स्वील गांव : नाम के पीछे की कथा, सुतक की परंपरा और देवता की यात्रा पर टिका सामाजिक जीवन
यात्रा का एक पड़ाव स्वील गांव में पड़ता है. गांव में पहुंचते ही हमारी मुलाकात मनमोहन सिंह चौहान से होती है. बातचीत की शुरुआत में वह बताते हैं कि स्वील गांव कमल सेराई पट्टी में आता है. पट्टी की संरचना को समझाते हुए वह कहते हैं कि सरकारी और राजस्व रिकॉर्ड में लगभग बीस से पच्चीस गांवों के समूह को एक पट्टी कहा जाता है. यही व्यवस्था प्रशासनिक पहचान के साथ-साथ सामाजिक जीवन को भी जोड़ती है.
स्वील गांव का नाम अपने भीतर एक लोककथा और सामाजिक परंपरा समेटे हुए है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि जब इस क्षेत्र में बसावट शुरू हो रही थी, उस समय यहां एक महिला को प्रसव हुआ था. स्थानीय बोली में प्रसव के बाद की अवस्था को “सुतक” कहा जाता है. सुतक की अवस्था में महिला को कुछ समय के लिए अलग बैठाया जाता है और उसके हाथ का बना भोजन नहीं खाया जाता. इसी अवस्था में बैठी महिला को स्थानीय लोग “स्वीली” कहकर संबोधित करते थे. गांव के लोगों के अनुसार, इसी शब्द से धीरे-धीरे इस स्थान का नाम स्वील पड़ गया.
गांव के ही कवित चौहान साफ करते हैं कि सुतक को लेकर यहां किसी तरह का सामाजिक बहिष्कार नहीं होता. यह एक पारिवारिक परंपरा है. परिवार के लोग महिला की पूरी देखभाल करते हैं. केवल पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों से उसे कुछ समय के लिए अलग रखा जाता है. यह परंपरा लगभग हर गांव में देखने को मिलती है और स्वील में भी उसी तरह निभाई जाती है. सुतक की अवधि आमतौर पर 21 दिन मानी जाती है.
पट्टी, थान और देवता की यात्रा
स्वील पहुंचने के दिन गांव में रुद्रेश्वर महादेव का मेला लगा हुआ है. मनमोहन सिंह बताते हैं कि यह मेला हर तीसरे साल जून–जुलाई के महीनों में लगता है. यह समय पूरे क्षेत्र के लिए खास होता है, क्योंकि इसी दौरान देवता की यात्रा शुरू होती है.
मनमोहन ने कहा कि इस वर्ष तिया बजलाड़ी थान से महाराज बाहर निकले हैं और पश्चिम के कंडाव, देवल, सारी थान के लगभग तीस गांवों का भ्रमण करते हैं. वह समझाते हैं कि यहां थान का अर्थ है लगभग चौदह गांवों का समूह, जो एक ही मंदिर और देवता की पूजा करता है.रुद्रेश्वर महाराज चार थानों के देवता हैं और हर वर्ष देवता का निवास अलग-अलग थान में होता है.
इन दो महीनों के दौरान महाराज जिस-जिस गांव में पहुंचते हैं, उस दिन वहां मेला लगता है. गांव से बाहर रह रहे लोग भी इसी अवसर पर अपने गांव लौटते हैं. पूजा-पाठ, मेलों और सामूहिक भोज के जरिए गांवों का सामाजिक जीवन फिर से जुड़ता है.
पालकी, चांदी का बॉक्स और पूजा की विधि
मनमोहन सिंह विस्तार से बताते हैं कि देवता की यात्रा की शुरुआत में पहली रात महाराज की पालकी में एक चांदी का गोलाकार बॉक्स रखा जाता है. यह बॉक्स पौराणिक काल से देवता के साथ जुड़ा माना जाता है. रात में पालकी मंदिर में ही रहती है और देवता के साथ रुद्रेश्वर महादेव कमेटी के लोग वहीं निवास करते हैं.
अगली सुबह लगभग आठ बजे देवता की मूर्ति को दर्शन के लिए चांदी के बॉक्स से बाहर निकालकर देवस्थान (पीड़ा) पर रखा जाता है. इस दौरान लगभग दो से ढाई हजार लोग दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
दोपहर करीब तीन बजे देवता की मूर्ति को फिर से बॉक्स में रख दिया जाता है और पालकी को सजाया जाता है. इसके बाद मंदिर प्रांगण में पूजा होती है. गांव के लोग दो-दो कर पालकी को कंधे पर उठाते हैं. ढोल-नगाड़ों के साथ पालकी को नचाया जाता है. पूरा वातावरण भक्ति, संगीत और सामूहिक उल्लास से भर जाता है.
पूजा के बाद देवता को नाचते–गाते अगले गांव के लिए विदा किया जाता है. इसी के साथ एक गांव का मेला समाप्त होता है और अगला गांव देवता की प्रतीक्षा में सजने लगता है.
पानी, गराट और खेती पर टिका जीवन
स्वील गांव में पानी का मुख्य स्रोत सुरोध है. इसी पानी पर गांव की घरेलू जरूरतें, खेती और पारंपरिक जल संरचनाएं निर्भर रही हैं. कवित चौहन ने बताया कि एक समय गांव में सात गराट चलते थे. आज इनमें से केवल एक-दो ही सक्रिय रह गए हैं.
गराट में गेहूं और अन्य अनाज का आटा पीसा जाता है. यह पूरी तरह पारंपरिक व्यवस्था है. ग्रामीण बताते हैं कि वे पांच से दस किलो अनाज ही पिसवाते हैं, ताकि रोजमर्रा के उपयोग के लिए ताजा आटा मिल सके. गराट में पैसे नहीं लिए जाते. आटा पिसने के बाद जो थोड़ा-बहुत आटा बच जाता है, वही गराट चलाने वाले का हिस्सा होता है.
गांव में मटर और टमाटर जैसी सब्जियां भी होती हैं, लेकिन खेती पूरी तरह पानी पर निर्भर है. पानी के स्रोत पर असर पड़ते ही खेती भी प्रभावित हो जाती है. कवित ने बताया कि नीचे बहने वाली कमल नदी ने भी गांव की खेती को काफी नुकसान किया है और यह नदी अब गांव के अस्तित्व के लिए खतरा भी बन गई है, नदी ने अब तक चार पांच लोगों के खेतों में भूकटाव किया है.
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