*जंगल, पानी और लोग : डख्याट से ठडुंग तक पहाड़ की जमीनी कहानी*
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में जंगल और पानी का रिश्ता सिर्फ पर्यावरण का नहीं, जीवन का सवाल है. उत्तरकाशी जिले के डख्याट गांव से लेकर बड़कोट क्षेत्र के ठडुंग तक लोगों के साथ हुई बातचीत यही बताती है कि जहां जंगल पर स्थानीय समुदाय का अधिकार और जिम्मेदारी है, वहां पानी, खेती और जीवन की निरंतरता बनी रहती है. इन गांवों में जंगल की रक्षा कानून से नहीं, समझ और जरूरत से होती है.
*डख्याट : जंगल पर ग्रामीणों का अधिकार, पानी की सुरक्षा की बुनियाद*
डख्याट गांव में खेती करने वाले खेमराज सिंह ज्याड़ा बताते हैं कि गांव के जंगल पर पूरा अधिकार ग्रामीणों का है. यहां ग्राम वन पंचायत व्यवस्था लागू है और वन पंचायत समिति का सरपंच पांच साल के लिए चुना जाता है. यह चुनाव प्रशासनिक अधिकारियों की देखरेख में होता है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है.
खेमराज बताते हैं कि पिछले एक दो साल की गर्मियों में जब बड़कोट और आसपास के इलाकों में पानी की भारी किल्लत रही, तब भी डख्याट के चार पानी के स्रोत सूखे नहीं. आसपास के गांवों के लोग भी यहां से पानी लेने आए. वह कहते हैं कि पिछली गर्मी में जहां पहाड़ के कई इलाकों में लोग रजाई छोड़ चुके थे, वहीं डख्याट में रात को रजाई ओढ़नी पड़ती है. इसका कारण घना और सुरक्षित जंगल है.
*रात बारह बजे भी आग बुझाने निकलते हैं ग्रामीण*
डख्याट में जंगल से लकड़ी काटना और चारा पत्ती लेना पूरी तरह प्रतिबंधित है. हर पांच साल में वन पंचायत समिति की निगरानी में सीमित काट छांट की जाती है. खेमराज कहते हैं कि अगर जंगल में रात के बारह बजे भी आग लगती है तो गांव के लोग उसे बुझाने निकल जाते हैं. उनके अनुसार जब जंगल सरकार के अधीन होता है तो लोग उसे अपना नहीं मानते, लेकिन जब जंगल गांव का होता है तो हर व्यक्ति उसकी रक्षा करता है.
डख्याट का अनुभव दिखाता है कि जंगल माइक्रोक्लाइमेट बनाता है. वह तापमान को नियंत्रित करता है, नमी बनाए रखता है और पानी के स्रोतों को जीवित रखता है.
*ठडुंग : जंगल देता है पानी, गांव करता है सुरक्षा*
बड़कोट क्षेत्र के ठडुंग गांव में भी जंगल और पानी का रिश्ता साफ दिखाई देता है. साल 2024 में हुई अस्कोट आराकोट यात्रा के दौरान गांव में मिले जगमोहन सिंह राणा बताते हैं कि ठडुंग लाल धान की खेती के लिए जाना जाता है और इसकी वजह गांव में उपलब्ध पानी का स्रोत है. गांव के ठीक ऊपर बांझ यानी ओक के पेड़ों का घना जंगल है, जिसकी ग्रामीण पूरी तरह सुरक्षा करते हैं.
जगमोहन के अनुसार गांव में सात–आठ लोगों की एक स्थायी टीम बनाई गई है, जो जंगल में आग लगने की स्थिति में वन विभाग के साथ मिलकर आग बुझाने का काम करती है. यह कोई अस्थायी व्यवस्था नहीं है, बल्कि नियमित निगरानी की एक प्रणाली है और सरकार व समुदाय के सहयोग का उदाहरण भी है.
*बांझ का जंगल और खेती का सीधा रिश्ता*
जगमोहन बताते हैं कि बांझ के जंगल और पानी के बीच सीधा संबंध है. बांझ के पेड़ों की जड़ें गहरी होती हैं और उनकी घनी छतरी मिट्टी और नमी को बनाए रखती है. यही जंगल पानी को धीरे धीरे छोड़ता है, जिससे नीचे खेती संभव हो पाती है.
ठडुंग में उगाया जाने वाला लाल धान पहाड़ की पारंपरिक फसल है, जिसके लिए अच्छी सिंचाई जरूरी होती है. गांव की खेती पूरी तरह ऊपर के जंगल से आने वाले पानी पर निर्भर है. जंगल कमजोर होगा तो पानी और खेती दोनों पर असर पड़ेगा.
*शिक्षा, बच्चे और भविष्य के सपने*
ठडुंग गांव में प्राथमिक स्कूल है, जबकि आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को पास के हुडोली जाना पड़ता है. गांव की रहने वाली आरुषि आठवीं कक्षा में पढ़ती है और हुडोली के इंटर कॉलेज में पढ़ाई कर रही है. वह बताती है कि स्कूल में सभी विषयों के शिक्षक हैं और करीब 300 बच्चे पढ़ते हैं. आसपास के चार गांवों से बच्चे यहां पढ़ने आते हैं.
आरुषि का सपना है कि वह बड़ी होकर पुलिस अफसर बने. उसके पिता किसान हैं और परिवार खेती पर निर्भर है. जमीन से खाने भर का अनाज हो जाता है, लेकिन बाजार में बेचने लायक उत्पादन नहीं हो पाता. परिवार में पांच भाई बहन हैं और सभी पढ़ाई कर रहे हैं.
*खेती, आजीविका और पलायन*
जगमोहन ने बताया कि ठडुंग में धान, दालें, राजमा और सब्जियां उगाई जाती हैं. खेती से बहुत अधिक कमाई नहीं होती, लेकिन गुजारा निकल जाता है. कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ कभी कभार मिल जाता है, लेकिन गांव की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार खेती ही है.
गांव वालों के अनुसार ठडुंग की आबादी करीब 800 से 900 के बीच है और परिवारों की संख्या 150 से 200 के आसपास है. पढ़ाई के लिए बच्चे बाहर जाते हैं, लेकिन परिवार स्थायी रूप से गांव छोड़कर नहीं जाते. यही वजह है कि यहां बड़े पैमाने पर पलायन नहीं दिखता.
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