Wednesday, January 7, 2026

महरगांव : जब बेटी के पीरियड्स पर जशोदा ने पूरे परिवार को खिलाया

महरगांव : जब बेटी के पीरियड्स पर जशोदा ने पूरे परिवार को खिलाया

परंपरा और बदलाव के बीच खड़ा एक पहाड़ी गांव

महरगांव की जशोदा ने अपनी बेटी के पहली बार पीरियड्स आने पर पूरे परिवार को भोजन कराया. गांव में जहां आज भी पीरियड्स के दौरान अलग रहने और रसोई से दूर रखने की परंपरा है, वहां जशोदा का यह कदम बदलाव की एक साफ़ तस्वीर पेश करता है. यही बदलाव, पानी, खेती, महिलाओं और सामाजिक संरचना के बीच महरगांव की असली कहानी कहता है.

जंगल से पानी, खेतों तक नालियां और सामूहिक जिम्मेदारी

महरगांव में पानी के प्राकृतिक स्रोत से खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए नालियां बनाई गई हैं. घरों तक पानी पहुंचाने के लिए स्रोत पर सीमेंट की टंकी बनाई गई है, जिससे पाइपलाइन के जरिए पानी सप्लाई होती है. गांव के ऊपर बांझ का जंगल है और यहीं से पानी का स्रोत आता है. जंगल में आग लगने पर गांव के दस–पंद्रह लोग झाड़ियों की मदद से आग बुझाने जाते हैं. इसे गांव वाले अपनी सामूहिक जिम्मेदारी मानते हैं.

आबादी, शिक्षा और नए मौके

महरगांव में करीब 90 परिवार रहते हैं और आबादी लगभग 800 है. गांव में करीब दस प्रतिशत लोग सरकारी नौकरी में हैं. लड़कियां स्कूल जाती हैं और पढ़ाई में बराबरी देखी जाती है. पढ़ाई के लिए डिग्री कॉलेज पुरोला और बड़कोट अहम केंद्र हैं. गांव की एक लड़की और एक लड़का वायरलेस में चयनित हुए हैं. नवोदय विद्यालय धुंगिरा में कक्षा 9 में पढ़ने वाली सुष्मिता इसका उदाहरण हैं. महावीर सिंह रवॉल्टा ने रवॉल्टी भाषा में लेखन के जरिए इस क्षेत्र में खास पहचान बनाई है और अपने उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में पहाड़ का दर्द उठाया है.

खेती, लाल चावल और बदलता श्रम-संस्कृति

गांव में आलू, मटर, मंडुआ, लाल चावल, गेहूं और सोयाबीन की खेती होती है. आलू और मटर हिमाचल के व्यापारी ले जाते हैं. लाल चावल के लिए यह इलाका मशहूर है, जो 120 रुपये किलो में बिकता है और बाहर 200 रुपये किलो से ज्यादा में बेचा जाता है. खेती में गोबर, चारे और पत्तियों से बनी खाद का ज्यादा इस्तेमाल होता है. नई बहुएं अब खेती का काम पहले से कम करती हैं और उन पर सास का पहले जैसा दबाव नहीं है. ग्रामीण बताते हैं कि इस साल न बर्फ पड़ी और न पहले जैसी ठंड रही.

समूह, बैंकिंग और महिलाओं की भागीदारी

गांव में दस स्वयं सहायता समूह हैं. इन समूहों से महिलाओं को दो प्रतिशत ब्याज पर बैंक कर्ज मिलता है. महिलाओं ने सिलाई मशीन और आटा पीसने की मशीनें ली हैं. हर दस समूहों पर एक सक्रिय महिला होती है, जो फील्ड में जाकर लोगों को जोड़ती है. जनधन खातों से गांव को फायदा मिला है. महिलाओं के पास एंड्रॉयड फोन हैं और वे फेसबुक व व्हाट्सएप का इस्तेमाल करती हैं, हालांकि बैंकिंग और स्किल इंडिया जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की जानकारी अब भी सीमित है.

स्वास्थ्य, पीरियड्स और सामाजिक व्यवहार

स्वास्थ्य के लिए गांव पुरोला अस्पताल पर निर्भर है, जो करीब 9 किलोमीटर दूर है. भारती पंवार के हाथ में गुड़ाई के दौरान कट लगने पर उन्हें वहीं इलाज कराना पड़ा. देहरादून नजदीक होने की वजह से डिलीवरी के दौरान महिलाओं की मौत के मामले कम बताए जाते हैं. गांव में पीरियड्स के दौरान चार दिन अलग रहने की परंपरा है, हालांकि टॉयलेट वही इस्तेमाल होता है. कुछ परिवारों में 21 दिन तक अलग बिस्तर और रसोई से दूरी भी देखी जाती है. महिलाओं ने मेंस्ट्रुअल कप के बारे में नहीं सुना है, जबकि लड़कियों ने सोशल मीडिया और टीवी से इसकी जानकारी पाई है. ऐसे माहौल में जशोदा का अपनी बेटी के पीरियड्स पर पूरे परिवार को खिलाना एक सामाजिक बदलाव का संकेत माना जा रहा है.

जातीय संरचना, परंपराएं और देवी का मेला

महरगांव में तीन–चार अनुसूचित जाति के परिवार हैं, जिनके अपने मकान और जमीन हैं. स्कूलों में भेदभाव की बात सामने नहीं आती. गांव में राणा, रावत, पंवार, भट्ट, बहुगुणा, नौटियाल, ठाकुर और ब्राह्मण रहते हैं. पहले यहां रावत रहते थे, बाद में अन्य जातियां भी बसीं. छानियों में रहने वाले लोगों को पहले ‘मर’ कहा जाता था, जब सब यहीं बस गए तो गांव महरगांव कहलाया. यहां माता राजराजेश्वरी का मंदिर है, जिनके पुजारी उनियाल होते हैं. हर साल 5 सितंबर को देवी का मेला लगता है और देवी की डोली महरगांव, उदकोटी और बैंणा के हर घर में जाती है.

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