Tuesday, January 6, 2026

हनोल : महासू देवता की लोककथा, माली परंपरा और जौनसार-बावर की जीवित आस्था

हनोल : महासू देवता की लोककथा, माली परंपरा और जौनसार-बावर की जीवित आस्था

कश्मीर से हनोल तक फैली महासू देवता की कथा, जिसे लोग आज भी जीते हैं

हनोल मंदिर में हमारी मुलाकात मुकेश नेगी से हुई, जो यहीं रहते हैं और मंदिर से जुड़ी परंपराओं को जानते हैं. मुकेश नेगी बताते हैं कि हनोल मंदिर और महासू देवता का इतिहास उन्होंने भी अपने पुराने लोगों से सुना है और यही कथा पीढ़ियों से यहां सुनाई जाती रही है. लोकमान्यता के अनुसार महासू देवता चार हैं और वे कश्मीर से यहां आए थे. जौनसार-बावर क्षेत्र में महासू देवता को न्याय और संरक्षण के देवता के रूप में पूजा जाता है और हनोल उनका प्रमुख धाम माना जाता है. हनोल मंदिर पुरातत्व विभाग के अंतर्गत संरक्षित है.

किरमिर राक्षस, ब्राह्मण परिवार और महासू का आह्वान

मुकेश नेगी बताते हैं कि लोककथा के अनुसार पुराने समय में किरमिर नाम का एक राक्षस था, जो आज के महेंद्रथ की जगह स्थित गांव में आया था. उस गांव में हुना भाट नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसके सात बेटे थे. गांव वालों ने राक्षस से कहा कि वे उसे हर हफ्ते खाने के लिए देंगे और बदले में वह एक ही जगह रहेगा. इसी दौरान राक्षस ने ब्राह्मण के छह बेटों को खा लिया. यह इलाका पब्बर नदी के किनारे बताया जाता है. एक दिन जब ब्राह्मण की पत्नी नदी के किनारे मिट्टी के बर्तन में पानी भर रही थी, तो पानी की आवाज सुनकर राक्षस ने नदी से बाहर हाथ निकालकर उसे खाने की कोशिश की. उसी समय उसके मुंह से अनायास ही “हे महासू” निकला.

महासू देवता का प्रकट होना और चार महाराजों की कथा

लोकमान्यता के अनुसार महासू देवता 64 देवियों और 52 वीरों के साथ चलते हैं. इनमें सबसे बड़े शडकुलिया महाराज ने ब्राह्मण की पत्नी की रक्षा की और कहा कि यदि राक्षस से बचना है तो महासू देवता को कश्मीर से यहां लाना होगा. घर लौटकर ब्राह्मण की पत्नी ने यह बात अपने पति को बताई और हुना भाट कश्मीर गए. वहां उन्होंने पानी के माध्यम से महाराज को बुलाकर सारी बात बताई. महाराज ने कहा कि तुम जाओ, हम आ जाएंगे. इसके बाद महाराज ने ब्राह्मण के गले में माला डाली और लोककथा के अनुसार वह ब्राह्मण तुरंत सैकड़ों किलोमीटर दूर हनोल पहुंच गया.

सोने-चांदी का हल, घायल देवता और चालदा महाराज

मुकेश नेगी बताते हैं कि महाराज ने कहा था कि सोने और चांदी का हल बनाया जाए और उनके लिए पकवान बनाए जाएं, तभी वे बाहर निकलेंगे. पकवान बनते समय राक्षस वहां आ गया और डर के कारण ब्राह्मण ने एक दिन पहले ही हल लगा दिया. सबसे पहले महेंद्रथ में बाशिक महाराज निकले, जिनका कान कट गया. इसके बाद बोठा महासू निकले और हल उनके पैर और आंख में लग गया, जिससे वे वहीं बैठ गए. तीसरी लकीर में पवासी महाराज निकले, जिनकी कोख फट गई. सबसे छोटे चालदा महाराज हस्तलेखन विद्या और कला जानते थे. उन्हें पता था कि समय अनुकूल नहीं है, इसलिए वे हल के पीछे से निकले और उन्हें कोई चोट नहीं आई. बाहर आते ही चालदा महाराज ने राक्षस का वध किया. लोकमान्यता है कि राक्षस 'खूनीगाढ़' में मारा गया और उसका सिर 'मुंडाड़' में गिरा.

चलायमान देवता, हनोल में ठहराव और जिम्मेदारियां

राक्षस के वध के बाद चारों महाराज कश्मीर लौटना चाहते थे, लेकिन घायल और अपाहिज होने की वजह से तीन महाराज हनोल में ही रुक गए. चालदा महाराज को स्थान देने और सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया और हनोल क्षेत्र बोठा महासू को दिया गया. लोकमान्यता के अनुसार चालदा महाराज को चलायमान देवता माना जाता है. उनका प्रवास हर साल बदलता है. मुकेश कहते हैं कि चालदा महाराज बाहर जाकर कमा कर लाते हैं और फिर अपने भाइयों को खिलाते हैं. हनोल में वे बारह-तेरह साल बाद केवल एक रात के लिए आते हैं और उनके आने का कोई निश्चित समय नहीं होता. चालदा महाराज को अपने साथ ले जाने के लिए कई लोग यात्रा में साथ चलते हैं.

शाठी-पाशी, पांडव-कौरव और मंदिर की परंपरा

मुकेश नेगी बताते हैं कि यह क्षेत्र शाठी और पाशी, यानी पांडवों और कौरवों से जुड़ा माना जाता है. लोकमान्यता है कि हनोल मंदिर का निर्माण शाठी यानी पांडवों ने किया था. यहां भीम के कंचे आज भी बताए जाते हैं. मेले के दौरान शाठी और पाशी के वंशज आज भी यहां पहुंचते हैं.

माली परंपरा, पुजारी व्यवस्था और आज का हनोल

मुकेश नेगी बताते हैं कि हनोल और आसपास के इलाकों में जिन लोगों के भीतर देवता आते हैं, उन्हें स्थानीय भाषा में “माली” कहा जाता है. माली को देवता का माध्यम माना जाता है और धार्मिक अवसरों पर उनके माध्यम से देवता की इच्छा को समझा जाता है. वह भी एक माली हैं.

हनोल क्षेत्र में चार गांव हैं और हर गांव में लगभग पांच-छह सौ लोग रहते हैं. मंदिर के पुजारी इन्हीं चार गांवों से होते हैं और बाहर का कोई व्यक्ति पुजारी नहीं बनता. पुजारी ड्यूटी के दौरान किसी के हाथ का खाना नहीं खाते. चार गांवों से बारी-बारी से पूजा होती है और बाहर का भोजन वर्जित है. मंदिर परिसर में कुछ स्थान ऐसे हैं, जहां पुजारी के अलावा किसी और का जाना मना है.

खेती कम, पढ़ाई के बाद बाहर और प्रशासनिक व्यवस्था

मुकेश ने बताया कि हनोल में खेतीबाड़ी बहुत कम है और लोग पढ़ाई के बाद रोज़गार के लिए बाहर जाते हैं. मंदिर में किसी तरह के दान की मांग नहीं की जाती और श्रद्धालु अपनी मर्जी से दान करते हैं. हनोल मंदिर की एक समिति बनी हुई है, जो एसडीएम की देखरेख में रहती है. लोककथा, परंपरा और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच हनोल मंदिर आज भी जौनसार-बावर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बना हुआ है. इस क्षेत्र के विकास के लिए मास्टर प्लान भी बन रहा है.

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