*उत्तराखंड से राष्ट्रीय और वैश्विक मंच तक : जनपक्ष, संस्थान और पत्रकारिता में चार दशकों की यात्रा"
उत्तराखंड के पहाड़ों से निकली पत्रकारिता की जिस परंपरा में जनसरोकार, संघर्ष और सादगी गहराई से जुड़े रहे हैं, गोविंद पंत राजू का पत्रकारिता जीवन उसी का सशक्त उदाहरण है। यह बातचीत वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू के लगभग चार दशकों लंबे उस सफर को दर्ज करती है, जिसकी शुरुआत उत्तराखंड के सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ से होती है और समय के साथ यह राष्ट्रीय संस्थानों तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों तक विस्तृत होती चली जाती है। जनपक्षधरता यहाँ केवल वैचारिक घोषणा नहीं, बल्कि ज़मीनी अनुभवों से उपजा सतत अभ्यास है। तकनीक और संसाधनों से वंचित दौर में शुरू हुई यह यात्रा संस्थागत पत्रकारिता, पेशेवर ईमानदारी और बदलते मीडिया परिदृश्य से होती हुई वैश्विक अभियानों तक पहुँची है। समाचार कक्षों के भीतर के संघर्ष हों या लोकतांत्रिक मूल्यों को व्यवहार में उतारने की चुनौती, यह संवाद उस पत्रकारिता को समझने का प्रयास है जो उत्तराखंड जैसे हाशिए के भूगोल से उठकर सत्ता से सवाल करती है, समाज से जुड़ी रहती है और समय के साथ अपने स्वरूप को लगातार परखती रहती है।
*लिखने की शुरुआत और नियमित नौकरी से असहमति*
इंटरव्यू के दौरान गोविंद पंत राजू बताते हैं कि उन्हें लिखने का शौक स्कूल और कॉलेज के दिनों से ही था. वे उस समय निकलने वाली मैगजीनों में लिखते थे और कई बार स्टूडेंट एडिटर भी रहे. इंटरमीडिएट के आसपास उन्होंने कहानियां लिखनी शुरू कर दी थीं और उनकी छोटी टिप्पणियां व लेख अलग-अलग पत्रिकाओं में छपने लगे थे. इसी दौरान उन्हें यह एहसास हो गया था कि वे किसी नियमित, तयशुदा समय वाली नौकरी के लिए बने नहीं हैं.
गोविंद कहते हैं कि नौ से पांच की नौकरी का ढांचा उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं था. यह सोच किसी फ़िल्मी प्रभाव से नहीं, बल्कि उनके निजी अनुभवों से आई थी. गोविंद मानते थे कि वह काम तो बहुत कुछ कर सकते हैं, लेकिन बंधी हुई दिनचर्या उन्हें रचनात्मक रूप से सीमित कर देगी. इसी मानसिकता ने आगे उनके पेशेवर फैसलों की दिशा तय की.
*पीएचडी, अकादमिक जीवन और वैकल्पिक सपने*
अपने जीवन के शुरुआती दौर पर प्रकाश डालते हुए गोविंद पंत ने कहा कि पीएचडी करते समय उन्होंने इतिहास को विषय के रूप में चुना और सामाजिक आंदोलनों पर शोध किया. इसी दौरान वे कुमाऊं विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे. उनकी कक्षाएं लोकप्रिय थीं और अतिरिक्त कक्षाओं में छात्रों की संख्या कई बार नियमित कक्षा से दोगुनी हो जाती थी. शुरू में उन्हें यह बेहद संतोषजनक लगता था, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें महसूस हुआ कि इतिहास जैसे विषय में हर सत्र में वही सामग्री दोहराई जाती है और रचनात्मक हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित है.
इसी दौर में उन्होंने यह भी तय किया कि वह केवल अकादमिक जीवन तक सीमित नहीं रहेंगे. उस समय वीडियोग्राफी बिल्कुल शुरुआती चरण में थी और उनका सपना था कि वे दूरदराज इलाकों, ट्रेकिंग रूट्स और पहाड़ी समाज की जीवनशैली को कैमरे में कैद करेंगे. गोविंद डिस्कवरी चैनल जैसी डॉक्यूमेंट्री बनाने और उसी से जीवन यापन करने की कल्पना करते थे.
*नैनीताल समाचार: पत्रकारिता की असली पाठशाला*
इसी दौरान नैनीताल से निकलने वाले जनपक्षीय अख़बार ‘नैनीताल समाचार’ से उनका जुड़ाव हुआ. अखबार ने स्थानीय लेखकों के लिए सार्वजनिक आह्वान किया था. गोविंद पंत राजू बताते हैं कि उन्हें लगा जैसे यह विज्ञापन उनके लिए ही है. उन्होंने संपादक को पत्र लिखा, लेख भेजे और पहली बार जब उनकी सामग्री सुधार के सुझावों के साथ लौटी, तो उन्होंने उसे सीख के रूप में लिया.
नैनीताल समाचार उनके लिए एक अखबार भर नहीं था, बल्कि एक बौद्धिक मंच था. वहाँ देश-विदेश से आने वाले इतिहासकार, लेखक, कलाकार, संस्कृतिकर्मी और विचारक बैठते थे. लंबी बहसें, वैचारिक टकराव और संवाद होते थे. इसी माहौल ने उनके भीतर पत्रकारिता को एक सामाजिक और बौद्धिक जिम्मेदारी के रूप में देखने की समझ विकसित की.
*राष्ट्रीय मीडिया में प्रवेश और रिपोर्टिंग का जोखिम*
नैनीताल समाचार के बाद वे जनसत्ता और नवभारत टाइम्स के लिए उत्तराखंड से नियमित डिस्पैच भेजने लगे. उस समय खबरें टेलीग्राम के जरिये भेजी जाती थीं और तकनीकी सीमाओं के बावजूद रिपोर्टिंग की गति बनी रहती थी. इसी दौरान उनकी पीएचडी पूरी हुई और वे पढ़ाने के साथ-साथ पत्रकारिता में भी सक्रिय रहे.
1984 के आसपास उनका चयन टाइम्स ऑफ इंडिया में रिपोर्टर के रूप में हुआ और वह लखनऊ संस्करण से जुड़ गए. 1984 से 1992 तक का समय उनकी पत्रकारिता का सबसे सक्रिय और जोखिम भरा दौर रहा. वे बताते हैं कि नेपाल में राजशाही के खिलाफ आंदोलन के दौरान उन्होंने अश्विनी भटनागर के साथ किसी तरह बॉर्डर पार कर काठमांडू पहुँचकर रिपोर्टिंग की. उस दौर में आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता से जुड़ी कई ऐसी खबरें की गईं जिनमें व्यक्तिगत जोखिम शामिल था.
*टीमवर्क, अख़बार और यूनियन आंदोलन*
आगे बातचीत करते हुए गोविंद कहते हैं कि नवभारत टाइम्स/टाइम्स ऑफ इंडिया में उस समय काम का माहौल बेहद शानदार था. टीमवर्क मजबूत था और अखबार देश में नंबर वन की स्थिति में था. हालांकि बाद में वेतन संरचना और प्रबंधन नीतियों को लेकर विवाद शुरू हुए. लखनऊ संस्करण के पत्रकारों को दिल्ली और मुंबई की तुलना में कम वेतन दिया जाता था, जबकि काम और जिम्मेदारी समान थी.
गोविंद पंत राजू बताते हैं कि पत्रकार यूनियन इस असमानता के खिलाफ खड़ी हुई. यह यूनियन केवल वेतन के लिए नहीं, बल्कि पेशेवर गरिमा और समान अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही थी. इस दौरान लखनऊ में दस-दस हजार लोगों की रैलियां हुईं. अटल बिहारी वाजपेयी और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे बड़े राजनीतिक नेताओं ने भी इस संघर्ष का समर्थन किया.
यह संघर्ष अदालत तक पहुँचा. वेतन आयोग से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और पत्रकारों ने यह मुकदमा जीत लिया। इसके बाद 1993 में प्रबंधन ने अचानक लखनऊ संस्करण बंद कर दिया और रातों-रात पूरे स्टाफ को नोटिस थमा दिए। इसके विरुद्ध पत्रकार फिर हाई कोर्ट गए और हाई कोर्ट से मामला जीता।
मामला इसके बाद सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ सुनवाई से पहले ही अदालत ने प्रबंधन को निर्देश दिया कि सभी 122 कर्मियों को एक-एक लाख रुपये का आकस्मिक भुगतान किया जाए. इसके बाद ही सुनवाई आगे बढ़ी. लगभग ढाई–तीन साल तक सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चली, जिसके बाद मामले को पुनः लखनऊ हाई कोर्ट भेज दिया गया. गोविंद पंत राजू इस पूरी कानूनी लड़ाई को सच, अधिकार और पेशेवर सम्मान की लड़ाई मानते हैं.
*अलग होने के बाद की राह और फ्रीलांसिंग*
टाइम्स ऑफ इंडिया से अलग होने के बाद सभी निकाले गए पत्रकारों ने मिलकर अपना अखबार निकालने की योजना बनाई. विचार यह था कि सब लोग मिलकर एक संस्थान खड़ा करेंगे. लेकिन कुछ समय काम करने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि इतने बड़े समूह को आर्थिक रूप से लंबे समय तक मजबूत बनाए रखना संभव नहीं है. अंततः यह तय हुआ कि हर व्यक्ति अपने-अपने रास्ते तलाशे.
गोविंद बताते हैं कि लगभग 99 प्रतिशत साथी बाद में अपने-अपने क्षेत्रों में आगे बढ़े. कई बड़े अखबारों के संपादक बने, कुछ शीर्ष प्रबंधन पदों तक पहुंचे और उनके कई साथियों ने किताबें लिखीं. संघर्ष आर्थिक रूप से कठिन था, लेकिन पेशेवर रूप से अधिकांश लोगों ने अपनी जगह बनाई.
*BBC, ANI और आज तक का दौर*
इसके बाद गोविंद पंत राजू ने फ्रीलांसिंग शुरू की और BBC के लिए स्टिंगर के रूप में काम किया. फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के शौक ने यहां उन्हें नया मंच दिया. वे हाई-8 कैमरे से रिपोर्टिंग करते थे और उत्तर भारत से कई महत्वपूर्ण खबरें BBC को भेजीं. इस काम में उन्हें अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता के मानकों और अनुशासन को नजदीक से देखने का अवसर मिला.
इसके बाद उन्हें ANI से ऑफर मिला और कुछ समय बाद ‘आज तक’ की शुरुआत हुई. आज तक के शुरुआती दौर में चैनल 24 घंटे का नहीं था. केवल सीमित बुलेटिन होते थे और एक रिपोर्टर से सप्ताह में दो-तीन स्टोरी की अपेक्षा की जाती थी. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में खबरों की तीव्रता के कारण यह संख्या अक्सर पूरी हो जाती थी. पेशेवर मतभेदों के बावजूद उन्होंने एस.पी. सिंह के साथ काम किया और स्पष्ट किया कि यूनियन नेतृत्व का उन्होंने कभी व्यक्तिगत लाभ नहीं उठाया.
*अंटार्कटिका अभियान के लिए चयन*
गोविंद पंत राजू बताते हैं कि जब वह उत्तरकाशी स्थित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में प्रशिक्षण ले रहे थे, उन्हीं दिनों अंटार्कटिका जाने का सपना भी देखने लगे थे. वहाँ के प्रिंसिपल कर्नल बजाज, नॉर्थ पोल और साउथ पोल जा चुके थे. उन्होंने प्रशिक्षुओं को अंटार्कटिका की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई और डॉक्यूमेंट्री देखने के बाद अंटार्कटिका जाने का सपना गोविंद के भीतर गहराई से बैठ गया.
बाद में टाइम्स ऑफ इंडिया में काम और यूनियन आंदोलन के दौरान एक दिन उन्होंने अखबार में भारत सरकार का एक छोटा सा विज्ञापन देखा, जिसमें अंटार्कटिका अभियान के लिए सामाजिक विज्ञान और मानविकी पृष्ठभूमि वाले लोगों से आवेदन माँगे गए थे. गोविंद आगे कहते हैं कि यदि पहले यह सपना न देखा होता, तो संभवतः उस विज्ञापन पर ध्यान भी न जाता. इसके बाद चयन की एक लंबी और कठिन प्रक्रिया चली, जिसमें लगभग 80 हजार आवेदकों में से अंततः केवल कुछ ही लोग अंतिम दौर तक पहुँचे और कई चरणों के इंटरव्यू के बाद उनका चयन हुआ. चयन की सूचना उन्हें उत्तरकाशी के पास एक पर्वतारोहण अभियान के दौरान मिली, जब ITBP के जवान कई किलोमीटर पैदल चलकर उनके कैंप तक पहुँचे और एक रेडियोग्राम सौंपा, जिसमें लिखा था कि उनका चयन हो चुका है और उन्हें तय तारीख पर रिपोर्ट करना है. यह उनके जीवन के सबसे अविस्मरणीय क्षणों में से एक था.
*जीवन के सबसे शानदार अनुभव*
गोविंद पंत राजू बताते हैं कि अंटार्कटिका ऐसा महाद्वीप है, जहाँ आम व्यक्ति नहीं जा सकता. यह दुनिया का सातवाँ महाद्वीप है और उस दौर में, जब ‘क्वारंटीन’ जैसे शब्द आम जीवन का हिस्सा नहीं थे, उन्होंने वहाँ वास्तविक अर्थों में एक लंबा क्वारंटीन जिया. अंटार्कटिका को लेकर दुनिया के देशों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे अंटार्कटिक ट्रीटी कहा जाता है, जिसके तहत यह तय किया गया कि अंटार्कटिका का उपयोग केवल शांतिपूर्ण और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए होगा, न वहाँ हथियारों का परीक्षण होगा और न ही सैन्य या जासूसी गतिविधियाँ.
भारत इस संधि का गर्वपूर्ण हस्ताक्षरकर्ता है और इस संधि से पहले जिन देशों ने अंटार्कटिका को अपने-अपने हिसाब से बाँट रखा था, उनके सभी क्षेत्रीय दावे समाप्त हो गए. उनके अनुसार अंटार्कटिका में दुनिया के मीठे पानी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा बर्फ के रूप में मौजूद है और भविष्य में यदि वैश्विक जल संकट गहराता है तो यह महाद्वीप पूरी पृथ्वी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है. वहाँ जीवन पूरी तरह अनुशासन और पर्यावरणीय नियमों से संचालित होता है, भारत के मैत्री स्टेशन में हर गतिविधि के लिए सख्त प्रोटोकॉल थे, यहाँ तक कि शौचालय के उपयोग के लिए भी. शौचालय ड्राई सिस्टम पर आधारित थे, जिनमें पानी का उपयोग नहीं होता था, हर सदस्य को तय समय और क्रम के अनुसार उनका उपयोग करना होता था. उपयोग के बाद अपशिष्ट को विशेष प्रणाली से जलाकर उसकी राख को कंटेनर में सुरक्षित रखकर भारत लौटते समय साथ लाया जाता था, जिसे साउथ की तरफ जाने के बाद ही समुद्र में निस्तारित किया जाता था. गोविंद पंत राजू बताते हैं कि अंटार्कटिका में किसी प्रकार का पदानुक्रम नहीं होता, ब्रिगेडियर हों या वैज्ञानिक या साधारण कर्मचारी, सभी को बारी-बारी से समान जिम्मेदारियाँ निभानी होती थीं, जिनमें सफाई और अपशिष्ट निपटान भी शामिल था.
गोविंद पंत राजू अंटार्कटिका से न्यूज डिस्पैच भेजने वाले देश के पहले पत्रकार हैं, ये खबरें टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स में साथ साथ प्रकाशित हुईं थी.
No comments:
Post a Comment