Monday, January 19, 2026

बोली और भाषा एक : भाषाविद सुरेश पंत से एक्सक्लूसिव बातचीत

*बोली और भाषा एक : भाषाविद सुरेश पंत से एक्सक्लूसिव बातचीत*

कुमाऊँ मूल के भाषाविद सुरेश पंत सोशल मीडिया पर हिंदी और कुमाउँनी सिखाने के साथ अपनी किताब 'शब्दों के साथ साथ' को लेकर चर्चा में बने हुए हैं. उनकी कार्यस्थली दिल्ली रही है और मूल निवास उत्तराखंड में कुमाऊँ क्षेत्र का है.

हिंदी से जुड़ी अपनी महत्वपूर्ण कृतियों के लिए हिंदी अकादमी, दिल्ली सहित कई प्रतिष्ठित संस्थानों के द्वारा सम्मानित सुरेश पंत ने देहरादून में एनडीटीवी साथ अपने शोध, लेखन, कुमाउँनी भाषा और हिंदी शिक्षण से जुड़े अनुभव साझा किए. बातचीत की शुरुआत उनकी पहली पुस्तक से होती है और धीरे धीरे यह भाषा, समाज और पहचान के सवालों तक पहुंचती है.

*पहली पुस्तक और कुमाउँनी में मौलिक शोध*

सुरेश पंत बताते हैं कि उनकी पहली पुस्तक कुमाउँनी क्रियापदों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन थी. कुछ वर्षों बाद यही विषय उनका शोध विषय भी बना. यह शोध उन्होंने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से पीएचडी के लिए किया. बाद में इसी विषय पर उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई.

उन्होंने कहा कि उस समय देश के प्रमुख हिंदी भाषाविदों ने इस काम को विशेष महत्व दिया. प्रोफेसर जगन्नाथन, प्रोफेसर भाटिया, डॉ दिलीप और के के गोस्वामी जैसे विद्वानों ने इस शोध को हिंदी भाषाविज्ञान में दुर्लभ और मौलिक माना. उनका कहना था कि ऐसा काम हिंदी में भी नहीं हुआ था और कुमाउँनी में किया जाना इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है.

शोध में कुमाउँनी और हिंदी क्रियापदों का तुलनात्मक अध्ययन शामिल था. क्रियापदों के वैज्ञानिक वर्गीकरण को लेकर यह काम विशेष रूप से सराहा गया.

*पीएचडी से पहले का समय और उत्तरीय पत्रिका*

सुरेश पंत बताते हैं कि भाषा में उनकी रुचि पीएचडी से बहुत पहले की है. वे पर्वतीय भाषाओं में विशेष रुचि रखते थे. इसी रुचि के कारण उन्होंने 'उत्तरीय' नाम से एक अनियतकालीन लघु पत्रिका शुरू की. यह पत्रिका भाषा विज्ञान पर केंद्रित थी.

उनका उद्देश्य था कि उत्तरीय का एक विशेषांक पर्वतीय भाषाओं पर निकाला जाए. पर्वतीय भाषाओं से उनका आशय उस पूरे क्षेत्र से था जिसे ग्रियर्सन ने पश्चिमी पहाड़ी, मध्य पहाड़ी और पूर्वी पहाड़ी भाषाओं के रूप में वर्गीकृत किया था. यह क्षेत्र कश्मीर से लेकर नेपाल तक फैला है.

वे बताते हैं कि उन्होंने इस क्षेत्र में काम कर रहे भाषाविदों से लेख मांगे. शुरुआत में उन्हें भरोसा नहीं था कि लोग सहयोग करेंगे क्योंकि पत्रिका का पाठक वर्ग बहुत सीमित था. लेकिन जिन लोगों से उन्होंने संपर्क किया, उन्हें यह योजना पसंद आई और लगभग सभी ने लेख भेजे.

*कम प्रसार के बावजूद विद्वानों का भरोसा*

सुरेश पंत इस बातचीत में आगे कहते हैं कि उत्तरीय का प्रसार बहुत सीमित था. वे पचास से कुछ अधिक प्रतियां परिचितों को भेजते थे और कुल मिलाकर सौ से भी कम पाठकों तक पत्रिका पहुंचती थी. इसके बावजूद लेखकों ने कभी यह नहीं पूछा कि सर्कुलेशन कितना है.

अमेरिका की एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे अनूप चंदोला, हिमाचल, नेपाली और अन्य पहाड़ी भाषाओं पर काम कर रहे विद्वान और मैसूर स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान से जुड़े शोधकर्ता सभी ने खुशी खुशी लेख भेजे. उनके अनुसार यह अनुभव बताता है कि बौद्धिक काम का मूल्य पाठक संख्या से तय नहीं होता.

*आगरा वाला प्रसंग और बौद्धिक चोरी का अनुभव*

बातचीत के दौरान उन्होंने एक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि आगरा में पढ़ा रहे एक विद्वान ने उन्हें पत्र लिखकर कहा कि वे विषय पर लिख सकते हैं, लेकिन लिखेंगे नहीं. कारण यह था कि हाल ही में उन्होंने एक अपरिचित व्यक्ति के अनुरोध पर साठ से सत्तर पृष्ठों का एक आलेख लिखा था.

बाद में पता चला कि उस व्यक्ति ने उस आलेख को बढ़ाकर उस पर थीसिस लिखी और डीलिट की उपाधि प्राप्त कर ली. इसकी जानकारी उन विद्वान को नहीं दी गई.

*प्रकाशन, उपाधि और दृष्टि*

उत्तरीय में प्रकाशित लेखों को बाद में उन्होंने पुस्तक रूप में प्रकाशित किया. पहाड़ी भाषाओं पर यह उनकी पहली पुस्तक थी. जब उन्होंने इस पुस्तक की भूमिका अमेरिका में अनूप चंदोला को भेजी, तो उन्हें उत्साहवर्धक उत्तर मिला.

उन्हें प्रिय डॉक्टर पंत कहकर संबोधित किया गया, जिस पर उन्होंने स्पष्ट किया कि वे उस समय पीएचडी नहीं थे और स्वयं को एक साधारण हिंदी शिक्षक मानते थे. इसके बावजूद उन्हें शोध कार्य जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया. बाद में मित्रों और सहकर्मियों के आग्रह पर उन्होंने पीएचडी पूरी की.

उनका कहना है कि उपाधि से अधिक महत्व काम की ईमानदारी का है, लेकिन शैक्षणिक दुनिया में उपाधि की भूमिका को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता.

*व्याकरण से डर और उसे सरल बनाने की कोशिश*

सुरेश पंत स्वीकार करते हैं कि छात्र जीवन में उन्हें भी व्याकरण रोचक नहीं लगता था. कारण यह था कि व्याकरण को शास्त्रीय और रटंत पद्धति से पढ़ाया जाता है. संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया केवल परिभाषाओं तक सीमित रह जाते हैं.

यहीं से उन्हें यह समझ आई कि व्याकरण को जीवन से जोड़ना होगा. उन्होंने व्याकरण को खेल, उदाहरण, चुटकुले और दैनिक जीवन के अनुभवों के जरिए पढ़ाने की कोशिश की. यही दृष्टि उनकी पुस्तकों और लेखन की शैली में दिखाई देती है. सोशल मीडिया पर भी वे इसी तरह का प्रयोग करते हैं.

*देश भर में हिंदी शिक्षकों के साथ काम*

सुरेश पंत बताते हैं कि उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी शिक्षकों के प्रशिक्षण का अवसर मिला. वे एनसीईआरटी, इग्नू, नवोदय विद्यालय और केंद्रीय विद्यालय संगठन जैसे मंचों से जुड़े. उन्होंने देश के लगभग सभी राज्यों में कार्यशालाएं कीं.

उत्तर भारत में हिंदी मातृभाषा के रूप में पढ़ाई जाती है, जबकि दक्षिण भारत और अन्य क्षेत्रों में यह दूसरी या तीसरी भाषा है. इन अलग अलग परिस्थितियों में पढ़ाने की चुनौतियां भी अलग हैं. उनका मानना है कि शिक्षक तभी प्रभावी बनता है जब वह बच्चों के अनुभव से जुड़ता है.

*पहाड़ी भाषा और हीनता बोध*

सुरेश पंत कहते हैं कि एक समय था जब पहाड़ी बोलना हीनता से जोड़ा जाता था. पहाड़ से बाहर आए लोगों में यह भावना बैठ गई थी कि हिंदी या अंग्रेजी बोलने से प्रतिष्ठा मिलेगी. वे इसे केवल पहाड़ की समस्या नहीं मानते.

उनके अनुसार आज हिंदी भाषी समाज में भी अंग्रेजी को श्रेष्ठ और हिंदी को कमतर समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है.

सुरेश पंत स्पष्ट कहते हैं कि बोली और भाषा के बीच कोई मौलिक अंतर नहीं है. जो बोली जाती है, वही भाषा है. ब्रज, अवधी और खड़ी बोली सभी कभी बोली थीं. अंग्रेजी भी एक समय बोली ही थी.

*कुमाउँनी नाम की उत्पत्ति*

वे कुमाउँनी नाम की उत्पत्ति पर भी विस्तार से बात करते हैं. कुर्मांचल जैसी पुराणिक व्याख्याओं पर सवाल उठाते हुए वे कहते हैं कि संस्कृत कभी जनभाषा नहीं रही, इसलिए हर स्थान नाम को संस्कृत से जोड़ना सही नहीं है.

उनके अनुसार मूल नाम कुमूँ (कुमों) था. इससे कुमाओं बना और अंग्रेजी लिप्यंतरण के कारण कुमाऊन और कुमाऊनी शब्द प्रचलन में आए. अंग्रेजी में अनुनासिक ध्वनियों के लिए अलग संकेत न होने के कारण यह परिवर्तन हुआ.

*भाषा चेतना का वर्तमान दौर*

सुरेश पंत मानते हैं कि आज उत्तराखंड में भाषा को लेकर चेतना बढ़ी है. कुमाउँनी और गढ़वाली में कविता, कहानी, नाटक और व्यंग्य लिखे जा रहे हैं. संस्थाएं बन रही हैं और भाषा को लेकर संवाद हो रहा है.

उनके अनुसार भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान और स्मृति का आधार है. जब तक समाज अपनी भाषा को सम्मान नहीं देगा, तब तक उसकी सांस्कृतिक जड़ें कमजोर बनी रहेंगी.

सुरेश पंत की हाल के वर्षों में प्रकाशित पुस्तकों में 'शब्दों के साथ साथ भाग एक', 'शब्दों के साथ साथ भाग दो' और 'भाषा के बहाने' शामिल हैं. शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक 'साधो शब्द विचारो' भी इसी श्रृंखला का हिस्सा है. इसके अतिरिक्त शैक्षिक व्याकरण पर उनकी अनेक पुस्तकें आज भी विद्यालयों में पढ़ाई जा रही हैं. उन्होंने 'भाषा के बहाने नाम' से एक यूट्यूब चैनल भी प्रारंभ किया था, वह चैनल को समय नहीं दे पाते फिर भी चैनल के आज भी काफी फॉलोवर्स हैं.

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