*लेखन ही जीवन था : विनोद कुमार शुक्ल को दिल्ली में याद किया गया*
भारतीय ज्ञानपीठ और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि कथाकार विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में गुरुवार शाम नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सभा का आयोजन किया गया. यह कार्यक्रम राजकमल प्रकाशन और रजा फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में हुआ. सभा में साहित्य, समाज और संस्कृति से जुड़े कई लेखक, विचारक और पाठक शामिल हुए. वक्ताओं ने विनोद कुमार शुक्ल के लेखन को हिन्दी साहित्य की एक ऐसी उपस्थिति बताया, जो बिना किसी दिखावे के जीवन, समाज और समय के जटिल प्रश्नों को अत्यंत सहज और संवेदनशील भाषा में सामने रखती है.
सभा की शुरुआत वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी के वक्तव्य से हुई. इसके बाद रसचक्र और चेमेगोइयाँ समूहों की ओर से विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं का पाठ किया गया. वन्दना राग ने उनके उपन्यास से अंशपाठ प्रस्तुत किया. कार्यक्रम में अपूर्वानंद, पुरुषोत्तम अग्रवाल, संजीव कुमार, भालचन्द्र जोशी, प्रत्यक्षा, विभूति नारायण राय, शिराज़ हुसैन और आशुतोष भारद्वाज ने अपने विचार साझा किए.
*विनोद कुमार शुक्ल का साहित्यिक परिचय*
विनोद कुमार शुक्ल का जन्म 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में हुआ था. उन्होंने जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की, इसके बाद वे इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से कृषि विस्तार के सह प्राध्यापक पद से 1996 में सेवानिवृत्त हुए.
उनकी प्रमुख कृतियों में लगभग जयहिन्द, वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह, सब कुछ होना बचा रहेगा, अतिरिक्त नहीं, कविता से लम्बी कविता, कभी के बाद अभी, प्रतिनिधि कविताएँ और आकाश धरती को खटखटाता है जैसे कविता संग्रह शामिल हैं. पेड़ पर कमरा और महाविद्यालय उनके कहानी संग्रह हैं, जबकि नौकर की क़मीज़, दीवार में एक खिड़की रहती थी, खिलेगा तो देखेंगे और हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़ उनके उपन्यास हैं.
उनकी रचनाओं का मराठी, मलयालम, अंग्रेज़ी, जर्मन और इतालवी सहित कई भाषाओं में अनुवाद हुआ. उपन्यास नौकर की क़मीज़ पर मणि कौल ने 1999 में फ़िल्म बनाई. अमित दत्ता के निर्देशन में बनी फ़िल्म आदमी की औरत को वेनिस फिल्म फेस्टिवल 2009 में स्पेशल इवेंट पुरस्कार मिला. उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, रजा पुरस्कार और 2023 का पेन अमेरिका नाबोकोव अवॉर्ड सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले. पिछले महीने 23 दिसंबर 2025 को रायपुर में उनका निधन हुआ.
*लेखन, जीवन और मासूमियत की एक ही धारा*
अपने वक्तव्य में अशोक वाजपेयी ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल ने लगभग सत्तर वर्षों का साहित्यिक जीवन जिया, जिसमें से अधिकांश समय रायपुर में बीता. वे कृषि महाविद्यालय में अध्यापन करते थे और उनका साहित्य उनके घर, परिवार और पड़ोस से ही उपजा. जहां अक्सर लेखकों के जीवन और उनके लेखन के बीच दूरी दिखाई देती है, वहीं विनोद कुमार शुक्ल के मामले में यह दूरी लगभग समाप्त हो गई थी और साहित्य ही उनका जीवन बन गया था.
अशोक वाजपेयी ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल ने कभी आरोप प्रत्यारोपों का सहारा नहीं लिया. उन्होंने जिस राह को चुना, उस पर जीवन भर स्थिर रहे. साहित्य उनके लिए एक प्रकार का आश्रम था, जिसमें रहते हुए वे बाहरी हलचलों से लगभग अप्रभावित रहते हुए रचना करते थे. वे किसी बड़े दार्शनिक सत्य की खोज में नहीं थे, बल्कि जीवन से भरे हुए शांत और सहज लेखक थे.
आशुतोष भारद्वाज ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य उनकी किसी कल्पनात्मक निर्मिति से अधिक उनके जिए हुए जीवन की प्रतिलिपि है. उम्र के आखिरी पड़ाव तक उनकी मासूमियत उतनी ही प्रामाणिक बनी रही. उन्होंने कहा कि आधुनिक हिन्दी साहित्य में शायद ही किसी एक लेखक ने अपने गृहराज्य को उतना दिया हो, जितना छत्तीसगढ़ को विनोद कुमार शुक्ल ने दिया है.
भालचन्द्र जोशी ने कहा कि रायपुर में विनोद कुमार शुक्ल का जन्मदिन भव्य रूप से मनाया जाता था, लेकिन वे स्वयं उसी विस्मय और सादगी के साथ बैठे रहते थे. जब पहली बार उनकी कविताएँ मंच पर गाई गईं, तो उन्होंने सहज भाव से पूछा कि अच्छा, मेरी कविताएँ गाई भी जा सकती हैं. जोशी के अनुसार यही मासूमियत उनके जीवन और लेखन दोनों की पहचान थी.
*साधारण भाषा में गहराई, मौन में प्रतिरोध*
विभूति नारायण राय ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ते हुए हमेशा यह विस्मय रहा कि वे कितनी साधारण रोजमर्रा की भाषा में कितना कठिन और गहन गद्य रच देते थे. वे कम बोलते थे, लेकिन उनके साथ बैठना ही एक समृद्धि थी और उनकी मौन उपस्थिति भी बहुत कुछ सिखा जाती थी.
संजीव कुमार ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य सचेत या अचेत रूप से प्रतिरोध का साहित्य है. वे किसी नारे या प्रत्यक्ष राजनीतिक वक्तव्य के लेखक नहीं थे, लेकिन उनकी दृष्टि यथास्थिति की विचारधारा में धीरे धीरे सेंध लगाती है. वे वही दिखाते हैं, जिसे देखने के हम अभ्यस्त नहीं हैं और यही अनपेक्षित दृष्टि उनके लेखन को राजनीतिक बनाती है.
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल विद्वत्ता से अधिक प्रज्ञा के लेखक थे. उनकी सबसे बड़ी क्षमता यह थी कि वे जटिल को सहज और बोधगम्य बना देते थे. उनका लेखन पाठक को चुनौती नहीं देता, बल्कि आमंत्रित करता है. छोटे छोटे वाक्यों में गूंजता यह लेखन लंबे समय तक पाठक के भीतर बना रहता है.
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