादा नुकसान महिलाओं के उस मंच का हुआ, जहां वे खुलकर बोल सकती थीं।
महिला समाख्या की देन हैं गंगा देवी
यात्रा के दौरान जब प्रीति और चंद्रा ने गंगा देवी का ज़िक्र किया, तो साफ था कि यह सिर्फ एक कहानी नहीं है। यात्रा के कुछ दिनों बाद गंगा देवी का मोबाइल नंबर मिला और उनसे बात हुई। गंगा देवी का जन्म साल 1947 में यमकेश्वर ब्लॉक के जामल गांव में हुआ। पिता की मृत्यु के बाद उनकी मां ने दूसरों के खेतों में काम कर बच्चों को पाला।
गंगा बताती हैं कि उस समय कहा जाता था कि लड़कियों को पढ़ाकर क्या करना है। उन्हें तो घास ही काटनी है। फिर भी वह बहाने बनाकर स्कूल जाती रहीं। लौटने पर मार भी पड़ी, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी। शिक्षकों की मदद से उन्होंने पांचवीं तक पढ़ाई पूरी की।
बाद में वह प्रौढ़ शिक्षा केंद्र में पढ़ाने लगीं। शादी के बाद खेती में रम गईं।
जब गांव ने कहा यह औरतें घर छोड़कर घूम रही हैं
साल 1997 में महिला समाख्या से जुड़ी महिलाएं गंगा के गांव सार पहुंचीं। शुरुआत में गांव की महिलाओं ने उन्हें बेघर समझकर नकार दिया। कहा गया कि इनके पतियों ने इन्हें छोड़ दिया है। लेकिन वे महिलाएं हर महीने आती रहीं। धीरे धीरे बातें असर करने लगीं। महिलाएं चारदीवारी से बाहर निकलीं और बेटियों, बहुओं को पढ़ने भेजने लगीं।
महिला समाख्या के कहने पर गंगा ग्राम प्रधान बनीं। पानी और सड़क जैसे मुद्दों पर गांव में काम हुआ।
जब पुरुषों से कहा हमने तुम्हें पैदा किया
गंगा बताती हैं कि उन्होंने जलागम योजना के तहत ठेका लिया। उस समय यह असामान्य था। गांव के पुरुषों ने आपत्ति की तो गंगा ने कहा कि महिलाओं ने तुम्हें पैदा किया है। अगर तुमने अपना काम ठीक से किया होता तो हमें यह ठेका लेने की जरूरत नहीं पड़ती।
उनके बनाए हौज आज भी सही हालत में हैं। उन्होंने गांव में एसडीएम को बुलाकर यह भी दिखाया कि महिला नेतृत्व क्या कर सकता है।
अब कोई मिसेज प्रधान क्यों नहीं बोलता
गंगा कहती हैं कि बाद में उनके पति प्रधान बने, लेकिन काम वही करती थीं। वह मीडिया से सवाल करती थीं कि जब महिला प्रधान के पति काम करें तो उन्हें पति प्रधान कहा जाता है, फिर महिला को मिसेज प्रधान क्यों नहीं कहा जाता।
आज उनकी बहू प्रधान है और गांव का काम वही संभालती हैं। गंगा कहती हैं कि जो कुछ भी उन्होंने किया, वह महिला समाख्या की देन है। कार्यक्रम बंद होने से पहाड़ की महिलाओं को बड़ा नुकसान हुआ है। अगर यह कार्यक्रम आज भी चलता, तो महिलाएं और भी बहुत कुछ कर सकती थीं।
भाग 2- यात्रा के बाद
घोड़ों की लीद और साड़ियों के बोझ तले घुट रहा यमुनोत्री का दम
यात्रा की समाप्ति के बाद आराकोट से लौटते हुए कुछ सहयात्रियों से उनकी यमुनोत्री यात्रा के अनुभवों पर चर्चा हुई।
हरीश पाठक ‘पहाड़’ प्रकाशन के प्रबंधक हैं। वह साल 1974 से हर दस साल में होने वाली ऐतिहासिक अस्कोट–आराकोट यात्रा के पचासवें वर्ष में भाग ले रहे थे। हरीश ने बताया कि यह उनकी दूसरी अस्कोट–आराकोट यात्रा है। अब तक की लगभग 1100 किलोमीटर की यात्रा के अनुभव में यमुनोत्री पड़ाव पर बात करते हुए वह कहते हैं कि यमुनोत्री हमारा धार्मिक स्थल है और यहीं से यमुना नदी का उद्गम होता है।
जब सात यात्रियों का हमारा दल मुख्य दल से अलग यात्रा करते हुए यमुनोत्री पहुंचा, तो हमने देखा कि यमुनोत्री बाजार में गंदगी भरी पड़ी है। घोड़े, यात्रियों को कंधे में ले जाते नेपाली, यात्री वाहन, इन सबके कारण बाजार में चलने की जगह नहीं थी। हरीश कहते हैं कि इसका समाधान घोड़ों के लिए एक अलग स्टैंड बनाकर, वहीं से यात्रियों को बैठाकर किया जा सकता है।
इसके आगे लगभग छह किलोमीटर दूर तीर्थ स्थान तक पहुंचने के लिए हम नदी के किनारे चलते हैं। इस रास्ते में घोड़ों की वजह से नदी में गिरने और चोट लगने का भय बना रहता है। मैंने घोड़ों को लीद करते देखा और यह समझ नहीं आया कि इस गंदगी का सही निस्तारण कैसे किया जाता होगा, क्योंकि वहां इसके लिए न कोई डस्टबिन है और न ही इसे अलग से इकट्ठा करने की कोई व्यवस्था।
हरीश बताते हैं कि यमुनोत्री के नजदीक पहुंचकर यमुना में धोती और साड़ियां दिखाई देती हैं और थोड़ा आगे चलने पर नदी के हिस्सों में इनका ढेर भी नजर आता है। स्थानीय लोगों से पूछने पर पता चला कि पहले ये कपड़े नदी में नहीं फेंके जाते थे। कुछ साल पहले ही इसकी शुरुआत हुई है। हरीश कहते हैं कि अगर इन कपड़ों को नदी में फेंकना ही है, तो यमुनोत्री मंदिर के रखरखाव से जुड़े लोगों द्वारा इसका निस्तारण किया जाना चाहिए।
साल 1991 से अब बहुत बदल गई है यमुना
मनमोहन चिलवाल रिटायर्ड बैंक कर्मी हैं और नैनीताल में रहते हैं। मनमोहन इससे पहले दो बार यात्रा में आंशिक रूप से हिस्सा ले चुके हैं, लेकिन इस बार वह पहली बार पूरी यात्रा में शामिल हुए। यमुनोत्री पहुंचने के लिए उन्होंने दल के अन्य छह सदस्यों के साथ उत्तरकाशी से असी गंगा घाटी, डोडीताल, दरवा टॉप, सीमा बुग्याल और हनुमान चट्टी का रास्ता चुना। अगोड़ा गांव से यमुनोत्री तक यह पैदल रास्ता करीब 51 किलोमीटर है। मनमोहन बताते हैं कि इस दौरान उन्होंने 3800 मीटर की अधिकतम ऊंचाई भी पार की।
सुबह आठ बजे अगोड़ा से शुरू हुआ यह रास्ता बुग्यालों से होकर जाता है। बुग्यालों में ऊंचे नीचे रास्ते हैं और घास से भरे मैदान हैं। यहां पोटेंटिला, स्नेक लिली, ब्रह्म कमल, अतीस, सफेद बुरांश और प्रिमुला जैसे फूल दिखाई देते हैं।
मनमोहन बताते हैं कि रास्ते में घने कोहरे की वजह से कई बार उनका दल भटक गया। कभी कभी कोहरा इतना घना था कि बीस मीटर की दूरी पर खड़ा साथी भी दिखाई नहीं दे रहा था। करीब ढाई घंटे रास्ता भटकने के बाद सही मार्ग मिला। तेज़ी से चलते हुए दल रात करीब नौ बजे हनुमान चट्टी पहुंचा। वहां एक ढाबे में रात्रि विश्राम के बाद सुबह आठ बजे वे यमुनोत्री के लिए रवाना हुए। करीब दस बजे यमुनोत्री पहुंचने पर उन्होंने देखा कि बाजार का कचरा नदी में फेंका जा रहा था और सफाई कर्मचारी घोड़ों की लीद भी नदी में ही झाड़ रहे थे। यही पानी आगे चलकर यमुना की मुख्यधारा में शामिल होता है और कई राज्य इसी पानी का उपयोग करते हैं।
मनमोहन ने बताया कि साल 1991 में जब वह पहली बार यमुनोत्री आए थे, तब नदी का पानी बहुत साफ था। अब उन्होंने देखा कि महिलाओं की साड़ी और धोती भी नदी में फेंकी जा रही हैं, जिसकी वजह से यमुनोत्री के स्रोत पर ही इन कपड़ों का बड़ा ढेर लग गया है।
हर्ष काफर ने कहा जो सक्षम उनके लिए घोड़ा क्यों
उत्तराखंड में युवाओं के बीच सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हर्ष काफर भी इस साल अस्कोट–आराकोट यात्रा में शामिल हुए। यात्रा के दौरान वह अपने अनुभव सोशल मीडिया पर साझा कर रहे थे। इसी विषय पर उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि यमुनोत्री में नहाने के बाद महिलाएं अपनी साड़ियां चढ़ा देती हैं और वह जानना चाहते हैं कि यह परंपरा कहां से शुरू हुई।
इस विषय पर पहली बार यात्रा कर रहे हर्ष काफर ने कहा कि हनुमान चट्टी से जानकी चट्टी की ओर जाने के बाद यमुनोत्री का ट्रैक शुरू होता है, जहां खाने और घोड़ों की लीद की बदबू आती है। हर्ष ने कहा सिर्फ असहाय लोगों को ही घोड़ा मिलना चाहिए। जानकी चट्टी से यमुनोत्री की दूरी लगभग पांच से छह किलोमीटर है, इसलिए जो चल सकते हैं, ऐसे सक्षम लोगों के लिए घोड़ा नहीं चलवाया जाना चाहिए। घोड़ों के अनियंत्रित चलने से पैदल यात्रियों को बड़ा खतरा रहता है। इसके साथ ही वह नदी में साड़ियां फेंकने के नए चलन पर भी सवाल उठाते हैं।
भीमताल का तितली अनुसंधान केंद्र और हिमालयी पर्यावरण की समझ
उत्तराखंड के भीमताल में स्थित तितली अनुसंधान केंद्र भारत का सबसे बड़ा निजी तितली और कीट संग्रह है। इस केंद्र ने तितली विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यहां भारत की दस फीसदी से अधिक रेशम पतंग प्रजातियों की खोज की गई और उनका नामकरण किया गया। वर्ष 2004 में पीटर स्मेटासेक ने एक तितली प्रजाति का नामकरण करते हुए उसे नेप्टिस मिया वर्ष्नेयी नाम दिया। वर्ष 2015 में केंद्र ने भारत की तितलियों की सूची तैयार की, जिसे तीस हजार से अधिक बार डाउनलोड किया गया। इससे पहले वर्ष 1994 में हिमालयी तितलियों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और आवारा कुत्तों का जंगली जानवरों पर असर जैसे विषयों पर शोध किया गया। यह केंद्र बायोनोट्स नामक एक निःशुल्क वैज्ञानिक पत्रिका भी प्रकाशित करता है।
पीटर स्मेटासेक के पिता फ्रेडरिक स्मेटासेक चेक गणराज्य के नागरिक थे। उन्होंने एक बार हिटलर को मारने की कोशिश की थी। नाजी शासन के दौरान फ्रेडरिक यूरोप से भागकर वर्ष 1940 के आसपास भारत आए और यहां नई जिंदगी शुरू की। वर्ष 1951 में उन्होंने भीमताल में एक बंद पड़ा चाय बागान खरीदा। तब से अब तक स्मेटासेक परिवार ने इस इलाके की प्रकृति को बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। पीटर बताते हैं कि उनके पिता ने कभी संरक्षण शब्द का प्रयोग नहीं किया। उन्हें बस यह समझ थी कि जंगल को ठीक होने के लिए मानव हस्तक्षेप से मुक्त समय और स्थान चाहिए।
पीटर स्मेटासेक के केंद्र ने वर्ष 2015 में भारत की तितलियों की सूची तैयार की थी।
जंगल की आग और ओक का महत्व
वर्ष 1984 में बागान के जंगल में लगी आग ने ओक वन को नष्ट कर दिया, जिसके कारण एक गांव का पानी का स्रोत भी सूख गया। इस घटना ने पीटर को यह समझने में मदद की कि ओक के जंगल पानी की व्यवस्था और जैव विविधता के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। ओक की छतरी मिट्टी को नम रखती है, जिससे नदियों का बहाव बना रहता है। हिमालय से निकलने वाली गंगा जैसी नदियां जंगलों पर निर्भर हैं और ओक जैसे देशी जंगल बारह सौ से अधिक पौधों की प्रजातियों को सहारा देते हैं।
पीटर का लक्ष्य केवल तितलियों को बचाना नहीं है, बल्कि हिमालयी पर्यावरण तंत्र को संरक्षित करना है, जो हिमालय से निकलने वाली नदियों को जीवित रखता है। पीटर कहते हैं कि भारत में स्वस्थ जंगल की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है और उसके बिना नदियों को बचाना असंभव है। देशी ओक जंगल पानी और जैव विविधता के लिए आवश्यक हैं, जबकि इस क्षेत्र में लगाए गए पाइन के जंगल इस भूमिका में अप्रभावी हैं। तितलियां और पतंगे जंगल की सेहत के संकेतक हैं और उनकी अनुपस्थिति पर्यावरण की खराब स्थिति को दर्शाती है। पीटर का मानना है कि तितलियों के अध्ययन से जंगल की पूरी सेहत को समझा जा सकता है।
हिमालय की रक्षा का स्थानीय रास्ता
धराली जैसी आपदाएं यह चेतावनी देती हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र की गहरी समझ विकसित करना आवश्यक है। पीटर स्मेटासेक का भीमताल मॉडल यह दिखाता है कि पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और धैर्य के साथ हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं। अगर जंगल बचेंगे, तो नदियां बचेंगी और अगर नदियां बचेंगी, तभी जीवन बचेगा।
हरिद्वार में फ्लाईओवरों के नीचे एक समानांतर दुनिया
कांवड़ के दिनों में हरिद्वार एक अलग ही शहर बन जाता है। सड़कों पर शिवभक्तों का सैलाब होता है, भगवा रंग हर दिशा में फैल जाता है और प्रशासन से लेकर मीडिया तक की निगाहें कांवड़ियों की आवाजाही पर टिकी रहती हैं। इन्हीं दिनों हरिद्वार की यात्रा के दौरान मैंने इस शहर का वह चेहरा देखा, जो शोर, आस्था और भीड़ के बीच लगभग अदृश्य हो जाता है। यह चेहरा फ्लाईओवरों के नीचे, पुलों के साये में और घाटों के किनारे बसा हुआ है।
कांवड़ यात्रा के दौरान हरिद्वार में घूमते हुए महसूस होता है कि यह शहर दो हिस्सों में बंट गया है। एक वह, जो ऊपर से दिखता है। और दूसरा वह, जो फ्लाईओवर के नीचे जी रहा है।
फ्लाईओवर के नीचे की सुबह
रात ढाई बजे बैरागी कैंप के पास गंगा किनारे सोए रवि की सुबह पांच बजे खुलती है। बारिश की हल्की फुहार उसे नींद से जगा देती है। वह उठकर फ्लाईओवर के नीचे बने अपने ठिकाने की ओर चल देता है। यही उसका घर है।
फ्लाईओवर के नीचे रवि जैसे सात आठ लोग रहते हैं। कोई रिक्शा चलाता है, कोई भीख मांगता है और कोई पास के भंडारे से पूरे हफ्ते का खाना जुटा लेता है। रवि बताता है कि उसका गांव लक्सर के पास था। तीन भाइयों में एक नशे में डूबा है, दूसरा देहरादून में मजदूरी करता है और तीसरा वह खुद है। मां कैंसर से पीड़ित हुई तो गांव की पांच बीघा जमीन बिक गई। मां के बाद सब्जी बेचने वाले पिता भी चल बसे। तब से पढ़ा लिखा रवि हरिद्वार में रोज पचास रुपये में रिक्शा किराये पर लेकर चलाता है। कभी तीन सौ तो कभी हजार रुपये तक कमा लेता है।
सरकारी योजनाओं से दूरी
रवि का दोस्त राजेश बदायूं से है। उम्र लगभग चालीस साल। माता पिता दोनों नहीं रहे। प्रधानमंत्री जनधन योजना का खाता है, लेकिन उसमें कितने पैसे हैं, यह जानने वह बैंक नहीं जाता। वह कहता है कि योजनाओं की जानकारी तो रहती है, लेकिन सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की हिम्मत नहीं होती। इसलिए वह सब छोड़ दिया है।
राजेश और रवि दोनों अपने भविष्य की चिंता किए बिना रोज की कमाई शराब और खाने में खर्च कर देते हैं। दोनों के पास स्मार्टफोन हैं, जिन्हें वे आसपास के दुकानदारों के यहां बीस रुपये में चार्ज करा लेते हैं।
केवाईसी एक मुसीबत
पंचकूला के ओम कुमार भी इसी फ्लाईओवर के नीचे रहते हैं। उन्होंने कभी बठिंडा में मिठाई की दुकान पर काम किया था। शरीर ने साथ छोड़ दिया तो हरिद्वार आ गए। दुकानों में सफाई कर बीस तीस रुपये मिल जाते हैं। फोन नहीं है। बैंक खाता है, लेकिन केवाईसी नहीं होने की वजह से बेकार पड़ा है।
ओम बताते हैं कि 2014 में डॉक्टरों ने कहा था कि उनके फेफड़े अस्सी प्रतिशत खराब हो चुके हैं। इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। सरकारी अस्पताल जाने से भी डरते हैं कि कहीं खर्च ज्यादा न हो जाए।
कांवड़ में उम्मीद की दुकान
बैरागी कैंप घाट पर सुबह चार बजे शिवकुमार से बातचीत होती है। मच्छरों से परेशान होकर वह गंगा किनारे बैठा है। कांवड़ के दिनों में वह लकड़ी के तख्त पर शिवभक्तों से जुड़ा सामान बेचता है। साल भर वह साइकिल रिपेयरिंग करता है। महीने में लगभग तीन हजार रुपये। पत्नी एक आश्रम में साफ सफाई कर तीन हजार रुपये कमाती है।
शिवकुमार की उम्र लगभग पचपन साल है। हर साल कांवड़ के दौरान वह यही दुकान लगाता है। बड़ी बेटी की शादी के बाद प्रसव में मौत हो गई थी। शादी में तीन चार लाख रुपये खर्च हो गए। अब दो बच्चे हैं। उनकी स्कूल फीस सालाना करीब दस हजार रुपये है। गैस सिलेंडर हजार के आसपास और सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं।
कांवड़ मेले में इस छोटी सी दुकान से सात आठ हजार रुपये कमाने की उम्मीद ही उन्हें यहां टिकाए रखती है।
आस्था के नीचे दबा जीवन
कांवड़ के दौरान हरिद्वार की यह यात्रा मुझे बार बार अस्कोट आराकोट की याद दिलाती रही। वहां पहाड़ों में छूटते गांव थे। यहां शहर में छूटते लोग हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां पलायन दिखाई नहीं देता, बल्कि फ्लाईओवरों के नीचे स्थिर हो गया है।
आस्था के इस विराट आयोजन के नीचे एक ऐसी दुनिया सांस ले रही है, जिसकी कोई तस्वीर पोस्टर में नहीं आती। कांवड़ के शोर में इन आवाजों की गूंज दब जाती है। लेकिन यही आवाजें बताती हैं कि हरिद्वार केवल तीर्थ नहीं है। यह संघर्ष, असमानता और अदृश्य जीवन का शहर भी है।
मेरे हिस्से की अस्कोट आराकोट यात्रा में यह हरिद्वार भी शामिल है। वह हरिद्वार, जो सड़कों के ऊपर नहीं, फ्लाईओवर के नीचे दिखता है।
डाडा जलालपुर : गांव में दुकान, खेती और बदलती अर्थव्यवस्था
अस्कोट आराकोट यात्रा खत्म होने के साल भर बाद भी मेरे हिस्से की अस्कोट आराकोट यात्रा जारी है और अब मैं दुनिया के किसी कोने में चले जाऊं, शायद यात्रा के दौरान मिली नई दृष्टि से मेरी यह यात्रा हमेशा जारी रहेगी। रुड़की से दस किलोमीटर दूर डाडा जलालपुर पहुंचने पर गांव को गहराई से समझा।
डाडा जलालपुर में खेती, दुकानों और फैक्ट्री के काम से आजीविका चल रही है, लेकिन उधार, पशुपालन और दूध उत्पादन में गिरावट चिंता है।
खेती में पॉपुलर के पेड़ों की ओर रुझान बढ़ा है, जबकि शिक्षा और आस्था गांव को जोड़े रखती हैं।
डाडा जलालपुर गांव में राजवीर सैनी की पुरानी दुकान है। राजवीर सैनी बताते हैं कि गांव की आबादी दो से चार हजार के बीच है। इनमें सौ के आसपास लोग सरकारी नौकरी में हैं, जबकि बाकी लोग फैक्ट्रियों में नौकरी, खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। गांव में करीब सत्तर दुकानें हैं, जिनमें राशन और खेती के सामान की चार दुकानें शामिल हैं। राजवीर सैनी की दुकान में पशुओं का चारा, ज्वार और बाजरा जैसे सामान मिलते हैं।
उधार, ऑनलाइन भुगतान और खेती के बदलते स्वरूप
राजवीर सैनी बताते हैं कि उधार गांव की बड़ी समस्या है। साल भर में उनकी दुकान पर पांच से छह लाख रुपये तक का उधार हो जाता है। गांव में गन्ना, गेहूं और धान की खेती होती है, लेकिन अब लोग पॉपुलर के पेड़ों की तरफ जा रहे हैं। उनके अनुसार पॉपुलर लगाने से एक एकड़ में करीब दस लाख रुपये की कमाई पांच साल में हो रही है। पॉपुलर के साथ अन्य फसल भी लग जाती है। गांव में ऑनलाइन पेमेंट बढ़ा है और इससे फायदा ही हुआ है। बैंक से निकालकर पैसे देने की बात कहने वाले लोग अब कम हैं।
पशुपालन में गिरावट और दूध की कमी
राजवीर सैनी बताते हैं कि पहले जहां लोगों के पास पांच–छह पशु होते थे, अब एक–दो ही पशु रह गए हैं। गांव में अब लोग डेयरी से दूध लेने लगे हैं। पुरुष फैक्ट्री में काम करते हैं और नई पीढ़ी की महिलाएं पशुपालन नहीं करना चाहती।
एक अन्य दुकानदार मुनेश कुमार सैनी बताते हैं कि गांव में अब सिर्फ एक ही डेयरी बची है। उनके अनुसार छह साल पहले गांव में दस–बारह क्विंटल दूध अतिरिक्त होता था, जो अब घटकर करीब दो–ढाई क्विंटल रह गया है।
बांझ पशु, इलाज और रोज़गार की प्राथमिकताएं
मुनेश कुमार सैनी ने बताया कि इन दिनों पशुओं का बांझ होना सबसे बड़ी समस्या बन गया है। लोग डॉक्टरों के पास जाते हैं, लेकिन उनका कहना है कि डॉक्टर भी इस समस्या को गंभीरता से नहीं लेते। शायद खेतों में प्रयोग हो रही केमिकल युक्त खाद इसका बड़ा कारण है।
उन्होंने आगे बताया कि गांव में लोग सरकारी नौकरी को बहुत गंभीरता से नहीं लेते और हिंदुस्तान लीवर जैसी कंपनियों में प्राइवेट नौकरियों की तरफ जा रहे हैं। गांव के दो–तीन युवा पीएचडी कर चुके हैं और कुछ बीटेक कर रहे हैं, यह गांव के अच्छे भविष्य की उम्मीद जगाता है।
शिक्षा, स्वास्थ्य और आस्था का केंद्र
डाडा जलालपुर में सरकारी स्कूल है। गंभीर बीमारी के लिए लोगों को देहरादून के अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। गांव में चार प्राइवेट स्कूल हैं और तीन किलोमीटर दूर वैभलपुर में भी सरकारी स्कूल है। मुनेश का कहना है कि सरकारी स्कूल में अब अच्छी शिक्षा मिल रही है।
गांव के एक और युवा मुकेश सैनी बताते हैं कि डाडा जलालपुर में हर साल जुलाई महीने में जारवीर गोगा माड़ी का मेला लगता है। इस दौरान न सिर्फ गांव बल्कि आसपास के कई इलाकों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। लोग गोगा माड़ी में पूजा–अर्चना करते हैं, निशान चढ़ाते हैं और परिवार की सुख–समृद्धि के साथ-साथ सांप–बिच्छू के डर से सुरक्षा की कामना करते हैं। कुछ युवाओं की इस मेले में दुकान लगाने से अच्छी कमाई भी हो जाती है। मुकेश ने बताया कि गांव में कभी–कभी जाति और धार्मिक आधार पर तनाव की स्थिति बनी है, लेकिन अधिकांश समय यहां शांति बनी रहती है।
इतिहास की किताबों में दर्ज होने की तैयारी करते लोहार
आधुनिक मशीनों और बदलते बाजार ने उनकी आजीविका को संकट में डाल दिया है। अगली पीढ़ी की इस काम से दूरी और मांग में कमी से यह पुश्तैनी शिल्प विलुप्त होने की कगार पर है और इतिहास में दर्ज होने की तैयारी में है।
मुल्तान के लोहार हिंदुस्तान में कब बसे
जाहिद हसन और उनके भाई वाजिद हसन उत्तराखंड के मानक मजरा गांव में रहते हैं। यह रुड़की से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर है। डाडा जलालपुर में अपनी दुकान पर बैठे जाहिद बताते हैं कि वे मिर्जा जाति से हैं और उनका परिवार पीढ़ियों से लोहार का काम करता आया है। उनके दादा मोहम्मद हसन 1947 के बंटवारे के दौरान अपने भाई रज्जाक के साथ मुल्तान से भारत आए थे। कुछ वर्षों तक लाहौर से रिश्तेदार यहां आते रहे, लेकिन समय के साथ यह सिलसिला थम गया।
जाहिद बताते हैं कि बंटवारे के दौर में मानक मजरा में लोहारों की कमी थी। इसी वजह से गांव के प्रधान चतरू ने उनके परिवार को घर के लिए जमीन का पट्टा देकर बसने में मदद की। जाहिद और वाजिद ने अपने पिता अब्दुल हमीद से लोहारी का हुनर सीखा।
लोहारी का शिल्प और तकनीक
जाहिद और वाजिद का काम किसानों की जरूरतों के इर्द गिर्द घूमता है। वे दरांती, खुरपा और पाटल जैसे औजार बनाते हैं, जो खेती और पेड़ काटने के काम आते हैं। इसके अलावा वे पुराने लोहे के औजारों में धार लगाने का काम भी करते हैं, जो उनकी आय का मुख्य जरिया है।
दुकान के आगे बने गड्ढे में कोयला डाला जाता है। कोयले को जलाने के लिए हवा देने वाली मशीन का इस्तेमाल होता है। यह मशीन हाथ से चलने वाली और बिजली से चलने वाली दोनों प्रकार की होती है। औजार के आकार के अनुसार वे कबाड़ी से खास तरह का लोहा खरीदते हैं। पाटल के लिए चौड़ा और मजबूत लोहे का टुकड़ा लिया जाता है।
कोयला लकड़ी की भट्टियों से बीस रुपये प्रति किलो की दर से खरीदा जाता है और एक महीने में करीब पचास किलो कोयला खर्च हो जाता है। भट्टी की आग में लोहा तपता है और हथौड़ों की ठक ठक से वह औजार का रूप लेता है।
बदलता बाजार और आर्थिक चुनौतियां
पिछले दो दशकों में इस पेशे में बड़ा बदलाव आया है। जाहिद बताते हैं कि बीस साल पहले एक पाटल दो सौ रुपये में बिकता था, जो अब ढाई सौ रुपये का हो गया है। कोयले की कीमत भी छह सात रुपये प्रति किलो से बढ़कर बीस रुपये हो गई है। बीस रुपये में बिकने वाली दरांती अब पचास रुपये में बिकती है।
कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद मांग में भारी कमी आई है। जाहिद बताते हैं कि पहले खेती का सारा काम हाथ से होता था। फसल कटाई के मौसम में दो सौ से तीन सौ दरांतियां बिक जाती थीं। मशीनों के आने के बाद यह संख्या घटकर सौ से डेढ़ सौ रह गई है।
खुरपे की स्थिति और भी खराब है। पहले महीने में सौ से डेढ़ सौ खुरपे बिकते थे। अब केवल बीस से तीस खुरपे ही बनते और बिकते हैं। छोटे खेत वाले किसान ही अब इन औजारों को खरीदते हैं। घर का राशन चलाने लायक आय का मुख्य हिस्सा औजारों की मरम्मत से आता है।
लोहारों का वजूद ही खत्म हो जाएगा
जाहिद को लगता है कि उनका यह पुश्तैनी पेशा अगले दस से बीस साल में खत्म हो सकता है। मशीनों ने खेती के तरीके बदल दिए हैं। पशुपालन में कमी के कारण घास काटने की जरूरत भी घट रही है। दरांती और खुरपे जैसे औजारों की मांग लगातार कम होती जा रही है। उनके बच्चे इस पेशे को अपनाने के इच्छुक नहीं हैं। एक बेटा इलेक्ट्रिशियन है और दूसरा अभी नौवीं कक्षा में पढ़ रहा है।
यात्रा में दिखाई दिया ऑफर
अस्कोट आराकोट यात्रा के अनुभव को और समृद्ध करने के लिए सहयात्री चंदन डांगी साल 2025 में अपने कुछ साथियों के साथ स्रोत से संगम और संगम से स्रोत तक नदी अध्ययन यात्रा पर निकले। इस दौरान उन्होंने चनौला गांव में लोहारों के कार्यस्थल को देखा, जिसे स्थानीय भाषा में ऑफर कहा जाता है।
गांव के एक कोने में बड़े पत्थर की ओट में स्थित यह पारंपरिक ऑफर अपनी छत जैसी आकृति वाले पत्थर के कारण पाखा खरक के नाम से भी जाना जाता है।
मैदान से अलग नहीं लोहारों के हालात
चंदन बताते हैं कि इसे देखकर उन्हें अपने गांव डांगीखोला मल्ला के मोहन दा का ऑफर याद आ गया, जहां वे दरांती, हल के फाल, कुदाल और बसूले पर धार लगवाने जाया करते थे। वहां चीड़ की छाल जलाकर साइकिल के पहिए से हवा फेंकी जाती थी।
चनौला के ऑफर के बारे में स्थानीय निवासी शंकर बिष्ट बताते हैं कि आजकल गंगा राम गांव के एकमात्र शिल्पकार हैं, जो इस कला को जीवित रखे हुए हैं। यह शिल्प चनौला गांव के सामाजिक और आर्थिक ताने बाने का अभिन्न हिस्सा रहा है।
कोयले की दहकती भट्टी, उसे हवा देने वाली धौंकनी और पास में रखी भारी निहाई, जिस पर गर्म लोहा आकार लेता है, इस ऑफर के जरूरी उपकरण हैं। कुछ साल पहले तक गांव के किसान खेती के औजार, घरों के दरवाजों के कब्जे, कुंडी, खूंटी और रसोई के सामान तक इन्हीं कारीगरों से बनवाते थे। बढ़ई, कुम्हार और राजमिस्त्री जैसे अन्य कारीगर भी अपने औजारों के लिए लोहारों पर निर्भर थे।
चंदन डांगी ने आगे बात करते हुए कहा कि उनकी गंगा राम से मुलाकात नहीं हो सकी, लेकिन गांव के बुजुर्ग जीत सिंह ने बताया कि गंगा राम केवल कारीगर ही नहीं, बल्कि एक समाधानकर्ता भी हैं, जो अपनी कुशलता से ग्रामीण जीवन की हर जरूरत पूरी करते हैं।
लोहार का यह शिल्प अक्सर पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। पिता अपने पुत्रों को धातु के स्वभाव, सही तापमान और हथौड़े की सटीक चोट से आकार देने की कला सिखाते हैं।
गंगा राम के भाई और बच्चे पढ़ लिखकर पलायन कर चुके हैं। मशीनों के कारण अब औजारों की मांग न्यूनतम स्तर पर आ गई है। सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार इस परिश्रम के बदले धन के बजाय अनाज, वस्त्र और खेतों से प्राप्त फसल का एक हिस्सा भेंट करने का चलन अभी भी मौजूद है। जातिवाद के कारण शिल्पकारों को अपेक्षित मान सम्मान भी नहीं मिल पाता।
श्यामनगर गांव : खेती, सौहार्द और बदलते रोज़गार की जमीनी तस्वीर
हाइवे से लगी सड़कों के अंदर बसे इन गांवों की तस्वीर अक्सर हमारे सामने नहीं आ पाती। ऐसी ही एक तस्वीर को तलाश करते हुए मैं जसपुर के पास जगजीतपुर टोल के नजदीक स्थित श्यामनगर की तरफ मुड़ गया।
ऊधम सिंह नगर ज़िले का श्यामनगर गांव खेती, सामाजिक सौहार्द और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। गांव के युवा अर्जुन सिंह कृष्णा बताते हैं कि उनके पिता किसान हैं। गांव में बड़े पैमाने पर पलायन नहीं है। युवा फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं, जबकि नई पीढ़ी का झुकाव खेती से कम होकर नौकरी की ओर बढ़ा है। कुछ घर आज भी पूरी तरह खेती पर निर्भर हैं।
ढांढी नदी, डैम और खेती पर असर
श्यामनगर से होकर बहने वाली ढांढी नदी तुमरिया डैम से आती है। इसी नदी से फायदा उठाते हुए गांव वालों द्वारा नाली बनाकर खेतों में पानी पहुंचाया गया है। गांव में अनुसूचित जाति के लगभग आठ सौ वोट हैं और उनके पास भूमि भी अधिक है।
अर्जुन सिंह कृष्णा बताते हैं कि बारिश के दौरान जब डैम से पानी बंद कर दिया जाता है, नदी में पानी की कमी हो जाती है और इसका असर खेती पर पड़ा है। अर्जुन सिंह के अनुसार पांच से दस साल पहले एक एकड़ में करीब तीस क्विंटल पैदावार होती थी, जो अब घटकर लगभग बीस क्विंटल रह गई है। गांव में मुख्य रूप से गन्ने की खेती की जाती है।
सामाजिक ताना–बाना, कम आबादी और ज्यादा भागीदारी
गांव में मुस्लिम आबादी कम है और उनके वोट लगभग सौ बताए जाते हैं। शादी–बारात में सभी समुदायों को निमंत्रण दिया जाता है। ईद के मौके पर सबको बुलाया जाता है और हिंदुओं के त्योहारों में मुस्लिम समुदाय शामिल होता है। गांव में माता देवी का मंदिर है, माता की झांकी और रामलीला जैसे आयोजनों में मुस्लिमों का योगदान भी रहता है।
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की चुनौतियां
श्यामनगर से तीन किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश स्थित ठाकुरद्वारा है, जहां कोचिंग सेंटर हैं। यहां से स्टेनो की पढ़ाई कर कई लोग सरकारी नौकरी में लगे हैं। गांव के आसपास फाइलों में इस्तेमाल होने वाला कागज़ बनाने वाली एक पेपर मिल भी है, जिससे कुछ स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलता है।
दस किलोमीटर दूर जसपुर में इंटर कॉलेज हैं और बच्चे वहीं पढ़ने जाते हैं। वे गांव से पहले साइकिल से हाइवे तक और फिर बस से स्कूल पहुंचते हैं। इलाज के लिए लोगों को काशीपुर जाना पड़ता है। पानी की सुविधा के लिए लगभग हर घर में निजी नल लगे हैं और गांव में पानी की टंकी लगाने का काम चल रहा है। गांव में दुधारू पशु हैं और गायों की संख्या अधिक है।
सड़क, पुल, पंचायत और खेल : बदलाव की कहानी
अर्जुन कहते हैं कि गांव में सड़क, पुल और बारातघर के लिए दिवंगत कंचन सिंह का संघर्ष अहम रहा है। साल 2017 से पहले ठाकुरद्वारा जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती थी। कंचन सिंह ने काफी भागदौड़ करने के बाद गांव में पुल बनवाया और इसके बाद आवागमन आसान हुआ। अब गांव का गन्ना उत्तर प्रदेश तक जाता है और उसके अच्छे दाम मिल जाते हैं, साथ ही पढ़ाई के लिए बाहर जाना भी सहज हो गया है। बावर खेड़ा ग्राम पंचायत से अलग होना भी कंचन सिंह के प्रयासों से जोड़ा जाता है।
अर्जुन ने बताया कि गांव की कई लड़कियां भी सरकारी नौकरी में हैं और उन्हें बराबरी की नजर से देखा जाता है। गांव के एक युवा अरविंद कुमार राज्य स्तर पर वॉलीबॉल खेल चुके हैं और वह गांव के अन्य लड़कों को भी वॉलीबॉल का प्रशिक्षण देते हैं। गांव के करीब पंद्रह लड़के इस खेल में बढ़िया हैं और यहां वॉलीबॉल टूर्नामेंट भी हो चुका है।
उत्तराखंड में खेती पर गहरा संकट : तिल, चौलाई और कीवी बन सकते हैं सहारा
अल्मोड़ा जिले के स्याल्दे क्षेत्र में कई किसानों के अनुसार एक दशक पहले तक आबाद रहने वाली खेती अब गोवंश और जंगली पशुओं की पहली पसंद बन गई है। खेतों में लगाए पौधे रात भर में नष्ट हो जाते हैं। स्याल्दे में एक चाय की दुकान पर प्रेमगिरी गोस्वामी से मिलना एक संक्षिप्त पहाड़ यात्रा को सफल कर गया।
चौखुटिया की पुरानी कृषि सफलता और उसका पतन
स्याल्दे के 91 वर्षीय कृषि विशेषज्ञ प्रेमगिरी गोस्वामी बताते हैं कि वर्ष 1974 से 1980 तक वे भारत जर्मनी कृषि विकास परियोजना आईगाडा में एडवाइजर रहे। उनका कार्यक्षेत्र चौखुटिया था, जो उस समय उच्च उत्पादन वाला ब्लॉक माना जाता था। उनके अनुसार उस दौर में गेहूं की उन्नत किस्में, धान की कई किस्में और व्यावसायिक सब्जियों का उत्पादन तेजी से बढ़ा।
प्रेमगिरी गोस्वामी बताते हैं कि चौखुटिया, स्याल्दे और ऊंचाई वाले अन्य इलाकों में नाशपाती और कागजी नींबू का सफल प्रयोग हुआ था। नाशपाती और नींबू दोनों ही ऊंचाई के हिसाब से बेहतर पैदावार देते थे। गोस्वामी के अनुसार कागजी नींबू की एक खासियत यह थी कि बंदर तक उसे नहीं खाते थे।
उनके अनुसार वर्ष 1980 में चौखुटिया ब्लॉक को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उच्च उत्पादन के लिए सम्मानित किया गया था। वह बताते हैं कि पिछले एक से दो दशक में कृषि में गिरावट आवारा पशुओं की संख्या बढ़ने और बैल आधारित कृषि के खत्म होने के बाद शुरू हुई।
आवारा पशुओं से बढ़ती समस्या
प्रेमगिरी गोस्वामी के अनुसार पशु चराई और बैलों के व्यापार में कमी आने के बाद खेत खाली होने लगे। जंगली पशु, खासकर बंदर और सूअर, कई फसलों को नुकसान पहुंचा देते हैं। उनका मानना है कि वर्तमान स्थिति में खेती को बचाने के लिए सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़ना ही एकमात्र मार्ग है।
तिल की खेती किसानों के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्प
गोस्वामी बताते हैं कि तिल वह फसल है जिसे जंगली पशुओं से लगभग कोई खतरा नहीं होता। उनके अनुसार उन्होंने इस उम्र में भी लोगों को जागरूक कर स्याल्दे सहित कई इलाकों में तिल बड़े पैमाने पर लगाया है। तिल लगभग 120 से 130 दिनों में तैयार हो जाता है। इसका तेल आसानी से बिक जाता है और पूजा सामग्री के रूप में भी इसकी स्थायी मांग रहती है। उनके अनुसार कम क्षेत्र में भी चार महीने में लगभग दो से तीन हजार रुपये की आमदनी संभव है।
चौलाई, कीवी और कागजी नींबू : सुरक्षित और बाजार में मजबूत
प्रेमगिरी गोस्वामी बताते हैं कि चौलाई भी ऐसी फसल है जिसे जानवर नहीं खाते। चौलाई की हरी पत्तियां सब्जी के रूप में उपयोग होती हैं और इसके दानों से लड्डू और रामदाना जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं। यह फसल बाजार में स्थायी मांग रखती है। हरिद्वार और स्थानीय पहाड़ी बाजारों में चौलाई के दाने और लड्डू की नियमित मांग रहती है।
वे बताते हैं कि तिल और चौलाई दोनों में ही पानी की आवश्यकता कम होती है। इसी तरह कागजी नींबू को भी जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते।
वर्ष 2015 में पांच हजार से छह हजार फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जिला प्रशासन द्वारा उनके सुझाव पर कीवी के पौधे वितरित किए गए थे। शुरुआती वर्षों में कई परिवारों को कीवी की खेती से अच्छी आमदनी हुई।
प्रेमगिरी गोस्वामी रेशम पालन को भी पहाड़ी क्षेत्रों की एक महत्वपूर्ण संभावना मानते हैं। इसके लिए उन्होंने शहतूत की खेती की है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि इसके लिए मजबूत तारबाड़ जरूरी है, ताकि जानवरों से फसल की सुरक्षा हो सके।
खेती को पुनर्जीवित करने के लिए क्या जरूरी है
प्रेमगिरी गोस्वामी के अनुसार खेती को फिर से पटरी पर लाने के लिए तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं। सुरक्षित फसलों का चयन, अच्छी मार्केटिंग और खेतों तक योजनाओं की पहुंच। उनका मानना है कि यदि खेतों पर काम करने वाली पुरानी योजनाएं फिर से लागू की जाएं और फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, तो कृषि क्षेत्र को राहत मिल सकती है।
AI Gemini की इस किताब को पढ़ने के बाद बनाई गई यह 'पॉलिसी ब्रीफ' (Policy Brief) संबंधित विभागों और नीति-निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण रोडमैप साबित हो सकता है।
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