Tuesday, January 6, 2026

डाडा जलालपुर गांव : दुकान, खेती और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जमीनी तस्वीर

डाडा जलालपुर : गांव में दुकान, खेती और बदलती अर्थव्यवस्था 

डाडा जलालपुर में खेती, दुकानों और फैक्ट्री के काम से आजीविका चल रही है, लेकिन उधार, पशुपालन और दूध उत्पादन में गिरावट चिंता है.
खेती में पॉपुलर के पेड़ों की ओर रुझान बढ़ा है, जबकि शिक्षा और आस्था गांव को जोड़े रखती हैं.

रुड़की से लगभग दस किलोमीटर दूर डाडा जलालपुर गांव में राजवीर सैनी की पुरानी दुकान है. राजवीर सैनी बताते हैं कि गांव की आबादी दो से चार हजार के बीच है. इनमें सौ के आसपास लोग सरकारी नौकरी में हैं, जबकि बाकी लोग फैक्ट्रियों में नौकरी, खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं. गांव में करीब सत्तर दुकानें हैं, जिनमें राशन और खेती के सामान की चार दुकानें शामिल हैं. राजवीर सैनी की दुकान में पशुओं का चारा, ज्वार और बाजरा जैसे सामान मिलते हैं.

उधार, ऑनलाइन भुगतान और खेती के बदलते स्वरूप
राजवीर सैनी बताते हैं कि उधार गांव की बड़ी समस्या है. साल भर में उनकी दुकान पर पांच से छह लाख रुपये तक का उधार हो जाता है. गांव में गन्ना, गेहूं और धान की खेती होती है, लेकिन अब लोग पॉपुलर के पेड़ों की तरफ जा रहे हैं. उनके अनुसार पॉपुलर लगाने से एक एकड़ में करीब दस लाख रुपये की कमाई पांच साल में हो रही है. पॉपुलर के साथ अन्य फसल भी लग जाती है. गांव में ऑनलाइन पेमेंट बढ़ा है और इससे फायदा ही हुआ है. बैंक से निकालकर पैसे देने की बात कहने वाले लोग अब कम हैं.

पशुपालन में गिरावट और दूध की कमी

राजवीर सैनी बताते हैं कि पहले जहां लोगों के पास पांच–छह पशु होते थे, अब एक–दो ही पशु रह गए हैं. गांव में अब लोग डेयरी से दूध लेने लगे हैं. पुरुष फैक्ट्री में काम करते हैं और नई पीढ़ी की महिलाएं पशुपालन नहीं करना चाहती.

 एक अन्य दुकानदार मुनेश कुमार सैनी बताते हैं कि गांव में अब सिर्फ एक ही डेयरी बची है. उनके अनुसार छह साल पहले गांव में दस–बारह क्विंटल दूध अतिरिक्त होता था, जो अब घटकर करीब दो–ढाई क्विंटल रह गया है.

बांझ पशु, इलाज और रोज़गार की प्राथमिकताएं

मुनेश कुमार सैनी ने बताया कि इन दिनों पशुओं का बांझ होना सबसे बड़ी समस्या बन गया है. लोग डॉक्टरों के पास जाते हैं, लेकिन उनका कहना है कि डॉक्टर भी इस समस्या को गंभीरता से नहीं लेते. शायद खेतों में प्रयोग हो रही केमिकल युक्त खाद इसका बड़ा कारण है.

उन्होंने आगे बताया कि गांव में लोग सरकारी नौकरी को बहुत गंभीरता से नहीं लेते और हिंदुस्तान लीवर जैसी कंपनियों में प्राइवेट नौकरियों की तरफ जा रहे हैं. गांव के दो–तीन युवा पीएचडी कर चुके हैं और कुछ बीटेक कर रहे हैं, यह गांव के अच्छे भविष्य की उम्मीद जगाता है.

शिक्षा, स्वास्थ्य और आस्था का केंद्र

डाडा जलालपुर में सरकारी स्कूल है. गंभीर बीमारी के लिए लोगों को देहरादून के अस्पतालों का रुख करना पड़ता है. गांव में चार प्राइवेट स्कूल हैं और तीन किलोमीटर दूर वैभलपुर में भी सरकारी स्कूल है. मुनेश का कहना है कि सरकारी स्कूल में अब अच्छी शिक्षा मिल रही है.

गांव के एक और युवा मुकेश सैनी बताते हैं कि डाडा जलालपुर में हर साल जुलाई महीने में जारवीर गोगा माड़ी का मेला लगता है. इस दौरान न सिर्फ गांव बल्कि आसपास के कई इलाकों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. लोग गोगा माड़ी में पूजा–अर्चना करते हैं, निशान चढ़ाते हैं और परिवार की सुख–समृद्धि के साथ-साथ सांप–बिच्छू के डर से सुरक्षा की कामना करते हैं. कुछ युवाओं की इस मेले में दुकान लगाने से अच्छी कमाई भी हो जाती है. मुकेश ने बताया कि गांव में कभी–कभी जाति और धार्मिक आधार पर तनाव की स्थिति बनी है, लेकिन अधिकांश समय यहां शांति बनी रहती है.

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