बुठोत्रा गांव : खेती, परंपरा और डेमोग्राफिक बदलाव के बीच पहाड़ का यथार्थ
मोरी क्षेत्र से आगे नदी के दूसरी ओर स्थित बुठोत्रा गांव पूरी घाटी में बंगाण क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है. गांव के लोग बताते हैं कि आसपास के गांवों में रीति रिवाज और सामाजिक जीवन लगभग एक जैसा है. बुठोत्रा की आबादी करीब डेढ़ सौ से दो सौ के बीच मानी जाती है और गांव के साथ जुड़ी कई थलियां भी हैं.
यहां थलियां गांव से अलग खेतों और जंगलों के पास बनी छोटी बस्तियों को कहा जाता है, जहां पहले लोग खेती और पशुपालन के लिए रहते थे. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बुठोत्रा की कुछ थलियां अब पूरी तरह खाली हो चुकी हैं. जिन जगहों पर कभी घर और खेत थे, वहां अब सूखे ढांचे और उजड़ी जमीन दिखती है. लोग धीरे धीरे नीचे की ओर या बाहर बसते चले गए.
खेती, लाल चावल और गुजारे की अर्थव्यवस्था
बुठोत्रा गांव में लाल चावल, धान, गेहूं और सेब की खेती होती है. खेती ही यहां आजीविका का मुख्य आधार है, लेकिन इससे केवल गुजारे भर की आमदनी हो पाती है. ग्रामीण बताते हैं कि साल भर का खर्च खेती से निकल पाना मुश्किल होता है. इसी वजह से कई परिवार मजदूरी, छोटे निजी काम या बाहर जाकर काम करने पर निर्भर हो गए हैं.
दिलीप कुमार की बातों में सामाजिक बदलाव
गांव में बातचीत के दौरान स्थानीय निवासी दिलीप कुमार बताते हैं कि पहले गांव में छुआछूत और सामाजिक भेदभाव ज्यादा था. समय के साथ इसमें काफी कमी आई है. युवाओं में यह लगभग खत्म हो चुका है, हालांकि बुजुर्ग पीढ़ी में इसके कुछ अवशेष अब भी दिखाई देते हैं.
दिलीप कुमार के अनुसार अब मंदिर, पूजा या देवी देवता के नाम पर खुले तौर पर भेदभाव नहीं होता. मान्यताएं आज भी हैं, लेकिन पहले जैसी सख्ती नहीं रही. गांव का सामाजिक जीवन अब भी सामूहिकता पर टिका है.
युवा, शिक्षा और बाहर जाने की मजबूरी
बुठोत्रा गांव में युवाओं की संख्या लगभग पैंतीस से चालीस के बीच बताई जाती है. इंटरमीडिएट के बाद लगभग सभी युवा पढ़ाई या काम के लिए बाहर चले जाते हैं. गांव में उच्च शिक्षा के साधन नहीं हैं, इसलिए बाहर जाना मजबूरी बन गया है.
कुछ युवा प्रतियोगी परीक्षाओं और पीए जैसी सेवाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन गांव से अब तक बड़े पदों पर चयन बहुत कम हुआ है. लड़कियां भी अब पढ़ाई कर रही हैं और परिवार उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं.
महिलाएं, परंपरा और स्वास्थ्य की चुनौती
गांव में महिलाओं को लेकर पारंपरिक मान्यताएं अब भी मौजूद हैं. दिलीप कुमार बताते हैं कि माहवारी और गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को कुछ समय के लिए पूजा पाठ से अलग रखा जाता है. हालांकि अब इसमें पहले जैसी कठोरता नहीं रही.
स्वास्थ्य सुविधाएं बुठोत्रा गांव की बड़ी चिंता हैं. गंभीर बीमारी या गर्भावस्था में जटिलता होने पर महिलाओं को बाहर के अस्पतालों में ले जाना पड़ता है. दूरी, समय और संसाधनों की कमी कई बार जोखिम बढ़ा देती है.
खेल, टूर्नामेंट और गांव की एकजुटता
बुठोत्रा गांव में एक पुराना खेल टूर्नामेंट भी आयोजित होता है, जिसमें आसपास के कई गांव शामिल होते हैं. यह आयोजन एक कमेटी द्वारा किया जाता है और इसमें करीब एक लाख रुपये तक का पुरस्कार रखा जाता है. हिमाचल से भी टीमें आती हैं और कबड्डी जैसे पारंपरिक खेल खेले जाते हैं.
खेल मैदान पूरी तरह समतल नहीं हैं, लेकिन फिर भी खेल गतिविधियां गांव के सामाजिक जीवन को जोड़ने का काम करती हैं.
डेमोग्राफिक चेंज और बाहरी बसावट की चिंता
बुठोत्रा गांव में अब एक नई चिंता उभर रही है, जिसे ग्रामीण डेमोग्राफिक चेंज के रूप में देखते हैं. गांव के लोग बताते हैं कि आसपास के इलाकों में धीरे धीरे बाहरी लोग बसने लगे हैं. शुरुआत में एक दो परिवार आते हैं, फिर उनके रिश्तेदार भी आने लगते हैं और धीरे धीरे छोटी बस्तियां फैलने लगती हैं.
ग्रामीणों का कहना है कि कई जगहों पर सरकारी या वन भूमि पर अस्थायी डेरों के जरिए बसावट शुरू होती है. समय बीतने के साथ यही डेरें स्थायी घरों में बदल जाती हैं. प्रशासनिक ढील और अधिकारियों के तबादलों का फायदा उठाकर अतिक्रमण बढ़ता चला जाता है.
गांव के बुजुर्ग मानते हैं कि अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में यह बदलाव बुठोत्रा और आसपास के गांवों के सामाजिक संतुलन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.
बदलता गांव, बची हुई पहचान
बुठोत्रा गांव की कहानी उस पहाड़ की कहानी है, जहां परंपरा और बदलाव साथ साथ चल रहे हैं. छुआछूत और सामाजिक भेदभाव कमजोर पड़े हैं, शिक्षा की चाह बढ़ी है, लेकिन रोजगार, स्वास्थ्य और डेमोग्राफिक बदलाव जैसी समस्याएं अब भी जस की तस हैं.
ग्रामीण मानते हैं कि बदलाव जरूरी है, लेकिन खेती, थलियां, संस्कृति और सामूहिक जीवन ही आज भी बुठोत्रा की असली पहचान है.
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