Friday, January 2, 2026

मेरे हिस्से की अस्कोट आराकोट यात्रा

शीर्षक - मेरे हिस्से की अस्कोट आराकोट यात्रा

उप शीर्षक - एक पत्रकार की डायरी

नोट - इस पुस्तक के कुछ अंश लेखक द्वारा पूर्व में NDTV India पर प्रकाशित रिपोर्टों के विस्तारित व संशोधित रूप हैं।


प्राक्कथन

हिमालय को जानने की ललक और उसे जीने के अनुभव के बीच जो दूरी है, उसे केवल पैदल चलकर ही नापा जा सकता है। बचपन में अखबारों के पन्नों पर डॉ. शेखर पाठक के आलेखों को पढ़ते हुए जिस उत्तराखंड की छवि मन में बनी थी, उसे साक्षात देखने और महसूस करने का अवसर मुझे साल 2024 की 'अस्कोट-आराकोट यात्रा' ने दिया। एक पत्रकार के तौर पर मेरी दृष्टि हमेशा सवालों के इर्द-गिर्द रही, लेकिन एक यात्री के तौर पर इस पखवाड़े भर की यात्रा ने मुझे उन उत्तरों से मिलवाया जो फाइलों में नहीं, बल्कि पहाड़ की पगडंडियों पर बिखरे थे।

यह किताब मात्र एक यात्रा का विवरण नहीं है, बल्कि मेरे भीतर की उस छटपटाहट और जिज्ञासा का परिणाम है जो उत्तराखंड के सीमांत गांवों की वास्तविकता को दर्ज करना चाहती थी। मैंने देखा कि कैसे केदारनाथ के नजदीक बसा 'बड़ासू' गांव अपनी खेती छोड़कर पूरी तरह यात्रा पर निर्भर हो चुका है, और कैसे 'डख्याट' के ग्रामीण आज भी अपने जंगल को अपनी औलाद की तरह सींच रहे हैं। यात्रा के दौरान डॉ. शेखर पाठक जी को एक पुराने पुल पर किसी जिज्ञासु बालक की तरह चहलकदमी करते देखना और पत्थरों की भाषा को उनसे समझना मेरे लिए किसी महान ग्रंथ को पढ़ने जैसा था।
इस वृत्तांत के दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा यात्रा के उन पड़ावों की कहानी है जहाँ मैंने 'बड़ासू' के संकट, 'नंदगांव' के बदलते सरोकार, 'स्वील' की पौराणिक कथाओं और 'हनोल' की अटूट आस्था को करीब से देखा। यहाँ मैंने पहाड़ की उन महिलाओं के संघर्ष को भी महसूस किया जो 'महिला समाख्या' जैसे मंचों के बंद होने के बाद आज भी अपनी आवाज को नई पहचान देने की कोशिश कर रही हैं।

दूसरा हिस्सा यात्रा के बाद की उस 'दृष्टि' का विस्तार है, जिसने मुझे भीमताल के तितली केंद्र से लेकर हरिद्वार के फ्लाईओवरों के नीचे बसने वाली एक समानांतर दुनिया तक पहुँचाया। इसमें टनकपुर के ठहरे हुए विकास की टीस है और स्याल्दे के प्रेमगिरी गोस्वामी के अनुभवों से उपजी खेती की नई उम्मीदें भी शामिल है।

मैंने इस किताब को एक पत्रकार की तटस्थता और एक पहाड़ी के सरोकारों के साथ लिखा है। मेरा मानना है कि पहाड़ की नीतियां वातानुकूलित कमरों में नहीं, बल्कि 'ईशाली' की टूटी हुई नहरों और 'त्यूणी' के ढहते बाज़ारों के बीच तय होनी चाहिए।

यह किताब उन पाठकों के लिए है जो हिमालय को केवल पर्यटन की दृष्टि से नहीं, बल्कि एक जीवंत और संघर्षशील समाज के रूप में देखना चाहते हैं। अंततः, यह यात्रा खुद को समझने और अपनी जड़ों की ओर लौटने की एक कोशिश है। मुझे विश्वास है कि इस किताब को पढ़ते हुए आप भी मेरे साथ उन रास्तों पर चलेंगे जहाँ पैरों में चिपक रही जोंक के बीच पहाड़ का भविष्य आज भी एक नई सुबह की प्रतीक्षा कर रहा है।




भाग 1 - यात्रा के दौरान


केदारनाथ के नजदीक बड़ासू गांव। यात्रा पर टिकी रोजी, पानी का संकट और टूटा ढांचा

रुद्रप्रयाग जिले के उखीमठ ब्लॉक में स्थित बड़ासू गांव केदारनाथ धाम के नजदीक है। लगभग बारह सौ की आबादी वाला यह गांव खेती से निकलकर अब पूरी तरह केदारनाथ यात्रा पर निर्भर हो चुका है। सड़क से करीब आठ सौ मीटर दूर बसे इस गांव के सामने आजीविका, शिक्षा, पानी और आपदा से जुड़े सवाल आज भी जस के तस हैं। अस्कोट आराकोट यात्री त्रिजुगीनारायण पहुंचे थे तो मैं वहां उनसे जुड़ने की जगह हाइवे के किनारे ही बसे बड़ासू गांव के लोगों से मिलने चला गया।

आबादी, खेती और बदलती आजीविका

बड़ासू गांव में करीब 180 परिवार रहते हैं। एक घर में औसतन तीन कमरे हैं। गांव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कभी कृषि था, लेकिन बंदर और सुअर की बढ़ती समस्या ने खेती को लगभग नुकसानदेह बना दिया है। यहां गेहूं और धान की खेती होती है। सर्दियों में हल्की बर्फ भी गिरती है, जिससे खेती का समय सीमित हो जाता है।
गांव के नरेंद्र सिंह बर्तवाल का होटल राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही है, अपने होटल में वह बताते हैं कि बड़ासू में लगभग सभी लोग सामान्य जाति से हैं। खेती से आय घटने के बाद गांव के लोगों की निर्भरता केदारनाथ यात्रा पर बढ़ गई है। कई ग्रामीणों ने सड़क किनारे होटल बनाए हैं, जिन्हें चार से पांच लाख रुपये में लीज पर दिया जाता है। इनमें हर साल एक से दो लाख रुपये तक का खर्च सिर्फ मेंटिनेंस में चला जाता है।
कई परिवार घोड़े-खच्चरों के व्यवसाय से भी जुड़े हैं। एक व्यक्ति के पास तीन से चार घोड़े तक हैं। एक जोड़ी घोड़े की कीमत चार से छह लाख रुपये तक होती है। ये घोड़े नजीबाबाद से मंगाए जाते हैं। घोड़े को खिलाने और नेपाली मजदूर को भुगतान करने के बाद साल भर में एक घोड़े से लगभग एक लाख रुपये की बचत होती है। हालांकि घोड़ों के लिए घास लाने में जोखिम भी है और कई बार महिलाएं पहाड़ियों से फिसलकर गिर जाती हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी की दिक्कत

नरेंद्र सिंह बताते हैं कि गांव में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति कमजोर है। गांव में केवल प्राइमरी स्कूल है। इसके बाद हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए बच्चों को लगभग सात किलोमीटर दूर फाटा जाना पड़ता है। क्षेत्र के लगभग हर गांव में यही स्थिति है कि पढ़ाई के लिए चार से पांच किलोमीटर दूर जाना मजबूरी है।
आठवीं के बाद खर्च वहन न कर पाने की वजह से कई लड़के और लड़कियों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। यह पलायन का एक बड़ा कारण भी बनता है। लोग अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए गांव छोड़कर बाहर चले जाते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं के लिए श्रीनगर अस्पताल सबसे नजदीक है, जो लगभग अस्सी किलोमीटर दूर पड़ता है। गांव में पानी की समस्या लगातार बनी रहती है। घरों में शौचालय बने हैं, लेकिन पाइपलाइन बार-बार टूटने से पानी की नियमित आपूर्ति नहीं हो पाती।
गांव के नीचे नदी बहती है, जिससे जलाने की लकड़ी तो मिल जाती है, लेकिन पीने के पानी का संकट बना रहता है। महिलाओं की स्थिति भी आसान नहीं है। परंपरा के अनुसार पीरियड्स के दौरान अब भी कई महिलाओं को घर से बाहर नहाना पड़ता है, क्योंकि उन दिनों घर में बने बाथरूम का उपयोग वर्जित माना जाता है।

आपदा की यादें और टूटता बुनियादी ढांचा

साल 2013 में आई केदारनाथ आपदा से बड़ासू गांव भी गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था। नरेंद्र सिंह बर्तवाल ने इस विषय पर बात करते हुए कहा कि उस आपदा में गांव के 24 से 25 लोगों की मौत हुई थी। कई बच्चे घोड़ों के साथ केदारनाथ यात्रा पर जाते थे, इस वजह से मरने वालों में बच्चों की संख्या ज्यादा थी।
आपदा के दौरान गांव की पुरानी सीढ़ियां पूरी तरह टूट गईं। आज भी गांव के भीतर आने-जाने के रास्ते पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए हैं। ऊपर राष्ट्रीय राजमार्ग का काम चल रहा है और उसका मलबा नीचे गांव की ओर गिरता रहता है, जिससे पहले से खराब रास्ते और ज्यादा बिगड़ गए हैं।
केदारनाथ यात्रा से जुड़ी उम्मीदों के बावजूद बड़ासू गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं, सुरक्षित रास्तों और स्थायी आजीविका के इंतजार में खड़ा है। पूरे साल में सिर्फ दो महीने ऐसे होते हैं, जब केदारनाथ यात्रा के दौरान कुछ कमाई और हलचल होती है। बाकी समय गांव का जीवन सीमित संसाधनों और अनिश्चित आय पर टिका रहता है।



उत्तरकाशी में डॉ. शेखर पाठक के नाम एक शाम

बड़ासू के बाद यात्रियों के साथ मेरा पहला दिन उत्तरकाशी में रहा, जहां रात को हम सब डिनर के लिए शहर के मध्य स्थित एक होटल में थे।

चंदन डांगी बताया कि अस्कोट-आराकोट यात्रा केवल एक पैदल भ्रमण नहीं, बल्कि हिमालय को उसकी समग्रता में समझने का एक जीवंत उपक्रम है। 25 मई को पांगू से शुरू हुई यह यात्रा जब तक उत्तरकाशी पहुँची, हम लगभग 900 किलोमीटर का सफर तय कर चुके थे। वर्ष 1974 में कुँवर प्रसून, प्रताप शिखर, शमशेर सिंह बिष्ट और डॉ. शेखर पाठक जैसे मनीषियों द्वारा शुरू की गई यह मुहिम अब अपने छठे पड़ाव (6th दशक) में है। इन युवाओं ने सुंदर लाल बहुगुणा से प्रेरणा लेकर इस तरह की अध्ययन यात्रा का प्रयोग किया था।

 गांधीवादी पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट जी ने इसे 'चलता-फिरता विश्वविद्यालय' यूँ ही नहीं कहा था।
अपने गांवों, अपनी नदियों और अपनी घाटियों को उनकी मूल पहचान के साथ पुन: खोजना ही इस यात्रा का मुख्य ध्येय है।

चंदन डांगी ने यात्रा के बारे में विस्तार से बताते हुए आगे कहा कि यह यात्रा प्रति दस वर्ष में 25 मई को अमर शहीद श्रीदेव सुमन के जन्मदिन पर शुरू होती है। यह तिथि प्रतीकात्मक है, क्योंकि 'जल, जंगल और जमीन' पर स्थानीय अधिकारों की जो लड़ाई श्रीदेव सुमन ने लड़ी थी, वह हिमालय के गांवों में आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। पाँच अलग-अलग जनजातीय क्षेत्रों से गुजरते हुए यह यात्रा हमें सिखाती है कि मान्यताओं, देवी-देवताओं और सामाजिक संरचनाओं की विविधता के बावजूद पहाड़ का अंतर्मन एक ही है।
लेकिन 1974 से 2024 के बीच का यह सफर कई विसंगतियों को भी उजागर करता है। बीते पाँच दशकों में पहाड़ का भूगोल और संस्कृति दोनों बदले हैं। जहाँ एक ओर पत्थर के पारंपरिक मकानों की जगह कंक्रीट के ढांचों ने ले ली है, वहीं एक सुखद बदलाव शिक्षा के क्षेत्र में दिखा है। 1974 में जिस पहाड़ में लड़कियों की शिक्षा एक सपना थी, आज वहीं की बेटियाँ हर क्षेत्र में शीर्ष (Top) पर हैं।
दूसरी ओर, विकास का जो आधुनिक मॉडल हम देख रहे हैं, वह डराने वाला है। 'खोदो और नदी में डाल दो' की नीति ने हमारी जीवनदायिनी नदियों को मलबे के ढेर में बदल दिया है। उत्तरकाशी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में वरुणावत पर्वत का खतरा और भूकंप की आहट के बीच बड़े बांधों का निर्माण एक आत्मघाती कदम जैसा प्रतीत होता है।

प्रोफेसर गिरिजा पांडे ने भी अपनी बात रखते हुए कहा कि सांस्कृतिक यात्राओं का स्वरूप अब केवल अनियंत्रित 'पर्यटन' तक सिमट गया है। मंदाकिनी, भिलांगना और भागीरथी जैसी पवित्र नदियों के तट आज गंदगी और प्लास्टिक से पटे हैं। सोनप्रयाग, सीतापुर और फाटा जैसे पड़ावों पर घोड़ों की लीद और कचरे के कारण मक्खियों का आतंक है। नदियों में फेंकी जा रही प्लास्टिक की बोतलें और गंदगी न केवल सिंचाई के लिए खतरनाक हैं, बल्कि यही प्रदूषित पानी आगे चलकर करोड़ों लोगों की प्यास बुझाता है। यह गंदगी हमारी वनस्पतियों और पारिस्थितिकी तंत्र को धीरे-धीरे लील रही है।
इन्हीं चिंताओं और जमीनी हकीकतों को समेटे हुए, राजकीय इंटर कॉलेज 'गढ़ बरसाली' (डुंडा) में वन विभाग के साथ वृक्षारोपण कर और स्थानीय प्रशासन व जनता का स्नेह समेटते हुए हम उत्तरकाशी पहुँचे हैं। 

डॉ. शेखर पाठक ने अपना संबोधन शुरू करते हुए मैनेरी और विल्सन की कहानी शुरू की। उन्होंने बताया कि 2004 में भी यात्रा के दौरान उन्होंने यह कहानी साझा की थी, लेकिन हर बार इसे सुनना एक नया अनुभव होता है। मैनेरी की कहानी उत्तराखंड के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे अंग्रेजों ने 1815 के आसपास चालाकी से हिमालय के हिस्से हथिया लिए और कैसे विल्सन जैसे व्यापारी यहां की अर्थव्यवस्था और समाज का हिस्सा बन गए।


डॉ. पाठक ने आगे बताया कि गोरखा युद्ध के बाद जब अंग्रेजों ने गोरखों को हराया, तो गढ़वाल का विभाजन हो गया। अलकनंदा नदी को सीमा बनाया गया। नदी के पूर्व का हिस्सा ब्रिटिश गढ़वाल बना, जो सीधे अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। नदी के पश्चिम का हिस्सा टिहरी रियासत को दे दिया गया।

यह विभाजन कोई संयोग नहीं था, अंग्रेजों ने बहुत चालाकी से हिमालय के वे हिस्से अपने पास रखे जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण थे। उन्हें जो हिस्से कम महत्वपूर्ण लगे, वे टिहरी के राजा को सौंप दिए।

उन्होंने बताया कि अंग्रेजों का उद्देश्य केवल व्यापार नहीं था। वे हिमालय क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे ताकि रूस और चीन के खिलाफ एक रणनीतिक स्थिति बना सकें।

मैनेरी ब्रिटिश गढ़वाल में आता था। यह क्षेत्र अंग्रेजों के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां से तिब्बत और हिमालय के अन्य हिस्सों तक पहुंचा जा सकता था। यहीं से विल्सन की कहानी शुरू होती है।

डॉ. पाठक ने कहा कि विल्सन 1845 के आसपास मैनेरी पहुंचा। वह एक अंग्रेज व्यापारी था जो यहां सामान खरीदने और बेचने के लिए आया था। उस समय उत्तराखंड में ऊन, कस्तूरी, जड़ी-बूटी और अन्य स्थानीय उत्पादों का व्यापार फलफूल रहा था। तिब्बत से भी व्यापारी आते थे।

विल्सन ने मैनेरी में अपना व्यापार स्थापित किया। धीरे-धीरे उसका व्यापार बढ़ा और वह यहां का एक महत्वपूर्ण व्यापारी बन गया।
विल्सन यहां की संस्कृति और समाज में घुल-मिल गया। उसने यहीं शादी की और यहीं परिवार बसाया।


विल्सन की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा साझा करते शेखर पाठक ने कहा कि उसने स्थानीय महिला से शादी की। विल्सन के तीन बेटे हुए, जिसमें दो गोरे और एक काला था। तब अंग्रेज और स्थानीय लोगों के बीच शादियां होती थीं। इससे एक मिश्रित संस्कृति का जन्म हुआ।

विल्सन का परिवार मैनेरी में बस गया। उसका व्यापार फलफूल रहा था। उसके बेटे भी व्यापार में हाथ बंटाने लगे।

डॉ. पाठक ने बताया कि पहाड़ पत्रिका में विल्सन के बारे में एक विस्तृत लेख प्रकाशित हुआ था। अगर आप विल्सन के बारे में और जानना चाहते हैं, तो वह लेख जरूर पढ़ें।

विल्सन के बाद डॉ. पाठक ने हेनरी हारा की कहानी सुनाई। हेनरी हारा भी इस घाटी से जुड़े एक दिलचस्प व्यक्ति थे।
हेनरी हारा एक माउंटेनियर होने के साथ ओलंपिक चैंपियन भी थे।

लेकिन उनकी कहानी का सबसे दुखद हिस्सा यह है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्हें हाउस अरेस्ट में रखा गया। डॉक्टर पाठक ने कहा कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों को हर उस व्यक्ति पर शक था जो जर्मनी या जापान से जुड़ा हो सकता था। हेनरी हारा की पृष्ठभूमि के कारण उन्हें संदेह की नजर से देखा गया और उन्हें हाउस अरेस्ट में रख दिया गया।
यह उस समय की त्रासदी थी, हारा की कहानी यह दर्शाती है कि कैसे युद्ध के समय में निर्दोष लोगों को भी परेशानी झेलनी पड़ती है।

डॉ. पाठक ने कहा कि जब हम यहां यात्रा करते हैं, तो हमें केवल प्राकृतिक सुंदरता ही नहीं देखनी चाहिए। हमें यह भी समझना चाहिए कि उत्तरकाशी का इतिहास कितना जटिल और दिलचस्प है।

विल्सन और हारा की कहानियों के बाद डॉ. पाठक ने सामाजिक पहलुओं पर बात शुरू की। उन्होंने बताया कि मैनेरी और उत्तरकाशी क्षेत्र में अंग्रेजों के आने से स्थानीय समाज पर कई तरह के प्रभाव पड़े। व्यापार के साथ-साथ सामाजिक संरचना में भी बदलाव आया।
अंग्रेज व्यापारियों और स्थानीय लोगों के बीच रिश्ते बने। शादियां हुईं और मिश्रित परिवार बने।

डॉक्टर पाठक के संबोधन के बाद डिनर का अंत मार्तंड बडोनी के संगीत से हुआ।




नंदगांव में खेती से पर्यटन तक का सफर, बुजुर्गों की स्मृतियों और युवाओं की उम्मीदों के बीच गांव

अगली सुबह हमें फलांचा खरकाना की पहाड़ी पार कर नांदगांव पहुंचना था और बिना किसी तैयारी के साथ यह मेरे जीवन का पहला ट्रैकिंग अनुभव होने वाला था। सालों बाद इतना चलना था और शुरुआती चढ़ाई में ही मेरी जांघें जवाब देने लगी थी। स्पोर्ट्स शू पहाड़ियों से फिसल रहे थे, इन सब चुनौतियों के बाद ही मैंने समझा कि यात्रा खुद को समझने का सबसे अहम जरिया हैं। साथी यात्रियों की हिम्मत देखकर ही मेरे कदम आगे बढ़ते गए और माया चिल्वाल, हेमंत बिष्ट, हिमांशु विश्वकर्मा ने यात्रा पूरी करने का हौंसला बनाए रखा।
नंदगांव से करीब 12 किलोमीटर ऊपर की पैदल चढ़ाई पर स्थित एक छानी में हमें एक व्यक्ति मिले, कई किलोमीटर घने जंगल के बीच पैदल चलने के बाद हमें पहले इंसान दिखाई दिए थे। बातचीत में उन्होंने बताया कि वे नंदगांव के ही रहने वाले हैं। हर साल जून से लेकर बरसात के महीनों तक वे अपने पशुओं के साथ गांव से ऊपर स्थित इस छानी में आकर रहते हैं। गाय और भैंस पालना उनकी आजीविका का मुख्य आधार है। इस दौरान उनका रहना, खाना बनाना और रोजमर्रा की जरूरतों का इंतजाम छानी में ही होता है। नंदगांव के अन्य परिवारों की भी आसपास इसी तरह की छानियां हैं।
उन्होंने बताया कि वे पहले बिजली विभाग में लाइनमैन के पद पर कार्यरत थे और सेवानिवृत्ति के बाद खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। 

जंगल से सटे इस इलाके में पशुपालन करने वाले लोगों और जंगलात विभाग के बीच टकराव का इतिहास भी रहा है। उन्होंने बताया कि उनके बुज़ुर्गों ने पहले जंगलात विभाग के साथ एक मुकदमा लड़ा था, जिसे वे जीत गए थे। उनके मुताबिक यह इलाका पंचायत के दायरे में आता है और वर्षों से यहां पशुपालन होता रहा है। उनसे बातचीत के बाद हम आगे बढ़े और रात नंदगांव पहुंचने के बाद अगली सुबह इस गांव को समझना बाकी था।

उत्तरकाशी जिले के नौगांव ब्लॉक में स्थित नंदगांव बीते कुछ वर्षों में तेजी से बदला है। यह गांव नौगांव नगर पंचायत से करीब 12 किलोमीटर, उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से लगभग 135 किलोमीटर और देहरादून से करीब 185 से 190 किलोमीटर दूर है। कभी पूरी तरह खेती पर निर्भर रहा नंदगांव अब पर्यटन, होटल और रिजॉर्ट के जरिए नई पहचान बना रहा है। गांव में आज करीब 250 से 300 परिवार रहते हैं और स्थानीय लोगों के अनुसार यहां से पलायन अपेक्षाकृत कम है।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में सड़क और पानी की सुविधा मौजूद है और सीमित ही सही लेकिन रोजगार के कुछ अवसर भी हैं। इसी वजह से सेना, पुलिस और अन्य सरकारी सेवाओं में कार्यरत कई परिवार आज भी गांव में ही रहना पसंद कर रहे हैं। गांव के लगभग हर दूसरे परिवार से कोई न कोई सदस्य सरकारी नौकरी में है।

खेती से होटल तक, मनोज बिष्ट की पहल और बढ़ता पर्यटन

नंदगांव के निवासी मनोज बिष्ट बताते हैं कि उन्होंने करीब एक साल पहले अपनी ही जमीन पर होटल और पर्यटन से जुड़ा काम शुरू किया। इससे पहले वह पूरी तरह खेती पर निर्भर थे। उनका कहना है कि यह काम इसी पर्यटन सीजन से ठीक तरह से शुरू हुआ है और अब धीरे-धीरे बाहर से लोग यहां आने लगे हैं।
मनोज बिष्ट के मुताबिक नंदगांव में अब करीब 15 से 20 रिजॉर्ट और होटल बन चुके हैं। इससे गांव के युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल रहा है और खेती के अलावा आजीविका का एक नया विकल्प सामने आया है। हालांकि वह यह भी कहते हैं कि पर्यटन से आय स्थायी होगी या नहीं, यह पूरी तरह आने वाले समय पर निर्भर करता है।

बुजुर्गों की स्मृतियों में पुराना नंदगांव, कम घर और ज्यादा खेती

गांव की 76 वर्षीय बुजुर्ग महिला कमला बिष्ट बताती हैं कि पहले नंदगांव में बहुत कम घर हुआ करते थे। उनके अनुसार उस समय करीब सौ के आसपास मकान थे, जबकि आज गांव काफी फैल चुका है। पहले ऊपर पहाड़ से लेकर नीचे सड़क तक ज्यादातर जमीन खेती के काम आती थी।
कमला बिष्ट कहती हैं कि धान, गेहूं और राजमा की खेती खूब होती थी। अब हालात बदल गए हैं और बड़ी संख्या में खेत बंजर हो चुके हैं। बच्चे पढ़ लिखकर बाहर निकल गए हैं और गांव में अब ज्यादातर बुजुर्ग ही रह गए हैं। उन्होंने बताया कि उनका खुद का सेब का बगीचा भी था, लेकिन मेहनत ज्यादा और कमाई कम होने के कारण अब उन्होंने वह बगीचा छोड़ दिया है।

कोटि बनाल शैली के घर और जंगल से टूटता रिश्ता

कमला बिष्ट बताती हैं कि पहले गांव के घर कोटि बनाल शैली में बनाए जाते थे और घरों के फर्नीचर में देवदार की लकड़ी का इस्तेमाल आम था। वन कानूनों में बदलाव के बाद अब लकड़ी आसानी से उपलब्ध नहीं होती, इसी वजह से इस तरह के पारंपरिक घर बनना लगभग बंद हो गया है। उनका कहना है कि लोगों का जंगल से जुड़ाव भी पहले जैसा नहीं रहा है और जंगल में आग जैसी घटनाओं के समय सामूहिक भागीदारी भी कम हुई है।

शिक्षा गांव में सीमित, बाहर जाना मजबूरी

नंदगांव में प्राथमिक शिक्षा की सुविधा है, लेकिन पांचवीं के बाद बच्चों को पढ़ाई के लिए इसी ग्राम सभा क्षेत्र में आने वाले गंगनानी गांव जाना पड़ता है। पैदल रास्ते से यह दूरी करीब डेढ़ किलोमीटर है। गांव में डिग्री कॉलेज नहीं है। इसके लिए छात्रों को तटाओ गांव जाना पड़ता है। उच्च शिक्षा के लिए बड़ी संख्या में युवा उत्तरकाशी और देहरादून का रुख करते हैं।

स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित, बड़कोट और देहरादून पर निर्भरता

नंदगांव में छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज आसपास और बड़कोट अस्पताल में हो जाता है, लेकिन गंभीर बीमारी और प्रसव के मामलों में लोगों को आज भी बड़कोट या देहरादून जाना पड़ता है। गांव के युवा सिद्धांत बिष्ट देहरादून में रहकर नीट की तैयारी कर रहे हैं, वह बताते हैं कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों को देहरादून पहुंचाने में साढ़े चार से पांच घंटे तक का समय लग जाता है।
कमला बिष्ट कहती हैं कि पहले अस्पताल की सुविधा न होने के कारण गांव में गर्भवती महिलाओं की मौतें आम थीं। उन्होंने अपने जीवन में 20 से 25 ऐसे मामले देखे हैं। अब स्थिति पहले से बेहतर जरूर हुई है और सामान्य डिलीवरी तथा ऑपरेशन पास के अस्पतालों में हो जाते हैं, लेकिन जटिल मामलों में आज भी देहरादून जाना मजबूरी है।

परंपराएं, सामाजिक रिवाज और बदलती सोच

सिद्धांत बताते हैं कि गांव में एक खास सामाजिक रिवाज आज भी निभाया जाता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर गांव के हर परिवार से एक व्यक्ति मुंडन कराता है। वह यह भी बताते हैं कि गांव के लगभग हर दूसरे परिवार से कोई न कोई सदस्य सरकारी नौकरी में है।
कमला बिष्ट के अनुसार महिलाओं की स्थिति में भी समय के साथ बदलाव आया है। वह खुद सदरी, कमीज और धोती पहनती हैं, जबकि नई पीढ़ी की महिलाएं अब सूट, जींस, धोती या साड़ी पहन रही हैं। परंपराएं अब भी मौजूद हैं, लेकिन उनमें पहले जैसी सख्ती नहीं रही।
उन्होंने बताया कि पीरियड्स के दौरान महिलाओं को सात दिन तक पूजा और धार्मिक कार्यों से दूर रखा जाता है, लेकिन अन्य किसी तरह के प्रतिबंध नहीं लगाए जाते। वहीं बच्चे के जन्म के बाद महिला को 21 दिन तक अलग रखा जाता है।

जलवायु परिवर्तन और खेती पर संकट

कमला बिष्ट कहती हैं कि पिछले एक-दो साल से गर्मी बेतहाशा बढ़ी है। अपने 75–76 साल के जीवन में उन्होंने ऐसी गर्मी पहले कभी नहीं देखी। इसका सीधा असर खेती पर पड़ा है। धान, गेहूं और राजमा जैसी फसलें जो पहले खूब होती थीं, अब बहुत कम हो रही हैं। पानी की कमी और मौसम के बदलते मिजाज ने खेती और पशुपालन दोनों को प्रभावित किया है।






यात्रा, बाजार और बुनियादी सुविधाओं से जूझता कस्बा

बड़कोट में अस्कोट आराकोट यात्रियों के स्वागत के लिए डाइट में प्रोग्राम रखा गया था। इसी दौरान वहां के बाजार में लोगों से बातचीत हुई।

बड़कोट में अस्पताल मौजूद है और हाल के समय में कुछ जांच सुविधाएं शुरू हुई हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाएं अब भी बेहद कमजोर हैं। गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को देहरादून रेफर किया जाता है और स्थानीय स्तर पर भरोसेमंद इलाज की सुविधा नहीं है।

बड़कोट के व्यापारी राजेश कुमार जैन बताते हैं कि हल्की बीमारी में भी यहां सही इलाज मिलना मुश्किल है। वह अपने अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि पिछले साल उन्हें बुखार हुआ था। यहां दवाइयां चलती रहीं, लेकिन बीमारी ठीक नहीं हुई। बाद में देहरादून जाकर जांच कराई गई तो पता चला कि टाइफाइड नहीं, बल्कि फेफड़ों में संक्रमण था। उनका कहना है कि गलत इलाज से स्थिति और गंभीर हो सकती थी।

राजेश के अनुसार गर्भवती महिलाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है। कई मामलों में महिलाओं को देहरादून रेफर किया जाता है और रास्ते में ही जटिलताएं हो जाती हैं। उनका कहना है कि स्वास्थ्य सुविधा की कमी यहां स्थायी संकट बन चुकी है।

पूरे तहसील का बाजार है बड़कोट

आगे बात करते हुए राजेश बताते हैं कि बड़कोट केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र का मुख्य बाजार है। बड़कोट तहसील के अंतर्गत आने वाले सौ से अधिक गांवों के लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए यहीं आते हैं। यमुनोत्री क्षेत्र तक के गांवों की निर्भरता बड़कोट बाजार पर है।

उनका कहना है कि छोटे गांवों में दुकानें जरूर खुली हैं, लेकिन असली खरीदारी आज भी बड़कोट से ही होती है। इसी वजह से बड़कोट का बाजार पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।

यात्रा सीजन और चौपट होता कारोबार

राजेश कुमार ने बताया कि बड़कोट का व्यापार मुख्य रूप से तीर्थ यात्रा पर निर्भर है। यात्रा सीजन में लाखों श्रद्धालु आते हैं और होटल, दुकानें, ढाबे सभी चलते हैं। लेकिन इस बार हालात पूरी तरह बदल गए।

उनके अनुसार यात्रा को जिस तरह नियंत्रित किया गया, उससे बड़कोट का कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ। जिन यात्रियों की बुकिंग बड़कोट में थी, वे दो तीन दिन बाद यहां पहुंचे या बीच रास्ते से लौट गए। होटल, दुकानें और लीज पर ली गई जमीनें घाटे में चली गईं।

राजेश कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा हाल पहले कभी नहीं देखा। उनका कहना है कि इस बार व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ और बाजार पूरी तरह बैठ गया।

जांच चौकियों से बना डर का माहौल

राजेश ने बताया कि हरिद्वार से लेकर यमुनोत्री तक यात्रियों को कई स्थानों पर रोका गया। पहचान पत्र और कागजों की बार बार जांच से यात्रियों में डर पैदा हुआ।

उनका कहना है कि कई यात्रियों ने यह सवाल करना शुरू कर दिया कि क्या यमुनोत्री जाने के लिए भी किसी तरह की अनुमति चाहिए। इस डर का सबसे ज्यादा नुकसान बड़कोट जैसे पड़ाव कस्बों को हुआ, जहां यात्री रुकते, खरीदारी करते और स्थानीय लोगों की आजीविका चलती थी।

पानी और सड़क, वर्षों पुरानी समस्याएं

बड़कोट में पानी की समस्या भी लंबे समय से बनी हुई है। राजाराम जगूड़ी के अनुसार पंपिंग योजना की मांग वर्षों पुरानी है। जमीन का मुआवजा बढ़ चुका है और पत्राचार भी हुआ है, लेकिन काम आज तक शुरू नहीं हो पाया।

यमुनोत्री जैसे विश्व प्रसिद्ध धाम की ओर जाने वाली सड़क की हालत को लेकर भी स्थानीय लोग नाराज हैं। उनका कहना है कि खराब सड़कें पहली बार आने वाले यात्रियों पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं और पूरे क्षेत्र की छवि प्रभावित होती है।

शिक्षा और स्वास्थ्य में पहाड़ और मैदान का फर्क

राजेश कहते हैं कि क्षेत्र में स्कूल और कॉलेज तो हैं, लेकिन व्यवस्थाएं कमजोर हैं। कहीं शिक्षक ज्यादा हैं और बच्चे कम, तो कहीं बच्चे ज्यादा और शिक्षक कम। पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है।

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी यही स्थिति है। उनका कहना है कि मैदानी इलाकों की तुलना में पहाड़ में आज भी बुनियादी सुविधाएं न के बराबर हैं और यही असमानता लोगों की सबसे बड़ी पीड़ा है।

बड़कोट की स्थिति, पूरे उत्तराखंड का सवाल

राजेश का कहना है कि बड़कोट की स्थिति केवल एक कस्बे की कहानी नहीं है। यह गढ़वाल और पूरे उत्तराखंड के उन इलाकों की तस्वीर है, जहां यात्रा, बाजार, स्वास्थ्य और शिक्षा एक दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।

लोगों को उम्मीद थी कि उत्तराखंड बनने के बाद हालात सुधरेंगे, लेकिन आज कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या सच में उनकी जिंदगी आसान हुई है। बड़कोट बाजार में बैठा हर व्यक्ति यही कहता है कि समस्या केवल यात्रा की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की है।





मंजियाली गांव : पानी, बसावट और खेती के संघर्ष 

पानी की कमी से शुरू हुई बसावट

उत्तरकाशी जिले के रवाईं क्षेत्र की मुंगरसन्ती पट्टी में स्थित मंजियाली गांव जिला मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूर है। बड़कोट से हम जब वहां पहुंचे तो गांव के प्रधान प्रकाश रावत मिले। वह बताते हैं कि वे मूल रूप से बिल्ला गांव के रहने वाले हैं, जहां पानी की भारी कमी थी। मौजूदा मंजियाली क्षेत्र में पहले गौशाला थी और लोग सर्दियों में यहां मवेशियों के साथ आते थे। धीरे-धीरे, लगभग एक पीढ़ी पहले, लोग यहीं स्थायी रूप से बस गए। गांव के पास यमुना और कमल नदी बराबर में बहती हैं, लेकिन इसके बावजूद गांव में आज तक कोई नौला नहीं है।

प्रशासन, आबादी और सामाजिक संरचना

मंजियाली गांव बड़कोट तहसील के अंतर्गत आता है, पोस्ट ऑफिस गांव से 2 किलोमीटर दूर है, एसबीआई नौगांव में है और बड़कोट तहसील 6 किलोमीटर दूर पड़ती है। गांव में जियो और एयरटेल नेटवर्क काम करता है। यहां 165 परिवार रहते हैं और कुल जनसंख्या लगभग तेरह सौ बताई जाती है। रावत, राणा, चौहान, कोहली, लाल, आर्य और कुमार समुदाय के लोग यहां रहते हैं। आबादी में लगभग 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग और शेष ओबीसी व अन्य वर्ग हैं। दलित परिवार मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं।

जंगल, जमीन और खेती की तस्वीर

गांव की वन पंचायत में आठ सदस्य हैं और रिज़र्व जंगल से लकड़ी मिलती है। बंजर भूमि ज्यादा है, फिर भी खेती होती है। यहां मटर, टमाटर, बीन्स, मंडुआ, गेहूं, झंगोरा, धान, आलू, प्याज, मक्का, चौलाई, राजमा, मसूर और तौर उगाए जाते हैं। गाय, भैंस, बकरी, खच्चर और घोड़े पाले जाते हैं और लगभग सभी परिवारों के पास अपनी जमीन है। इस क्षेत्र को रवाईं इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां लंबे समय तक हिमाचल के राजा शासन करते रहे।

सरकारी योजनाएं, शराब और महिला आंदोलन

गांव में 45 से 50 लोग सरकारी नौकरी में हैं। लोग ऑनलाइन बैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं और किसान सम्मान निधि, मनरेगा, उज्ज्वला और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। इसके साथ ही गांव में शराब का चलन भी ज्यादा बताया जाता है। इसके खिलाफ महिलाओं का आंदोलन लंबे समय से चलता आ रहा है। ग्रामीण बताते हैं कि साल 2004–05 में महिलाओं ने शराब के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया था, जिसकी याद आज भी गांव में बनी हुई है।

सूर्य मंदिर और खेती का मौजूदा संकट

मंजियाली गांव में सूर्य देव का एक मंदिर है, लेकिन इसका कोई लिखित इतिहास कहीं दर्ज नहीं है। ग्रामीण चाहते हैं कि इसका संरक्षण हो, ताकि पर्यटन के रूप में गांव को नया सहारा मिल सके। खेती की मौजूदा हालत रवींद्र कुमार की कहानी में दिखती है। उन्होंने बड़कोट के श्रीदेव सुमन कॉलेज से पढ़ाई की और एयरफोर्स में चयन भी हुआ था, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे नहीं जा सके। अब वे खेती करते हैं। इस साल बारिश की कमी से टमाटर की पैदावार में लगभग 40–50 प्रतिशत गिरावट आई है। आधुनिक मशीनें मौजूद हैं, लेकिन खेतों तक रास्ते न होने के कारण आज भी कई जगह बैलों से खेती करनी पड़ती है।



जंगल, पानी और लोग : डख्याट से ठडुंग तक पहाड़ की जमीनी कहानी


उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में जंगल और पानी का रिश्ता सिर्फ पर्यावरण का नहीं, जीवन का सवाल है। उत्तरकाशी जिले के डख्याट गांव से लेकर बड़कोट क्षेत्र के ठडुंग तक लोगों के साथ हुई बातचीत यही बताती है कि जहां जंगल पर स्थानीय समुदाय का अधिकार और जिम्मेदारी है, वहां पानी, खेती और जीवन की निरंतरता बनी रहती है। इन गांवों में जंगल की रक्षा कानून से नहीं, समझ और जरूरत से होती है। डख्याट के बारे में नंदगांव में सिद्धांत बिष्ट से सुना था तो समय निकाल कर डख्याट पहुंच कर सिद्धांत के परिचित से मुलाकात की।

डख्याट : जंगल पर ग्रामीणों का अधिकार, पानी की सुरक्षा की बुनियाद

डख्याट गांव में खेती करने वाले खेमराज सिंह ज्याड़ा बताते हैं कि गांव के जंगल पर पूरा अधिकार ग्रामीणों का है। यहां ग्राम वन पंचायत व्यवस्था लागू है और वन पंचायत समिति का सरपंच पांच साल के लिए चुना जाता है। यह चुनाव प्रशासनिक अधिकारियों की देखरेख में होता है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है।

खेमराज बताते हैं कि पिछले एक दो साल की गर्मियों में जब बड़कोट और आसपास के इलाकों में पानी की भारी किल्लत रही, तब भी डख्याट के चार पानी के स्रोत सूखे नहीं। आसपास के गांवों के लोग भी यहां से पानी लेने आए। वह कहते हैं कि पिछली गर्मी में जहां पहाड़ के कई इलाकों में लोग रजाई छोड़ चुके थे, वहीं डख्याट में रात को रजाई ओढ़नी पड़ती है। इसका कारण घना और सुरक्षित जंगल है।

रात बारह बजे भी आग बुझाने निकलते हैं ग्रामीण

डख्याट में जंगल से लकड़ी काटना और चारा पत्ती लेना पूरी तरह प्रतिबंधित है। हर पांच साल में वन पंचायत समिति की निगरानी में सीमित काट छांट की जाती है। खेमराज कहते हैं कि अगर जंगल में रात के बारह बजे भी आग लगती है तो गांव के लोग उसे बुझाने निकल जाते हैं। उनके अनुसार जब जंगल सरकार के अधीन होता है तो लोग उसे अपना नहीं मानते, लेकिन जब जंगल गांव का होता है तो हर व्यक्ति उसकी रक्षा करता है।

डख्याट का अनुभव दिखाता है कि जंगल माइक्रोक्लाइमेट बनाता है। वह तापमान को नियंत्रित करता है, नमी बनाए रखता है और पानी के स्रोतों को जीवित रखता है।

ठडुंग : जंगल देता है पानी, गांव करता है सुरक्षा

बड़कोट क्षेत्र के ठडुंग गांव में भी जंगल और पानी का रिश्ता साफ दिखाई देता है। बड़कोट से आगे निकलने के बाद गांव में मिले जगमोहन सिंह राणा बताते हैं कि ठडुंग लाल धान की खेती के लिए जाना जाता है और इसकी वजह गांव में उपलब्ध पानी का स्रोत है। गांव के ठीक ऊपर बांझ यानी ओक के पेड़ों का घना जंगल है, जिसकी ग्रामीण पूरी तरह सुरक्षा करते हैं।

जगमोहन के अनुसार गांव में सात–आठ लोगों की एक स्थायी टीम बनाई गई है, जो जंगल में आग लगने की स्थिति में वन विभाग के साथ मिलकर आग बुझाने का काम करती है। यह कोई अस्थायी व्यवस्था नहीं है, बल्कि नियमित निगरानी की एक प्रणाली है और सरकार व समुदाय के सहयोग का उदाहरण भी है।

बांझ का जंगल और खेती का सीधा रिश्ता

जगमोहन बताते हैं कि बांझ के जंगल और पानी के बीच सीधा संबंध है। बांझ के पेड़ों की जड़ें गहरी होती हैं और उनकी घनी छतरी मिट्टी और नमी को बनाए रखती है। यही जंगल पानी को धीरे धीरे छोड़ता है, जिससे नीचे खेती संभव हो पाती है।

ठडुंग में उगाया जाने वाला लाल धान पहाड़ की पारंपरिक फसल है, जिसके लिए अच्छी सिंचाई जरूरी होती है। गांव की खेती पूरी तरह ऊपर के जंगल से आने वाले पानी पर निर्भर है। जंगल कमजोर होगा तो पानी और खेती दोनों पर असर पड़ेगा।

शिक्षा, बच्चे और भविष्य के सपने

ठडुंग गांव में प्राथमिक स्कूल है, जबकि आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को पास के हुडोली जाना पड़ता है। गांव की रहने वाली आरुषि आठवीं कक्षा में पढ़ती है और हुडोली के इंटर कॉलेज में पढ़ाई कर रही है। वह बताती है कि स्कूल में सभी विषयों के शिक्षक हैं और करीब 300 बच्चे पढ़ते हैं। आसपास के चार गांवों से बच्चे यहां पढ़ने आते हैं।

आरुषि का सपना है कि वह बड़ी होकर पुलिस अफसर बने। उसके पिता किसान हैं और परिवार खेती पर निर्भर है। जमीन से खाने भर का अनाज हो जाता है, लेकिन बाजार में बेचने लायक उत्पादन नहीं हो पाता। परिवार में पांच भाई बहन हैं और सभी पढ़ाई कर रहे हैं।

खेती, आजीविका और पलायन

जगमोहन ने बताया कि ठडुंग में धान, दालें, राजमा और सब्जियां उगाई जाती हैं। खेती से बहुत अधिक कमाई नहीं होती, लेकिन गुजारा निकल जाता है। कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ कभी कभार मिल जाता है, लेकिन गांव की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार खेती ही है।

गांव वालों के अनुसार ठडुंग की आबादी करीब 800 से 900 के बीच है और परिवारों की संख्या 150 से 200 के आसपास है। पढ़ाई के लिए बच्चे बाहर जाते हैं, लेकिन परिवार स्थायी रूप से गांव छोड़कर नहीं जाते। यही वजह है कि यहां बड़े पैमाने पर पलायन नहीं दिखता।

जंगल क्यों बचता है

डख्याट और ठडुंग दोनों गांवों की कहानी एक ही बात कहती है। जंगल की रक्षा केवल कानून से नहीं होती। जंगल इसलिए बचता है क्योंकि लोग जानते हैं कि जंगल उनके जीवन का आधार है। जंगल पानी देता है, ठंडक देता है, खेती को सहारा देता है और आजीविका से जुड़ा है।

यही वजह है कि जहां जंगल पर समुदाय का अधिकार और जिम्मेदारी होती है, वहां लोग आधी रात को भी आग बुझाने निकलते हैं और जंगल को बचाए रखते हैं।






स्वील गांव : नाम के पीछे की कथा, सुतक की परंपरा और देवता की यात्रा पर टिका सामाजिक जीवन

यात्रा का एक पड़ाव स्वील गांव में पड़ता है। ठडुंग से वहां पहुंचते रात हो गई थी और गांव में मेले की धूम थी।
वहां हमारी मुलाकात मनमोहन सिंह चौहान से होती है। बातचीत की शुरुआत में वह बताते हैं कि स्वील गांव कमल सेराई पट्टी में आता है। पट्टी की संरचना को समझाते हुए वह कहते हैं कि सरकारी और राजस्व रिकॉर्ड में लगभग बीस से पच्चीस गांवों के समूह को एक पट्टी कहा जाता है। यही व्यवस्था प्रशासनिक पहचान के साथ-साथ सामाजिक जीवन को भी जोड़ती है।

स्वील गांव का नाम अपने भीतर एक लोककथा और सामाजिक परंपरा समेटे हुए है। मनमोहन बताते हैं कि जब इस क्षेत्र में बसावट शुरू हो रही थी, उस समय यहां एक महिला को प्रसव हुआ था। स्थानीय बोली में प्रसव के बाद की अवस्था को “सुतक” कहा जाता है। सुतक की अवस्था में महिला को कुछ समय के लिए अलग बैठाया जाता है और उसके हाथ का बना भोजन नहीं खाया जाता। इसी अवस्था में बैठी महिला को स्थानीय लोग “स्वीली” कहकर संबोधित करते थे। गांव के लोगों के अनुसार, इसी शब्द से धीरे-धीरे इस स्थान का नाम स्वील पड़ गया।

गांव के ही कवित चौहान साफ करते हैं कि सुतक को लेकर यहां किसी तरह का सामाजिक बहिष्कार नहीं होता। यह एक पारिवारिक परंपरा है. परिवार के लोग महिला की पूरी देखभाल करते हैं। केवल पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों से उसे कुछ समय के लिए अलग रखा जाता है। यह परंपरा लगभग हर गांव में देखने को मिलती है और स्वील में भी उसी तरह निभाई जाती है। सुतक की अवधि आमतौर पर 21 दिन मानी जाती है।

पट्टी, थान और देवता की यात्रा

स्वील पहुंचने के दिन गांव में रुद्रेश्वर महादेव का मेला लगा हुआ है। मनमोहन सिंह बताते हैं कि यह मेला हर तीसरे साल जून–जुलाई के महीनों में लगता है। यह समय पूरे क्षेत्र के लिए खास होता है, क्योंकि इसी दौरान देवता की यात्रा शुरू होती है।
मनमोहन ने कहा कि इस वर्ष तिया बजलाड़ी थान से महाराज बाहर निकले हैं और पश्चिम के कंडाव, देवल, सारी थान के लगभग तीस गांवों का भ्रमण करते हैं। वह समझाते हैं कि यहां थान का अर्थ है लगभग चौदह गांवों का समूह, जो एक ही मंदिर और देवता की पूजा करता है। रुद्रेश्वर महाराज चार थानों के देवता हैं और हर वर्ष देवता का निवास अलग-अलग थान में होता है।

इन दो महीनों के दौरान महाराज जिस-जिस गांव में पहुंचते हैं, उस दिन वहां मेला लगता है। गांव से बाहर रह रहे लोग भी इसी अवसर पर अपने गांव लौटते हैं। पूजा-पाठ, मेलों और सामूहिक भोज के जरिए गांवों का सामाजिक जीवन फिर से जुड़ता है।

पालकी, चांदी का बॉक्स और पूजा की विधि

मनमोहन सिंह विस्तार से बताते हैं कि देवता की यात्रा की शुरुआत में पहली रात महाराज की पालकी में एक चांदी का गोलाकार बॉक्स रखा जाता है। यह बॉक्स पौराणिक काल से देवता के साथ जुड़ा माना जाता है। रात में पालकी मंदिर में ही रहती है और देवता के साथ रुद्रेश्वर महादेव कमेटी के लोग वहीं निवास करते हैं।
अगली सुबह लगभग आठ बजे देवता की मूर्ति को दर्शन के लिए चांदी के बॉक्स से बाहर निकालकर देवस्थान (पीड़ा) पर रखा जाता है। इस दौरान लगभग दो से ढाई हजार लोग दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
दोपहर करीब तीन बजे देवता की मूर्ति को फिर से बॉक्स में रख दिया जाता है और पालकी को सजाया जाता है। इसके बाद मंदिर प्रांगण में पूजा होती है। गांव के लोग दो-दो कर पालकी को कंधे पर उठाते हैं। ढोल-नगाड़ों के साथ पालकी को नचाया जाता है। पूरा वातावरण भक्ति, संगीत और सामूहिक उल्लास से भर जाता है।
पूजा के बाद देवता को नाचते–गाते अगले गांव के लिए विदा किया जाता है। इसी के साथ एक गांव का मेला समाप्त होता है और अगला गांव देवता की प्रतीक्षा में सजने लगता है।

पानी, गराट और खेती पर टिका जीवन

स्वील गांव में पानी का मुख्य स्रोत सुरोध है। इसी पानी पर गांव की घरेलू जरूरतें, खेती और पारंपरिक जल संरचनाएं निर्भर रही हैं। कवित चौहन ने बताया कि एक समय गांव में सात गराट चलते थे। आज इनमें से केवल एक-दो ही सक्रिय रह गए हैं।
गराट में गेहूं और अन्य अनाज का आटा पीसा जाता है। यह पूरी तरह पारंपरिक व्यवस्था है। ग्रामीण बताते हैं कि वे पांच से दस किलो अनाज ही पिसवाते हैं, ताकि रोजमर्रा के उपयोग के लिए ताजा आटा मिल सके। गराट में पैसे नहीं लिए जाते। आटा पिसने के बाद जो थोड़ा-बहुत आटा बच जाता है, वही गराट चलाने वाले का हिस्सा होता है।

गांव में मटर और टमाटर जैसी सब्जियां भी होती हैं, लेकिन खेती पूरी तरह पानी पर निर्भर है। पानी के स्रोत पर असर पड़ते ही खेती भी प्रभावित हो जाती है। कवित ने बताया कि नीचे बहने वाली कमल नदी ने भी गांव की खेती को काफी नुकसान किया है और यह नदी अब गांव के अस्तित्व के लिए खतरा भी बन गई है। नदी ने अब तक चार पांच लोगों के खेतों में भूकटाव किया है।




महरगांव : जब बेटी के पीरियड्स पर जशोदा ने पूरे परिवार को खिलाया

परंपरा और बदलाव के बीच खड़ा एक पहाड़ी गांव

महरगांव की जशोदा ने अपनी बेटी के पहली बार पीरियड्स आने पर पूरे परिवार को भोजन कराया। गांव में जहां आज भी पीरियड्स के दौरान अलग रहने और रसोई से दूर रखने की परंपरा है, वहां जशोदा का यह कदम बदलाव की एक साफ़ तस्वीर पेश करता है। यही बदलाव, पानी, खेती, महिलाओं और सामाजिक संरचना के बीच महरगांव की असली कहानी कहता है।

जंगल से पानी, खेतों तक नालियां और सामूहिक जिम्मेदारी

महरगांव में पानी के प्राकृतिक स्रोत से खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए नालियां बनाई गई हैं। घरों तक पानी पहुंचाने के लिए स्रोत पर सीमेंट की टंकी बनाई गई है, जिससे पाइपलाइन के जरिए पानी सप्लाई होती है। गांव के ऊपर बांझ का जंगल है और यहीं से पानी का स्रोत आता है। गांव की युवती भारती पंवार बताती हैं कि जंगल में आग लगने पर गांव के दस–पंद्रह लोग झाड़ियों की मदद से आग बुझाने जाते हैं। इसे गांव वाले अपनी सामूहिक जिम्मेदारी मानते हैं।

आबादी, शिक्षा और नए मौके

महरगांव में करीब 90 परिवार रहते हैं और आबादी लगभग 800 है। गांव में करीब दस प्रतिशत लोग सरकारी नौकरी में हैं। भारती कहती हैं कि लड़कियां स्कूल जाती हैं और पढ़ाई में बराबरी देखी जाती है। पढ़ाई के लिए डिग्री कॉलेज पुरोला और बड़कोट अहम केंद्र हैं। गांव की एक लड़की और एक लड़का वायरलेस में चयनित हुए हैं। 

यात्रियों का स्वागत करने वाले और साथ ही उनके हाथों अपनी किताबों का विमोचन करवाने वाले महावीर सिंह रवॉल्टा ने रवॉल्टी भाषा में लेखन के जरिए इस क्षेत्र में खास पहचान बनाई है और अपने उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में पहाड़ का दर्द उठाया है।

खेती, लाल चावल और बदलता श्रम-संस्कृति

गांव में आलू, मटर, मंडुआ, लाल चावल, गेहूं और सोयाबीन की खेती होती है। भारती पंवार ने बताया कि आलू और मटर हिमाचल के व्यापारी ले जाते हैं। लाल चावल के लिए यह इलाका मशहूर है, यह आसपास के इलाकों में 120 रुपये किलो तक बिकता है और बाहर जाकर 200 रुपये किलो से ज्यादा में बेचा जाता है। खेती में गोबर, चारे और पत्तियों से बनी खाद का ज्यादा इस्तेमाल होता है। नई बहुएं अब खेती का काम पहले से कम करती हैं और उन पर सास का पहले जैसा दबाव नहीं है। भारती के साथ बैठे उनके परिवार के सदस्य कहते हैं कि इस साल न बर्फ पड़ी और न पहले जैसी ठंड रही।

समूह, बैंकिंग और महिलाओं की भागीदारी

गांव में दस स्वयं सहायता समूह हैं। इन समूहों से महिलाओं को दो प्रतिशत ब्याज पर बैंक कर्ज मिलता है। महावीर सिंह रवॉल्टा के घर यात्रियों से मिलने आई गांव की महिलाओं ने बताया कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं ने सिलाई मशीन और आटा पीसने की मशीनें ली हैं। हर दस समूहों पर एक सक्रिय महिला होती है, जो फील्ड में जाकर लोगों को जोड़ती है। जनधन खातों से गांव को फायदा मिला है। महिलाओं के पास एंड्रॉयड फोन हैं और वे फेसबुक व व्हाट्सएप का इस्तेमाल करती हैं, हालांकि बैंकिंग और स्किल इंडिया जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की जानकारी अब भी सीमित है।

स्वास्थ्य, पीरियड्स और सामाजिक व्यवहार

स्वास्थ्य के लिए गांव पुरोला अस्पताल पर निर्भर है, जो करीब 9 किलोमीटर दूर है। भारती पंवार के हाथ में गुड़ाई के दौरान कट लगने पर उन्हें वहीं इलाज कराना पड़ा। देहरादून नजदीक होने की वजह से डिलीवरी के दौरान महिलाओं की मौत के मामले कम बताए जाते हैं। गांव में पीरियड्स के दौरान चार दिन अलग रहने की परंपरा है, हालांकि टॉयलेट वही इस्तेमाल होता है। कुछ परिवारों में 21 दिन तक अलग बिस्तर और रसोई से दूरी भी देखी जाती है। महिलाओं ने मेंस्ट्रुअल कप के बारे में नहीं सुना है, जबकि लड़कियों ने सोशल मीडिया और टीवी से इसकी जानकारी पाई है। हमें भारती ने जशोदा के बारे में बताया, जशोदा ने अपनी बेटी के पीरियड्स शुरू होने पर पूरे गांव को खाना खिलाया था। यह एक बहुत बड़ा सामाजिक बदलाव है।

जातीय संरचना, परंपराएं और देवी का मेला

महरगांव में तीन–चार अनुसूचित जाति के परिवार हैं, जिनके अपने मकान और जमीन हैं। स्कूलों में भेदभाव की बात सामने नहीं आती। गांव में राणा, रावत, पंवार, भट्ट, बहुगुणा, नौटियाल, ठाकुर और ब्राह्मण रहते हैं। पहले यहां रावत रहते थे, बाद में अन्य जातियां भी बसीं। छानियों में रहने वाले लोगों को पहले ‘मर’ कहा जाता था, जब सब यहीं बस गए तो गांव महरगांव कहलाया। यहां माता राजराजेश्वरी का मंदिर है, जिनके पुजारी उनियाल होते हैं। हर साल 5 सितंबर को देवी का मेला लगता है और देवी की डोली महरगांव, उदकोटी और बैंणा के हर घर में जाती है।


पोरा गांव में 21–22 में बना भव्य मंदिर, गांव में पढ़ाई लिखाई का माहौल

यात्रा में आगे बढ़ते पोरा गांव पहुंचे तो इतिहास के प्रोफेसर गिरिजा पांडे साथ थे।

उत्तरकाशी जिले के रामासिराई क्षेत्र का पोरा गांव अपनी सामाजिक संरचना, शिक्षा और खेती के लिए पहचाना जाता है। गांव की आबादी करीब 1200 है और सरकारी नौकरी में लगभग 50 लोग कार्यरत हैं। यहां स्वर्ण और दलित जाति के परिवार साथ रहते हैं। घरों में आपसी आना जाना है, केवल खाने को लेकर परहेज रखा जाता है। गांव में एक ही गोत्र में विवाह नहीं होता और शादियां पोरा के साथ साथ भाबर क्षेत्र में भी होती हैं। गांव में सबसे खास बात इसमें बना भव्य मंदिर है।

डोडा कश्मीरा से आए देवता, गांव में बना भव्य मंदिर

पोरा गांव के लोकदेवता डोडा कश्मीरा माने जाते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार देवता डोडा कश्मीरा क्षेत्र से यहां आए थे, कुछ लोगों का ये मानना भी है कि डुंडा होने के कारण यह गोठा महाराज का रूप भी हैं। पहले यहां छोटा लकड़ी का मंदिर था, जिसे समय समय पर बदला गया। वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण वर्ष 2021–22 में हुआ।
हर साल 4 अगस्त से 7 अगस्त तक क्षेत्र में मेला लगता है, जिसमें आसपास के कुछ गांवों के लोग शामिल होते हैं। रामा गांव में शुरू होकर यह मेला पोरा में 7 अगस्त को लगता है। मेले में पारंपरिक पूजा, नृत्य और लोकगीत होते हैं। यह आयोजन पूरे क्षेत्र का सामूहिक धार्मिक उत्सव माना जाता है।

स्कूल गांव के पास, डिग्री कॉलेज के लिए पुरोला जाना मजबूरी

पोरा गांव में प्राइमरी स्कूल की सुविधा है। इंटर कॉलेज गुंदियाट और मोलताड़ी में है। डिग्री कॉलेज के लिए छात्रों को पुरोला जाना पड़ता है।
गांव की युवती प्रविता बताती हैं कि गांव की लगभग सभी लड़कियां पढ़ाई कर रही हैं और परिवार अब बेटियों की शिक्षा को लेकर सजग हैं। उच्च शिक्षा के लिए कुछ युवा बाहर जाते हैं, लेकिन बुनियादी पढ़ाई गांव और आसपास ही हो जाती है।

महिलाएं समूह से जुड़ीं, एनजीओ सक्रिय, फ्रूट जाम और पिरुल से उत्पाद

पोरा गांव में महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं और एक एनजीओ भी सक्रिय है। महिलाएं फ्रूट जाम बनाती हैं और पिरुल से भी कुछ उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इससे गांव में सीमित स्तर पर रोजगार के अवसर बने हैं।
प्रविता बताती हैं कि गांव की महिलाएं मोबाइल और सोशल मीडिया का उपयोग कर रही हैं। मम्मियां भी फेसबुक और इंस्टाग्राम चलाती हैं, हालांकि रोजगार से जुड़े किसी एप का उपयोग फिलहाल नहीं हो रहा।

गांव के सामाजिक नियम, शिक्षा और खेती पर एक नजर

गांव में परंपरा के अनुसार पीरियड्स के दौरान विवाहित महिलाएं किचन और पूजा में नहीं जातीं। सामाजिक रूप से गांव में शांति बनी हुई है। कुछ साल पहले पुरोला में हिंदू मुस्लिम तनाव हुआ था, लेकिन अब वहां स्थिति सामान्य है।
यहाँ शादियां आसपास के गांवों और भाबर क्षेत्र में होती हैं। दलित समाज में दूसरी जाति में शादी होने पर कई बार परिवार को बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।
खेती में लाल चावल प्रमुख फसल है, जिसे हिमाचल प्रदेश तक भेजा जाता है। गांव के लोग बताते हैं कि पहले मोटे अनाज का भाव नहीं मिलता था, लेकिन अब स्थिति कुछ बेहतर हुई है।
प्रविता के अनुसार उनके दादा खिलानंद बिल्जवाण क्षेत्र के शुरुआती शिक्षित लोगों में शामिल रहे हैं। उनकी कुछ किताबें भी प्रकाशित हुई थीं, उनके समय में आठवीं से परीक्षा देने चकराता जाना पड़ता था और क्षेत्र में स्कूल भी कम थे इसलिए उन्होंने आगे की पढ़ाई चकराता से पूरी की।
रिटायर्ड लेक्चरर डॉक्टर राधे श्याम बिल्जवाण की दो किताबें ‘मध्य हिमालय की रियासत में ग्रामीण जनसंघर्षों का इतिहास’ और ‘ये वक्त की पुकार है’ इन्हीं दिनों आई हैं, वह कहते हैं कि पोरा में पढ़ाई लिखाई का अच्छा माहौल है और गांव के कई युवा वर्तमान में महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्त भी हैं।



मोरी में गुज्जर समुदाय के कुछ परिवार, पशुपालन मुख्य आय और एक सामाजिक नियम है कमाल

उत्तरकाशी जिले के मोरी ब्लॉक में रास्ते से गुजरते हुए सांद्रा गांव में गुज्जर समुदाय के तीन से चार परिवार रहते हैं। इस डिजिटल दौर में अब गुज्जर भी समाज की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं। उनके कुछ सामाजिक नियम महिलाओं के लिए लाभकारी भी हैं। महिला समाख्या में रहीं प्रीति थपलियाल और चंद्रा भंडारी तब मेरे साथ ही पैदल चल रहे थे, गुज्जर महिलाओं को देख हम उनके घर चले गए।

रहन-सहन, आय और शिक्षा

सांद्रा गांव में सड़क के किनारे तीन - चार गुज्जर परिवार पट्टे पर मिली जमीन में लकड़ी और टिन से बनी झोपड़ियों में रहते हैं, उनके घरों के पास ही पंद्रह से बीस गाय और भैंस बंधी देखी। घर की महिलाओं में से एक जुबैदा बताती हैं कि दूध बेचकर परिवार की आय होती है और दूध नजदीक ही मोरी के बाजार में बिक जाता है। वहीं खड़े कुतुबद्दीन कहते हैं कि अब महीने में आठ से दस हजार रुपए की कमाई वाले दूध के कारोबार पर निर्भर रहना मुश्किल हो रहा है इसलिए वह गाड़ी चलाने का काम भी कर रहे हैं। बाकी कुछ परिवार अब भी सिर्फ पशुपालन पर निर्भर हैं।

पहली पीढ़ी खासकर महिलाएं स्कूल नहीं गईं लेकिन अब बच्चे पढ़ रहे हैं, प्राथमिक स्कूल पास में ही है। जुबैदा ने बताया कि नजदीक गांवों में रहने वाले समुदाय के कुछ लड़के कॉलेज भी पढ़ रहे हैं। आधार और राशन कार्ड सबके बने हैं और वे मोरी पते पर दर्ज हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं की समस्या लेकिन सामाजिक नियम कमाल के

जुबैदा ने बताया कि क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधा सीमित है और ज्यादातर प्रसव घरों में होते हैं। माहवारी को लेकर पारंपरिक मान्यताएं अब भी कायम हैं पर यह महिलाओं के लिए फायदे की ही हैं। समुदाय की महिलाओं को माहवारी के दौरान कहीं चार दिन तो कहीं दस-पंद्रह दिन तक सामान्य कामों से दूर रखा जाता है और इस समय खाना भी पुरुष बनाते हैं। परिवार इस अवधि को महिलाओं के आराम करने का समय और जरूरी परंपरा मानते हैं। प्रसव के बाद तो महिलाओं की यह छुट्टी तीस से चालीस दिन लंबी हो जाती है।

कुछ गुज्जर महिलाएं अब सैनिटरी पैड इस्तेमाल करती हैं लेकिन कई अभी भी कपड़ा उपयोग करती हैं। जुबैदा का कहना है कि आंगनवाड़ी से उन्हें न पैड मिलता है और न बच्चों का पोषण राशन। शिकायत करने के बावजूद कोई बदलाव नहीं हुआ है। परिवारों के पास टीवी और फ्रिज नहीं है पर मोबाइल अब लगभग सभी के पास है और युवा व्हाट्सऐप चला लेते हैं। उन्होंने आगे बताया कि शौचालय तो पक्के हैं लेकिन पानी की व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो पाती।

पंचायत सहभागिता और योजनाओं तक पहुंच

कुतुबद्दीन कहते हैं कि ग्रामसभा की बैठकों में समुदाय की उपस्थिति कम है और उन्हें बैठकों की जानकारी भी नहीं मिलती। पंचायत रजिस्टर में नाम दर्ज होने के बावजूद योजनाओं का लाभ उनके लिए सीमित ही है और सरकारी सुविधाएं कागज तक सीमित हैं।
इसके बावजूद समुदाय को बदलाव महसूस हो रहा है। बच्चों की शिक्षा, मोबाइल तकनीक और सरकारी पहचान पत्रों ने उनके जीवन को नई दिशा दी है। कुतुबद्दीन का मानना है कि अगर योजनाएं जमीन तक पहुंचीं तो आने वाली पीढ़ी का जीवन मौजूदा स्थिति से कहीं बेहतर हो सकता है।




बुठोत्रा गांव : खेती, परंपरा और डेमोग्राफिक बदलाव के बीच पहाड़ का यथार्थ

मोरी क्षेत्र से आगे नदी के दूसरी ओर स्थित बुठोत्रा गांव पूरी घाटी में बंगाण क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है। गांव के लोग बताते हैं कि आसपास के गांवों में रीति रिवाज और सामाजिक जीवन लगभग एक जैसा है। बुठोत्रा की आबादी करीब डेढ़ सौ से दो सौ के बीच मानी जाती है और गांव के साथ जुड़ी कई थलियां भी हैं।

यहां थलियां गांव से अलग खेतों और जंगलों के पास बनी छोटी बस्तियों को कहा जाता है, जहां पहले लोग खेती और पशुपालन के लिए रहते थे। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बुठोत्रा की कुछ थलियां अब पूरी तरह खाली हो चुकी हैं। जिन जगहों पर कभी घर और खेत थे, वहां अब सूखे ढांचे और उजड़ी जमीन दिखती है। लोग धीरे धीरे नीचे की ओर या बाहर बसते चले गए। खूनीगाड़ से यह गांव सड़क के दाहिनी तरफ ऊपर दिखता है, मेरे जोर देने पर वरिष्ठ सहयात्री प्रीति थपलियाल और चंद्रा भंडारी वहां चलने को राजी हो गए।

खेती, लाल चावल और गुजारे की अर्थव्यवस्था

बुठोत्रा गांव में लाल चावल, धान, गेहूं और सेब की खेती होती है। खेती ही यहां आजीविका का मुख्य आधार है, लेकिन इससे केवल गुजारे भर की आमदनी हो पाती है। ग्रामीण बताते हैं कि साल भर का खर्च खेती से निकल पाना मुश्किल होता है। इसी वजह से कई परिवार मजदूरी, छोटे निजी काम या बाहर जाकर काम करने पर निर्भर हो गए हैं।

दिलीप कुमार की बातों में सामाजिक बदलाव

गांव में बातचीत के दौरान स्थानीय निवासी दिलीप कुमार बताते हैं कि पहले गांव में छुआछूत और सामाजिक भेदभाव ज्यादा था। समय के साथ इसमें काफी कमी आई है। युवाओं में यह लगभग खत्म हो चुका है, हालांकि बुजुर्ग पीढ़ी में इसके कुछ अवशेष अब भी दिखाई देते हैं।

दिलीप कुमार के अनुसार अब मंदिर, पूजा या देवी देवता के नाम पर खुले तौर पर भेदभाव नहीं होता। मान्यताएं आज भी हैं, लेकिन पहले जैसी सख्ती नहीं रही। गांव का सामाजिक जीवन अब भी सामूहिकता पर टिका है।

युवा, शिक्षा और बाहर जाने की मजबूरी

बुठोत्रा गांव में युवाओं की संख्या लगभग पैंतीस से चालीस के बीच बताई जाती है। इंटरमीडिएट के बाद लगभग सभी युवा पढ़ाई या काम के लिए बाहर चले जाते हैं। गांव में उच्च शिक्षा के साधन नहीं हैं, इसलिए बाहर जाना मजबूरी बन गया है।

कुछ युवा प्रतियोगी परीक्षाओं और पीए जैसी सेवाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन गांव से अब तक बड़े पदों पर चयन बहुत कम हुआ है। लड़कियां भी अब पढ़ाई कर रही हैं और परिवार उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।

महिलाएं, परंपरा और स्वास्थ्य की चुनौती

गांव में महिलाओं को लेकर पारंपरिक मान्यताएं अब भी मौजूद हैं। दिलीप कुमार बताते हैं कि माहवारी और गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को कुछ समय के लिए पूजा पाठ से अलग रखा जाता है। हालांकि अब इसमें पहले जैसी कठोरता नहीं रही।

स्वास्थ्य सुविधाएं बुठोत्रा गांव की बड़ी चिंता हैं। गंभीर बीमारी या गर्भावस्था में जटिलता होने पर महिलाओं को बाहर के अस्पतालों में ले जाना पड़ता है। दूरी, समय और संसाधनों की कमी कई बार जोखिम बढ़ा देती है।

खेल, टूर्नामेंट और गांव की एकजुटता

बुठोत्रा गांव में एक पुराना खेल टूर्नामेंट भी आयोजित होता है, जिसमें आसपास के कई गांव शामिल होते हैं। यह आयोजन एक कमेटी द्वारा किया जाता है और इसमें करीब एक लाख रुपये तक का पुरस्कार रखा जाता है। हिमाचल से भी टीमें आती हैं और कबड्डी जैसे पारंपरिक खेल खेले जाते हैं।

खेल मैदान पूरी तरह समतल नहीं हैं, लेकिन फिर भी खेल गतिविधियां गांव के सामाजिक जीवन को जोड़ने का काम करती हैं।

डेमोग्राफिक चेंज और बाहरी बसावट की चिंता

बुठोत्रा गांव में अब एक नई चिंता उभर रही है, जिसे ग्रामीण डेमोग्राफिक चेंज के रूप में देखते हैं। गांव के लोग बताते हैं कि आसपास के इलाकों में धीरे धीरे बाहरी लोग बसने लगे हैं। शुरुआत में एक दो परिवार आते हैं, फिर उनके रिश्तेदार भी आने लगते हैं और धीरे धीरे छोटी बस्तियां फैलने लगती हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि कई जगहों पर सरकारी या वन भूमि पर अस्थायी डेरों के जरिए बसावट शुरू होती है। समय बीतने के साथ यही डेरें स्थायी घरों में बदल जाती हैं। प्रशासनिक ढील और अधिकारियों के तबादलों का फायदा उठाकर अतिक्रमण बढ़ता चला जाता है।

गांव के बुजुर्ग मानते हैं कि अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में यह बदलाव बुठोत्रा और आसपास के गांवों के सामाजिक संतुलन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

बदलता गांव, बची हुई पहचान

बुठोत्रा गांव की कहानी उस पहाड़ की कहानी है, जहां परंपरा और बदलाव साथ साथ चल रहे हैं। छुआछूत और सामाजिक भेदभाव कमजोर पड़े हैं, शिक्षा की चाह बढ़ी है, लेकिन रोजगार, स्वास्थ्य और डेमोग्राफिक बदलाव जैसी समस्याएं अब भी जस की तस हैं।

ग्रामीण मानते हैं कि बदलाव जरूरी है, लेकिन खेती, थलियां, संस्कृति और सामूहिक जीवन ही आज भी बुठोत्रा की असली पहचान है।



हनोल : महासू देवता की लोककथा, माली परंपरा और जौनसार-बावर की जीवित आस्था

कश्मीर से हनोल तक फैली महासू देवता की कथा, जिसे लोग आज भी जीते हैं

यात्रा में आगे बढ़ते हुए एक मुख्य पड़ाव हनोल मंदिर में हमारी मुलाकात मुकेश नेगी से हुई, वह मंदिर में ही रहते हैं और वहां से जुड़ी परंपराओं को जानते हैं। मुकेश नेगी बताते हैं कि हनोल मंदिर और महासू देवता का इतिहास उन्होंने भी अपने पुराने लोगों से सुना है और यही कथा पीढ़ियों से यहां सुनाई जाती रही है। लोकमान्यता के अनुसार महासू देवता चार हैं और वे कश्मीर से यहां आए थे। जौनसार-बावर क्षेत्र में महासू देवता को न्याय और संरक्षण के देवता के रूप में पूजा जाता है और हनोल उनका प्रमुख धाम माना जाता है। हनोल मंदिर पुरातत्व विभाग के अंतर्गत संरक्षित है।

किरमिर राक्षस, ब्राह्मण परिवार और महासू का आह्वान

मुकेश नेगी बताते हैं कि लोककथा के अनुसार पुराने समय में किरमिर नाम का एक राक्षस था, जो आज के महेंद्रथ की जगह स्थित गांव में आया था। उस गांव में हुना भाट नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसके सात बेटे थे। गांव वालों ने राक्षस से कहा कि वे उसे हर हफ्ते खाने के लिए देंगे और बदले में वह एक ही जगह रहेगा। इसी दौरान राक्षस ने ब्राह्मण के छह बेटों को खा लिया। यह इलाका पब्बर नदी के किनारे बताया जाता है। एक दिन जब ब्राह्मण की पत्नी नदी के किनारे मिट्टी के बर्तन में पानी भर रही थी, तो पानी की आवाज सुनकर राक्षस ने नदी से बाहर हाथ निकालकर उसे खाने की कोशिश की। उसी समय उसके मुंह से अनायास ही “हे महासू” निकला।

महासू देवता का प्रकट होना और चार महाराजों की कथा

लोकमान्यता के अनुसार महासू देवता 64 देवियों और 52 वीरों के साथ चलते हैं। इनमें सबसे बड़े शडकुलिया महाराज ने ब्राह्मण की पत्नी की रक्षा की और कहा कि यदि राक्षस से बचना है तो महासू देवता को कश्मीर से यहां लाना होगा। घर लौटकर ब्राह्मण की पत्नी ने यह बात अपने पति को बताई और हुना भाट कश्मीर गए। वहां उन्होंने पानी के माध्यम से महाराज को बुलाकर सारी बात बताई। महाराज ने कहा कि तुम जाओ, हम आ जाएंगे। इसके बाद महाराज ने ब्राह्मण के गले में माला डाली और लोककथा के अनुसार वह ब्राह्मण तुरंत सैकड़ों किलोमीटर दूर हनोल पहुंच गया।

सोने-चांदी का हल, घायल देवता और चालदा महाराज

मुकेश नेगी बताते हैं कि महाराज ने कहा था कि सोने और चांदी का हल बनाया जाए और उनके लिए पकवान बनाए जाएं, तभी वे बाहर निकलेंगे। पकवान बनते समय राक्षस वहां आ गया और डर के कारण ब्राह्मण ने एक दिन पहले ही हल लगा दिया। सबसे पहले महेंद्रथ में बाशिक महाराज निकले, जिनका कान कट गया। इसके बाद बोठा महासू निकले और हल उनके पैर और आंख में लग गया, जिससे वे वहीं बैठ गए। तीसरी लकीर में पवासी महाराज निकले, जिनकी कोख फट गई। सबसे छोटे चालदा महाराज हस्तलेखन विद्या और कला जानते थे। उन्हें पता था कि समय अनुकूल नहीं है, इसलिए वे हल के पीछे से निकले और उन्हें कोई चोट नहीं आई। बाहर आते ही चालदा महाराज ने राक्षस का वध किया। लोकमान्यता है कि राक्षस ‘खूनीगाढ़’ में मारा गया और उसका सिर ‘मुंडाड़’ में गिरा।

चलायमान देवता, हनोल में ठहराव और जिम्मेदारियां

राक्षस के वध के बाद चारों महाराज कश्मीर लौटना चाहते थे, लेकिन घायल और अपाहिज होने की वजह से तीन महाराज हनोल में ही रुक गए। चालदा महाराज को स्थान देने और सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया और हनोल क्षेत्र बोठा महासू को दिया गया। लोकमान्यता के अनुसार चालदा महाराज को चलायमान देवता माना जाता है। उनका प्रवास हर साल बदलता है। मुकेश कहते हैं कि चालदा महाराज बाहर जाकर कमा कर लाते हैं और फिर अपने भाइयों को खिलाते हैं। हनोल में वे बारह-तेरह साल बाद केवल एक रात के लिए आते हैं और उनके आने का कोई निश्चित समय नहीं होता। चालदा महाराज को अपने साथ ले जाने के लिए कई लोग यात्रा में साथ चलते हैं।

शाठी-पाशी, पांडव-कौरव और मंदिर की परंपरा

मुकेश नेगी बताते हैं कि यह क्षेत्र शाठी और पाशी, यानी पांडवों और कौरवों से जुड़ा माना जाता है। लोकमान्यता है कि हनोल मंदिर का निर्माण शाठी यानी पांडवों ने किया था। यहां भीम के कंचे आज भी बताए जाते हैं। मेले के दौरान शाठी और पाशी के वंशज आज भी यहां पहुंचते हैं।

माली परंपरा, पुजारी व्यवस्था और आज का हनोल

मुकेश नेगी बताते हैं कि हनोल और आसपास के इलाकों में जिन लोगों के भीतर देवता आते हैं, उन्हें स्थानीय भाषा में “माली” कहा जाता है। माली को देवता का माध्यम माना जाता है और धार्मिक अवसरों पर उनके माध्यम से देवता की इच्छा को समझा जाता है। वह भी एक माली हैं।

हनोल क्षेत्र में चार गांव हैं और हर गांव में लगभग पांच-छह सौ लोग रहते हैं। मंदिर के पुजारी इन्हीं चार गांवों से होते हैं और बाहर का कोई व्यक्ति पुजारी नहीं बनता। पुजारी ड्यूटी के दौरान किसी के हाथ का खाना नहीं खाते। चार गांवों से बारी-बारी से पूजा होती है और बाहर का भोजन वर्जित है। मंदिर परिसर में कुछ स्थान ऐसे हैं, जहां पुजारी के अलावा किसी और का जाना मना है।

खेती कम, पढ़ाई के बाद बाहर और प्रशासनिक व्यवस्था

मुकेश ने बताया कि हनोल में खेतीबाड़ी बहुत कम है और लोग पढ़ाई के बाद रोज़गार के लिए बाहर जाते हैं। मंदिर में किसी तरह के दान की मांग नहीं की जाती और श्रद्धालु अपनी मर्जी से दान करते हैं। हनोल मंदिर की एक समिति बनी हुई है, जो एसडीएम की देखरेख में रहती है। लोककथा, परंपरा और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच हनोल मंदिर आज भी जौनसार-बावर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बना हुआ है। इस क्षेत्र के विकास के लिए मास्टर प्लान भी बन रहा है।





त्यूणी : बदलते पहाड़ की जमीनी सच्चाई

देहरादून जिले के सीमांत इलाके त्यूणी में बाजार भले छोटा हो, लेकिन आसपास के 22 से 30 गांवों की ज़रूरतें इसी पर टिकी हैं। हिमाचल की चार से पांच पंचायतों और उत्तराखंड की करीब 26 पंचायतों का आवागमन यहां होता है। यहां आने वाले लोग आम पर्यटक नहीं बल्कि मुख्य रूप से महासू देवता के दर्शन के लिए आते हैं, इसलिए व्यापार स्थानीय मांग पर आधारित है।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक महासू देवता चार भाई थे और सेडकुलिया महाराज उनके वजीर थे। लोककथाएं और धार्मिक विश्वास आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में प्रमुख हैं।

त्यूणी में नेपाली मूल की आबादी बड़ी है। रायगी गांव के रहने वाले किशन प्रसाद पिछले आठ साल से यहां दुकान चला रहे हैं, वह बताते हैं कि उनके पूर्वज 1922 में नेपाल से यहां आए थे और तब से उनकी तीसरी चौथी पीढ़ी यहां रह रही है। फिर भी कुछ लोग उन्हें आज भी बाहरी मानते हैं।
वह कहते हैं कि कुछ गांवों के मंदिरों में दलित समुदाय का प्रवेश अब भी प्रतिबंधित है, हालांकि नई पीढ़ी इस परंपरा को बदलने की सोच रखती है।

शिक्षा मौजूद लेकिन उच्च पढ़ाई के लिए देहरादून ही विकल्प

किशन ने बताया कि त्यूणी में सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूल हैं। एक डिग्री कॉलेज भी है, लेकिन बेहतर विकल्पों और संसाधनों की कमी के कारण उच्च शिक्षा के लिए छात्र अब भी देहरादून जाना चुनते हैं। स्थानीय बोली और भाषा अब भी परिवारों में जिंदा है और उसके साथ ही पारंपरिक जीवनशैली भी बनी हुई है।
स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो प्राथमिक उपचार और छोटे ऑपरेशन यहां हो जाते हैं, लेकिन गंभीर बीमारियों में मरीजों को रोड़ू, देहरादून या शिमला भेजना पड़ता है।

बदलता बाजार और डिजिटल भुगतान की बढ़ती भूमिका

त्यूणी का बाजार पहले लकड़ी की दुकानों के लिए जाना जाता था। साल 2005 में अग्निकांड में कई दुकानें जलने के बाद बाजार का स्वरूप बदला और अब पक्की दुकानों की संख्या बढ़ गई है।
दो साल से कपड़ों का कारोबार करने वाले मनोज शर्मा कहते हैं कि क्षेत्र में ऑनलाइन शॉपिंग का असर अभी सीमित है, लेकिन यूपीआई भुगतान तेजी से बढ़ा है। त्यूणी का बाजार मछली, सेब और टमाटर के लिए लोकप्रिय है। पास से बहने वाली टौंस और पब्बर नदी की मछली यहां की पहचान मानी जाती है।

महिलाएं, रोजगार और बदलता सामाजिक ढांचा

किशन प्रसाद की बेटी भी दुकान में ही थीं, उन्होंने बताया कि त्यूणी में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है। लड़कियां टेलरिंग और हस्तशिल्प सीख रही हैं और एक दुकान में पांच से छह महिलाएं नियमित सिलाई का काम कर रही हैं। उन्होंने आगे बताया कि अब महिलाएं पीरियड्स के दौरान सैनिटरी पैड का इस्तेमाल कर रही हैं। बड़ी उम्र की महिलाएं अभी भी मोबाइल एप और यूपीआई भुगतान का इस्तेमाल कम करती हैं।
यहां कई पारंपरिक मान्यताएं अभी भी कायम हैं। जैसे प्रसव के बाद महिलाओं को 22 दिन तक अलग रखने की प्रथा कई घरों में जारी है, लेकिन नई पीढ़ी इसे लेकर सवाल करने लगी है।





ईशाली गांव में सिंचाई ठप, सड़क अधूरी और सेब पर टिकी अर्थव्यवस्था

यात्रा के अंतिम पड़ाव आराकोट से पहले उत्तरकाशी जिले का ईशाली गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। गांव की खेती, स्वास्थ्य और बाजार तक पहुंच सीधे तौर पर सड़क और सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर है। स्थानीय लोगों के मुताबिक पलायन यहां कम है, लेकिन खेती लगभग खत्म होने की कगार पर है और बागवानी ही मुख्य सहारा बन चुकी है।

आराकोट से आने वाली नहर क्षतिग्रस्त, खेती पर गहरा असर

ईशाली के निवासी सुरेन्द्र बताते हैं कि लगभग दो किलोमीटर आराकोट से आने वाली नहर पूरी तरह गांव के आसपास क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इस नहर से ही गांव की सिंचाई होती थी, लेकिन अब इसके टूटने से खेती पर बेहद नकारात्मक असर पड़ा है। सुरेन्द्र के मुताबिक नहर के ऊपर सड़क निर्माण के दौरान गिरने वाला मलबा भी इसके क्षतिग्रस्त होने का बड़ा कारण है।
वह कहते हैं कि पहले हालात बिल्कुल अलग थे। हम 12 महीने अपना अनाज खाते थे। साल 1993 के आसपास हमारे पास 40 बोरी धान होता था, लेकिन अब एक भी नहीं है। नहर खराब होने के बाद खेत बंजर हो गए और अनाज उत्पादन लगभग समाप्त हो गया।

आराकोट थुनारा मोटर मार्ग अधूरा, सेब बिक्री और एंबुलेंस दोनों प्रभावित

स्थानीय निवासी कृपाल बताते हैं कि आराकोट से थुनारा को जोड़ने वाला मोटर मार्ग कई सालों से अधूरा पड़ा है। यह सड़क अलग अलग विभागों में बंटी होने की वजह से आज तक पूरी नहीं हो पाई है। उनका कहना है कि अगर यह मार्ग बन जाता है तो गांव की तस्वीर बदल सकती है।
कृपाल के अनुसार ईशाली और आसपास के गांवों में हर सीजन करीब 50 हजार पेटी सेब का उत्पादन होता है। सड़क पूरी न होने की वजह से सेब को बाजार तक पहुंचाने में परेशानी होती है। सड़क बनने से न केवल सेब की बिक्री आसान होगी, बल्कि एंबुलेंस की पहुंच भी गांव तक हो सकेगी, जो अभी बड़ी चुनौती है।

शिक्षा और इलाज के लिए बाहर जाना मजबूरी

गांव की निवासी रोहिला राणा बताती हैं कि ईशाली के बच्चे पढ़ाई के लिए आराकोट जाते हैं। डिग्री कॉलेज के लिए छात्रों को त्यूणी जाना पड़ता है। शिक्षा की बुनियादी सुविधा आसपास है, लेकिन उच्च शिक्षा के विकल्प सीमित हैं।
स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर रोहिला राणा कहती हैं कि छोटी मोटी बीमारियों का इलाज त्यूणी और आराकोट के अस्पतालों में हो जाता है। लेकिन गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को हिमाचल के रोहड़ू या फिर देहरादून ले जाना पड़ता है, जिसमें समय और पैसे दोनों की समस्या आती है।

जातिवाद लगभग नहीं, महिलाओं को लेकर सोच में बदलाव

स्थानीय लोगों के अनुसार ईशाली गांव में जातिवाद न के बराबर है। सुरेन्द्र और कृपाल दोनों का कहना है कि गांव में जाति को लेकर कोई बड़ा भेदभाव देखने को नहीं मिलता।
रोहिला राणा बताती हैं कि महिलाओं को लेकर सामाजिक सोच में भी बदलाव आया है। वह कहती हैं कि अब पीरियड्स के दौरान महिलाओं को अलग रखने की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है। बच्चा होने के बाद महिलाओं को 15 से 20 दिन तक आराम दिया जाता है और परिवार उनका सहयोग करता है।







उत्तराखंड का ‘मांझी’ महावीर, जिसने पहाड़ों को काटा नहीं और भी ऊंचा कर डाला

उत्तराखंड के सुदूरवर्ती गांवों से हिंदी साहित्य के बड़े नाम आते रहे हैं। महावीर रवांल्टा भी उसी कड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं। लिखने की वजह से अपने दुखों के पहाड़ को भूलकर महावीर रवांल्टा ने रवांल्टी भाषा के लिए जो कार्य किए हैं, उनसे वह अपनी जन्मभूमि हिमालय का कद और भी बढ़ा रहे हैं।

अस्कोट आराकोट यात्रा में महावीर से मुलाकात

अस्कोट आराकोट यात्रा के दौरान स्वील गांव से निकलते वक्त एक लड़के ने हमारा उस रात का पड़ाव पूछा। हमने उसे महरगांव बताया। यह सुनते ही वह बोला कि रवांल्टी भाषा में लिखने वाले महावीर रवांल्टा वहीं रहते हैं। एक भाषा को बचाए रखने वाले शख्स से मिलने की बेसब्री वहीं से शुरू हो गई थी।

शाम होते ही महरगांव पहुंचने पर महावीर रवांल्टा ने सभी यात्रियों का अपने घर में स्वागत किया। घर के आंगन में मंच बनाकर बच्चों द्वारा एक नाटक दिखाने की योजना थी, लेकिन बारिश की वजह से कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। इसी बीच अस्कोट आराकोट यात्रियों के हाथों उनकी किताब ‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुमक’ का विमोचन हो गया।

यात्रा के अंतिम पड़ाव आराकोट में उनसे फिर मुलाकात हुई और रात में उनके साथ ठहरकर लंबी बातचीत का अवसर मिला।

बचपन से ही पढ़ने लिखने के शौकीन रहे महावीर

महावीर रवांल्टा का जन्म 10 मई 1966 को उत्तरकाशी जिले के सरनौल गांव में हुआ। उनके पिता टीका सिंह राजस्व विभाग में कानूनगो थे और माता रूपदेई देवी गृहिणी थीं। तीन भाइयों और दो बहनों में दूसरे नंबर के महावीर बचपन में ही महरगांव आ गए।

गांव के विद्यालय में शनिवार को होने वाले कार्यक्रमों में कविता पाठ होता था। यहीं से कविता पढ़ने का शौक जागा। नौवीं कक्षा में विद्यालय के पुस्तकालय से किताबें पढ़नी शुरू कीं। पराग, नंदन और धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं पढ़ते थे। साथी अपने जेब खर्च से खाने की चीजें लेते थे, जबकि महावीर उससे पत्रिकाएं खरीद लेते थे।

बाद में पिता के साथ उत्तरकाशी आए और गांधी वाचनालय जाने लगे। बारहवीं में विज्ञान वर्ग के छात्र थे, लेकिन रुचि प्रेमचंद, शिवानी और हिमांशु जोशी जैसे लेखकों में थी।

‘हिमालय और हम’ के लिए पहला पत्र

बीएससी में दाखिला लेने के बाद पहले ही साल असफल हो गए, क्योंकि लिखने में पूरी तरह डूब चुके थे। टिहरी से प्रकाशित साप्ताहिक ‘हिमालय और हम’ को पहला पत्र लिखा। इसके संपादक गोविंद प्रसाद गैरोला थे।

साल 1983 में देहरादून से प्रकाशित साप्ताहिक ‘उत्तरांचल’ के स्तंभ ‘साहित्य कला और संस्कृति’ में उनकी पहली कविता ‘बेरोजगार’ प्रकाशित हुई। इससे यह भरोसा जगा कि लिखोगे तो कहीं न कहीं छपोगे जरूर।

ज्ञानपीठ से कम नहीं थे वे बीस रुपये

उत्तरकाशी के माघ मेले में होने वाले कवि सम्मेलन में बड़े कवियों को सुनते हुए महावीर के मन में भी मंच पर कविता पढ़ने की इच्छा जागी। इत्तेफाक से कवि घनश्याम रतूड़ी ने उन्हें कविता पाठ का अवसर दिया।

कविता सुनाने पर उन्हें बीस रुपये का इनाम मिला। महावीर कहते हैं कि वह लिफाफा उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार के बराबर लगा। इसी ने उनका हौसला और मजबूत किया।

कहानीकार और नाटककार महावीर

महावीर ने महरगांव में नाट्य शिविर लगाए, जिनमें गांव के बच्चों ने भाग लिया। गांव की समस्याओं पर आधारित नाटक लिखे गए। पौराणिक, लोककथा और समसामयिक विषयों को मंच पर लाया गया।

रामलीला में महिलाओं के किरदार पुरुष निभाते थे, लेकिन महावीर ने गांव की लड़कियों को मंच पर लाने की शुरुआत की। चुनावी विवादों के चलते जब नाटक का विरोध हुआ तो उन्होंने अपने घर के आंगन में ही मंच तैयार कर लिया।

लेखक के तौर पर जमते महावीर

नौकरी के सिलसिले में मुरादाबाद और फिर अस्कोट जाना पड़ा। रंगमंच से दूरी बनी, तो लेखन और गहरा हो गया। साल 1992 में पहला उपन्यास ‘पगडंडियों के सहारे’ प्रकाशित हुआ। इसके बाद ‘एक और लड़ाई लड़’, ‘समय नहीं ठहरता’, ‘अपना अपना आकाश’ और ‘टुकड़ा टुकड़ा यथार्थ’ जैसी रचनाएं आईं।

दुख के पहाड़ को झेलकर खुद पहाड़ से ऊंचे बने

साल 2004 में महावीर की इकलौती बेटी का निधन हो गया। वह कहते हैं कि उस दुख ने तोड़ दिया था, लेकिन लेखन ने ही जीने की ताकत दी। इसी दौर में ‘त्रिशंकु’ और ‘सपनों के साथ चेहरे’ जैसी कृतियां सामने आईं।

सम्मानों को लेकर महावीर कहते हैं कि सही समय पर मिला सम्मान लेखकों के लिए संजीवनी जैसा होता है।

अपनी भाषा को पहचान दिलाते महावीर

रवांई क्षेत्र के लोग अपनी भाषा बोलने में झिझकते थे। हिंदी में पहचान बनने के बाद महावीर ने रवांल्टी भाषा के लिए काम शुरू किया। कविता, लोककथाएं, शब्दकोश और भाषा सर्वेक्षण में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

हाल ही में उनकी किताब ‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुमक’ प्रकाशित हुई है। चार उपन्यास, अनेक कहानी संग्रह, कविता संग्रह और हिंदी व रवांल्टी में रचनात्मक काम आज भी जारी है।





क्यों शुरू होना चाहिए बंद पड़ा महिला समाख्या कार्यक्रम

अस्कोट आराकोट यात्रा के दौरान सहयात्री प्रीति थपलियाल और चंद्रा भंडारी को महरगांव सहित कई गांवों में मैं महिलाओं से कुछ महत्वपूर्ण सवाल पूछते देख रहा था। घर के फैसलों में भागीदारी है या नहीं, अपनी बात रखने का अवसर मिलता है या नहीं, घरेलू हिंसा या अन्य समस्याओं पर बोलने की कोई जगह है या नहीं। यह सवाल किसी सर्वे का हिस्सा नहीं थे, बल्कि उस अनुभव से निकले थे, जिसे वे सालों पहले महिला समाख्या कार्यक्रम के दौरान जी चुकी थीं।

यात्रा के दौरान ही उनसे महिला समाख्या कार्यक्रम पर विस्तार से बातचीत हुई। प्रीति थपलियाल और चंद्रा भंडारी महिला समाख्या प्रोग्राम में डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम कॉर्डिनेटर रह चुकी हैं। उसी बातचीत में उन्होंने कई महिलाओं की कहानियां साझा कीं। इन्हीं कहानियों में एक नाम बार बार सामने आया। गंगा देवी। एक ऐसी महिला, जिसकी ज़िंदगी महिला समाख्या कार्यक्रम का जीवंत उदाहरण है।

क्या था महिला समाख्या कार्यक्रम

महिला समाख्या कार्यक्रम के बारे में बात करते हुए प्रीति थपलियाल बताती हैं कि उत्तराखंड में महिलाओं को लंबे समय तक घर की चारदीवारी से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी। यह स्थिति आज भी कई इलाकों में पूरी तरह नहीं बदली है।

साक्षरता के साथ साथ महिलाओं को जीवन कौशल, आत्मविश्वास और अपने हालात को समझने की क्षमता देने के लिए एक अलग तरह के कार्यक्रम की जरूरत महसूस की गई। इसी सोच के साथ केंद्र सरकार के मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के अंतर्गत शिक्षा विभाग ने साल 1988 में महिला समाख्या कार्यक्रम शुरू किया। यह कोई कागज़ी योजना नहीं थी, बल्कि महिलाओं के साथ रहकर काम करने वाला जमीनी कार्यक्रम था।

साल 1990 में अविभाजित उत्तर प्रदेश के टिहरी जिले को इस कार्यक्रम के लिए चुना गया। इसके बाद 1995 में पौड़ी और 1996 में नैनीताल जिले इसमें शामिल हुए। साल 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यह साफ हुआ कि पहाड़ों में सबसे ज्यादा मेहनत करने वाली महिलाओं की घर के फैसलों में कोई भूमिका नहीं है। इसी कारण साल 2004 में उत्तरकाशी, चंपावत और उधम सिंह नगर जिलों में भी महिला समाख्या कार्यक्रम शुरू किया गया।

गांव स्तर पर इसका ढांचा सहयोगिनी से शुरू होता था। एक सहयोगिनी दस गांवों की जिम्मेदारी संभालती थी। सौ गांवों पर दस कार्यकर्ता होते थे। यह पूरी संरचना महिलाओं के बीच से निकली महिलाओं द्वारा चलाई जाती थी।

महिला समाख्या से साक्षर महिलाएं आज आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता

प्रीति बताती हैं कि महिला समाख्या के तहत साक्षरता शिविर लगाए जाते थे। इसके लिए अलग से पाठ्यक्रम तैयार किया गया था। कई महिलाओं को ओपन स्कूल के जरिए परीक्षाएं दिलाई गईं। आज इन्हीं महिलाओं में से कई आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता के रूप में काम कर रही हैं।

उत्तराखंड में महिला समाख्या ने स्कूल छोड़ चुकी एक हजार से अधिक लड़कियों को दोबारा शिक्षा से जोड़ा। इसके साथ ही महिलाओं पर हो रहे यौन अपराधों को लेकर सर्वेक्षण भी किए गए, जिनसे पहली बार कई मुद्दे सार्वजनिक रूप से सामने आए।

संजीवनी केंद्र और अपनी अदालत

साल 2004 में महिला समाख्या ने जड़ी बूटी का ज्ञान रखने वाली महिलाओं की पहचान की। इनके सहयोग से ग्राम, क्लस्टर और विकासखंड स्तर पर संजीवनी केंद्र खोले गए। इससे पारंपरिक ज्ञान सुरक्षित हुआ और यह अंधविश्वास भी टूटा कि ज्ञान साझा करने से खत्म हो जाता है। पौड़ी का संजीवनी केंद्र जड़ी बूटी शोध संस्थान देहरादून द्वारा पुरस्कृत भी किया गया।

महिला समाख्या के तहत अपनी अदालत की शुरुआत भी हुई। यहां महिलाएं पारिवारिक और सामाजिक विवादों का समाधान खुद करती थीं। यह महिलाओं के आत्मविश्वास का बड़ा मंच था।

जब महिला समाख्या ने टैक्सी का किराया तय करवा दिया

प्रीति बताती हैं कि महिला समाख्या के सदस्य महिलाओं से जुड़े हर मुद्दे में उनके साथ खड़े रहते थे। साल 1997 में बेतालघाट में राशन कार्ड बनवाने के नाम पर महिलाओं से पैसे लिए जा रहे थे। टैक्सी चालक भी महिलाओं से मनमाना किराया वसूलते थे। महिला समाख्या ने महिलाओं को जागरूक किया कि राशन कार्ड बनवाने के कोई पैसे नहीं लगते और टैक्सी का किराया तय होना चाहिए। महिलाओं ने विरोध किया और व्यवस्था बदली।

साल 2016 में महिला समाख्या कार्यक्रम बंद करने का पत्र आया। विरोध हुआ, लेकिन कार्यक्रम बंद हो गया। इसके बाद लगभग 350 लोग बेरोजगार हुए। इससे ज्यादा नुकसान महिलाओं के उस मंच का हुआ, जहां वे खुलकर बोल सकती थीं।

महिला समाख्या की देन हैं गंगा देवी

यात्रा के दौरान जब प्रीति और चंद्रा ने गंगा देवी का ज़िक्र किया, तो साफ था कि यह सिर्फ एक कहानी नहीं है। यात्रा के कुछ दिनों बाद गंगा देवी का मोबाइल नंबर मिला और उनसे बात हुई। गंगा देवी का जन्म साल 1947 में यमकेश्वर ब्लॉक के जामल गांव में हुआ। पिता की मृत्यु के बाद उनकी मां ने दूसरों के खेतों में काम कर बच्चों को पाला।

गंगा बताती हैं कि उस समय कहा जाता था कि लड़कियों को पढ़ाकर क्या करना है। उन्हें तो घास ही काटनी है। फिर भी वह बहाने बनाकर स्कूल जाती रहीं। लौटने पर मार भी पड़ी, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी। शिक्षकों की मदद से उन्होंने पांचवीं तक पढ़ाई पूरी की।

बाद में वह प्रौढ़ शिक्षा केंद्र में पढ़ाने लगीं। शादी के बाद खेती में रम गईं।

जब गांव ने कहा यह औरतें घर छोड़कर घूम रही हैं

साल 1997 में महिला समाख्या से जुड़ी महिलाएं गंगा के गांव सार पहुंचीं। शुरुआत में गांव की महिलाओं ने उन्हें बेघर समझकर नकार दिया। कहा गया कि इनके पतियों ने इन्हें छोड़ दिया है। लेकिन वे महिलाएं हर महीने आती रहीं। धीरे धीरे बातें असर करने लगीं। महिलाएं चारदीवारी से बाहर निकलीं और बेटियों, बहुओं को पढ़ने भेजने लगीं।

महिला समाख्या के कहने पर गंगा ग्राम प्रधान बनीं। पानी और सड़क जैसे मुद्दों पर गांव में काम हुआ।

जब पुरुषों से कहा हमने तुम्हें पैदा किया

गंगा बताती हैं कि उन्होंने जलागम योजना के तहत ठेका लिया। उस समय यह असामान्य था। गांव के पुरुषों ने आपत्ति की तो गंगा ने कहा कि महिलाओं ने तुम्हें पैदा किया है। अगर तुमने अपना काम ठीक से किया होता तो हमें यह ठेका लेने की जरूरत नहीं पड़ती।

उनके बनाए हौज आज भी सही हालत में हैं। उन्होंने गांव में एसडीएम को बुलाकर यह भी दिखाया कि महिला नेतृत्व क्या कर सकता है।

अब कोई मिसेज प्रधान क्यों नहीं बोलता

गंगा कहती हैं कि बाद में उनके पति प्रधान बने, लेकिन काम वही करती थीं। वह मीडिया से सवाल करती थीं कि जब महिला प्रधान के पति काम करें तो उन्हें पति प्रधान कहा जाता है, फिर महिला को मिसेज प्रधान क्यों नहीं कहा जाता।

आज उनकी बहू प्रधान है और गांव का काम वही संभालती हैं। गंगा कहती हैं कि जो कुछ भी उन्होंने किया, वह महिला समाख्या की देन है। कार्यक्रम बंद होने से पहाड़ की महिलाओं को बड़ा नुकसान हुआ है। अगर यह कार्यक्रम आज भी चलता, तो महिलाएं और भी बहुत कुछ कर सकती थीं।



भाग 2- यात्रा के बाद



घोड़ों की लीद और साड़ियों के बोझ तले घुट रहा यमुनोत्री का दम

यात्रा की समाप्ति के बाद आराकोट से लौटते हुए कुछ सहयात्रियों से उनकी यमुनोत्री यात्रा के अनुभवों पर चर्चा हुई।

हरीश पाठक ‘पहाड़’ प्रकाशन के प्रबंधक हैं। वह साल 1974 से हर दस साल में होने वाली ऐतिहासिक अस्कोट–आराकोट यात्रा के पचासवें वर्ष में भाग ले रहे थे। हरीश ने बताया कि यह उनकी दूसरी अस्कोट–आराकोट यात्रा है। अब तक की लगभग 1100 किलोमीटर की यात्रा के अनुभव में यमुनोत्री पड़ाव पर बात करते हुए वह कहते हैं कि यमुनोत्री हमारा धार्मिक स्थल है और यहीं से यमुना नदी का उद्गम होता है।

जब सात यात्रियों का हमारा दल मुख्य दल से अलग यात्रा करते हुए यमुनोत्री पहुंचा, तो हमने देखा कि यमुनोत्री बाजार में गंदगी भरी पड़ी है। घोड़े, यात्रियों को कंधे में ले जाते नेपाली, यात्री वाहन, इन सबके कारण बाजार में चलने की जगह नहीं थी। हरीश कहते हैं कि इसका समाधान घोड़ों के लिए एक अलग स्टैंड बनाकर, वहीं से यात्रियों को बैठाकर किया जा सकता है।

इसके आगे लगभग छह किलोमीटर दूर तीर्थ स्थान तक पहुंचने के लिए हम नदी के किनारे चलते हैं। इस रास्ते में घोड़ों की वजह से नदी में गिरने और चोट लगने का भय बना रहता है। मैंने घोड़ों को लीद करते देखा और यह समझ नहीं आया कि इस गंदगी का सही निस्तारण कैसे किया जाता होगा, क्योंकि वहां इसके लिए न कोई डस्टबिन है और न ही इसे अलग से इकट्ठा करने की कोई व्यवस्था।

हरीश बताते हैं कि यमुनोत्री के नजदीक पहुंचकर यमुना में धोती और साड़ियां दिखाई देती हैं और थोड़ा आगे चलने पर नदी के हिस्सों में इनका ढेर भी नजर आता है। स्थानीय लोगों से पूछने पर पता चला कि पहले ये कपड़े नदी में नहीं फेंके जाते थे। कुछ साल पहले ही इसकी शुरुआत हुई है। हरीश कहते हैं कि अगर इन कपड़ों को नदी में फेंकना ही है, तो यमुनोत्री मंदिर के रखरखाव से जुड़े लोगों द्वारा इसका निस्तारण किया जाना चाहिए।

साल 1991 से अब बहुत बदल गई है यमुना

मनमोहन चिलवाल रिटायर्ड बैंक कर्मी हैं और नैनीताल में रहते हैं। मनमोहन इससे पहले दो बार यात्रा में आंशिक रूप से हिस्सा ले चुके हैं, लेकिन इस बार वह पहली बार पूरी यात्रा में शामिल हुए। यमुनोत्री पहुंचने के लिए उन्होंने दल के अन्य छह सदस्यों के साथ उत्तरकाशी से असी गंगा घाटी, डोडीताल, दरवा टॉप, सीमा बुग्याल और हनुमान चट्टी का रास्ता चुना। अगोड़ा गांव से यमुनोत्री तक यह पैदल रास्ता करीब 51 किलोमीटर है। मनमोहन बताते हैं कि इस दौरान उन्होंने 3800 मीटर की अधिकतम ऊंचाई भी पार की।

सुबह आठ बजे अगोड़ा से शुरू हुआ यह रास्ता बुग्यालों से होकर जाता है। बुग्यालों में ऊंचे नीचे रास्ते हैं और घास से भरे मैदान हैं। यहां पोटेंटिला, स्नेक लिली, ब्रह्म कमल, अतीस, सफेद बुरांश और प्रिमुला जैसे फूल दिखाई देते हैं।

मनमोहन बताते हैं कि रास्ते में घने कोहरे की वजह से कई बार उनका दल भटक गया। कभी कभी कोहरा इतना घना था कि बीस मीटर की दूरी पर खड़ा साथी भी दिखाई नहीं दे रहा था। करीब ढाई घंटे रास्ता भटकने के बाद सही मार्ग मिला। तेज़ी से चलते हुए दल रात करीब नौ बजे हनुमान चट्टी पहुंचा। वहां एक ढाबे में रात्रि विश्राम के बाद सुबह आठ बजे वे यमुनोत्री के लिए रवाना हुए। करीब दस बजे यमुनोत्री पहुंचने पर उन्होंने देखा कि बाजार का कचरा नदी में फेंका जा रहा था और सफाई कर्मचारी घोड़ों की लीद भी नदी में ही झाड़ रहे थे। यही पानी आगे चलकर यमुना की मुख्यधारा में शामिल होता है और कई राज्य इसी पानी का उपयोग करते हैं।

मनमोहन ने बताया कि साल 1991 में जब वह पहली बार यमुनोत्री आए थे, तब नदी का पानी बहुत साफ था। अब उन्होंने देखा कि महिलाओं की साड़ी और धोती भी नदी में फेंकी जा रही हैं, जिसकी वजह से यमुनोत्री के स्रोत पर ही इन कपड़ों का बड़ा ढेर लग गया है।

हर्ष काफर ने कहा जो सक्षम उनके लिए घोड़ा क्यों

उत्तराखंड में युवाओं के बीच सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हर्ष काफर भी इस साल अस्कोट–आराकोट यात्रा में शामिल हुए। यात्रा के दौरान वह अपने अनुभव सोशल मीडिया पर साझा कर रहे थे। इसी विषय पर उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि यमुनोत्री में नहाने के बाद महिलाएं अपनी साड़ियां चढ़ा देती हैं और वह जानना चाहते हैं कि यह परंपरा कहां से शुरू हुई।

इस विषय पर पहली बार यात्रा कर रहे हर्ष काफर ने कहा कि हनुमान चट्टी से जानकी चट्टी की ओर जाने के बाद यमुनोत्री का ट्रैक शुरू होता है, जहां खाने और घोड़ों की लीद की बदबू आती है। हर्ष ने कहा सिर्फ असहाय लोगों को ही घोड़ा मिलना चाहिए। जानकी चट्टी से यमुनोत्री की दूरी लगभग पांच से छह किलोमीटर है, इसलिए जो चल सकते हैं, ऐसे सक्षम लोगों के लिए घोड़ा नहीं चलवाया जाना चाहिए। घोड़ों के अनियंत्रित चलने से पैदल यात्रियों को बड़ा खतरा रहता है। इसके साथ ही वह नदी में साड़ियां फेंकने के नए चलन पर भी सवाल उठाते हैं।





भीमताल का तितली अनुसंधान केंद्र और हिमालयी पर्यावरण की समझ


यात्रा से मिले अनुभवों के बाद अपने आसपास घटित हो रहे हर घटनाक्रम को देखने की नई दृष्टि मिली और इसी नए की खोज में नैनीताल समाचार की साथी पत्रकार सोनाली मिश्रा के साथ भीमताल में स्थित तितली अनुसंधान केंद्र जाना हुआ।

उत्तराखंड के भीमताल में स्थित तितली अनुसंधान केंद्र भारत का सबसे बड़ा निजी तितली और कीट संग्रह है।  इस केंद्र ने तितली विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यहां भारत की दस फीसदी से अधिक रेशम पतंग प्रजातियों की खोज की गई और उनका नामकरण किया गया। वर्ष 2004 में पीटर स्मेटासेक ने एक तितली प्रजाति का नामकरण करते हुए उसे नेप्टिस मिया वर्ष्नेयी नाम दिया। वर्ष 2015 में केंद्र ने भारत की तितलियों की सूची तैयार की, जिसे तीस हजार से अधिक बार डाउनलोड किया गया। इससे पहले वर्ष 1994 में हिमालयी तितलियों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और आवारा कुत्तों का जंगली जानवरों पर असर जैसे विषयों पर शोध किया गया। यह केंद्र बायोनोट्स नामक एक निःशुल्क वैज्ञानिक पत्रिका भी प्रकाशित करता है।

पीटर स्मेटासेक के पिता फ्रेडरिक स्मेटासेक चेक गणराज्य के नागरिक थे। उन्होंने एक बार हिटलर को मारने की कोशिश की थी। नाजी शासन के दौरान फ्रेडरिक यूरोप से भागकर वर्ष 1940 के आसपास भारत आए और यहां नई जिंदगी शुरू की। वर्ष 1951 में उन्होंने भीमताल में एक बंद पड़ा चाय बागान खरीदा। तब से अब तक स्मेटासेक परिवार ने इस इलाके की प्रकृति को बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। पीटर बताते हैं कि उनके पिता ने कभी संरक्षण शब्द का प्रयोग नहीं किया। उन्हें बस यह समझ थी कि जंगल को ठीक होने के लिए मानव हस्तक्षेप से मुक्त समय और स्थान चाहिए।

पीटर स्मेटासेक के केंद्र ने वर्ष 2015 में भारत की तितलियों की सूची तैयार की थी।

जंगल की आग और ओक का महत्व

वर्ष 1984 में बागान के जंगल में लगी आग ने ओक वन को नष्ट कर दिया, जिसके कारण एक गांव का पानी का स्रोत भी सूख गया। इस घटना ने पीटर को यह समझने में मदद की कि ओक के जंगल पानी की व्यवस्था और जैव विविधता के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। ओक की छतरी मिट्टी को नम रखती है, जिससे नदियों का बहाव बना रहता है। हिमालय से निकलने वाली गंगा जैसी नदियां जंगलों पर निर्भर हैं और ओक जैसे देशी जंगल बारह सौ से अधिक पौधों की प्रजातियों को सहारा देते हैं।

पीटर का लक्ष्य केवल तितलियों को बचाना नहीं है, बल्कि हिमालयी पर्यावरण तंत्र को संरक्षित करना है, जो हिमालय से निकलने वाली नदियों को जीवित रखता है। पीटर कहते हैं कि भारत में स्वस्थ जंगल की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है और उसके बिना नदियों को बचाना असंभव है। देशी ओक जंगल पानी और जैव विविधता के लिए आवश्यक हैं, जबकि इस क्षेत्र में लगाए गए पाइन के जंगल इस भूमिका में अप्रभावी हैं। तितलियां और पतंगे जंगल की सेहत के संकेतक हैं और उनकी अनुपस्थिति पर्यावरण की खराब स्थिति को दर्शाती है। पीटर का मानना है कि तितलियों के अध्ययन से जंगल की पूरी सेहत को समझा जा सकता है।

हिमालय की रक्षा का स्थानीय रास्ता

धराली जैसी आपदाएं यह चेतावनी देती हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र की गहरी समझ विकसित करना आवश्यक है। पीटर स्मेटासेक का भीमताल मॉडल यह दिखाता है कि पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और धैर्य के साथ हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं। अगर जंगल बचेंगे, तो नदियां बचेंगी और अगर नदियां बचेंगी, तभी जीवन बचेगा।








हरिद्वार में फ्लाईओवरों के नीचे एक समानांतर दुनिया

कांवड़ के दिनों में हरिद्वार एक अलग ही शहर बन जाता है। सड़कों पर शिवभक्तों का सैलाब होता है, भगवा रंग हर दिशा में फैल जाता है और प्रशासन से लेकर मीडिया तक की निगाहें कांवड़ियों की आवाजाही पर टिकी रहती हैं। इन्हीं दिनों हरिद्वार की यात्रा के दौरान मैंने इस शहर का वह चेहरा देखा, जो शोर, आस्था और भीड़ के बीच लगभग अदृश्य हो जाता है। यह चेहरा फ्लाईओवरों के नीचे, पुलों के साये में और घाटों के किनारे बसा हुआ है।

कांवड़ यात्रा के दौरान हरिद्वार में घूमते हुए महसूस होता है कि यह शहर दो हिस्सों में बंट गया है। एक वह, जो ऊपर से दिखता है। और दूसरा वह, जो फ्लाईओवर के नीचे जी रहा है।

फ्लाईओवर के नीचे की सुबह

रात ढाई बजे बैरागी कैंप के पास गंगा किनारे सोए रवि की सुबह पांच बजे खुलती है। बारिश की हल्की फुहार उसे नींद से जगा देती है। वह उठकर फ्लाईओवर के नीचे बने अपने ठिकाने की ओर चल देता है। यही उसका घर है।

फ्लाईओवर के नीचे रवि जैसे सात आठ लोग रहते हैं। कोई रिक्शा चलाता है, कोई भीख मांगता है और कोई पास के भंडारे से पूरे हफ्ते का खाना जुटा लेता है। रवि बताता है कि उसका गांव लक्सर के पास था। तीन भाइयों में एक नशे में डूबा है, दूसरा देहरादून में मजदूरी करता है और तीसरा वह खुद है। मां कैंसर से पीड़ित हुई तो गांव की पांच बीघा जमीन बिक गई। मां के बाद सब्जी बेचने वाले पिता भी चल बसे। तब से पढ़ा लिखा रवि हरिद्वार में रोज पचास रुपये में रिक्शा किराये पर लेकर चलाता है। कभी तीन सौ तो कभी हजार रुपये तक कमा लेता है।

सरकारी योजनाओं से दूरी

रवि का दोस्त राजेश बदायूं से है। उम्र लगभग चालीस साल। माता पिता दोनों नहीं रहे। प्रधानमंत्री जनधन योजना का खाता है, लेकिन उसमें कितने पैसे हैं, यह जानने वह बैंक नहीं जाता। वह कहता है कि योजनाओं की जानकारी तो रहती है, लेकिन सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की हिम्मत नहीं होती। इसलिए वह सब छोड़ दिया है।

राजेश और रवि दोनों अपने भविष्य की चिंता किए बिना रोज की कमाई शराब और खाने में खर्च कर देते हैं। दोनों के पास स्मार्टफोन हैं, जिन्हें वे आसपास के दुकानदारों के यहां बीस रुपये में चार्ज करा लेते हैं।

केवाईसी एक मुसीबत

पंचकूला के ओम कुमार भी इसी फ्लाईओवर के नीचे रहते हैं। उन्होंने कभी बठिंडा में मिठाई की दुकान पर काम किया था। शरीर ने साथ छोड़ दिया तो हरिद्वार आ गए। दुकानों में सफाई कर बीस तीस रुपये मिल जाते हैं। फोन नहीं है। बैंक खाता है, लेकिन केवाईसी नहीं होने की वजह से बेकार पड़ा है।

ओम बताते हैं कि 2014 में डॉक्टरों ने कहा था कि उनके फेफड़े अस्सी प्रतिशत खराब हो चुके हैं। इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। सरकारी अस्पताल जाने से भी डरते हैं कि कहीं खर्च ज्यादा न हो जाए।

कांवड़ में उम्मीद की दुकान

बैरागी कैंप घाट पर सुबह चार बजे शिवकुमार से बातचीत होती है। मच्छरों से परेशान होकर वह गंगा किनारे बैठा है। कांवड़ के दिनों में वह लकड़ी के तख्त पर शिवभक्तों से जुड़ा सामान बेचता है। साल भर वह साइकिल रिपेयरिंग करता है। महीने में लगभग तीन हजार रुपये। पत्नी एक आश्रम में साफ सफाई कर तीन हजार रुपये कमाती है।

शिवकुमार की उम्र लगभग पचपन साल है। हर साल कांवड़ के दौरान वह यही दुकान लगाता है। बड़ी बेटी की शादी के बाद प्रसव में मौत हो गई थी। शादी में तीन चार लाख रुपये खर्च हो गए। अब दो बच्चे हैं। उनकी स्कूल फीस सालाना करीब दस हजार रुपये है। गैस सिलेंडर हजार के आसपास और सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं।

कांवड़ मेले में इस छोटी सी दुकान से सात आठ हजार रुपये कमाने की उम्मीद ही उन्हें यहां टिकाए रखती है।

आस्था के नीचे दबा जीवन

कांवड़ के दौरान हरिद्वार की यह यात्रा मुझे बार बार अस्कोट आराकोट की याद दिलाती रही। वहां पहाड़ों में छूटते गांव थे। यहां शहर में छूटते लोग हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां पलायन दिखाई नहीं देता, बल्कि फ्लाईओवरों के नीचे स्थिर हो गया है।

आस्था के इस विराट आयोजन के नीचे एक ऐसी दुनिया सांस ले रही है, जिसकी कोई तस्वीर पोस्टर में नहीं आती। कांवड़ के शोर में इन आवाजों की गूंज दब जाती है। लेकिन यही आवाजें बताती हैं कि हरिद्वार केवल तीर्थ नहीं है। यह संघर्ष, असमानता और अदृश्य जीवन का शहर भी है।

मेरे हिस्से की अस्कोट आराकोट यात्रा में यह हरिद्वार भी शामिल है। वह हरिद्वार, जो सड़कों के ऊपर नहीं, फ्लाईओवर के नीचे दिखता है।




डाडा जलालपुर : गांव में दुकान, खेती और बदलती अर्थव्यवस्था

अस्कोट आराकोट यात्रा खत्म होने के साल भर बाद भी मेरे हिस्से की अस्कोट आराकोट यात्रा जारी है और अब मैं दुनिया के किसी कोने में चले जाऊं, शायद यात्रा के दौरान मिली नई दृष्टि से मेरी यह यात्रा हमेशा जारी रहेगी। रुड़की से दस किलोमीटर दूर डाडा जलालपुर पहुंचने पर गांव को गहराई से समझा।

डाडा जलालपुर में खेती, दुकानों और फैक्ट्री के काम से आजीविका चल रही है, लेकिन उधार, पशुपालन और दूध उत्पादन में गिरावट चिंता है।

खेती में पॉपुलर के पेड़ों की ओर रुझान बढ़ा है, जबकि शिक्षा और आस्था गांव को जोड़े रखती हैं।

डाडा जलालपुर गांव में राजवीर सैनी की पुरानी दुकान है। राजवीर सैनी बताते हैं कि गांव की आबादी दो से चार हजार के बीच है। इनमें सौ के आसपास लोग सरकारी नौकरी में हैं, जबकि बाकी लोग फैक्ट्रियों में नौकरी, खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। गांव में करीब सत्तर दुकानें हैं, जिनमें राशन और खेती के सामान की चार दुकानें शामिल हैं। राजवीर सैनी की दुकान में पशुओं का चारा, ज्वार और बाजरा जैसे सामान मिलते हैं।

उधार, ऑनलाइन भुगतान और खेती के बदलते स्वरूप
राजवीर सैनी बताते हैं कि उधार गांव की बड़ी समस्या है। साल भर में उनकी दुकान पर पांच से छह लाख रुपये तक का उधार हो जाता है। गांव में गन्ना, गेहूं और धान की खेती होती है, लेकिन अब लोग पॉपुलर के पेड़ों की तरफ जा रहे हैं। उनके अनुसार पॉपुलर लगाने से एक एकड़ में करीब दस लाख रुपये की कमाई पांच साल में हो रही है। पॉपुलर के साथ अन्य फसल भी लग जाती है। गांव में ऑनलाइन पेमेंट बढ़ा है और इससे फायदा ही हुआ है। बैंक से निकालकर पैसे देने की बात कहने वाले लोग अब कम हैं।

पशुपालन में गिरावट और दूध की कमी


राजवीर सैनी बताते हैं कि पहले जहां लोगों के पास पांच–छह पशु होते थे, अब एक–दो ही पशु रह गए हैं। गांव में अब लोग डेयरी से दूध लेने लगे हैं। पुरुष फैक्ट्री में काम करते हैं और नई पीढ़ी की महिलाएं पशुपालन नहीं करना चाहती।

एक अन्य दुकानदार मुनेश कुमार सैनी बताते हैं कि गांव में अब सिर्फ एक ही डेयरी बची है। उनके अनुसार छह साल पहले गांव में दस–बारह क्विंटल दूध अतिरिक्त होता था, जो अब घटकर करीब दो–ढाई क्विंटल रह गया है।

बांझ पशु, इलाज और रोज़गार की प्राथमिकताएं


मुनेश कुमार सैनी ने बताया कि इन दिनों पशुओं का बांझ होना सबसे बड़ी समस्या बन गया है। लोग डॉक्टरों के पास जाते हैं, लेकिन उनका कहना है कि डॉक्टर भी इस समस्या को गंभीरता से नहीं लेते। शायद खेतों में प्रयोग हो रही केमिकल युक्त खाद इसका बड़ा कारण है।

उन्होंने आगे बताया कि गांव में लोग सरकारी नौकरी को बहुत गंभीरता से नहीं लेते और हिंदुस्तान लीवर जैसी कंपनियों में प्राइवेट नौकरियों की तरफ जा रहे हैं। गांव के दो–तीन युवा पीएचडी कर चुके हैं और कुछ बीटेक कर रहे हैं, यह गांव के अच्छे भविष्य की उम्मीद जगाता है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और आस्था का केंद्र


डाडा जलालपुर में सरकारी स्कूल है। गंभीर बीमारी के लिए लोगों को देहरादून के अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। गांव में चार प्राइवेट स्कूल हैं और तीन किलोमीटर दूर वैभलपुर में भी सरकारी स्कूल है। मुनेश का कहना है कि सरकारी स्कूल में अब अच्छी शिक्षा मिल रही है।

गांव के एक और युवा मुकेश सैनी बताते हैं कि डाडा जलालपुर में हर साल जुलाई महीने में जारवीर गोगा माड़ी का मेला लगता है। इस दौरान न सिर्फ गांव बल्कि आसपास के कई इलाकों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। लोग गोगा माड़ी में पूजा–अर्चना करते हैं, निशान चढ़ाते हैं और परिवार की सुख–समृद्धि के साथ-साथ सांप–बिच्छू के डर से सुरक्षा की कामना करते हैं। कुछ युवाओं की इस मेले में दुकान लगाने से अच्छी कमाई भी हो जाती है। मुकेश ने बताया कि गांव में कभी–कभी जाति और धार्मिक आधार पर तनाव की स्थिति बनी है, लेकिन अधिकांश समय यहां शांति बनी रहती है।




इतिहास की किताबों में दर्ज होने की तैयारी करते लोहार

आधुनिक मशीनों और बदलते बाजार ने उनकी आजीविका को संकट में डाल दिया है। अगली पीढ़ी की इस काम से दूरी और मांग में कमी से यह पुश्तैनी शिल्प विलुप्त होने की कगार पर है और इतिहास में दर्ज होने की तैयारी में है। 

मुल्तान के लोहार हिंदुस्तान में कब बसे

जाहिद हसन और उनके भाई वाजिद हसन उत्तराखंड के मानक मजरा गांव में रहते हैं। यह रुड़की से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर है। डाडा जलालपुर में अपनी दुकान पर बैठे जाहिद बताते हैं कि वे मिर्जा जाति से हैं और उनका परिवार पीढ़ियों से लोहार का काम करता आया है। उनके दादा मोहम्मद हसन 1947 के बंटवारे के दौरान अपने भाई रज्जाक के साथ मुल्तान से भारत आए थे। कुछ वर्षों तक लाहौर से रिश्तेदार यहां आते रहे, लेकिन समय के साथ यह सिलसिला थम गया।

जाहिद बताते हैं कि बंटवारे के दौर में मानक मजरा में लोहारों की कमी थी। इसी वजह से गांव के प्रधान चतरू ने उनके परिवार को घर के लिए जमीन का पट्टा देकर बसने में मदद की। जाहिद और वाजिद ने अपने पिता अब्दुल हमीद से लोहारी का हुनर सीखा।

लोहारी का शिल्प और तकनीक

जाहिद और वाजिद का काम किसानों की जरूरतों के इर्द गिर्द घूमता है। वे दरांती, खुरपा और पाटल जैसे औजार बनाते हैं, जो खेती और पेड़ काटने के काम आते हैं। इसके अलावा वे पुराने लोहे के औजारों में धार लगाने का काम भी करते हैं, जो उनकी आय का मुख्य जरिया है।

दुकान के आगे बने गड्ढे में कोयला डाला जाता है। कोयले को जलाने के लिए हवा देने वाली मशीन का इस्तेमाल होता है। यह मशीन हाथ से चलने वाली और बिजली से चलने वाली दोनों प्रकार की होती है। औजार के आकार के अनुसार वे कबाड़ी से खास तरह का लोहा खरीदते हैं। पाटल के लिए चौड़ा और मजबूत लोहे का टुकड़ा लिया जाता है।

कोयला लकड़ी की भट्टियों से बीस रुपये प्रति किलो की दर से खरीदा जाता है और एक महीने में करीब पचास किलो कोयला खर्च हो जाता है। भट्टी की आग में लोहा तपता है और हथौड़ों की ठक ठक से वह औजार का रूप लेता है।

बदलता बाजार और आर्थिक चुनौतियां

पिछले दो दशकों में इस पेशे में बड़ा बदलाव आया है। जाहिद बताते हैं कि बीस साल पहले एक पाटल दो सौ रुपये में बिकता था, जो अब ढाई सौ रुपये का हो गया है। कोयले की कीमत भी छह सात रुपये प्रति किलो से बढ़कर बीस रुपये हो गई है। बीस रुपये में बिकने वाली दरांती अब पचास रुपये में बिकती है।

कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद मांग में भारी कमी आई है। जाहिद बताते हैं कि पहले खेती का सारा काम हाथ से होता था। फसल कटाई के मौसम में दो सौ से तीन सौ दरांतियां बिक जाती थीं। मशीनों के आने के बाद यह संख्या घटकर सौ से डेढ़ सौ रह गई है।

खुरपे की स्थिति और भी खराब है। पहले महीने में सौ से डेढ़ सौ खुरपे बिकते थे। अब केवल बीस से तीस खुरपे ही बनते और बिकते हैं। छोटे खेत वाले किसान ही अब इन औजारों को खरीदते हैं। घर का राशन चलाने लायक आय का मुख्य हिस्सा औजारों की मरम्मत से आता है।

लोहारों का वजूद ही खत्म हो जाएगा

जाहिद को लगता है कि उनका यह पुश्तैनी पेशा अगले दस से बीस साल में खत्म हो सकता है। मशीनों ने खेती के तरीके बदल दिए हैं। पशुपालन में कमी के कारण घास काटने की जरूरत भी घट रही है। दरांती और खुरपे जैसे औजारों की मांग लगातार कम होती जा रही है। उनके बच्चे इस पेशे को अपनाने के इच्छुक नहीं हैं। एक बेटा इलेक्ट्रिशियन है और दूसरा अभी नौवीं कक्षा में पढ़ रहा है।

यात्रा में दिखाई दिया ऑफर

अस्कोट आराकोट यात्रा के अनुभव को और समृद्ध करने के लिए सहयात्री चंदन डांगी साल 2025 में अपने कुछ साथियों के साथ स्रोत से संगम और संगम से स्रोत तक नदी अध्ययन यात्रा पर निकले। इस दौरान उन्होंने चनौला गांव में लोहारों के कार्यस्थल को देखा, जिसे स्थानीय भाषा में ऑफर कहा जाता है।

गांव के एक कोने में बड़े पत्थर की ओट में स्थित यह पारंपरिक ऑफर अपनी छत जैसी आकृति वाले पत्थर के कारण पाखा खरक के नाम से भी जाना जाता है।

मैदान से अलग नहीं लोहारों के हालात

चंदन बताते हैं कि इसे देखकर उन्हें अपने गांव डांगीखोला मल्ला के मोहन दा का ऑफर याद आ गया, जहां वे दरांती, हल के फाल, कुदाल और बसूले पर धार लगवाने जाया करते थे। वहां चीड़ की छाल जलाकर साइकिल के पहिए से हवा फेंकी जाती थी।

चनौला के ऑफर के बारे में स्थानीय निवासी शंकर बिष्ट बताते हैं कि आजकल गंगा राम गांव के एकमात्र शिल्पकार हैं, जो इस कला को जीवित रखे हुए हैं। यह शिल्प चनौला गांव के सामाजिक और आर्थिक ताने बाने का अभिन्न हिस्सा रहा है।

कोयले की दहकती भट्टी, उसे हवा देने वाली धौंकनी और पास में रखी भारी निहाई, जिस पर गर्म लोहा आकार लेता है, इस ऑफर के जरूरी उपकरण हैं। कुछ साल पहले तक गांव के किसान खेती के औजार, घरों के दरवाजों के कब्जे, कुंडी, खूंटी और रसोई के सामान तक इन्हीं कारीगरों से बनवाते थे। बढ़ई, कुम्हार और राजमिस्त्री जैसे अन्य कारीगर भी अपने औजारों के लिए लोहारों पर निर्भर थे।

चंदन डांगी ने आगे बात करते हुए कहा कि उनकी गंगा राम से मुलाकात नहीं हो सकी, लेकिन गांव के बुजुर्ग जीत सिंह ने बताया कि गंगा राम केवल कारीगर ही नहीं, बल्कि एक समाधानकर्ता भी हैं, जो अपनी कुशलता से ग्रामीण जीवन की हर जरूरत पूरी करते हैं।

लोहार का यह शिल्प अक्सर पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। पिता अपने पुत्रों को धातु के स्वभाव, सही तापमान और हथौड़े की सटीक चोट से आकार देने की कला सिखाते हैं।

गंगा राम के भाई और बच्चे पढ़ लिखकर पलायन कर चुके हैं। मशीनों के कारण अब औजारों की मांग न्यूनतम स्तर पर आ गई है। सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार इस परिश्रम के बदले धन के बजाय अनाज, वस्त्र और खेतों से प्राप्त फसल का एक हिस्सा भेंट करने का चलन अभी भी मौजूद है। जातिवाद के कारण शिल्पकारों को अपेक्षित मान सम्मान भी नहीं मिल पाता।



श्यामनगर गांव : खेती, सौहार्द और बदलते रोज़गार की जमीनी तस्वीर

हाइवे से लगी सड़कों के अंदर बसे इन गांवों की तस्वीर अक्सर हमारे सामने नहीं आ पाती। ऐसी ही एक तस्वीर को तलाश करते हुए मैं जसपुर के पास जगजीतपुर टोल के नजदीक स्थित श्यामनगर की तरफ मुड़ गया।

ऊधम सिंह नगर ज़िले का श्यामनगर गांव खेती, सामाजिक सौहार्द और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। गांव के युवा अर्जुन सिंह कृष्णा बताते हैं कि उनके पिता किसान हैं। गांव में बड़े पैमाने पर पलायन नहीं है। युवा फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं, जबकि नई पीढ़ी का झुकाव खेती से कम होकर नौकरी की ओर बढ़ा है। कुछ घर आज भी पूरी तरह खेती पर निर्भर हैं।

ढांढी नदी, डैम और खेती पर असर

श्यामनगर से होकर बहने वाली ढांढी नदी तुमरिया डैम से आती है। इसी नदी से फायदा उठाते हुए गांव वालों द्वारा नाली बनाकर खेतों में पानी पहुंचाया गया है। गांव में अनुसूचित जाति के लगभग आठ सौ वोट हैं और उनके पास भूमि भी अधिक है।

अर्जुन सिंह कृष्णा बताते हैं कि बारिश के दौरान जब डैम से पानी बंद कर दिया जाता है, नदी में पानी की कमी हो जाती है और इसका असर खेती पर पड़ा है। अर्जुन सिंह के अनुसार पांच से दस साल पहले एक एकड़ में करीब तीस क्विंटल पैदावार होती थी, जो अब घटकर लगभग बीस क्विंटल रह गई है। गांव में मुख्य रूप से गन्ने की खेती की जाती है।

सामाजिक ताना–बाना, कम आबादी और ज्यादा भागीदारी

गांव में मुस्लिम आबादी कम है और उनके वोट लगभग सौ बताए जाते हैं। शादी–बारात में सभी समुदायों को निमंत्रण दिया जाता है। ईद के मौके पर सबको बुलाया जाता है और हिंदुओं के त्योहारों में मुस्लिम समुदाय शामिल होता है। गांव में माता देवी का मंदिर है, माता की झांकी और रामलीला जैसे आयोजनों में मुस्लिमों का योगदान भी रहता है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की चुनौतियां

श्यामनगर से तीन किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश स्थित ठाकुरद्वारा है, जहां कोचिंग सेंटर हैं। यहां से स्टेनो की पढ़ाई कर कई लोग सरकारी नौकरी में लगे हैं। गांव के आसपास फाइलों में इस्तेमाल होने वाला कागज़ बनाने वाली एक पेपर मिल भी है, जिससे कुछ स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलता है।
दस किलोमीटर दूर जसपुर में इंटर कॉलेज हैं और बच्चे वहीं पढ़ने जाते हैं। वे गांव से पहले साइकिल से हाइवे तक और फिर बस से स्कूल पहुंचते हैं। इलाज के लिए लोगों को काशीपुर जाना पड़ता है। पानी की सुविधा के लिए लगभग हर घर में निजी नल लगे हैं और गांव में पानी की टंकी लगाने का काम चल रहा है। गांव में दुधारू पशु हैं और गायों की संख्या अधिक है।

सड़क, पुल, पंचायत और खेल : बदलाव की कहानी

अर्जुन कहते हैं कि गांव में सड़क, पुल और बारातघर के लिए दिवंगत कंचन सिंह का संघर्ष अहम रहा है। साल 2017 से पहले ठाकुरद्वारा जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती थी। कंचन सिंह ने काफी भागदौड़ करने के बाद गांव में पुल बनवाया और इसके बाद आवागमन आसान हुआ। अब गांव का गन्ना उत्तर प्रदेश तक जाता है और उसके अच्छे दाम मिल जाते हैं, साथ ही पढ़ाई के लिए बाहर जाना भी सहज हो गया है। बावर खेड़ा ग्राम पंचायत से अलग होना भी कंचन सिंह के प्रयासों से जोड़ा जाता है।
अर्जुन ने बताया कि गांव की कई लड़कियां भी सरकारी नौकरी में हैं और उन्हें बराबरी की नजर से देखा जाता है। गांव के एक युवा अरविंद कुमार राज्य स्तर पर वॉलीबॉल खेल चुके हैं और वह गांव के अन्य लड़कों को भी वॉलीबॉल का प्रशिक्षण देते हैं। गांव के करीब पंद्रह लड़के इस खेल में बढ़िया हैं और यहां वॉलीबॉल टूर्नामेंट भी हो चुका है।


उत्तराखंड में खेती पर गहरा संकट : तिल, चौलाई और कीवी बन सकते हैं सहारा

अल्मोड़ा जिले के स्याल्दे क्षेत्र में कई किसानों के अनुसार एक दशक पहले तक आबाद रहने वाली खेती अब गोवंश और जंगली पशुओं की पहली पसंद बन गई है। खेतों में लगाए पौधे रात भर में नष्ट हो जाते हैं। स्याल्दे में एक चाय की दुकान पर प्रेमगिरी गोस्वामी से मिलना एक संक्षिप्त पहाड़ यात्रा को सफल कर गया।

चौखुटिया की पुरानी कृषि सफलता और उसका पतन

स्याल्दे के 91 वर्षीय कृषि विशेषज्ञ प्रेमगिरी गोस्वामी बताते हैं कि वर्ष 1974 से 1980 तक वे भारत जर्मनी कृषि विकास परियोजना आईगाडा में एडवाइजर रहे। उनका कार्यक्षेत्र चौखुटिया था, जो उस समय उच्च उत्पादन वाला ब्लॉक माना जाता था। उनके अनुसार उस दौर में गेहूं की उन्नत किस्में, धान की कई किस्में और व्यावसायिक सब्जियों का उत्पादन तेजी से बढ़ा।

प्रेमगिरी गोस्वामी बताते हैं कि चौखुटिया, स्याल्दे और ऊंचाई वाले अन्य इलाकों में नाशपाती और कागजी नींबू का सफल प्रयोग हुआ था। नाशपाती और नींबू दोनों ही ऊंचाई के हिसाब से बेहतर पैदावार देते थे। गोस्वामी के अनुसार कागजी नींबू की एक खासियत यह थी कि बंदर तक उसे नहीं खाते थे।

उनके अनुसार वर्ष 1980 में चौखुटिया ब्लॉक को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उच्च उत्पादन के लिए सम्मानित किया गया था। वह बताते हैं कि पिछले एक से दो दशक में कृषि में गिरावट आवारा पशुओं की संख्या बढ़ने और बैल आधारित कृषि के खत्म होने के बाद शुरू हुई।

आवारा पशुओं से बढ़ती समस्या

प्रेमगिरी गोस्वामी के अनुसार पशु चराई और बैलों के व्यापार में कमी आने के बाद खेत खाली होने लगे। जंगली पशु, खासकर बंदर और सूअर, कई फसलों को नुकसान पहुंचा देते हैं। उनका मानना है कि वर्तमान स्थिति में खेती को बचाने के लिए सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़ना ही एकमात्र मार्ग है।

तिल की खेती किसानों के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्प

गोस्वामी बताते हैं कि तिल वह फसल है जिसे जंगली पशुओं से लगभग कोई खतरा नहीं होता। उनके अनुसार उन्होंने इस उम्र में भी लोगों को जागरूक कर स्याल्दे सहित कई इलाकों में तिल बड़े पैमाने पर लगाया है। तिल लगभग 120 से 130 दिनों में तैयार हो जाता है। इसका तेल आसानी से बिक जाता है और पूजा सामग्री के रूप में भी इसकी स्थायी मांग रहती है। उनके अनुसार कम क्षेत्र में भी चार महीने में लगभग दो से तीन हजार रुपये की आमदनी संभव है।

चौलाई, कीवी और कागजी नींबू : सुरक्षित और बाजार में मजबूत

प्रेमगिरी गोस्वामी बताते हैं कि चौलाई भी ऐसी फसल है जिसे जानवर नहीं खाते। चौलाई की हरी पत्तियां सब्जी के रूप में उपयोग होती हैं और इसके दानों से लड्डू और रामदाना जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं। यह फसल बाजार में स्थायी मांग रखती है। हरिद्वार और स्थानीय पहाड़ी बाजारों में चौलाई के दाने और लड्डू की नियमित मांग रहती है।

वे बताते हैं कि तिल और चौलाई दोनों में ही पानी की आवश्यकता कम होती है। इसी तरह कागजी नींबू को भी जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते।

वर्ष 2015 में पांच हजार से छह हजार फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जिला प्रशासन द्वारा उनके सुझाव पर कीवी के पौधे वितरित किए गए थे। शुरुआती वर्षों में कई परिवारों को कीवी की खेती से अच्छी आमदनी हुई।

प्रेमगिरी गोस्वामी रेशम पालन को भी पहाड़ी क्षेत्रों की एक महत्वपूर्ण संभावना मानते हैं। इसके लिए उन्होंने शहतूत की खेती की है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि इसके लिए मजबूत तारबाड़ जरूरी है, ताकि जानवरों से फसल की सुरक्षा हो सके।

खेती को पुनर्जीवित करने के लिए क्या जरूरी है

प्रेमगिरी गोस्वामी के अनुसार खेती को फिर से पटरी पर लाने के लिए तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं। सुरक्षित फसलों का चयन, अच्छी मार्केटिंग और खेतों तक योजनाओं की पहुंच। उनका मानना है कि यदि खेतों पर काम करने वाली पुरानी योजनाएं फिर से लागू की जाएं और फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, तो कृषि क्षेत्र को राहत मिल सकती है।






मालधन चौड़ में पहाड़ के शिल्पकार समुदाय की बसावट : ढेला नदी का डर और अधूरी बुनियादी जरूरतें

इतिहासकार पद्मश्री डॉ शेखर पाठक के कहने पर मैं अस्कोट आराकोट यात्रा के कुछ महीनों बाद मालधन चौड़ पहुंचा, वह चाहते हैं कि लगभग छह दशक पहले जाति के आधार पर बसाए गए इस इलाके की मौजूदा स्थिति को दर्ज किया जाए।

उत्तराखंड में काशीपुर और रामनगर से लगभग 20 किलोमीटर स्थित मालधन चौड़ साल 1966-67 में पहाड़ के शिल्पकार समुदाय को बसाया गया था। आज भी यह इलाका ढेला नदी के कटाव, बाढ़ के इतिहास, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और वन ग्रामों की उपेक्षा से जूझ रहा है। यह रिपोर्ट स्थानीय निवासियों कमला, मोहनलाल आर्य, महेश चंद्र की बातचीत पर आधारित है।

पुरानी बस्ती की कमला : लड़कियों की पढ़ाई, महिलाओं की सेहत, बदले हुए सामाजिक तौर-तरीके

कमला पुरानी बस्ती की रहने वाली हैं। उनकी शादी भी यहीं हुई। वह बताती हैं कि पहले यहां लड़कियों की शादी 14 और 15 साल में कर देते थे। अब शादी 18 साल के बाद होती है। उनकी उम्र करीब 40 से 45 वर्ष है।
कमला कहती हैं कि लड़कियों के लिए पढ़ाई का माहौल पूरी तरह बदला है। अब लड़कियां इंटर कॉलेज तक जाती हैं। कई ग्रेजुएशन कर रही हैं। पहले जंगल और स्कूल दूर के कारण पढ़ाई छूट जाती थी।
महिलाओं की सेहत पर वह बताती हैं कि मालधन चौड़ के अस्पताल में लेडी डॉक्टर तो है। लेकिन कई वर्षों तक एक्स रे और ब्लड टेस्ट जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं। कैंसर और महिलाओं से जुड़ी बीमारियों के बारे में जागरूकता पहले बहुत कम थी। अब धीरे-धीरे बढ़ रही है। कई बार इलाज के लिए काशीपुर जाना पड़ता था।
कमला कहती हैं कि गरीब परिवारों में महिला समूह ने कुछ मदद दी है। लेकिन कई सरकारी योजनाएं वन ग्रामों तक अब भी पहुंच नहीं सकीं हैं।

सामाजिक बदलावों का जिक्र करते हुए वह कहती हैं कि पहले पीरियड और प्रसूति के बाद महिलाओं को कुछ दिनों तक अलग रखा जाता था। अब यह प्रचलन लगभग खत्म है। पैड का इस्तेमाल बढ़ा है, कपड़े का प्रयोग कम हुआ है। मेंस्ट्रुअल कप की जानकारी यहां की महिलाओं को कम ही है। जाति को लेकर कमला बताती हैं कि पूरी बस्ती शिल्पकार समुदाय की है। इसलिए जातिगत तनाव नहीं है।

मोहनलाल आर्य : कैसे बसा मालधन चौड़ और बदलती ढेला नदी

मोहनलाल आर्य, ग्रामसभा आनन्द नगर के निवासी हैं। रिटायर्ड पोस्टमास्टर मोहनलाल कहते हैं कि मालधन चौड़ साल 1966 और 1967 में बसाया गया। उस समय ढेला नदी केवल लगभग 50 फीट चौड़ी थी और आज यह कटाव बढ़कर लगभग एक किलोमीटर तक फैल गया है।
उन्होंने बताया शुरुआत में चंद्रनगर, मालधनचौड़ नंबर दो, गांधी नगर नंबर तीन सहित सात गांव बसाए गए थे और बाद में बाढ़ से विस्थापित लोगों के लिए नथावली और पटरानी जैसे वन ग्राम बने।
मोहनलाल बताते हैं कि स्वर्गीय खुशीराम शिल्पकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के निर्णय के बाद पहाड़ के शिल्पकार समुदाय को यहां बसने का अवसर मिला और हर परिवार को पांच एकड़ जमीन, दो बैल मिले और हल मिला।
मोहनलाल कहते हैं आनन्द नगर और देवीपुरा में खेती की जमीन ढेला नदी से कटते गई और अब पूरी तरह रेत से भर गई है। उन्होंने कहा साल 1978 की बाढ़ में गांव के कई जानवर मर गए और कुछ बच्चे भी बहे। अफसरों ने तब गांव वालों को ऊंची जगहों पर जाने के लिए कहा। नथावली और पटरानी जैसे नए गांव जंगल के बीच बसाए गए और आज वहां ऐसे दस से बारह वन ग्राम हैं।
बाढ़ से प्रभावित परिवारों को तब जमीन देने का आश्वासन मिला था लेकिन आज तक वह जमीन नहीं मिली, वन ग्राम की जमीन पट्टे पर नहीं है।
ढेला नदी को लेकर मोहनलाल चिंतित हैं। उनका कहना है कि नदी लगातार रास्ता बदल रही है। बारिश में यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि कटाव अगली बार किस दिशा में जाएगा।
वो कहते हैं तुमरिया बांध भर जाता है तो फाटक खोलने पर नदी की तेज धारा सीधे गांवों की ओर आती है और बड़ा नुकसान करती है। सबसे ज्यादा नुकसान गोपालनगर गांव में हो रहा है।

क्षेत्र में पर्यटन की संभावना तो वन ग्रामों की सबसे बड़ी मुश्किल सड़क

महेश चंद्र देवीपुरा गांव के निवासी हैं। वह मालधन चौड़ में टू व्हीलर सर्विस और होंडा एजेंसी चलाते हैं। महेश कहते हैं कि मालधन चौड़ में सरकारी नौकरी वाले पांच प्रतिशत से भी कम लोग हैं। तुमरिया बांध को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए तो यहां नैनीताल जैसा पर्यटन विकसित हो सकता है।

उन्होंने कहा यह क्षेत्र जिम कॉर्बेट पार्क से जुड़ा हुआ है और अत्यधिक सुंदर है लेकिन इसकी पब्लिसिटी नहीं की गई।
अपनी बात समाप्त करते महेश कहते हैं कि मुख्य गांव में तो सड़क और लाइट की स्थिति बेहतर है। लेकिन वन ग्रामों में हालत बेहद खराब है, नथावली, पटरानी जैसे गांवों में बच्चों का स्कूल जाना, चक्की तक पहुंचना और पानी लाना आज भी बड़ी चुनौती है। हाथियों और जंगली जानवरों का डर हमेशा रहता है। यहां स्थित मिलिट्री की लगभग तीन हजार एकड़ जमीन पर कोई उद्योग या फैक्ट्री लग जाए तो रोजगार के लिए जूझ रहे बीए और बारहवीं पास युवाओं के लिए रोजगार की संभावनाएं खुल जाएगी।





टनकपुर विकास की राह में पीछे क्यों छूट गया! सड़क, बाजार और मजदूरी की बदलती तस्वीर

हल्द्वानी की तरह ही टनकपुर को भी नदी-पहाड़ प्रकृति से गिफ्ट में मिले हैं, इसके बावजूद यह क्षेत्र विकास से अब तक महरूम रहा है। यह किताब मेरे गृह नगर के जमीनी हालातों को बयान किए बिना अधूरी रहती, आइए जानते हैं टनकपुर में विकास की रफ्तार किन मोड़ों पर थम गई।

ऊंचीहार उत्तर प्रदेश से सुरेश साहू के पिता रामनारायण वर्ष 1955 में रोजगार की तलाश में टनकपुर आए थे। वह टनकपुर में मजदूरी किया करते थे। सुरेश बताते हैं कि 1984 में नेपाल बॉर्डर पर पुल बनना टनकपुर के लिए एक बड़ा मोड़ था। मजदूरों, कर्मचारियों और व्यापारियों की वजह से बाजार चमका। लोगों ने घरों को किराए पर देना शुरू किया। सुरेश साहू ने भी उसी साल वीसीआर किराए पर देने और किराए की दुकान में एक सिलाई मशीन लेकर सिलाई का काम शुरू किया।
1991 में पुल का काम खत्म होते ही बाजार की गति दोबारा धीमी पड़ने लगी। 2005 में अपनी दुकान खरीदी। उनकी बेटियाँ आईआईटी, आईआईएम और एमसीए जैसी उच्च शिक्षा लेकर आगे बढ़ गईं लेकिन शहर का कारोबार वह प्रगति नहीं कर पाया।

सड़क की वजह से शहर का बदलता स्वरूप

सुरेश ने टनकपुर के बाजार की बुरी स्थिति के बारे में बात करते हुए आगे बताया कि टनकपुर के पास स्थित पूर्णागिरी धाम की भीड़ से कभी चैत्र नवरात्र की भीड़ से शहर भरा रहता था। बसें और यात्री टनकपुर के भीतर तक आते थे जिससे बाजार में रौनक बनी रहती थी। अब सड़कें सुधरने के बाद लोग सीधे धाम तक चले जाते हैं। शहर के अंदर तक भीड़ नहीं आती। यही स्थिति ऑल वेदर रोड की वजह से भी हुई है, पहाड़ के लिए अब रात भर गाड़ियां चलती हैं तो टनकपुर रुक कर खरीददारी कम ही लोग करते हैं।

ऑनलाइन बाजार का असर

सुरेश की सिलाई दुकान में कोरोना से पहले दस कारीगर काम करते थे। अब केवल चार रह गए हैं। इसके साथ ही ऑनलाइन खरीददारी ने स्थानीय बाजार को और कमजोर कर दिया है। सुरेश अपनी दुकान के सामने खड़े होकर आसपास की खाली पड़ी दुकानों की ओर इशारा करते हैं। वह कहते हैं कि पहले इन दुकानों में भीड़ रहती थी। आज ग्राहक ऑनलाइन खरीद लेते हैं और दुकानें खाली पड़ी रहती हैं। उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले तक रेलवे क्षेत्र में हाथ से पत्थर तोड़ने का बड़ा काम था। मजदूरों की आवाजाही रहती थी। बाद में क्रेशर लगने लगे। क्रेशर मशीनें पत्थर को तेज़ी से तोड़ देती हैं जिससे मजदूरों की जरूरत कम हो गई और यह काम लगभग खत्म हो गया।

टनकपुर से भी पलायन

सुरेश कहते हैं कि लोग पहाड़ से पलायन की बात करते हैं जबकि टनकपुर स्वयं भी पलायन की मार झेल रहा है। वह कहते हैं कि यहां युवाओं के लिए कोई रोजगार नहीं है। व्यापार करो तो भी मन में हमेशा अनिश्चितता रहती है कि यह कब तक चलेगा। युवाओं की बड़ी संख्या पढ़ाई या काम के लिए बाहर ही चली जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि भोटिया समुदाय के दस पंद्रह परिवार कभी बाजार में टॉफी और छोटी मोटी वस्तुएँ बेचते थे। अब सिर्फ एक परिवार इस काम में बचा है।

टनकपुर का बदलता बाजार और खेती का असर

गुलशन भी बाजार में मिले। वह अब ई रिक्शा चलाते हैं। उनका परिवार पहले टनकपुर में सब्जी उगाकर बेचता था। वह बताते हैं कि अब सब्जी बाहर से आती है। स्थानीय खेती लगभग खत्म हो गई है क्योंकि लोगों ने सब्जियों की जगह जमीन पर प्लॉटिंग कर दी है। खेती घटने से शहर की सब्जी मंडी की स्थानीय पहचान भी खत्म होती जा रही है।

पर्यटन और रेल लाइन की उम्मीद

सुरेश साहू कहते हैं कि चूका गांव तक शारदा नदी के किनारे बनने वाली सड़क को लोग पर्यटन की एक नई संभावना बताते हैं। चूका गांव का प्राकृतिक सौंदर्य और आसपास के जंगल मिलकर इसे एक छोटे पर्यटन केंद्र के रूप में पहचान दिला सकते हैं।
सालों से चर्चा में टनकपुर बागेश्वर रेल लाइन भी यहाँ की सबसे बड़ी उम्मीदों में से एक है। इसका सर्वे अंग्रेजों के समय हुआ था लेकिन योजना आज भी आगे ही बढ़ती जा रही है। रेल लाइन बन जाए तो टनकपुर की रौनक वापस लौट सकती है। यात्रियों की आवाजाही बढ़ेगी और बाजार फिर चल पड़ेगा।



पहाड़ी हीर रांझा, गुजु मलारी का दुनिया से परिचय कराती ‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम’

मैंने पहले भी लिखा है कि यात्रियों ने महरगांव पहुंचने पर महावीर सिंह रवांल्टा की किताब का विमोचन किया था। उसी दिन मैंने निर्णय ले लिया था कि महावीर जी की इस आवभगत का आभार उनकी किताब की समीक्षा लिखकर चुकाया जाएगा।

‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम’ समय साक्ष्य प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है। किताब में लेखक ने रवाईं क्षेत्र की 46 लोक कथाओं को शामिल किया है। इन कथाओं को पढ़ते मनुष्य और जानवरों के सदियों पुराने आत्मीय संबंधों का पता चलता है। इन रवाईं लोक कथाओं का महावीर ने हिंदी अनुवाद न किया होता तो शायद हिंदी साहित्य के पाठकों को कभी पहाड़ी हीर रांझा, गुजु मलारी के बारे में पता ही न चलता।

शुरुआत से ही मनुष्य और जानवरों के आत्मीय संबंधों पर प्रकाश डालती लोककथाएं

किताब की पहली कहानी ‘सात रानियां और राजकुमार’ पढ़ते हम समझ सकते हैं कि मनुष्य और जानवरों के बीच आत्मीय संबंध सदियों से चले आ रहे हैं। इसी तरह ‘सौतेली मां’ की पंक्ति ‘रूपा खाडू के पास जाकर अपना दुखड़ा रोती। एक दिन खाडू बहन रूपा को ढाँढस देता हुआ बोला, तू रोया मत कर, जब तू मुसीबत में हो, मेरे सींगों पर डंडे से मारा कर, तब जो तू चाहेगी वह सब काम हो जाएगा’ भी साबित करती है कि जानवर, इंसान के हमेशा से करीब रहा है। हम कई लोककथाओं में जानवरों को इंसान के साथ रिश्तों में भी बंधा हुआ पढ़ते हैं, जैसे ‘आदमी की बुद्धिमत्ता’ में सियार और इंसान के बीच मामा, भांजे का रिश्ता है।

इंसान को उसके आचरण की सीख देती किताब

कई लोककथाओं में इंसान के आचरण पर भी लिखा गया है। ‘अकड़’ लोककथा मात्र बारह पंक्तियों की है और उसे पढ़ते ऐसा लगता है कि दुनिया के हर पति पत्नी का रिश्ता एक जैसा ही होता है। ‘आचरण’ लोककथा में रिश्ते नातों पर प्रकाश डालते हुए घर परिवार में एक दूसरे के प्रति अच्छा व्यवहार करने की सीख दी गई है। जैसे ‘कुत्ते के आचरण वाले अपने बेटे बहुओं के साथ उसका हिरण का आचरण कैसे मेल खा सकता था?’ पंक्ति से हमारी समझ बनती है कि हमें घर के बड़े बूढ़ों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए।

लोक कथाओं से देवताओं पर गहरा होता रहा है विश्वास

‘श्रीपुरी ढोल’ में बागा जैसा वीर जब राजा से कहता है कि ‘महाराज। दाहिने हाथ से मैं सिर्फ अपने ईष्ट देवता महासू को ही प्रणाम करता हूं, किसी और को नही’। लोक कथाओं में हमेशा से यह प्रचलित रहा है कि बागा बहुत वीर था और ऐसा वीर भी हमेशा महासू देवता के प्रति श्रद्धा भाव रखता है। इससे यह प्रमाण मिलते हैं कि इन लोक कथाओं ने लोगों के मन में अपने देवताओं के प्रति विश्वास को और भी गहरा करने का काम किया है।

पहाड़ी हीर रांझा, गुजु मलारी का दुनिया से परिचय कराती ‘चल मेरी ढोलक ठुमक ठुम’

‘गुजु मलारी’ पहाड़ी बैकग्राउंड की एक लोक कथा है, जिसमें लड़का भेड़ बकरी चराता है और उसे बचपन में ही ब्याह दी गई मलारी से प्रेम हो जाता है। पिता की प्रेमी से न मिलने देने की जिद और प्रेमी के वियोग में दम तोड़ देने वाली प्रेमिका की यह कहानी हीर रांझा की मशहूर कहानी से कम नही है। इस लोक कथा को पढ़ते हुए यह साबित हो जाता है कि पहाड़ में ऐसी कई कहानियां रही होंगी जो दुनिया के सामने आती तो खूब लोकप्रिय होतीं। महावीर ने इस कहानी का हिंदी अनुवाद कर एक शुरुआत तो की ही है।

पहाड़ के नामों की कहानी इन लोक कथाओं से

पहाड़ों में बहुत से स्थान ऐसे हैं जिनके नामों के पीछे कोई न कोई लोक कथा अवश्य होती है। इस किताब के जरिए हमें ऐसे ही कुछ स्थानों की कहानी के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। पृष्ठ संख्या 52 में ‘दंड’ लोक कथा में लिखा है, कालसी के समीप निर्जन जंगल का स्थान कौवे की काँव काँव के कारण ‘क्वा बासणी’ यानी कौवा बोलना के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ‘विनाश’ में भी लिखा है, ‘उनके अट्ठारह कुंवरों के साथ उनकी पूजा कौंल महाराज के साथ की जाती है। बंग्वाणों के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम बंगाण हुआ’।

‘चालाक घुघतू’ जैसी लोककथा पाठकों को बोर नहीं होने देती है। किताब में मात्राओं की गलती भी दिखाई दी है, जिसने कहीं कहीं पर इसे पढ़ने का मजा किरकिरा किया है। पृष्ठ 97 में बलि को बति लिख दिया गया है, तो 100 में नाक को नाग।


AI Gemini की इस किताब को पढ़ने के बाद बनाई गई यह 'पॉलिसी ब्रीफ' (Policy Brief) संबंधित विभागों और नीति-निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण रोडमैप साबित हो सकता है।


📑 नीतिगत निष्कर्ष एवं अनुशंसा रिपोर्ट (Policy Brief)

विषय: अस्कोट-आराकोट यात्रा और उसके पश्चात के नदी-घाटी अध्ययन (2024-2026) के आधार पर उत्तराखंड के सीमांत एवं तराई क्षेत्रों हेतु नीतिगत रोडमैप।

1. आजीविका एवं कृषि पुनरुद्धार (Livelihood & Agriculture)
 * संकट: बंदरों, सूअरों और आवारा पशुओं के कारण 'बड़ासू' से 'ईशाली' तक पारंपरिक खेती का परित्याग। 'डाडा जलालपुर' जैसे तराई गांवों में रसायनों के कारण पशुओं में बांझपन।
 * नीतिगत अनुशंसा: * सुरक्षित फसल मॉडल: स्याल्दे के अनुभव के आधार पर 'तिल, चौलाई, कागजी नींबू और कीवी' को राज्य की 'बंदर-सुरक्षित फसल' घोषित कर क्लस्टर खेती को बढ़ावा देना।
   * सिंचाई सुरक्षा: ईशाली की क्षतिग्रस्त नहरों और मंजियाली जैसे 'बिना नौले' वाले गांवों के लिए पाइपलाइन के बजाय पारंपरिक जल-नहरों (कूल) का वैज्ञानिक जीर्णोद्धार।
   * परंपरागत कौशल का संरक्षण: लोहारों के 'ऑफर' (कार्यशालाओं) को 'हेरिटेज क्राफ्ट' का दर्जा देकर नई पीढ़ी को स्टाइपेंड के साथ जोड़ना।

2. सामाजिक न्याय एवं सामुदायिक सशक्तिकरण (Social Justice & Empowerment)
 * संकट: 'महिला समाख्या' जैसे मंचों के बंद होने से ग्रामीण महिलाओं के आत्मविश्वास में कमी। दलित बस्तियों (मालधन चौड़) में भूमि पट्टों और बुनियादी सुविधाओं का अभाव।
 * नीतिगत अनुशंसा:
   * महिला समाख्या 2.0: 'गंगा देवी' और 'जशोदा' जैसे जीवंत उदाहरणों को ध्यान में रखते हुए महिलाओं के लिए 'अपनी अदालत' और 'संजीवनी केंद्र' मॉडल को पुनर्जीवित करना।
   * वन ग्रामों का नियमितीकरण: मालधन चौड़ जैसे वन ग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा देना ताकि वहाँ 'सड़क और बिजली' जैसी बुनियादी जरूरतें कानूनी बाधा के बिना पूरी हो सकें।
   * पीरियड्स और रूढ़िवादिता: सांद्रा (गुज्जर बस्ती) और महरगांव के सकारात्मक बदलावों को 'सोशल हेल्थ मॉडल' के रूप में प्रचारित करना।

3. पारिस्थितिकी-संवेदनशील पर्यटन (Eco-Sensitive Tourism)
 * संकट: यमुनोत्री में घोड़ों की लीद और 'साड़ियों' के कचरे से यमुना का दम घुट रहा है। तीर्थाटन 'अनियंत्रित पर्यटन' में बदल गया है।
 * नीतिगत अनुशंसा:
   * यमुनोत्री वेस्ट-फ्री मॉडल: जानकीचट्टी में घोड़ों के लिए अलग ट्रैक और अपशिष्ट निस्तारण केंद्र। नदी में कपड़े फेंकने पर पूर्ण प्रतिबंध और 'निस्तारण शुल्क' का प्रावधान।
   * नया पर्यटन मानचित्र: 'हनोल' (महासू धाम), 'मंजियाली का सूर्य मंदिर' और 'भीमताल का तितली केंद्र' जैसे स्थानों को पर्यटन सर्किट में जोड़ना ताकि केदारनाथ-बद्रीनाथ पर दबाव कम हो।
   * तराई-पहाड़ पर्यटन: टनकपुर की 'शारदा नदी' और 'चूका गांव' को जल-क्रीड़ा और इको-टूरिज्म के रूप में विकसित करना।

4. पर्यावरण एवं वन प्रबंधन (Forest & Ecology)
 * संकट: ओक (बांझ) के जंगलों का विनाश और जल स्रोतों का सूखना। विकास के नाम पर 'खोदो और नदी में डाल दो' का मॉडल (वरुणावत पर्वत खतरा)।
 * नीतिगत अनुशंसा:
   * डख्याट मॉडल का विस्तार: जहाँ ग्रामीण स्वयं जंगल की आग बुझाते हैं और चारे का प्रबंधन करते हैं, ऐसी 'वन पंचायतों' को सीधे बजटीय सहायता प्रदान करना।
   * तितली विज्ञान (Indicators): पीटर स्मेटासेक के शोध के आधार पर तितलियों को 'पर्यावरण स्वास्थ्य का सूचक' मानकर जंगलों की सेहत का वार्षिक डेटाबेस तैयार करना।

5. शहरी असमानता एवं स्वास्थ्य (Urban Inequality & Health)
 * संकट: हरिद्वार के फ्लाईओवरों के नीचे बसती 'अदृश्य दुनिया' और पहाड़ के गांवों में श्रीनगर या देहरादून पर भारी निर्भरता।
 * नीतिगत अनुशंसा:
   * मोबाइल हेल्थ यूनिट्स: ईशाली और बुठोत्रा जैसे दुर्गम गांवों के लिए 'एयर-एंबुलेंस' या 'पहाड़-अनुकूल एंबुलेंस' की व्यवस्था।
   * अदृश्य आबादी का पंजीकरण: हरिद्वार जैसे शहरों में फ्लाईओवरों के नीचे रहने वाले 'रवि और राजेश' जैसों के लिए 'आश्रय स्थल' और 'स्वास्थ्य कार्ड' (KYC सरलीकरण) की विशेष मुहीम।

🏛️ कार्यान्वयन हेतु नोडल एजेंसी प्रस्ताव:
 * उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण: भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील उत्तरकाशी और रुड़की (बांझ पशु समस्या) के शोध हेतु।
 * उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग: लाल चावल, कीवी और पिरुल उत्पादों की ब्रांडिंग हेतु।
 * महिला एवं बाल विकास विभाग: 'गंगा देवी' मॉडल के सामाजिक विस्तार हेतु।
 * लोक निर्माण विभाग एवं रेलवे: टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन और सीमांत सड़कों के समयबद्ध निर्माण हेतु।

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