Thursday, January 15, 2026

wbf

*World Book Fair 2026: कागज की किताब, भविष्य की चिंता और स्त्री जीवन के सवाल*

विश्व पुस्तक मेले में हर साल सैकड़ों किताबें आती हैं, लेकिन कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो पाठक को रुककर सोचने पर मजबूर करती हैं. World Book Fair 2026 के दौरान ये किताबें भविष्य, समाज और स्त्री जीवन से जुड़े जरूरी सवाल उठाती हैं.

*विश्व पुस्तक मेले के बीच कागज की किताब पर ठहरती एक कहानी*

डिजिटल दौर में जब पढ़ना स्क्रीन तक सिमटता जा रहा है, तब अनुराग शर्मा की किताब ‘आधी सदी का किस्सा’ कागज और किताब के महत्व पर ठहरकर सोचने को मजबूर करती है. किंडल पर उपलब्ध यह रचना भविष्य, तकनीक और मनुष्य के रिश्तों को कहानी के माध्यम से देखती है. World Book Fair 2026, किंडल और कागज की किताबों के बीच यह किताब एक जरूरी हस्तक्षेप बनकर सामने आती है.

*लेखक परिचय और लेखन की पृष्ठभूमि*

लेखक अनुराग शर्मा एक प्रतिष्ठित द्विभाषी लेखक, संपादक और सांस्कृतिक कर्मी हैं. उन्हें अप्रवासी हिंदी साहित्य सृजन सम्मान और राष्ट्रीय निर्मल वर्मा पुरस्कार सहित कई महत्वपूर्ण साहित्यिक सम्मान प्राप्त हैं.

किताब की शुरुआत से ही लेखक पाठकों को अपने अनुभव और समय के प्रवाह से जोड़ लेते हैं. ‘लेकिन तब से अब तक एमेज़ॉन, ब्रह्मपुत्र और ओहायो नदियों में बहुत पानी बह चुका है’ जैसी पंक्ति कहानी को पाठकों से जोड़ती है. नदी और पर्वत हमारे अपने अनुभवों का हिस्सा हैं और कहानी में उनका उल्लेख पाठकों में अपनत्व का भाव पैदा करता है.

*तकनीक, समय और पीढ़ी की चिंताएं*

‘एक तरफ़ कम्प्यूटरीकरण और ऑटोमेशन से लोगों का जीवन सरल हुआ और दूसरी ओर इस क्षेत्र ने संसार भर में अनेक नये और अभूतपूर्व बिज़नेस मॉडलों तथा नये पदों का सृजन किया’ लिखते हुए अनुराग शर्मा ने अपनी पीढ़ी की चिंताओं को कहानी का हिस्सा बना दिया है. इससे कहानी केवल कल्पना नहीं रहती, बल्कि हमारे समय का आईना बन जाती है और पाठकों की रुचि बनाए रखती है.

*किताब के भीतर किताब और प्रयोगात्मक शिल्प*

अनुराग शर्मा की पुस्तक ‘आधी सदी का किस्सा’ में यह विचार उभरता है कि इंसान सप्ताह के 40 घंटे या उससे भी अधिक के जानलेवा श्रम के लिए नहीं बना है. यह रचना इस बात की ओर इशारा करती है कि संसार के अधिकांश कार्य मशीनीकृत किए जा सकते हैं. लेखक द्वारा अपनी ही किताब को कहानी का हिस्सा बनाना इसे प्रयोगात्मक होने के साथ रोचक भी बनाता है और पाठक को लगातार चौंकाता है.

लेखक इतिहास को भी सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं. उनकी भाषा सरल है, लेकिन प्रभाव गहरा है. ‘यह भी एक विरोधाभास है कि डायनामाइट के खोजकर्ता नोबल के अकूत धन की सहायता से उसके नाम पर हर साल दुनिया के सबसे बड़े सम्मान दिए जाते थे, जिनमें नोबल शांति पुरस्कार भी था’ जैसी पंक्तियां पाठकों को उन घटनाओं पर सोचने के लिए मजबूर करती हैं, जिन्हें हम अक्सर सामान्य मानकर आगे बढ़ जाते हैं.

*रायन के बहाने समाज और पर्यावरण*

कहानी का मुख्य पात्र रायन है, जो हमारे समय से कहीं आगे की सोच का प्रतिनिधित्व करता है. रायन के बहाने लेखक वर्तमान के सामाजिक और पर्यावरणीय संकटों पर चिंता जाहिर करते हैं. ‘कसाईखानों की क्रूरता से लेकर सीवेज के मैनहोल में उतरकर मानव मल साफ करने जैसी मलिनता भी इनसानी मजबूरी थी’ जैसी पंक्तियां सामाजिक बुराइयों को सामने लाती हैं. वहीं ‘पाकिस्तान और भारत जैसे अव्यवस्थित और निष्क्रिय प्रशासन वाले देशों ने नदी और वर्षा जल का सदुपयोग करने के बजाय भूतल का सारा जल ही बाहर खींच लिया था’ लिखते हुए लेखक पर्यावरण के प्रति हमारी लापरवाही को उजागर करते हैं.

*समस्याओं के साथ समाधान की दृष्टि*

किताब की खास बात यह है कि लेखक केवल समस्याएं नहीं गिनाते, बल्कि उनके समाधान भी सुझाते हैं. कहानी या कहानी रूपी आलेख को इस तरह गढ़ा गया है कि वह हमारे कृत्यों से डराता भी है और समाधान पढ़ने के लिए प्रेरित भी करता है. ‘पानी का दुरुपयोग घटाने के लिए सबसे पहले तो जलहीन शौचालयों की तकनीक निकाली गई. उसके बाद निर्जला डिशवॉशर भी बने’ जैसी पंक्तियां इसी दृष्टि को सामने लाती हैं.

*वैश्विक राजनीति और भविष्य की कल्पना*

यह किताब केवल भारत के भविष्य तक सीमित नहीं रहती. यह पूरी दुनिया की बदल सकने वाली राजनीति और समाज की कल्पना करती है. ‘सऊदी अरब में सदियों से सताई गई नारियों ने और चीन में एक संतान नीति के अत्याचारों से बचने के लिए छिपाए गए बच्चों ने समानता क्रांति में मुख्य भूमिका निभाई’ जैसे अंश पाठकों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हैं.

पाठकों के लिए इस किताब में वह सब है, जिसकी उन्होंने शायद कल्पना भी न की हो. इसमें वर्णित भविष्य की वैज्ञानिक दुनिया रोचक होने के साथ चौंकाने वाली भी है. ‘इस तर्क की काट निकालने के लिए कुछ वैज्ञानिकों ने ऑर्गन हार्वेस्टिंग के लिए अब बिना दिमाग के मनुष्य बनाने पर काम शुरू कर दिया है, जिन्हें उन्होंने ऑर्गन जॉम्बी का नाम दिया है’ जैसी कल्पनाएं पाठक को ठहरकर सोचने पर मजबूर करती हैं.

*अन्य रचनाओं से अलग पहचान और आलोचनात्मक दृष्टि*

विज्ञान, पर्यावरण और सामाजिक विषयों में रुचि रखने वाले पाठकों को यह किताब खास तौर पर पसंद आएगी. मूल रूप से पुस्तकों के महत्व पर लिखी गई यह रचना अपने अंत में पाठकों के सामने इस डिजिटल दौर में कागज वाली किताबों के महत्व का सवाल छोड़ जाती है.

‘आधी सदी का किस्सा’ हिंदी की ऐसी रचनाओं से अलग दिखाई देती है जो केवल भविष्य का डर दिखाती हैं. यह किताब आने वाले समय की बात करते हुए आज की नीतियों, काम की व्यवस्था और इंसानी मूल्यों पर भी सवाल उठाती है. आमतौर पर भविष्य पर लिखी गई कहानियां सत्ता या तकनीक से पैदा होने वाली तबाही पर ही रुक जाती हैं, लेकिन यह किताब समस्याओं के साथ उनके समाधान की संभावना भी सामने रखती है. कुछ जगहों पर लेखक की सोच बहुत आदर्श लग सकती है, खासकर तब जब दुनिया की राजनीति और तकनीक में बदलाव आसान तरीके से होते दिखाए गए हैं, लेकिन इसे चेतावनी और बेहतर भविष्य की उम्मीद के रूप में भी पढ़ा जा सकता है. किताब की बनावट थोड़ी अलग है, जिसमें कहानी के भीतर विचार की बात आती है. यह तरीका सोचने वाले पाठकों को आकर्षित करता है, हालांकि हर पाठक के लिए यह पूरी तरह आसान नहीं है. इसके बावजूद यही अलगपन इस किताब को सामान्य कहानियों से अलग खड़ा करता है और इसे अपने समय की एक विचारपूर्ण रचना बनाता है.

*World Book Fair 2026 : पढ़ डालें स्त्री मुक्ति का नया पाठ*

यूट्यूब के 'कहानी माला' चैनल से जुड़ी डॉ. अंजु वेद का कहानी संग्रह 'अधूरी नहीं हूं' संजय प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया है. कवर पेज आकर्षक है और उसे देखकर लगता है कि यह पुस्तक World Book Fair 2026 के पाठकों को महिलाओं से जुड़े गंभीर और संवेदनशील मुद्दों से रूबरू कराएगी. किताब की शुरुआत में हंसराज कॉलेज, दिल्ली की प्राचार्या प्रो. रमा ने इसे स्त्री मुक्ति का नया पाठ कहा है और अपनी टिप्पणी में उन हिस्सों को रेखांकित किया है जो इस संग्रह की वैचारिक दिशा तय करते हैं. लेखिका ने 'संकलन के विषय में' यह स्पष्ट लिखा है कि उनकी कहानियाँ कृत्रिम नहीं हैं और सीधे जीवन से ली गई हैं. इससे पाठक के मन में संग्रह की सहज विश्वसनीयता स्थापित होती है.

*कहानियों की दुनिया और उनका स्वर*

किताब की पहली कहानी ‘कुनिया’ में लेखिका स्वयं कहानी के भीतर मौजूद दिखती हैं. 'अचानक मेरी दृष्टि पहली पंक्ति में खड़ी पहली बालिका पर पड़ी.' जैसे वाक्य कथा को व्यक्तिगत अनुभव और आत्मीयता से जोड़ते हैं. कुनिया के मासूम हावभाव को 'कुनिया की आंखें सजल हो उठीं, उसका गोल-गोल चेहरा खुशी से लाल हो गया.' जैसे वाक्यों से जीवंत कर दिया गया है. 'लड़की जात थी, कौन हाथ पीले करता उसके', पंक्ति हमारे सामाजिक मनोविज्ञान का कटु सच सामने रखती हैं. यही वह तीखापन है, जिसने प्रो. रमा को इस संग्रह की प्रशंसा करने पर मजबूर किया.

*ग्रामीण पृष्ठभूमि और संस्कारों की पुनरावृत्ति*

किताब की ज्यादातर कहानियाँ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित हैं और एक समान सांस्कृतिक धरातल साझा करती हैं. इनमें संस्कार, परंपरा, सामाजिक रूढ़ियाँ और स्त्री के लिए तय की गई भूमिकाएँ बार-बार उभरती हैं.

कई कहानियों में लेखिका संस्कारों के इर्द-गिर्द रहकर जीवन जीने की सीख भी देती हैं. नए और पुराने के द्वंद्व में यह भी दिखता है कि परंपरा को अक्सर सही और आधुनिक जीवनशैली को गलत ठहराने की प्रवृत्ति कई कथाओं में एकतरफा रूप में उभरती है.

इस दृष्टि से यह संग्रह विषय और भाव दोनों में एक-दूसरे से जुड़ी कहानियों का समूह है. नई कथ्य-तलाश या विविधता की अपेक्षा रखने वाले पाठकों को यहाँ कुछ समानता अधिक महसूस हो सकती है. परंतु ग्रामीण समाज में स्त्री की वास्तविक स्थिति को समझने वालों के लिए यह एक आवश्यक पाठ है.

*स्त्री संघर्ष, आकांक्षा और आत्मनिर्भरता*

शीर्षक कहानी 'अधूरी नहीं हूं' में यशवन्ती सामाजिक बेड़ियों को तोड़ते हुए आगे बढ़ती है. यह कहानी एक सीधा संदेश देती है कि बेटियाँ अपनी क्षमता के दम पर सब कुछ कर सकती हैं और उनका सशक्तिकरण परिवार के सहयोग से और तेज होता है. 'कल्पना' कहानी में विभिन्न वर्गों की महिलाएँ अपने-अपने संघर्ष, जिम्मेदारियाँ और छिपी आकांक्षाएँ लेकर सामने आती हैं. कमला, अपने पिता की मृत्यु के बाद “घर का मर्द” बन गई और पराग की मां, जिसे “बेचारी” कहना स्वीकार नहीं, इन दोनों के माध्यम से स्त्री जीवन की विविधताएँ संवेदनशीलता से उभरती हैं. 'क्या अपराध था' कहानी में ग्रामीण समाज की बहुओं की स्थिति और उन पर ढहते सामाजिक अत्याचार नजदीक से दिखाई देते हैं.

*डिजिटल युग और परंपरा के द्वंद्व वाली कहानियाँ*

किताब की कई कहानियां ओल्ड स्कूल शैली की हैं और आधुनिक डिजिटल जीवन से मेल नहीं खातीं. 'मैं मॉडर्न हूं' कहानी शहर और गांव के बीच बने पुल को दिखाती है, पर कथा का बदलाव उतना स्वाभाविक नहीं लगता. सपना के चरित्र परिवर्तन का कारण स्पष्ट नहीं है और लेखिका का आधुनिक व्यवहार पर टिप्पणी करना पूर्वाग्रहपूर्ण प्रतीत होता है.

*लिंगभेद और पारिवारिक संवेदनशीलता*

'लुभावन' कहानी बच्चों की परवरिश में लिंग आधारित भेदभाव को तीखे और सटीक ढंग से उजागर करती है. “मैं ही क्यों? तेजस को भेजो.” और “तेजस को ये चीजें बिना काम के ही मिल जाती थीं.” इन पंक्तियों से यह साफ पता चलता है कि कई परिवारों में लड़कियों और लड़कों के बीच संसाधनों और स्नेह का वितरण आज भी समान नहीं है.

कहानी का यह अतिरिक्त विवरण इसे और गहराई देता है: 'हमें चॉकलेट, बिस्कुट और बच्चों की पसंदीदा चीजें लुभावन के रूप में देती थी. हां, यह अलग बात है कि तेजस को ये चीजें बिना काम के ही मिल जाती थीं.' यह हिस्सा भेदभाव को और उभारता है.

बेटी द्वारा अस्पताल का बिल चुकाना इस कहानी का भावनात्मक शिखर है. 'सिया, आज तूने अपनी परवरिश का...' यह पंक्ति पाठक को भीतर तक छू जाती है.

*थर्ड जेंडर का चित्रण और अकेली महिला*

'तेरी पहचान' कहानी में 'सुंदरी' का चरित्र अत्यंत संवेदना से लिखा गया है. इसमें थर्ड जेंडर समुदाय के संघर्ष, प्रेम, समर्पण और आत्मसम्मान को सम्मानजनक स्थान मिला है. 'आप लोगों की इस तपस्या को सफल बनाने में मुझसे जो हो सकेगा, मैं प्राण देकर भी करूंगी.' यह वाक्य कहानी के साथ किताब को विशेष ऊंचाई देता है.

'कौन-सी बेटी' कहानी में उन सामाजिक व्यवहारों को उजागर किया गया है, जिनमें अकेली औरतों को पारिवारिक व सामाजिक आयोजनों से बाहर रखा जाता है. 'ऐसे अवसर में इनको नहीं बुलाते.' यह पंक्ति अकेली स्त्रियों के प्रति समाज की असंवेदनशीलता को स्पष्ट करती है.

*वर्णनात्मक शैली और लक्षित पाठक-वर्ग*

अंजु वेद की अधिकांश कहानियाँ वर्णनात्मक (descriptive) हैं और संवाद बहुत कम हैं. लेखिका दृश्य, भावना और परिवेश को धीरे-धीरे खोलती हैं और पाठक को कहानी के भीतर ले जाती हैं. यह लेखन-शैली उन पाठकों को विशेष आकर्षित करेगी जो स्त्री-विमर्श पढ़ते हैं और ग्रामीण पृष्ठभूमि की कहानियों में रुचि रखते हैं. किताब परंपरा और आधुनिकता के संघर्ष को समझने की चाह रखने वालों को भी पसन्द आएगी. यह संग्रह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो महिला मुद्दों पर लिखी संवेदनशील कहानियाँ खोजते हैं.

 'अधूरी नहीं हूं' एक ऐसा संग्रह है जो ग्रामीण जीवन, स्त्री संघर्ष और संस्कार-केंद्रित परंपराओं को बार-बार, कई कोणों से सामने लाता है. कई कहानियों में विषयों की पुनरावृत्ति है, पर वही पुनरावृत्ति इस बात का प्रमाण भी है कि हमारे समाज में स्त्री के जीवन की लाचारियां, उम्मीदें और सीमाएं लगातार एक जैसी ही बनी रहती हैं.

No comments:

Post a Comment

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...