मंजियाली गांव : पानी, बसावट और खेती के संघर्ष
पानी की कमी से शुरू हुई बसावट
उत्तरकाशी जिले के रवाईं क्षेत्र की मुंगरसन्ती पट्टी में स्थित मंजियाली गांव जिला मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूर है। गांव के प्रधान प्रकाश रावत बताते हैं कि वे मूल रूप से बिल्ला गांव के रहने वाले हैं, जहां पानी की भारी कमी थी। मौजूदा मंजियाली क्षेत्र में पहले गौशाला थी और लोग सर्दियों में यहां मवेशियों के साथ आते थे। धीरे-धीरे, लगभग एक पीढ़ी पहले, लोग यहीं स्थायी रूप से बस गए। गांव के पास यमुना और कमल नदी बराबर में बहती हैं, लेकिन इसके बावजूद गांव में आज तक कोई नौला नहीं है।
प्रशासन, आबादी और सामाजिक संरचना
मंजियाली गांव बड़कोट तहसील के अंतर्गत आता है, पोस्ट ऑफिस गांव से 2 किलोमीटर दूर है, एसबीआई नौगांव में है और बड़कोट तहसील 6 किलोमीटर दूर पड़ती है। गांव में जियो और एयरटेल नेटवर्क काम करता है। यहां 165 परिवार रहते हैं और कुल जनसंख्या लगभग 13 हजार बताई जाती है। रावत, राणा, चौहान, कोहली, लाल, आर्य और कुमार समुदाय के लोग यहां रहते हैं। आबादी में लगभग 50 प्रतिशत सामान्य वर्ग और शेष ओबीसी व अन्य वर्ग हैं। दलित परिवार मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं।
जंगल, जमीन और खेती की तस्वीर
गांव की वन पंचायत में आठ सदस्य हैं और रिज़र्व जंगल से लकड़ी मिलती है। बंजर भूमि ज्यादा है, फिर भी खेती होती है। यहां मटर, टमाटर, बीन्स, मंडुआ, गेहूं, झंगोरा, धान, आलू, प्याज, मक्का, चौलाई, राजमा, मसूर और तौर उगाए जाते हैं। गाय, भैंस, बकरी, खच्चर और घोड़े पाले जाते हैं और लगभग सभी परिवारों के पास अपनी जमीन है। इस क्षेत्र को रवाईं इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां लंबे समय तक हिमाचल के राजा शासन करते रहे।
सरकारी योजनाएं, शराब और महिला आंदोलन
गांव में 45 से 50 लोग सरकारी नौकरी में हैं। लोग ऑनलाइन बैंकिंग का इस्तेमाल करते हैं और किसान सम्मान निधि, मनरेगा, उज्ज्वला और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। इसके साथ ही गांव में शराब का चलन भी ज्यादा बताया जाता है। इसके खिलाफ महिलाओं का आंदोलन लंबे समय से चलता आ रहा है। ग्रामीण बताते हैं कि साल 2004–05 में महिलाओं ने शराब के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया था, जिसकी याद आज भी गांव में बनी हुई है।
सूर्य मंदिर और खेती का मौजूदा संकट
मंजियाली गांव में सूर्य देव का एक मंदिर है, लेकिन इसका कोई लिखित इतिहास कहीं दर्ज नहीं है। ग्रामीण चाहते हैं कि इसका संरक्षण हो, ताकि पर्यटन के रूप में गांव को नया सहारा मिल सके। खेती की मौजूदा हालत रवींद्र कुमार की कहानी में दिखती है। उन्होंने बड़कोट के श्रीदेव सुमन कॉलेज से पढ़ाई की और एयरफोर्स में चयन भी हुआ था, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे नहीं जा सके। अब वे खेती करते हैं। इस साल बारिश की कमी से टमाटर की पैदावार में लगभग 40–50 प्रतिशत गिरावट आई है। आधुनिक मशीनें मौजूद हैं, लेकिन खेतों तक रास्ते न होने के कारण आज भी कई जगह बैलों से खेती करनी पड़ती है।
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