Monday, January 5, 2026

श्यामनगर गांव : खेती, सौहार्द और बदलते रोज़गार की जमीनी हकीकत

श्यामनगर गांव : खेती, सौहार्द और बदलते रोज़गार की जमीनी हकीकत

ऊधम सिंह नगर जिले का श्यामनगर गांव खेती, सामाजिक सौहार्द और बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करता है. गांव के युवा अर्जुन सिंह कृष्णा बताते हैं कि उनके पिता किसान हैं. गांव में बड़े पैमाने पर पलायन नहीं है. युवा फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं, जबकि नई पीढ़ी का झुकाव खेती से कम होकर नौकरी की ओर बढ़ा है. कुछ घर आज भी पूरी तरह खेती पर निर्भर हैं.

ढांढी नदी, डैम और खेती पर असर

श्यामनगर से होकर बहने वाली ढांढी नदी तुमरिया डैम से आती है. इसी नदी से फायदा उठाते हुए गांव वालों द्वारा नाली बनाकर खेतों में पानी पहुंचाया गया है. गांव में अनुसूचित जाति के लगभग आठ सौ वोट हैं और उनके पास भूमि भी अधिक है.

अर्जुन सिंह कृष्णा बताते हैं कि बारिश के दौरान जब डैम से पानी बंद कर दिया जाता है, नदी में पानी की कमी हो जाती है और इसका असर खेती पर पड़ा है. अर्जुन सिंह के अनुसार पांच से दस साल पहले एक एकड़ में करीब तीस क्विंटल पैदावार होती थी, जो अब घटकर लगभग बीस क्विंटल रह गई है. गांव में मुख्य रूप से गन्ने की खेती की जाती है.

सामाजिक ताना–बाना, कम आबादी और ज्यादा भागीदारी

गांव में मुस्लिम आबादी कम है और उनके वोट लगभग सौ बताए जाते हैं. शादी–बारात में सभी समुदायों को निमंत्रण दिया जाता है. ईद के मौके पर सबको बुलाया जाता है और हिंदुओं के त्योहारों में मुस्लिम समुदाय शामिल होता है. गांव में माता देवी का मंदिर है, माता की झांकी और रामलीला जैसे आयोजनों में मुस्लिमों का योगदान भी रहता है. 

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की चुनौतियां

श्यामनगर से तीन किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश स्थित ठाकुरद्वारा है, जहां कोचिंग सेंटर हैं. यहां से स्टेनो की पढ़ाई कर कई लोग सरकारी नौकरी में लगे हैं. गांव के आसपास फाइलों में इस्तेमाल होने वाला कागज़ बनाने वाली एक पेपर मिल भी है, जिससे कुछ स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलता है.

दस किलोमीटर दूर जसपुर में इंटर कॉलेज हैं और बच्चे वहीं पढ़ने जाते हैं. वे गांव से पहले साइकिल से हाइवे तक और फिर बस से स्कूल पहुंचते हैं. इलाज के लिए लोगों को काशीपुर जाना पड़ता है. पानी की सुविधा के लिए लगभग हर घर में निजी नल लगे हैं और गांव में पानी की टंकी लगाने का काम चल रहा है. गांव में दुधारू पशु हैं और गायों की संख्या अधिक है.

सड़क, पुल, पंचायत और खेल : बदलाव की कहानी

अर्जुन कहते हैं कि गांव में सड़क, पुल और बारातघर के लिए दिवंगत कंचन सिंह का संघर्ष अहम रहा है. साल 2017 से पहले ठाकुरद्वारा जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती थी. कंचन सिंह ने काफी भागदौड़ करने के बाद गांव में पुल बनवाया और इसके बाद आवागमन आसान हुआ. अब गांव का गन्ना उत्तर प्रदेश तक जाता है और उसके अच्छे दाम मिल जाते हैं, साथ ही पढ़ाई के लिए बाहर जाना भी सहज हो गया है. बावर खेड़ा ग्राम पंचायत से अलग होना भी कंचन सिंह के प्रयासों से जोड़ा जाता है. 

अर्जुन ने बताया कि गांव की कई लड़कियां भी सरकारी नौकरी में हैं और उन्हें बराबरी की नजर से देखा जाता है. गांव के एक युवा अरविंद कुमार राज्य स्तर पर वॉलीबॉल खेल चुके हैं और वह गांव के अन्य लड़कों को भी वॉलीबॉल का प्रशिक्षण देते हैं. गांव के करीब पंद्रह लड़के इस खेल में बढ़िया हैं और यहां वॉलीबॉल टूर्नामेंट भी हो चुका है.

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